हो सकता है कि आज के जमाने में किसी को यह अतिश्योक्ति लगे, मगर हमारे घर में अभी तक यह लगभग किसी नियम के तहत चलता आ रहा है कि रात में सोने से पहले माता-पिता का चरणस्पर्श करके ही हम सोने जाते हैं.. इसका सबसे बड़ा फायदा बचपन से ही मुझे यह दिखा है कि अगर किसी तरह कि अगर किसी तरह कि नाराजगी रही हो माता-पिता की तरफ से अथवा हम बच्चों कि तरफ से तो वह कभी भी अगले दिन तक नहीं खींचता था.. रात में जब आशीर्वाद लेने के लिए हम जाते थे तब वहीं उसका निपटारा हो जाया करता था.. अभी भी हम हर रात को आशीर्वाद लेने जाते हैं, मगर बच्चा 'फर्स्ट' होने के लिए सबसे पहले भागता था, सबसे पहले 'पाम'(प्रणाम) उसे ही जो करना होता था दादा-दादी को..
पापा-मम्मी के कमरे में आज भी मच्छरदानी का प्रयोग होता है.. बाकी हम लोग उसका प्रयोग करना बंद कर चुके हैं.. पापा का कहना है कि 'जो मच्छरदानी नहीं लगाता है वो हमको गंवार लगता है' और हमारा कहना है कि 'जो मच्छरदानी लगाता है वो हमें' :).. खैर जो भी हो, मगर चूंकि हमलोग उसका प्रयोग नहीं करते हैं सो बच्चे को भी उसके भीतर अजीब सा बंधन लगता है, और यह एक बहुत बड़ा कारण है कि वह रात में अपने दादा-दादी के पास कभी नहीं सोया है.. अभी एक दिन मैं मच्छरदानी में घुस कर, बच्चे को चिढा-चिढा कर पापा-मम्मी पर 'लार छिड़िया' रहा था, और बच्चा इतना अधिक स्वत्वबोधक(Possessive) कि मच्छरदानी में सब बंधा-बंधा होने के बावजूद अंदर घुस कर मुझसे कुस्ता-कुस्ती करने लगा और अंततः जब तक मैं बाहर नहीं निकल गया तब तक वह वहाँ से हटा नहीं..
बच्चे को हर दिन सुबह होने पर 'दारू' चाहिए होता था.. नहीं, यह पी कर तल्ली होने वाला दारू नहीं है, यह तो घर साफ़ करने वाला 'झाड़ू' है.. सुबह उठने पर जैसे ही उसका 'भक्क' टूटता था वैसे ही वह 'दारू-दारू' की रट लगा देता था, और जब तक 'दारू' उसके हाथ ना लगे तब तक उस बालकनी का दरवाजा पिटता रहता जिस बालकनी में 'दारू' रखा होता है.. दिन में और किसी भी समय वह 'दारू' की तलाश नहीं करता था, सिर्फ सुबह ही!! बच्चे को पता था कि सुबह के समय घर कि सफाई होती है.. हमारे यहाँ काम करने वाली को वह 'उवा' (बुवा) और उसकी बहन को 'उप्पा'(रूपा) बुलाता था.. नए जगह पर एक नयी काम वाली को देख कर बहुत देर तक परेशान रहा और फिर अपनी मम्मा से 'मम्मा उवा-उप्पा' का पता पूछता रहा..
कपड़े पहनने में उसके नखरे बड़े.. लेकिन जैसे ही किसी से सुन लिया 'तंदा-तंदा'(ठंढा), वैसे ही अपनी लाल वाली बन्दर टोपी लेकर पहुँच जाता.. अगर किसी ने 'तंदा-तंदा' नहीं बोला तो फिर कोई भी टोपी पहनाओ, तुरंत उतार फेंकता था.. उसे सबसे अधिक भय अपने छोटे पापा से ही था और अभी भी है, कि वो उसका पैंट (जो कि लगभग मेरे मोजा के बराबर आता है), उसका शर्ट, उसका 'छोक्छ'(शोक्स), उसका जैकेट, सब पहन लेंगे.. कम से कम इसी डर से चुपचाप बिना शोरगुल किये और बिना किसी को मेहनत कराये पहन लेता था.. पता नहीं भाभी अब भी उसे मेरा ही डर दिखा कर यह सब पहनाती होंगी या अब कुछ नयी बात हो चुकी होगी!!!!
कल रात भैया-भाभी और बच्चे के साथ मैंने Video Chatting की और सुबह पापा-मम्मी को चिढाया इस बाबत.. :) कम से कम इसी बहाने उनमें यह तकनीक सीखने की ललक तो पैदा हुई.. केशू अपने नए वाले घर में अपने बलखाती जुल्फों के साथ :)
काफी दिन हो गए पटना आये हुए, अब जाने का दिन भी नजदीक आ रहा है.. हर दिन पापा को चिढाता हूँ "अब बस चौदह दिन बचे हैं", "अब बस बारह दिन बचे हैं".. पापा कल तक बोलते थे कि "काहे याद दिलाता है, तुमको जब जाना है जाओ ना?" मगर जब आज वही बात मैंने उन्हें याद दिलाई तो बोले कि "अच्छा हुआ जो पहले से याद दिला रहा था, चोट कम लगेगी तुम्हारे जाने की.." :(
दीदी की बड़की बिटिया का जन्म हमारे यहाँ ही हुआ था, और बचपन में दीदी कि छुटकी बिटिया के मुकाबले मैं बड़की के ही अधिक संपर्क में रहा। उसके पैदा होने पर उसे हाथ में लेकर देखा था, मेरी हथेली में उसका पूरा धड़ और उसका सर मेरी अँगुलियों के सहारे से आराम से टिक जाता था। लगभग यही हाल भैया के बेटे का भी था। वो भी मेरी हथेलियों से बाहर नहीं निकल पाता था। दीदी कि बड़की बिटिया जब दो-ढाई साल कि हुई तब तक शैतानी उसकी शुरू हो चुकी थी, उसे शैतानी कम और नटखटपना अधिक कहा जाए तो ही ठीक रहेगा। इसी बीच पता नहीं कब मैं उसे अपना बेसबैट दिखा कर उसे बोल दिया कि बदमाशी करोगी तो इसी मोटा वाला डंडा से पिटाई लगेगी। मैं तो भला बोल दिया और वापस चेन्नई लौट आया, मगर घर में अब सभी उसे उसकी बदमाशी पर डराना शुरू कर दिए, "पछान्त! मोटा वाला डंडा लाना!!" मामा मुफ्त में बदनाम हुए। यूँ तो भैया का बेटा बहुत ही सीधा और बहुत ही अधिक नटखट है लेकिन इस बार मैंने देखा कि अगर उसकी कोई जिद्द पूरी ना हुई तो बस! सीधा जमीन पर 'ओंघराना' चालू। अब ठंढ के इस मौसम में उसे जमीन पर 'ओंघराने' से बेहतर उसकी जिद्द मान लेना लोगों ने भला समझा और यह देख कर वह उसे रामवाण!! फिर से मेरा वही नुस्खा काम आया, एक डंडा पास में रखना, जैसे ही ओंघराए वैसे ही वो डंडा दिखाना, फिर उसका मुंह बिसुराना, और जमीन से उठाकर मोटे से कालीन पर जाकर लेट जाना जिस पर ठंढ का कोई असर ना हो!! जिस दिन वह गया उसके अगले दिन सबसे पहले मैं वह डंडा अपनी नजर से दूर किया, बहुत याद दिलाता था उसकी!!
३ जनवरी की सुबह देर से उठा। अक्सर हर रोज अधिकतम साढ़े आठ से नौ के बीच उठ जाता था, बच्चे के जागने का समय सवा आठ से साढ़े आठ के बीच का होता था, और जैसे ही भक्क टूटे, बस वो, उसका सायकिल और उसके पीछे खाने का कटोरी लेकर भागती उसकी मम्मी! इसी धमाचौकड़ी में हर दिन नींद खुलती थी, अगर इससे नींद ना खुले तो बच्चा कमरे में आकर 'पापा-पापा...मोsss' करके डराने आ जाता। उसकी समझ में उसके 'मोssss' करके डराने से दुनिया के किसी भी शख्स का डरना जरूरी है, कम से कम अभी तक उसका यह विश्वास किसी ने नहीं तोड़ा। अब कोई इतने प्यार से डराए तो भला नींद कैसे ना टूटे? अगर वो डराने नहीं आया तो उसकी मम्मी/मेरी भाभी आकर मेरा कंबल जबरदस्ती खींच ले जाती थी। ३ जनवरी को जब बिस्तर छोड़ा तब तक साढ़े दस बज चुके थे, पापा-मम्मी मिलकर बच्चे से जुडी लगभग हर चीज कहीं ऐसी जगह ठिकाने लगा चुके थे जहाँ वह सुरक्षित भी रहे और नज़रों से दूर भी।
इस बच्चे के लिए आजकल हर कोई 'पापी' है। कभी "पापा पापी ऐ?" सवाल पूछता है, तो कभी "मम्मा पापी ऐ?" का सवाल! उसके इस पापी के अंतर्गत वो हर कोई आता है जिस पर यह पूरा हक जमाता है। जैसे डैडी, दादा, दादी, बुवा, हर कोई। जो कोई भी उसका अपना हो...बच्चा 'पानी' को 'पापी' बोलता है, और बहुत मासूमियत से "पापा पापी ऐ?" का सवाल आकर पूछता था। उस समय तो मैं उसे बोलता था, "तू पापी, तेरा पूरा खानदान पापी", मगर आज बहुत दिनों बाद फोन पर उससे यही सुनकर बहुत खुशी हुई। "पापा पापी ऐ"....
उसका 'उम्मा' भी गजब का था। 'उम्मा' मतलब 'चुम्मा'। अगर कोई चाहता है कि बच्चा खुद उसे 'उम्मा' करे तो उसके लिए बेहद आसान तरीका यह है कि उसका होंठ छू कर अपने होंठ पर सटा ले, बस इतना ही काफी है। उसे लगता है कि उसका 'उम्मा' अब उसके पास नहीं है, कोई और लेकर भाग गया, अब क्या है, वो पूरे घर में दौड़ेगा पीछे-पीछे, अपना 'उम्मा' वापस लेने के लिए, और तब तक पीछा नहीं छोडेगा जब तक की वो अपने होंठ से होंठ सटा ना ले! ये उसका 'उम्मा' वापस लेने का तरीका है। ये बात सिर्फ 'उम्मा' तक ही नहीं था, 'सू-सू' करके पैंट पहनने में बहुत नखरे करता था, एक बार मैं उसका 'सू-सू' 'कुवा'(कौवा) को दे दिया तब से तुरत अपना पैंट पहन कर बताता था, 'नई ऐ'। मतलब अब आप नहीं ले सकते हो। उसका मुंह, नाक, कान, सबका यही किस्सा। हर चीज को 'कुवा' से बचाता फिरता था। इधर घर आने पर मैंने बहुत बड़े-बड़े मूंछ बढ़ा रखे थे, जिस दिन उसे काटे उस दिन बहुत देर तक ढूँढता रहा, जब मैंने उसे बताया कि मेरा मूंछ 'कुवा' ले गया, तब बहुत खुश...कि पापा का मूंछ भी कुवा ले जा सकता है, अकेला मैं ही नहीं हूँ।
हर किसी बच्चे कि तरह वो हर किसी पर सिर्फ और सिर्फ अपना ही हक समझता है। उसकी दादी, मेरी मम्मी, की गोद में जब कभी सर रखूं तो झट से आ जाता। पहले प्यार से समझाता "नई पापा, नई!" अगर मैं नहीं मानता तो मुझसे कुश्ती होती उसकी, कभी हाथ पाकर कर खींचता, कभी आकर नखरे मारता। अंत में ब्रह्मास्त्र तो था ही उसके पास, एक बार भोमियाना शुरू हुआ नहीं की अब क्या मजाल कि कोई भी वहाँ बैठा रह सकता है?
जिस दिन मैं पटना आया था उस दिन उसके मन में बैठ गया था कि छोटे पापा उसके लिए 'बौल' ला रहे हैं। मैं इधर नहाने गया, और उधर वो मेरे सारे सामान को पलटने लगा। जब कहीं बौल नहीं मिला तो भोमियाने लगा। नहाने के बाद जब मैं वापस आया और उसे लेकर जब तक बाजार से बौल खरीद ना दिया, तब तक बच्चे को तसल्ली नहीं। पता नहीं इतने दिनों बाद भी देखकर पहचान कैसे गया था, या शायद अहसास हो गया होगा कि कोई अपना ही है, पता नहीं कैसे!! आज सुबह घर की साफ़-सफाई के समय फिर घर के किसी कोने से एक बौल निकलकर बाहर आ गया!!!!
उसे मौसी बोलना भी नहीं आता था। उसकी मौसी हमेशा 'तार'(कार) से आती थी, और 'तार' 'पों-पों' करता है, सो उसने अपनी मौसी का नाम ही 'पों-पों' रख दिया। बच्चे के दादा एक-दो बार उसके इस मौसी को 'पों-पों' बोलने पर नापसंदगी जाहिर कर चुके थे, सो बच्चा समझता था कि दादाजी गुस्सा हो जायेंगे। अब जैसे ही उसने अपनी मौसी को 'पों-पों' बोला और देखा कि किसी ने उसकी इस बात पर ध्यान दिया है कि तुरत पलट जाता था 'तार पों-पों, ऊ नई'!! और मैं भैया-भाभी को उलाहना देता कि बच्चे ने दुनियादारी का पहला सबक सीख लिया, झूठ बोलना!!
आज मुझे सुनाया कि उसका नाम 'छाछ्वत'(शाश्वत) है और उसके डैडी का नाम 'छुछमित'(सुस्मित) है!!!
लग रहा है जैसे घर भाँय भाँय कर रहा है। दिन भर घर में एक उत्पात जैसा मचाये रखने वाला लड़का!! भैया की शादी के समय वह लखनऊ में थे, और इधर शादी हुई और भैया का पोस्टिंग पटना हो गया। पापा-मम्मी भी खुश, भैया-भाभी भी खुश। देखते ही देखते साढ़े तीन साल भी निकल गए। एक बच्चा भी आ गया। पापा रिटायर भी इसी बीच हुए। मम्मी को दिन भर घर में अकेले रहने की आदत जो हो चुकी थी वह भी खत्म हो चुका था। अब कहीं भी जाओ, कोई ना कोई घर में रहता जरूर था। पापा-भैया दफ्तर गए तो मम्मी के लिए भाभी, और भाभी के लिए मम्मी। पापा रिटायर हुए तब तक बच्चे का आगमन घर में हो चुका था, सो दिन भर बच्चे के साथ लगे रहने में रिटायर होने कि तकलीफ से भी गुजरने का मौका नहीं मिला। दिन भी उड़ता ही चला गया। एक टिपिकल सास-बहु वाला तकरार पिछले तीन-साढ़े तीन साल में कभी नहीं हुआ। कुल मिलाकर एक आईडियल परिवार, जिसे देख कर जलने वाले भी खूब।
मूलधन से अधिक प्यारा सूद होता है – एक पुरानी कहावत।
मैंने बहुत सारी महिलाओं को झूठे आंसू बहाते देखा है। अधिकांशतः अपने रिश्तेदारों में ही। जो जैसे ही घर में घुसो नहीं कि बस्स!! लग गए टप-टप लोर चुवाने। घर से बाहर निकलो नहीं की फिर वही “आही रे बौवा!! जा रहल छी!!” और भोकार पार कर रोना चालू। और मुझे इससे सख्त नफरत है। थोड़ा मुंहफट भी हूँ, सो एक-दो बार टोक दिया ऐसा ही था तो उस समय वैसा क्यों बोल या कर रही थी, सो अब कम से कम मेरे सामने कोई झूठा लोर नहीं चुवाता है। पता नहीं यह जन्मजात गुण होता है या फिर सीखने वाली कला, कि जब चाहो तब आँख में आंसू भरकर रो लो!! लेकिन भाभी को मैंने देखा कार में चुपचाप अकेले में रोते हुए। बगल में सिर्फ मैं बैठा हुआ था, और वो झूठी कोशिश कर रही थी अपने आंसू छुपाने की। कोई दिखावटीपन नहीं, कोई आवाज भी नहीं, आवाज करने से कार के बंद सीसे में सभी सुन लेंगे शायद। मैंने भी कुछ टोका-टाकी नहीं किया। बस ये सोच रहा था कि कितनी बहु होती है जो अपने सास-ससुर के लिए रोती हैं? जवाब भी पता था कि जब बहु को बेटी जैसा प्यार मिले तो ऐसा हर घर में होगा।
सूद के अधिक प्यारे होने का कारण अब समझ में आ रहा है। अपने बच्चे के समय लोग दुनियादारी-कामकाज में उलझे रहते हैं। बच्चों से प्यार रहने के बावजूद उतना समय नहीं दे पाते हैं। ऊपर से कभी कभार बच्चों से सख्ती भी बरतनी पड़ती है, अनुशासन सीखाने के लिए। मगर पोते-पोती, नाती-नतिनी के समय लोग या तो रिटायर हो चुके होते हैं या फिर उसके करीब पहुंचे होते हैं। अब सारा समय उन्हीं बच्चों के साथ गुजरता है, लोग बाग शुरुवाती दिनों में उसी बच्चे में अपने बच्चे का बचपना ढूंढते हैं और बाद में बुरी तरह रम जाते हैं। अपने बच्चों से भी अधिक प्रेम भाव आ जाता है। ये मोह माया कि जकड़न बेहद बुरी होती है, ये जानते हुए भी लोग उसमें जकड़ते चले जाते हैं। बच्चा पैदा होता है तो माँ-बाप, बड़ा होने पर पति-पत्नी, कुछ दिनों बाद बच्चे, फिर नाती-नतिनी और पोते-पोतियां, और अगर उम्र फिर भी बाकी हो तो उनकी शादी के सपने भी संजोना। कोई तोड़ नहीं है इस माया जाल का।
ये तो बात रही बड़ों कि माया की! उस दो-ढाई साल के बच्चे की माया भी कम नहीं थी। सुबह उठते ही सबसे पहले उसे दादा चाहिए। उस समय अपने माँ-बाप की गोद भी नहीं सुहाती थी। उस समय बालकनी से दिखने वाले सभी कारों पर सिर्फ उसका और उसके दादा का ही आधिपत्य वह समझता था, उन कारों को देखने का अधिकार वह किसी और को कभी नहीं देता था। कुछ दिन पहले तक उसके लिए ‘तू’(टू) ही सबसे बड़ी संख्या थी, बाद में उसके शब्दकोष में कुछ और इजाफा हुआ, एक नया शब्द जुड़ा ‘बिग’!! पहले उसका अपना जो कुछ भी था वह ‘वन’ था, और वन बोलना उसे आता नहीं था। ऐसे में ‘तू नई’ या फिर अपनी छोटी सी तर्जनी दिखाना भर ही उसके लिए वह होता था। अब नए नए शब्द सीखने के बाद उसके पास जो कुछ भी है वह ‘बिग’ है। अपने दादा ‘बिग दादा’, अपनी दादी ‘बिग दादी’, अपनी नानी 'बिग नानी', अपने नाना 'बिग नाना', अपने छोटे पापा ‘बिग पापा’, अपना सायकिल ‘बिग सायकिल’!! बाकी दुनिया ‘टू’! माने 'स्माल'!! अब तक वो ‘तू’ से ‘टू’ तक का सफर भी तय कर चुका था। और हर ‘बिग’ पर उसका एकाधिकार था। उसके जाने वाले दिन ही एक नया शब्द उससे सुना ‘ईरी’ माने थ्री।
“आत नई ऐ”, “आत आ गया”। यह उसका नया खेल था। ठंढ के इस मौसम में जब कभी वो कंबल के भीतर घुसा होता था तब अपने हाथ हो कंबल के भीतर घुसा कर यह खेल खेलता रहता था। भोली सी मुस्कान, चेहरे पर शरारत, और तोतली बोली, ऊपर से यह खेल। भैया ही सिखाएं हैं उसे ये सब। मुझे याद है, बचपन मए ठंढ के मौसम में भैया और मैं तक़रीबन ऐसा ही खेल खेला करते थे, सोने से पहले कम से कम आधे घंटे के लिए तो जरूर। उस खेल का नाम था “भूत-भूत”, इस खेल के नियम का पहला नियम यह कि कोई नियम नहीं। अचानक दोनों में से कोई भी एक बोलता “भूत आ गया” और दोनों ही रजाई के भीतर सर छिपा लेते, फिर कोई भी एक बोलता “भूत चला गया” और दोनों ही रजाई से अपना चेहरा धीरे से बाहर निकाल लेते। ‘बौवा’ ने भी पहले अपने डैडी से यही खेल सिखा और उसके लिए उस खेल का नाम “भाकौंवा-भाकौंवा” था, बाद में उसने खुद ही “आत नई ऐ” नाम का खेल इजाद कर लिया।
हमारे घर के हर कमरे में दो सफ़ेद रौशनी देने वाला बल्ब लगा हुआ है और कहीं कहीं ट्यूबलाईट भी। मगर दो बल्ब तो जरूर से जरूर है। अब ऐसे में अगर किसी कमरे में सिर्फ एक बत्ती जल रही हो तो बच्चा आकर परेशान-परेशान कर देता "तू आईत!! तू आईत" की रट लगा देता, और जब तक उसका "तू आईत" नहीं जलता तब तक "तू आईत!! तू आईत!!" रटता रहता।
जब कभी मैं ‘लाई’ (भूजे हुए चूड़े, या मुरही जैसी चीजों को गुड के साथ मिलाकर बनाया गया लड्डू जैसा खाद्य पदार्थ) खाने के लिए जाता था तब बच्चा मेरे पीछे भाग कर आता था ‘आई’ मांगने। मैं पूछता कौन सा लाई, ‘ऐ वाला’ मुरही वाले के तरफ दिखा कर बोलता था। ‘वन’ चाहिए या ‘टू’ (सनद रहे वो हर बात पर टू बोलता है), वो अपनी तर्जनी उठा कर ‘वन’ दिखाता था, उसे ‘वन’ बोलना नहीं आता ना!! मैं उसे बोलता कि मुंह से बोलो तब दूँगा, फिर वह बोलता ‘टू नई’, मतलब वन!! “बिग चाहिए या स्माल?” अब जबकि उसे हर चीज ‘बिग’ चाहिए होती थी, मगर अभी वो बोलता ‘बिग नई’! क्योंकि ‘बिग’ वाला लाई वो खा नहीं पाता था।
हमारी माया तो वो था मगर उसकी माया उसके खिलौने ही तो थे। अधिकाँश खिलौने भैया के जाने वाले सामान के साथ बंधवा दिए थे। कुछ बाक़ी थे, जिसमें से कुछ या तो जाने के हालत में नहीं थे, या फिर सामान के यहाँ से जाने के बाद ख़रीदे गए थे, या फिर मैंने रुकवा लिए थे कि पन्द्रह दिन कैसे रहेगा यह यहाँ इनके बिना – वहाँ जाकर नया ले लेगा। इसमें उसकी सबसे प्यारा तीन पहिये वाली सायकिल, जिसे वह किसी को नहीं, अपने दादा अथवा डैडी को भी नहीं, छूने देता था और दिन भर उस सायकिल पर ‘पीं...पीं...’ की आवाज मुंह से निकालते हुए दौड़ता था। अगर बदमाशी कर रहा हो, या उसका ध्यान कहीं और भटकाना हो तो बस इतना ही कह दो कि कोई उस सायकिल पर बैठ रहा है या छू भी रहा है तो बस्स!!! सब कुछ छोड़ कर अपने सायकिल की सुरक्षा में लग गया। उस दिन मेरे भतीजे प्रेम कि वाह-वाही हो रही थी, मगर अब घर भर में मुझे कोसा जा रहा है। जब जब किसी को वह सायकिल नजर आती है, एक बार मुझे मन भर कोस लिया जाता है!! "यही लड़का के कारण सायकिल यहाँ है, इसे देख कर याद अधिक आती है!!"
फिलहाल तो उसकी सब माया धरी रह गई सी लगती है, और वो अहमदनगर पहुँच चुका है, कुछ नया सीखने, नयी दुनिया से परिचय लेने!!
पापा-मम्मी के लिए लिए तो फिलहाल वही बच्चा सबसे बड़ी माया था!!!!! आज शाम में एक कार नीचे में बैक कर रहा था, उससे निकलने वाली आवाज सुन कर बच्चा दौड कर खिडकी के पास जाकर अपने अंगूठे और तर्जनी को उसकी आवाज पर सिंक्रोनाइज करके “तार पों पों..पों पों” बोलता था, लगा जैसे कि बच्चा उधर ही कहीं खिडकी से झाँक रहा है!! जिस दिन वो गया उस दिन रात में पहली बार पापा को रोते देखा। २ जनवरी २०११!!!
ऊपर तस्वीर में पटना एअरपोर्ट पर पापा के साथ भैया-भाभी और बच्चा। बच्चा भी समझ गया है कि कुछ गडबड है, सो सहमा हुआ चुपचाप मुरझाया सा चेहरा लेकर गोद में बैठा हुआ है!!
पता है आपको, आज मेरा पहला जन्मदिन है.. और मेरे पहले जन्मदिन पर छोटे पापा ने मुझे सुबह-सुबह ढ़ाई बजे एक कविता लिख कर एस.एम.एस. किया.. आज आप वही कविता पढ़िये.. कल आपसे ढ़ेर सारी बातें करूंगा, अब मैं बड़ा जो हो गया हूं..
देखो, देखो ये मेरा ढ़ोल डैडी लाये मुझे बिन बोल मैं बजाऊं ढम धम् ढम देख इसे खुशी छाये हरदम ये है मेरी रेल गाड़ी बैठ घूमू मैं दुनिया सारी लाल रंग की गेंद है मेरी पास में रखी हुई एक लॉरी चाभी से यह चलती है कभी शोर ना करती है डैडी का लैपटॉप है मेरा तबला हैप्पी बड्डे केशू, हुआ ये हल्ला एक बात तो आपको बताना ही भूल गया.. डैडी बर्थडे गिफ्ट में मेरे लिये नया वाला ढोल लाकर दिये हैं, जिसे मैंने बर्थडे से पहले ही निकाल कर बजाना शुरू कर दिया है.. उसे बजाने में मैं बिलकुल खो जाता हूं.. एक बार जब मैं ढोल बजाने में खोया हुआ था तभी डैडी मेरा फोटो ले लिये.. देखिये इसमें..
डैडी एक विडियो भी लिये थे जिसे आप पहले ही यहां देख चुके हैं.. क्या कहा? आप नहीं देख पाये थे? तो इस लिंक पर जाकर देख लिजिये..
चलते-चलते इस लिंक को भी देखते जाईये.. आज से एक साल पहले मैं कैसा दिखता था.. मगर अब बिलकुल स्मार्ट और हैंडसम हो गया हूं..
क्या आपने मेरा ढोल देखा है? क्या कहा, नहीं देखा है? तो आज देख लें, बाद में ये मत कहें कि केशू ने अपना ढोल भी नहीं दिखाया.. अभी देखने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आपको मैं फ्री में बजा कर भी सुना रहा हूं..