Thursday, June 11, 2009

कहानी मां की

मुझे याद नहीं है कि मैंने यह कब लिखा था.. बस इतना ही याद है कि रात में किसी बेख्याली में मम्मी को एस.एम.एस.मे यह लिखकर भेजा था.. आज यही सही..

मां याद है तुम्हें?
कैसे तुम्हारी कहानियों में,
नायक हमेशा जीतता रहा है..
खुद को जाने कितनी ही बार
उस नायक के स्थान पर
देख चुका हूं मैं..
लड़ाई में मगर अकेला पर जाता हूं..
इस नायक का हौशला भी
टूटता सा लगता है..
तुम आ जाओ मां..
आज फिर उन कहानियों कि जरूरत सी है..

17 comments:

  1. सच कहा प्रशांत भाई ..मेरे पास तो सिर्फ माँ की यादें बची हैं माँ नहीं...भावुक कर दिया आपने...

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  2. बेखयाली में भी सुन्दर रचना। किसी शायर के शब्दों में कहूँ तो-

    निकले जो घर से माँ की दुआएँ लिए हुए।
    बढ़कर हमारे रास्ते आसान हो गए।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  3. पीडी, मां की याद दिलाने के लिए शुक्रिया। यादों के संसार के भावों में बहती अच्छी याद।

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  4. तुम आ जाओ मां..
    आज फिर उन कहानियों कि जरूरत सी है.

    बचपन के एइसे ही कुछ एहसास...... माँ के करीब बीते हुवे पल संबल देते हैं जीवन में ............ भावुक रचना

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  5. बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

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  6. ये पढ़ कर तो माँ दौड़ी चली आयेगी प्रशान्त...

    बहुत प्यारा..

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  7. हौसला बनाये रखो जवान।
    तुम्हारे पास माँ है।

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  8. mera hausla to isi se bana rehta hai ki mere pass maa hai

    bahut achchhi rachna PD bhai

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  9. बचपन के यही अहसास जीवन की आपाधापी में हमारा सहारा बनते है.

    ... बहुत सुन्दर

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  10. कभी मां ऐसे ही याद आती है। सुंदर भावाभिव्यक्ति।

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  11. हम तीनो भाई आज भी मां को बचपन मे सुनाई कहानिया सुनाओ कह कर तंग करते हैं।बहुत सुन्दर लिखा पीडी।

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  12. sach hai maa ki kahaniya aisi hi hoti hai

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  13. मॉं की ममता की कीमत वही बेहतर जानता है, जिसकी मॉं न हो।

    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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