Friday, May 21, 2010

एक गंजेरी की सूक्तियां

एक-

गँजेरी डरता है तूफ़ान से
तब
जब बची हो
सिर्फ एक तीली

और चलती हो
दिलों में आंधियां

दो-

धुवें में
बनती है शक्लें भी
बिगड़ती हैं शक्लें भी

यह कोई जेट प्लेन का धुवाँ नहीं
जो सीधी लकीर पे चले

तीन-

सिगरेट पीने वाले को गालियाँ
सिर्फ वही दे

जिसने नहीं पीया है
प्रदुषण का धुवाँ

चार-

सुना कि सिगरेट धीमा जहर है
धीरे-धीरे मारती है

जिंदगी और भी धीमा जहर है
यह बहुत दूर घेर के मारती है

पांच-

समाज के छुवाछूत को
इसी ने किया होगा
छिन्न-भिन्न सर्वप्रथम

जब एक सिगरेट को
दस लोगों ने बांटा होगा
साथ-साथ

छः-

पटना के गंजेरियों से
अलग नहीं है
दिल्ली का गंजेरी

छल्ले हर जगह एक से ही उड़ते हैं

सात-

जिन्हें नहीं चढ़ता है
नशा शराब से
वह पीता है धुवाँ भी

आखिर सब कुछ नशा ही तो नहीं होता

आठ-

लोग पूछते हैं
चाय के साथ
क्यों पीया जाता है सिगरेट
कोई अलग सुकून के लिए क्या

हम पूछते हैं
सुकून के लिए भी कोई
मुंह कड़वा करता है भला

नौ-

रात के तीन बजे
उठता है कोई

जलता है सिगरेट कोई
उठता है धुवाँ कहीं

दस-

सिगरेट जलाने वाले
जलते हैं खुद भी कहीं

एक आग सी लगती है कहीं
एक धुवाँ सा उठता है कहीं

यह पोस्ट "एक शराबी कि सूक्तियां" कि नक़ल भर है.. असली लुत्फ़ उठाना हो तो उधर जाए.. कसम धुवें और शराब कि, मजा आ जाएगा.. ;-) नजरें इधर भी इनायत करें.. :)

Thursday, May 13, 2010

दोस्ती को रीडिफाइन करने का समय

छुटपन में घर के बड़े कभी भी किसी से अधिक दोस्ती बढ़ाने के लिए नहीं कहते थे.. बिहार में उस समय जैसे हालत थे उसमे उनका यह एतराज जायज भी था.. समय बदला, हम बच्चो ने भी अपने आसमान तलाशने शुरू किये, फिर कई दोस्त भी बने.. कुछ समय के साथ चले तो कुछ चले गए.. अब से कुछ समय पहले तक के जितने भी मित्र मेरे रडार सीमा से बाहर निकले, उनमे से एक-आध को छोड़ कर किसी अन्य को लेकर दुःख नहीं हुआ.. घर के बड़े भी अब उस दोस्ती के रिश्ते में मीन-मेख निकालना छोड़ कर यह शिक्षा दिए कि यही वह एकमात्र रिश्ता है जिसे बनाने का अधिकार मनुष्य को खुद मिलता है.. शायद वे यह समझने लगे थे कि बच्चे अब बड़े हो रहे हैं और अपना भला-बुरा समझने लगे हैं..

खैर, समय के साथ हर चीज बदलती है तो फिर दोस्ती जैसे रिश्ते क्या चीज हैं? जो मुझे सबसे करीब के लगते थे, उनसे अनजानो सा व्यवहार खल रहा है.. ऐसा लग रहा है जैसे या तो मैं समय के साथ चूक गया हूँ या फिर नकार दिया गया हूँ.. चलो, जीवन का एक पाठ और सही..

मुझे आजकल ऐसा लग रहा है जैसे अब समय आ गया है कि इस रिश्ते को मैं रीडिफाइन करूँ..

नोट - मैंने इस पोस्ट पर कमेन्ट का अधिकार नहीं दिया है, कृपया किसी अन्य पोस्ट पर जाकर इससे संबंधित कमेन्ट ना करें.. अगले पोस्ट में मैं पिछले छोड़े हुए पोस्ट की कड़ी को आगे बढाता हूँ..

Sunday, May 09, 2010

माँ से जुडी कुछ बातें पार्ट 1

मैंने मम्मी से बचपन में कभी राजा-रानी या शेर-खरगोश कि कहानी नहीं सुनी.. या शायद कोई भी कहानी नहीं सुनी है.. जब से होश संभाला, मैंने उन्हें डट कर मेहनत करते पाया.. पूरे घर को एक किये रहती थी.. और उस एक करने के चक्कर में हम बच्चे उनसे डरे सहमे रहते थे.. किसी बात पर गुस्सा होकर किसी से २-४ दिन या शायद १२-१३ घंटे बात नहीं करती थी.. शायद इसलिए क्योंकि मुझे याद नहीं, वह उम्र कुछ याद करने कि थी भी नहीं और उस उम्र कि बाते अक्सर किसी को याद रहती भी नहीं है.. उनके किसी से बात ना करने के समय अक्सर हम बच्चों को उनके पास भेजा जाता था.. मनाने के लिए नहीं, बस यूँ ही.. और उसमे भी प्राथमिकता मेरे ऊपर ही अधिक होती थी (छोटा होने कि वजह से).. उनके गुस्से कि वजह अक्सर क्या होती थी मुझे नहीं पता, और ना ही मैंने कभी माँ से इस बाबत पूछा है.. मगर अंदाज से बता सकता हूँ कि एक संयुक्त परिवार का सारा बोझ अकेले ढोना ही वह वजह हो सकती थी.. अब इससे अधिक मुझे और कुछ याद नहीं है, आखिर मैं उस समय ४-५ साल से अधिक का नहीं था.. हाँ मगर यह बात जरूर थी कि हम बच्चे माँ से अधिक पिता कि गोद में समय बिताते थे.. पापा जी का गोद हम सभी के लिए सबसे अधिक सुरक्षित जगह हुआ करती थी..

कभी कभी अंतर्मन में बसी हुई कुछ बीती बातें किसी सिनेमेटिक सीन कि तरह फ्लिक करके निकल जाती है.. जिसमे मैं मम्मी कि गोद में बैठ उनसे कुछ उटपटांग बाते पूछता रहता हूँ, वे बाते क्या थी यह नहीं दिखता है.. शायद वैसी ही बाते होंगी जैसे कि दीदी कि बिटिया दीदी से सवाल पूछती है, या फिर भैया का बेटा कुछ और महीने बाद भाभी से वैसे ही प्रश्न पूछे..

जब घर से पहली बार अपनी दुनिया तलाश करने बाहर निकला तब मेरे साथ कुछ अजीब से संयोग बनते गए.. जब पहली बार दिल्ली जा रहा था तब पटना में घर में कोई नहीं था, सभी मुझे कुछ दिन रुक कर जाने के लिए कह रहे थे और मैंने किसी कि ना सुनते हुए अपना सामान बाँधा और निकल गया अपनी जमीन तलाशने.. घर कि चाभी सामने पड़ोस में रहने वाली भाभी को दे दिया.. फिर उसके बाद जब भी घर(पटना) आता तो वहाँ कोई नहीं होता था.. मैं उन्ही पड़ोस वाली भाभी से चाभी लेता, कुछ घंटे आराम करता और गोपालगंज के लिए निकल लेता जहाँ पापा उस समय पोस्टेड थे.. ऐसे ही होते-होते लगभग एक साल निकल गए.. मेरा दिल्ली-पटना-गोपालगंज आना जाना चलता रहा.. मुझे याद है, पहली बार माँ को याद करके दिल्ली के उस एक छोटे से कमरे में रोया था, जिसे लोग बरसाती के नाम से दिल्ली में जानते हैं..

फिर एक दिन अचानक से VIT से MCA के प्रवेश के लिए बुलावा आ गया, और जिंदगी में पहली बार हवाई जहाज कि यात्रा भी कि.. मन में अजीब से ख्यालात भी चलते रहे थे उस ढाई घंटे कि हवाई यात्रा में.. कम से कम उत्साह तो कहीं भी नहीं था.. थोडा सा डिप्रेशन और घबराहट के साथ-साथ मन में यह भी चल रहा था कि पापाजी के मेहनत से कमाए दस हजार इस बेकार कि हवाई यात्रा में खर्च हो रहे हैं.. डिप्रेशन इस बात की थी कि मैं घर जाने और मम्मी से मिलने के लिए छटपटा रहा था.. और घबराहट इस बात की थी कि मेरे पास कुछ भी सामान नहीं है, नई जगह होगी, नई भाषा के साथ-साथ नए लोग भी होंगे.. कैसे सब ठीक से कर पाऊंगा? अंग्रेजी ठीक से बोल नहीं पाता था उस समय, और ऐसे शहर में अकेला जा रहा था जहाँ अंग्रेजी ही एकमात्र माध्यम था बातचीत का.. थोड़ी बहुत उन दिनों भैया से भी शिकायत थी कि कम से कम वही तो मेरे साथ चलते, मगर बाद में समझ आया कि वो भी अपना कैरियर बनाने में उस समय उलझे हुए थे..

खैर, प्रवेश ले लिया और कक्षा शुरू होने में ५-६ दिन थे.. मैंने निर्णय लिया कि वापस पटना जाऊं और मम्मी से मिलने के साथ-साथ अपने जरूरी सामान भी लेता आऊंगा.. रेल से २ दिन वापस पटना आना और २ दिन वापस कालेज जाने को छोड़कर सिर्फ एक या डेढ़ दिन हाथ में थे.. घर फोन करने पर पता चला कि कुछ जरूरी चीजों के कारण पटना में कोई नहीं रहेंगे, और चाभी बगल वाली भाभी के पास रहेगा..

जारी...

Saturday, May 08, 2010

ओ देश से आने वाले बता - "पैगाम-ए-मुहब्बत"

ओ देश से आने वाले बता
किस हाल में है यार-ए-वतन
वो बाग-ए-वतन, फ़िरदौस-ए-वतन
क्या अब भी वहां के बागों में
मस्तानी हवाऐं आती हैं
क्या अब भी वहां के पर्वत पर
घनघोर घटाऐं छाती हैं
क्या अब भी वहां की बरखाऐं
ऐसे ही दिलों को भाती हैं
ओ देश से आने वाले बता
----अख्तर शीरानी

वो शहर जो हमसे छूटा है
वो शहर हमारा कैसा है
सब लोग हमें प्यारे थे मगर
वो जान से प्यारा कैसा है
ओ देश से आने वाले बता
----अहमद फ़ैराज़

ओ देश से आने वाले बता
क्या अब भी वतन में वैसे ही
सरमस्त नजारें होते हैं
क्या अब भी सुहानी रातों में
वो चांद सितारे होते हैं
हम खेल जो खेला करते थे
क्या अब भी वो सारे होते हैं
ओ देश से आने वाले बता
----अख्तर शीरानी

शब बज़्म-ए-हरिफ़ां सजती है
या शाम ढ़ले सो जाती हैं
यारों कि बसर औकात है क्या
हर अंजुमन-ए-आरा कैसा है
ओ देश से आने वाले बता
----अहमद फ़ैराज़

ओ देश से आने वाले बता
क्या अब भी महकते मंदिर से
नाकूस की आवाज आती है
क्या अब भी मुकद्दस मस्जिद पर
मस्ताना अजान थर्राती है
क्या अब भी वहां के पनघट पर
पन्हारियां पानी भरती है
अन्गराई का नक्सा बन-बन कर
सब माथे पर गागर धरती हैं
और अपने घरों को जाते हुये
हंसते हुये चुहले करती हैं
ओ देश से आने वाले बता
----अख्तर शीरानी

महरान लहू कि धार हुआ
वो लान भी क्या गुलनार हुआ
किस रंग का है दरिया-ए-अटक
रावी का किनारा कैसा है
ऐ देश से आने वाले मगर
तुमने तो ना इतना भी पूछा
वो कवि जिसे बनबास मिला
वो दर्द का मारा कैसा है
ओ देश से आने वाले बता
----अहमद फ़ैराज़

क्या अब भी किसी के सीने में
आती है हमारी चाह बता
क्या याद हमें भी करता है
अब यारों में कोई आह बता
ओ देश से आने वाले बता
लिल्लाह बता..लिल्लाह बता..
----अख्तर शीरानी



यह गीत नीरज रोहिल्ला के सौजन्य से.. :)



यह मुजफ्फर अली द्वारा कम्पोज किया हुआ एवं आबिदा परबीन द्वारा गया हुआ, "पैगाम-ए-मुहब्बत एल्बम से लिया गया है.. एक आग्रह के साथ इस गीत को पोस्ट कर रहा हूँ कि अगर किसी को इस एल्बम के MP3 का पता मालूम हो तो बताएं.. कबाड़ियों से कुछ अधिक ही उम्मीद लगाये बैठा हूँ(अगर कोई कबाड़ी मुझे पढते हो तो)..

Thursday, May 06, 2010

मैं कई बार मर चुका हूंगा - पाब्लो नेरूदा

सारी रात मैंने अपनी ज़िन्दगी तबाह की
कुछ गिनते हुए,
गायें नहीं
पौंड नहीं
फ़्रांक नहीं, डालर नहीं...
न, वैसा कुछ भी नहीं


सारी रात मैंने अपनी ज़िन्दगी तबाह की
कुछ गिनते हुए,
कारें नहीं
बिल्लियाँ नहीं
मुहब्बतें नहीं...
न!


रौशनी में मैंने अपनी ज़िन्दगी तबाह की
कुछ गिनते हुए,
क़िताबें नहीं
कुत्ते नहीं
हिंदसे नहीं...
न!


सारी रात मैंने चांद को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
बोसे नहीं
वधुएँ नहीं
बिस्तर नहीं...
न!


लहरों में मैंने रात को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
बोतलें नहीं
दाँत नहीं
प्याले नहीं...
न!


शान्ति में मैंने युद्ध को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
सड़कें नहीं
नगमें नहीं...
न!


छाया में मैंने ज़मीन को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
बाल नहीं झुर्रियाँ नही
गुम गई चीज़ें नहीं...
न!


ज़िन्दगी में मैंने मौत को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
क्या उस सबको भी जोड़ा जाय ?
याद नहीं पड़ता...
न!


मौत में मैंने ज़िन्दगी को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
नफ़ा कहूँ या नुकसान !
नहीं जानता
न ज़मीन ही...
वग़ैरह वग़ैरह..

सुरेश सलिल जी द्वारा स्पेनिश से हिंदी में अनुवादित.

नेरूदा के बारे में अधिक पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ..

Tuesday, May 04, 2010

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई

हाथी से आई

घोड़ा से आई

अँगरेजी बाजा बजाई, समाजवाद...

नोटवा से आई

बोटवा से आई

बिड़ला के घर में समाई, समाजवाद...

गाँधी से आई

आँधी से आई

टुटही मड़इयो उड़ाई, समाजवाद...

काँगरेस से आई

जनता से आई

झंडा से बदली हो आई, समाजवाद...

डालर से आई

रूबल से आई

देसवा के बान्हे धराई, समाजवाद...

वादा से आई

लबादा से आई

जनता के कुरसी बनाई, समाजवाद...

लाठी से आई

गोली से आई

लेकिन अंहिसा कहाई, समाजवाद...

महंगी ले आई

गरीबी ले आई

केतनो मजूरा कमाई, समाजवाद...

छोटका का छोटहन

बड़का का बड़हन

बखरा बराबर लगाई, समाजवाद...

परसों ले आई

बरसों ले आई

हरदम अकासे तकाई, समाजवाद...

धीरे-धीरे आई

चुपे-चुपे आई

अँखियन पर परदा लगाई

समाजवाद उनके धीरे-धीरे आई ।

गोरख पाण्डेय जी द्वारा रचित(रचनाकाल :1978). उनकी अन्य रचनाएँ आप यहाँ पढ़ सकते हैं.

Thursday, April 29, 2010

दो बजिया बैराग्य पार्ट फोर

मैंने कभी भी पापाजी को गुस्से में चीखते-चिल्लाते नहीं देखा है.. वह भी एक आम इंसान हैं, और किसी और कि तरह गुस्साते भी हैं.. मगर घर में उनके गुस्से को ऊँची आवाज कभी नहीं मिली.. उनका चुप रह जाना ही अपने आप में सब कह जाता था.. जब तक इतनी समझ नहीं आयी थी कि पापाजी चुप हैं मतलब गुस्से में हैं, तब तक वह जरा सा आँख तरेर देते थे और बस इतना ही काफी होता था हमारे सहम जाने के लिए.. हमारे से मेरा मतलब हम तीनो भाई-बहन..

अपने घर का सबसे प्रोब्लेमेटिक बच्चा मैं खुद को ही मानता हूँ.. हर बात पर गुस्सा, हर चीज से खीज, पढाई लिखाई से भी हमेशा दूर.. मगर फिर भी पापाजी का दुलारा.. पता नहीं कब तक लाड़-छिड़ियाते रहा हूँ.. अब पापाजी पर तो नहीं लेकिन जब घर जाता हूँ तो मम्मी पर जम कर लाड़-छिड़ियाता हूँ.. घर में पापाजी से सबसे ज्यादा पिटाई भी मुझे ही लगी है, मगर उसे अब आंकलन करता हूँ तो उसे गुस्से में की गई पिटाई नहीं पता हूँ.. एक नियंत्रित मात्र डर पैदा करने के लिए एक सजा ही पाता हूँ.. और जब भी पिटाई लगी तो वो सिर्फ दीदी को मारने के एवज़ में.. वैसे पिटाई कि बात करें तो भैया को सबसे अधिक पिटाई लगी है.. मगर पापाजी से नहीं, मम्मी से.. अभी याद करने बैठा हूँ तो एक वाकया भी ऐसा याद नहीं आ रहा जब भैया को पापाजी से पिटाई लगी हो(कल सुबह ही पापाजी से लड़ने वाला हूँ कि आप भैया को कभी नहीं मारे, आज मारिये.. भैया को पिटाई खिलाना है).. :)

उनका एक तकिया कलाम जैसा ही कुछ हुआ करता था.. वो हमेशा हम बच्चों के बारे में कहते थे कि "मेरा बैल है, हम कुल्हारिये से नाथेंगे, कोई क्या कर लेगा?".. आज जब मैं अपने भतीजे के बारे में यही कहता हूँ तो बोलते हैं कि हम कभी नाथे थे क्या जो तुम अपने बैल को नाथोगे?

मैं पापाजी से एक बात सिखने कि बहुत कोशिश करता हूँ.. वो कभी भी ऑफिस का तनाव घर लेकर नहीं आते थे.. ऑफिस का टेंशन ऑफिस में रहता था.. एक प्रशासनिक अधिकारी को कई तरह के तनाव हर वक़्त घेरे रहता है, मगर वह कभी भी हम देख नहीं पाए.. दफ्तर में एक कड़क अधिकारी कि पहचान रखने वाले पापाजी के मातहत कर्मचारी अगर घर में उन्हें हमारे साथ देख लेते थे तो आश्चर्य में पड़ जाया करते थे.. 'साहब ऐसे भी हैं, ये तो पता ही नहीं था' वो एक बार मुझे एक बात बोले थे, जिसे मैंने गाँठ बाँध कर रख लिया है.. वो बोले थे कि "किसी भी इंसान कि पहचान इससे नहीं होता है कि वह अपने से बड़े के साथ कैसा बर्ताव करता है, बल्कि इससे होता है कि वह अपने से छोटे से कैसा व्यवहार रखता है".. मैं अच्छे से जानता हूँ कि पापाजी अगर ये पढेंगे तो उन्हें आश्चर्य ही होगा कि वो कब ये बात बोले थे.. बाद में भैया से भी ये मैंने सुना था..

अभी कुछ दिन पहले पापाजी से बात हो रही थी.. उन्हें मैं किसी बात पर अपने कुछ दोस्तों के बारे में बता रहा था.. बता क्या रहा था, एक तरह का कान्फेशन(Confession) ही था.. उन्हें अपने दोस्तों कि खूबियों के बारे में बता रहा था कि वो किन-किन मामलों में मुझसे अच्छे हैं.. पापाजी पूछ बैठे, "क्या वे सब तुम्हारे आदर्श हैं?" मेरा कहना था कि अभी तक अपने जीवन में किसी भी ऐसे व्यक्ति से नहीं मिला हूँ जिसे मैं अपना आदर्श मान सकूं, अगर उन्हें अपने आदर्श कि कसौटी पर कसने बैठ गया तो वे मुझे बेचारे से नजर आयेंगे.. मेरा एक्सपेक्टेशन लेवल बहुत ऊंचा है इस मामले में.. मेरा कहना था कि किसी को खुद से अच्छा मानना एक अलग बात है और किसी को अपना आदर्श मानना अलग.. हाँ मगर यह बात जरूर है कि अगर कोई मुझसे पूछे कि तुम कैसा बनना चाहोगे, तो मेरा जवाब होगा "अपने पापा जैसा"..

एक बार आठवीं कक्षा कि परीक्षा में मैंने चोरी कि थी.. परीक्षा भवन में तो किसी को कुछ भी पता नहीं चला मगर इंस्ट्रूमेंट बाक्स में छुपाया गया चीट घर में गवाही दे गया.. जिस दिन घर में पता चला उस दिन ही उसका परिणाम भी आने वाला था और मुझे स्कूल में भैया से ये खबर मिली.. मगर उस पर भी पापाजी मुझ पर चीखें-चिल्लाये नहीं और ना ही मार पड़ी.. और मुझे वह आत्मग्लानी कई दिनों तक खाती रही, जिसके कारण से फिर मुझे फेल होना तो मंजूर था मगर कभी चोरी करने कि हिम्मत नहीं हुई.. एक दफ़े भैया भी एक गलती किये थे अपने कालेज में, घर आने पर जब दो-तीन दिनों तक कोई कुछ भी उसके बारे में नहीं पूछा तो तीसरे दिन भैया खुद ही पापा-मम्मी के सामने फूट-फूट कर रोने लगे..

अभी अगस्त २००८ कि बात है.. केशू होने वाला था सो घर के सभी सदस्य इकठ्ठा थे.. बातों का दौर चल रहा था.. दीदी यूँ ही पूछ बैठी थी, "आपके होठों का रंग इतना काला क्यों होता जा रहा है? सिगरेट पीने लगे हैं क्या?" एक पल को मैं ठिठका, और बोल दिया "हाँ".. यूँ तो भैया-भाभी को पता था और शायद भैया मम्मी को भी बता चुके थे.. मगर पापाजी को इसकी भनक भी नहीं थी.. एक सन्नाटा सा छा गया.. मम्मी कुछ बोली, जो मुझे याद नहीं है.. क्योंकि मैं पापाजी कि डांट सुनना चाह रहा था.. पापाजी एक बार फिर कुछ नहीं बोले.. ना ही आँखे तरेरे.. एक-दो मिनट बैठे और फिर धीमे से उठकर चुपचाप चले गए..



२२ अप्रैल को पापा-मम्मी कि शादी कि सालगिरह पर ली गई तस्वीर

दो बजिया बैराग्य वन
दो बजिया बैराग्य टू
दो बजिया बैराग्य थ्री

चलते-चलते : लिख चुकने के बाद जब पिछले पोस्टों का लिंक ढूंढ रहा था तो मैंने पाया कि एक-दो बातों को मैंने रिपीट किया है इस दफ़े.. अपनी सफाई में मैं कह सकता हूँ कि पहली बार वह छोटे में ही निपटा दिया था, जबकि इस बार यह विस्तार लिए हुए है.. मगर कहीं ना कहीं सागर कि बात भी सच होती दिख रही है.. उसने कहा था "एक सच बताऊँ ... जब मैंने तुम्हें पहली बार पढ़ा था तो मुझे लगा था इतनी ज़मीनी बात करने वाला ज्यादा पोस्ट नहीं लिख सकता... लेकिन में गलत था... अपनी साफगोई और इमानदारी के कारण तुम बहुत कुछ लिख सकते हो जो प्रभावित करती रहेंगी... (माफ़ करना PD मैंने तुम्हारे बारे में गलत सोचा था)" अब मुझे लग रहा है कि सागर कि बात कही सच ना हो जाए..

Tuesday, April 27, 2010

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है?

कल मैंने एक दफ़े फिर से यह सिनेमा देखी, और इस पुरानी पोस्ट को फिर से ठेल दिया। पहली बार जब मैंने यह लिखा था तब शायद ही कोई मेरे ब्लॉग को पढता था, शायद अबकी कोई पढ़ ले। :)

कल मैंने फिर से प्यासा देखी, ये एक ऐसी फ़िल्म है जिसे मैं जितनी बार देखता हूं उतनी बार एक बार और देखने का जी चाहता है। मेरा ऐसा मानना है कि अगर कोई भी डायरेक्टर अपने जीवन में इस तरह का फ़िल्म बनाता है तो फिर उसे कोई और फ़िल्म बनाने कि जरूरत ही नहीं है, क्योंकि वो फ़िल्म व्यवसाय को इससे अच्छा उपहार दे ही नहीं सकता है। मगर जैसा कि अपवाद हर जगह होता है, बिलकुल वैसे ही गुरूदत्त जैसा अपवाद हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री को भी मिला। उन्होंने हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री को एक से बढकर एक कई अच्छे और दिल को छू जाने वाले फ़िल्म दिये। जैसे ‘कागज़ के फूल’, ‘चौदहवीं का चांद’, ‘साहिब, बीवी और गुलाम’, ‘मिस्टर एंड मिसेस 55’, ‘बाज़ी’, इत्यादी।

यहाँ मैं बस प्यासा फ़िल्म की चर्चा करने जा रहा हूं। मेरे मुताबिक ये फ़िल्म अपने आप में एक विशिष्ठ श्रेणी की फ़िल्म थी, क्योंकि यह फ़िल्म तब बनी थी जब जवाहर लाल नेहरू के सपनों के भारत का जन्म हो रहा था। और उस समय गुरूदत्त ने जो समाज का चित्रन किया था वो आज कि परिदृष्य में भी सही बैठता है।

प्यासा, जो सन १९५७ में बनी थी, में वह सबकुछ है जो किसी फ़िल्म के अर्से तक प्रभावी व जादुई बने रहने के लिए ज़रुरी होता है। सामान्य दर्शक के लिए एक अच्छी, कसी हुई, सामयिक कहानी का संतोष (फ़िल्म के सभी, सातों गाने सुपर हिट)। और सुलझे हुए दर्शक के लिए फ़िल्म हर व्यूईंग में जैसे कुछ नया खोलती है। अपनी समझ व संवेदना के अनुरुप दर्शक प्यासा में कई सारी परतों की पहचान कर सकता है, और हर परत जैसे एक स्वतंत्र कहानी कहती चलती है। परिवार, प्रेम, व्यक्ति की समाज में जगह, एक कलाकार का द्वंद्व व उसका भीषण अकेलापन, पैसे का सर्वव्यापी बर्चस्व और उसके जुडे संबंधों के आगे बाकी सारे संबंधों का बेमतलब होते जाना।

मैं यहां प्यासा फ़िल्म का एक गाना लिख रहा हूं जो कि आज के समाज पर भी उतना ही बड़ा कटाक्ष कर रहा है जैसा उस समय पर था। ये मेरे अब-तक के सबसे पसंदीदा गानों में से भी है।

ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया..
ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनिया..
ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया..
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है??

हर एक जिस्म घायल, हर एक रूह प्यासी..
निगाहों में उलझन दिलों में उदासी..
ये दुनिया है या आलम-ए-बदहवासी..
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है??

यहां एक खिलौना है इंसान की हस्ती..
ये बस्ती है मुर्दा-परस्तों की बस्ती..
यहां पर तो जीवन से है मौत सस्ती..
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है??

जवानी भटकती है बदकार बनकर..
जवां जिस्म सजते हैं बाजार बनकर..
यहां प्यार होता है व्यापार बनकर..
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है??

ये दुनिया, जहां आदमी कुछ नहीं है..
वफ़ा कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है..
जहां प्यार की कद्र ही कुछ नहीं है..
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है??

जला दो इसे फ़ूंक डालो ये दुनिया..
मेरे सामने से हटा दो ये दुनिया..
तुम्हारी है, तुम ही संभालो ये दुनिया..
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है??


Saturday, April 17, 2010

दो बजिया वैराग्य पार्ट थ्री


कल दीदी का फोन आया, तक़रीबन रात साढ़े दस बजे के आस पास.. अक्सर जब भी फोन करती है तो उसका समय दस से ग्यारह के बीच ही होता है.. बहुत खुश होकर फोन कि थी और सिर्फ एक सूचना देकर एक मिनट से भी कम समय में फोन रख दी.. बोली कि मैंने आखिर अपना इमेल बना ही लिया है और आपको(सबसे छोटा होने के बाद भी सभी मुझे घर में 'आप' ही कहते हैं.. क्यों, कारण फिर कभी) मेल भी कर दिए हैं.. इससे पहले शायद 2001 के लगभग दीदी Rediff पर अपना इमेल यूज करती थी, अब तो उसे उसका ID भी याद नहीं है पासवर्ड कि बात तो बेहद दूर है..

बचपन से लेकर अभी तक दीदी मुझे लगभग हर मुसीबत(जो उन्हें ज्ञात हो) से बचाती आई है.. मैं कितना भी याद करने कि कोशिश करता हूँ मगर मुझे यह कभी याद नहीं आता कि दीदी कभी भी मुझपर हाथ उठाई हो.. हाँ, मगर ऐसे किस्से खूब याद हैं जब मैंने बचपन कि नासमझी में दीदी को मारा हूँ.. एकाध किस्सों को छोड़ दिया जाये तो मुझे पापाजी से जब कभी भी पिटाई लगी है तो सिर्फ और सिर्फ दीदी को मारने के कारण ही.. और उस समय भी मुझे बचाने वाली दीदी ही हुआ करती थी.. पापाजी से लगभग लड़ लेती थी कि मेरे भाई को मत मारिये..

पटना में आने के बाद से जब भैया आगे कि पढाई के लिए घर से बाहर निकल गए और मेरा घर से बाहर निकलना कुछ बढ़ा, तब दीदी ही मेरी मित्र-सखा सब कुछ थी.. उसी समय पहली बार हमें जेबखर्च के नाम पर कुछ मिलना शुरू हुआ था.. 1999-2000 कि बात कर रहा हूँ.. वैसे जेबखर्च मिलना-ना मिलाना, दोनों मेरे लिए बराबर ही था.. घर के सारे सामान मैं ही लाता था, सो कभी ये हिसाब नहीं रहता था कि मैंने अपने जेबखर्च से घर का सामान खरीद लिया है या फिर घर के सामान के लिए मिलने वाले पैसे को अपने ऊपर खर्च कर लिया है..

कुल जमा 300 रूपये हमें मिला करता था, और दीदी के पास वह जब कभी 500-1000 के पास पहुँचता था तब दीदी वह सारे पैसे मुझ पर खर्च कर देती थी.. कभी कोई सनग्लास तो कभी कोई टीशर्ट्स तो कभी कुछ.. दीदी कि शादी के समय दीदी के पास लगभग 300-400 रूपये थे उन्ही जेबखर्च से बचे हुए और वह भी दीदी मुझे दे दी थी.. मैंने भी उन्हें 2003 से अभी तक छुपा रखा है अपनी एक डायरी के अंदर.. यक़ीनन रूप से मैं यह कह सकता हूँ कि वह पैसे मुझ से कभी भी खर्च ना हो सकेगा..

मेरी वह डायरी भी एक अजीब अजायब घर से कम नहीं दिखती है.. एक स्केच जो मेरे लिए मोनालिसा के पेंटिंग से भी अधिक कीमती है.. दीदी के दिए कुछ रूपये, और जीजाजी से लिए गए 5 अमेरिकन डॉलर.. मेरे लिए कुछ अमूल्य पेपर कि कतरने.. दो-तीन सूखे हुए गुलाब कि झड़ी हुई पंखुडियां जिनसे अब खुश्बू नहीं आती.. कुछ खास लोगों के पासपोर्ट साइज की तस्वीरें.. इन सबमे से अगर उन रूपयों और डॉलर को हटा दिया जाए तो बाकि चीजों कि कीमत पांच पैसे भी कोई ना लगाये, मगर मैं उन्हें अपने उस ताले वाले डायरी में हमेशा बंद करके रखता हूँ.. इस कदर कि कोई उसे देख भी ना सके..

बिहार और बिहार के बाहर के लोगों का अक्सर यह मानना होता है कि जो भी बिहार बोर्ड से पढ़ा-लिखा है तो उसकी अंग्रेजी खराब होना निश्चित है(अभी तक के अनुभव से इसे सही पाया भी है, बिहारी विद्यार्थी को अक्सर इसी मोर्चे पर मात खाते भी देखा है).. दीदी इसे भी मिथ्या साबित कर दिखाई थी.. हम दोनों भाई केंद्रीय विद्यालय से पढ़े होने के बाद भी दीदी कि अंग्रेजी के सामने कुछ भी नहीं थे..

घर में शुरू से ही एक स्कूटर रहा है और बाद में एक कार भी आ गई थी.. हम सभी के वयस्क होने के बाद भी पापाजी अक्सर हमें उसे चलाने से रोकते थे.. किसी अनजाने भय से ग्रसित होकर कि एक्सीडेंट कर देगा, वगैरह-वगैरह.. दीदी अक्सर मुझे स्कूटर निकलने को कहती थी और जब तक मैं वापस ना आ जाऊं तब तक घर में संभाले रखती थी कि किसी को पता ना चल जाए कि मैं स्कूटर लेकर सिखने निकल गया हूँ.. कार में मामले में स्थिति अलग थी, कार थोड़ी बड़ी थी और सभी को आराम से पता चल जाता(फिर भी दो-तीन दफ़े मैं जब पटना में अकेला होता था तो कार लेकर कालेज चला जाता था, कुछ चलाने के लालच से और कुछ शो-ऑफ करने के लालच से)..

जब घर में हम दो बच्चे ही थे(भैया इंजीनियरिंग कि पढाई के लिए पहले ही बाहर जा चुके थे) तो उनमे झगडा होना भी जरूरी था.. और हम झगड़ते भी थे.. पूरे दो साल तक मैं हर दिन सुबह साढ़े छः-सात बजे तक दीदी को कालेज छोडने जाता था.. और यह रूटीन मेरा कभी नहीं टूटा, चाहे हम दोनों में कितना भी अनबन चल रहा हो.. हर दिन सुबह दीदी को उठाना और अगर झगडा चल रहा हो तो कोई सामान पटक कर शोर मचा कर उठाना, मगर उठाना.. गर्मी हो बरसात हो या 3-4 डिग्री वाली हाड़कंपाती सर्दी..

इसे अचानक से यहीं खत्म कर रहा हूँ, क्योंकि इसे मैं चाह कर भी किसी इंड प्वाइंट तक लाकर खत्म नहीं कर सकता.. ऐसे ही अनाप-सनाप लिखता ही चला जाऊंगा..


दो बजिया बैरागी पार्ट 1
दो बजिया बैरागी पार्ट 2

Thursday, April 15, 2010

इंडिया सर ये चीज धुरंधर

किसी ने सच ही कहा है, कि अंग्रेजी में अक्सर अपशब्द डाल्यूट हो जाया करते हैं.. अपनी तीव्रता नहीं बनाये रख पाते हैं.. कुछ ऐसा ही फौलोवर शब्द के साथ भी है.. शब्दकोश.कॉम पर फौलोवर शब्द के तरह-तरह के मतलब दे रखे हैं.. मसलन - अनुगामी, अनुयायी, शिष्य, अनुसरणकर्ता, अधीन चेला, आगे दिया हुआ.. मेरी समझ में इसी का स्लैंग रूप "चमचागिरी" भी है..

आजकल अजित अंजुम जी फेसबुक पर चमचों के ऊपर रिसर्च कर रहे हैं.. उन्हें तरह-तरह के नये शब्द लोग सुझा रहे हैं.. कोई चमचाधिराज बता रहा है टो कोई चाटू नारायण.. एक भाई साहब आकर बेलचा पर भी नजरें इनायत करके आख्यान दे गये इस हिदायत के साथ कि चमचा और बेलचा का पुराना नाता है..

मेरी समझ में अगर आप किसी के साथ, अपनी इच्छा ना होते हुये भी, दो कदम अधिक चल लेते हैं तो इसे चमचागिरी के कैटेगरी में नहीं रखा जा सकता है.. एक उदहारण देना चाहूँगा, अगर आपके पास 'ए' और 'बी' ऑप्शन है और आप कुछ भी चुने इससे आपको कोई अंतर नहीं पड़ता हो, ऐसे में किसी के कहने पर आप 'ए' चुन लेते हैं और लोग आपको उसका चमचा बता जाते हैं..इस पर मुझे सिर्फ एक शेर याद आता है, "करीब जाकर छोटे लगे... वो लोग जो आसमान थे.." आज प्यार या लगाव भी चमचागिरी के फेर में पड़ने लगे हैं, खैर ये अपनी अपनी समझ का फेर है..

चमचागिरी के कैटगरी पर बात उठाने पर राजीव मिश्र जी आकर उसे छः भागों मे ऐसे बांटते हैं कि इस दुनिया जहान का हर कर्म चमचागिरी के घेरे मे आ जाये.. वो बताते हैं :

पहली वेरायटी --- वो जो बॉस की हाँ में हाँ तुरंत मिलाते हैं।

दूसरी वेरायटी --- जो बॉस की हाँ में हाँ मिलाने की पहले वजह ढूंढते हैं।

तीसरी वेरायटी --- क्या बात है सर जी, वाह भई वाह, आपने तो कमाल कर दिया, सिर्फ आप ही यह कर सकते थे आदि आदि वाक्यों से अपनी बात कहते हैं।

चौथी वेरायटी --- ऐसा कोई मौका नहीं खोते जैसे उनका जन्मदिन, शादी की सालगिरह, बच्चे का जन्म दिन, बीवी का जन्मदिन... जिसमें उनसे पहले कोई बधाई देदे।

पांचवीं वेरायटी --- कुछ ऐसे होते हैं कि कुछ लोग सिर्फ अपने होने का एहसास कराने के लिए बीच-बीच में लाइक्स इट, हं, हमममम आदि लिख देते हैं।

छठा वेरायटी --- भी जो अपनी शेखी बघारने के लिए अपने से मेल खाता विचार आने का इंतजार करते रहते हैं...

यह सब पढते हुए मेरे मन मे लालू प्रसाद यादव जी द्वारा अक्सर प्रयोग मे लाया जाने वाला जुमला याद हो आया.. टीटीएम, यानि ताबड़तोड़ तेल मालिश.. कुछ घंटे बाद ही अजित जी ने भी यह बात लिख डाली..

अंत मे रविन्द्र पंचोली जी द्वारा लिखा गया कविता, दोहा या गजल टाइप का ही कुछ भी पढते जाएँ..
सुन चमचा संसार में सभी चम्मच एक रंग
कोई उड़ाए दारू तो कोई पीए भंग
काम करने वाला रोए और ये लंबी तान कर सोए
ये काटते माल ख़ुद्दार दिहाड़ी को रोए..


अधिक विस्तार से पढ़ने के लिए आप अजित जी के फेसबुक प्रोफाइल में झाँक आयें.. चमचागिरी पर अगर कोई PHD करना चाहे तो पूरी थिसिस का माल उन्हें वहाँ मिल ही जायेगा.. कई थ्रेड बने हुए हैं चमचों के ऊपर..