Friday, January 18, 2008

मैं चोरी करते पकड़ा गया

चौकन्नी निगाह हर वक्त, चाहे परिक्षा कक्ष हो या घर। कोई आ तो नहीं रहा है। कोई देख तो नहीं रहा है। शायद किसी की निगाह मुझे चोरी-छिपे देख रही है। कौन है? अरे ये तो अपने ही कक्षा का छात्र है, देखने दो। ये मेरा क्या बिगाड़ लेगा मेरा। अगर किसी को कुछ बोला तो बाहर ना देख लूंगा इसे!! मेरा डर तो होगा ही इसे। अगर नहीं होगा तो आज हो जायेगा।

जूते में पुरजी। मोजे में पुरजी। पेंसिल बक्से में भी अलग-अलग तह बना कर रखा हुआ पुरजी। स्कूल के पहचान पत्र में भी पुरजी। बेल्ट में घुसी हुई पुरजी। छोटे-छोटे अक्क्षर में पुरजी बनाने का अभ्यास भी तो करना पड़ा था। कितनी मेहनत का ये काम था वो इसे करने वाला ही समझ सकता है।

संस्कृत, हिंदी और समाज-अध्ययन तो फिर भी बिना चोरी के पास कर लेता था पर अंग्रेजी, मैथ और साइंस का बेरा कैसे पार हो ये समझ में नहीं आता था। फलतः बस एक ही उपाय दिखता था, नकल।

ये कहानी मैं सुना रहा हूं अपने बचपन की जब मैं कक्षा आठवीं में पढता था। अचानक से अंग्रेजी का हौवा मेरे सामने कक्षा छः से आ गया था जो भागने का नाम ही नहीं ले रहा था। पांचवी कक्षा तक अपने स्कूल के सबसे होनहार छात्रों में से एक छात्र को नकल ही एकमात्र उपाय नजर आ रहा था। मैं आठवीं कक्षा में शत-प्रतिशत चोरी करके किसी तरह 50% से ज्यादा अंक लाने में सफल रहा था, पर वो घटना मुझे जीवन के कई पाठ सिखा गई थी।

उस दिन दीदी को पेंसिल बाक्स की जरूरत पड़ी थी और मैं अपनी परीक्षा के बाद से उस पेंसिल बाक्स से सारे चिट-पूर्जे ठीक से नहीं निकाल कर फेंक नहीं पाया था। एक तरफ मेरे हाथ में मेरा वार्षिक परीक्षाफल था जो पिछले 2-3 सालों में सबसे बढिया था और दूसरी तरफ भैया मुझे आकर ये बता रहे थे की मेरी चोरी पकड़ी गई है और घर में सभी को पता चल गया है।

मैं भाड़ी कदमों से चलते हुये घर पहूंचा और सोच रहा था की मुझे अभी बुलाया जायेगा और जमकर डांट पड़ेगी शायद मार भी परे। मैं इंतजार करता रहा मगर कहीं से कोई बुलावा नहीं आया। किसी ने कुछ नहीं कहा, कुछ भी नहीं। यहां तक बात भी नहीं की उस बारे में। और ना ही परीक्षाफल के बारे में पूछा गया।

मैं शर्म से गड़ा जा रहा था। बाद में मैं खुद जाकर पापाजी से रोते हुये इसके बारे में कहा और उन्होंने समझाया की "किसी भी चीज को पाने के दो रास्ते होते हैं, एक गलत राह जो बहुत आसान होता है मगर उस पर चल कर मंजिल तक नहीं पहूंचा जा सकता है और दूसरा संघर्ष का राह जिस पर चलकर हम कहीं भी पहूंचे लगता है कि यही मंजिल है।"

उस घटना के बाद से मैंने परीक्षा में चोरी करनी बंद कर दी। कई बार गिरा फिर खुद संभला। मगर उनका कहा कभी भूला नहीं। शायद आसान राह चुनता तो मैं आज जहां कहीं भी हूं वहां तक पहूंचना मेरे लिये एक सपना के अलावा और कुछ नहीं होता।

मेरे पापाजी मेरे आदर्श हैं, मैं हमेशा उनके जैसा ही बनना चाहूंगा। वो भी विद्यार्थी जीवन में एक साधारण छात्र थे पर अपनी मेहनत से उन्होंने अपने जीवन में जो भी चाहा उसे पाया।

Wednesday, January 16, 2008

और वो डरी सहमी सी चुपचाप बैठी थी

कल मैंने सुबह उठ कर पूछा, "नाश्ता कर ली हो क्या?" उधर से विकास की आवाज आयी, "हां कर लिया हूं।"

मेरे मुंह से एक प्यार भरी गाली निकली, "साले तेरे को अपने सिवा कुछ दिखता नहीं है क्या? तुमसे कौन पूछ रहा है?"

विकास किचन में आया और देख कर मुस्कुरा कर बोलते हुये चला गया, "तुम नहीं सुधरने वाले हो।"

हमारे बीच कई बार ऐसे वार्तालाप चले हैं और हमेशा मैं ही कुछ ना कुछ बोलता रहता हूं। आजतक उसकी कोई आवाज नहीं सुनी। हर समय उसकी डरी-सहमी आंखें मेरी ओर याचना भरी दृष्टि से देखती रहती है। मैं कितनी ही बार उसे क्यों ना समझाऊं, मगर वो शायद मेरी भाषा भी समझने को तैयार नहीं है। हमलोग अक्सर मजाक में कहते हैं की शायद ये हिंदी नहीं समझती है, इसके लिये हमें तमिल सीखना पड़ेगा।

मगर प्यार कि कोई भाषा नहीं होती है ये अब मुझे समझ में आने लगा है। आजकल वो भी निर्भीकता से अपने पंखों से हमारे चेहरे पर हवा झलते हुये आती है और वैसे ही बाहर भी निकल जाती है। आखिर उसे भी तो अपने और अपने बच्चों का ख्याल रखने के लिये कुछ दाना-पानी की जरूरत होती है।

ये सारा किस्सा है मेरे घर में अपना एक छोटा सा घर बनाये हुये एक कबूतर की, जिसने मेरे घर के रसोई वाले भाग में अपना छोटा सा आशियां बना रखा है। मैं कार्यालय से घर पहूंचते ही सबसे पहले उसे ही उसकी मासूम सी आंखों को देखता हूं, और उसे चैन से पा कर निश्चिंत हो जाता हूं। कई बार उससे मूर्खों कि तरह बातें करना भी अच्छा लगता है। ठीक उसी तरह जैसे हम किसी छोटे से बच्चे से बात कर रहें हों जबकी हमें पता होता है की वो हमें नहीं समझ रहा है। उसकी तो एक अलग ही भाषा होती है।

मगर मुझे पता है, जैसे ही उस पर से अपने बच्चों की जिम्मेदारी खत्म होगी वैसे ही वो फिर से अपने किसी नये आशियाने कि तलाश में उड़ जायेगी। और मेरा घर फिर से सूना हो जायेगा। मेरे अकेलेपन का साथी चला जायेगा और मैं फिर से दिवारों से बाते करने लगूंगा।

ये चित्र मैंने गूगल इमेज से उठाया है पर दिखने में है बिलकुल मेरे घर वाले कबूतर जैसा। :)

Monday, January 14, 2008

साफ्टवेयर इंजिनियर और तारे जमीं पर

साफ्टवेयर इंजिनीयर जमीं पर...Every Engineer Is Special...

मैं कभी बतलाता नहीं ,
पर Coding से डरता हूं मैं PM..
यूं तो मैं, दिखलाता नहीं,
पर बेंच पर जाना चाहता हूं मैं PM..

आपको सब है पता, है ना PM..
आपको सब है पता, मेरे PM..
Issues में यूं ना छोड़ो मुझे,
घर लौट कर भी जा ना पाऊं PM..

भेजते क्यूं नहीं Onsite मुझको आप,
याद भी आपको आ ना पाऊं PM..
क्या इतना Dumb हूं मैं PM,
क्या इतना Dumb मेरे PM..

जब भी कभी Onsite मुझे,
ढेर सारे काम देता है..
मेरी नजर ढूंढे आपको..
सोचूं यूं ही आप आकर Work Distribute करोगे PM..

उनसे मैं ये कहता नही,
पर Testing से पक जता हूं Pm..
चेहरे पे आने देता नहीं,
Company छोड़ कर भाग जाना चाहता हूं PM..

आपको सब है पता, है ना PM..
आपको सब है पता, मेरे PM..


ये गीत मुझे मेरे एक मित्र ने इ-पत्र के द्वारा भेजा था, मुझे अच्छा और मजेदार लगा सो मैंने इसे यहां लग दिया। मैं अपने PM को धन्यवाद देता हूं कि उन्हें हिंदी नहीं आती है और वो इसे नहीं पढने वाले हैं। :D

Sunday, January 13, 2008

अनमना सा मन

पता नहीं क्यों, आज-कल कहीं भी मन नहीं लग रहा है। यही कारण है कि चिट्ठे पर भी कुछ नहीं लिख रहा हूं। लिखने के लिये तो बहुत सारे टापिक हैं, पर लिखने की इच्छा भी तो हो।

देखिये ये मिज़ाज कब बदलता है और कब मैं फिर से पहले वाले ढंग में लौट कर आता हूं। तब तक के लिये विदा चाहूंगा।

Thursday, January 10, 2008

तारे जमीं पर और मेरा बचपन

मैंने कल ये फिल्म थोड़ी देर से ही सही मगर देख ली। मुझे काफी हद तक इसमें अपना बचपन दिख रहा था। बिलकुल वैसी ही विवशता, दोस्तों के बीच वैसा ही खुद को छोटा पाना। घर में वैसे ही बड़ा भाई क्लास टापरों में से एक और खेल-कूद से लेकर लगभग हर चीज में अव्वल आने वाले और एक इधर मैं किसी तरह घिसट कर प्रोमोटेड होकर पास करने वाला साधारण सा छात्र। इतनी भी हिम्मत नहीं कि खेल-कूद में भी हिस्सा ले सकूं। उस बच्चे की ही तरह हर वक्त घर में पड़े बेकार चीजों से कुछ ना कुछ बनाने कि कोशिशें करते रहना और अगर कोई बेकार चीज ना मिले तो अच्छी खासी चीजों को ही पहले बेकार बनाना और फिर से कोशिशे जारी रखना। :)

कुछ मायनों में यह सिनेमा मेरे जीवन से अलग भी था। जैसे मुझे अपने घर में उस बच्चे की तरह दुत्कार नहीं मिला, और सबसे ज्यादा मुझ पर मेरे पापाजी ही करते थे। मैं फिसड्डी तो था पर उस बच्चे कि तरह हर जगह नहीं। मेरी आंखों के आगे शब्द नाचते नहीं थे, हां आंग्रेजी का अक्षर विन्यास मुझे कभी याद नही हो पाते था। और सबसे बड़ी बात ये की मेरे जीवन में वैसा कोई अध्यापक नहीं आया जो मेरी काया कल्प ही बदल डाले। और तो और, मेरी चित्रकारी भी सुभानअल्ला के अलावा और कुछ नहीं था।

जहां तक मैं समझता हूं, हर व्यक्ति की एक इच्छा होती है कि वो जो कुछ भी कर रहा हो उसमें सबसे अच्छा करे। इससे कोई फर्क नहीं परता कि वो कोई वयस्क है या कोई छोटा सा बच्चा।

आज मैं चाहे कितना ही मुश्किल कंप्यूटर प्रोग्राम के लाजिक को क्यों ना समझ लूं पर जार्गनस(Jargons) और टेक्निकल टर्म मुझे ज्यादा याद नहीं रहते हैं। कुछ ऐसा ही था कि मुझे बचपन में अक्षर-विन्यास याद नहीं होते थे। मगर इसका मतलब ये नहीं कि मुझे कुछ भी याद करने में ही परेशानी होती है, अगर आप संख्या ओं की बात करेंगे तो मुझे लगभग अपने मोबाईल में सुरक्षित सारे नम्बर याद हैं जो लगभग 150 से ज्यादा हैं।

जब मैं ये फ़िल्म देखने जा रहा था तो मेरी मुहबोली बहन स्नेहा ने मुझसे बोला था कि तुम ये सिनेमा देख कर जरूर रो दोगे और जवाब में मैंने कहा था कि अभी तक तो कोई भी सिनेमा देख कर मैं नहीं रोया हूं क्योंकि मेरे मन में हमेशा यही होता है कि ये एक सिनेमा है ना कि आम जिंदगी। सो हम दोनों में ठन गई। और मैच ड्रा रहा। क्योंकि मेरी आंखें तो नम हुई थी मगर सिनेमा देख कर नहीं, उस गाने पर जो मां के उपर था। वो गाना सुन कर मुझे अपनी मां की बहुत याद आने लगी थी।

चलिये आप भी उस गाने को मेरे साथ सुने :

Maa - Taare Zameen...


मैं कभी बतलाता नहीं
पर अन्धेरे से डरता हूं मैं मां
यूं तो मैं, दिखलाता नहीं
तेरी परवाह करता हूं मैं मां
तुझे सब है पता, है ना मां
तुझे सब है पता,,मेरी मां

भीड़ में यूं ना छोड़ो मुझे
घर लौट के भी आ ना पाऊं मां
भेज ना इतना दूर मुझको तू
याद भी तुझको आ ना पाऊं मां
क्या इतना बुरा हूं मैं मां
क्या इतना बुरा मेरी मां

जब भी कभी पापा मुझे
जो जोर से झूला झुलाते हैं मां
मेरी नजर ढूंढे तुझे
सोचूं यहीं तू आ के थामेगी मां

उनसे मैं ये कहता नहीं
पर मैं सहम जाता हूं मां
चेहरे पे आने देता नहीं
दिल ही दिल में घबराता हूं मां
तुझे सब है पता है ना मां
तुझे सब है पता मेरी मां

मैं कभी बतलाता नहीं
पर अंधेरे से डरता हूं मैं मां
यूं तो मैं, दिखलता नहीं
तेरी परवाह करता हूं मैं मां
तुझे सब है पता, है ना मां
तुझे सब है पता,,मेरी मां


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ये सिनेमा मैं अपने दोस्तों के सथा रात 10 बजे वाले शो में देखने गया था। और वहां से लौटते-लौटते 1:30 से ज्यादा हो गये थे और उपर से सुबह उठ कर आफिस जाने की जल्दी भी थी। इसलिये मैं सो गया पर नींद पूरी नहीं हुई और पूरे दिन भर आफिस में अल्साया सा घूमता रहा। सिनेमा देखते समय मेरे साथ मेरी मित्र बैठी हुई थी जो ज्यादा कुछ बोलती नहीं है और उसे टंग करने में बहुत मजा भी आता है, सो मैं उसे पूरे फिल्म में चिढाता भी रहा। :)

Tuesday, January 08, 2008

असम वाले नोयडा से एक व्यक्ति ने मेरा ब्लौग देखा

आज मैं लेकर आया हूं उन साइटों के बारे में जो आपको, उन लोगों के जो आपके ब्लौग पर आये थे, सही IP Address दिखाने के दावे तो बड़े-बड़े करते हैं पर कई जानकारीयां गलत देते हैं। और हम उनसे उपलब्ध जानकारीयों को सही मान करके कई बार दूसरों से उलझ जाया करते हैं।

आप इस चित्र पर एक नजर डालें और देखें कि किस प्रकार ये मुझे बता रहा है कि नोयडा असम में है।

इस चित्र में नोयडा को असम में बताने वाली जानकारी को मैंने लाल रंग से घेर रखा है। एक और जिसे मैने लाल रंग से घेर रखा है उसका कोई आपेरेटिंग सिस्टम ही नहीं दिख रहा है।

एक जिसे मैंने लाल रंग से चौकोर आकार में घेर रखा है उसका तो IP Address ही नहीं दिखा रहा है। वैसे मेरे कंप्यूटर का सर्वर भी उसी स्थान में है जहां का ये दिखा रहा है, पर मैंने आज एक बार भी www.blogvani.com से अपने ब्लौग को नहीं देखा है और मुझे अपने सर्वर का IP Address भी पता है।

अगर कोई हैं जो मुझे इसका कारण समझा सकते हैं तो कृपया बतायें। मुझे इसका तकनीकी पक्ष जानने की बहुत उत्सुकता है।

Monday, January 07, 2008

ब्लू फ़िल्म और उससे आती आवाजें

जीवन में घटी कुछ घटनाऐं ऐसी होती है जिन्हें लोग चाहकर भी नहीं भुला पाते हैं। वैसे ही ये घटना मेरे कालेज के छात्रावास जीवनकाल की है।

उस समय मैंने वेल्लोर तकनीकी संस्थान(VIT, Vellore) के MCA पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया था। नया-नया छात्रावास का दौर था और उस पर भी तुर्रा ये कि हमारे कालेज में रैगींग का कोई भय नहीं। सारी रात जमकर मस्ती होती थी और सुबह उठ कर जैसे-तैसे समय पर या थोड़ी देर से कक्षा में पहूंच जाया करते थे।

हमारा कालेज भारत के बहुत ही अनुशासित कालेजों में से एक है और अनुशासन की नाम पर कई तरह के उट-पटांग नियम भी हैं वहां जिसका कोई सिर-पैर मुझे अभी तक समझ में नहीं आया है। कड़ा अनुशासन होना और उस पर MCA की पढाई थोड़ी कठिन, ये दोनों ही मिलकर रैगींग के लिये कोई जगह नहीं छोड़ती थी। अनुशासन के नियमों में से एक नियम यह भी था कि हर दिन रात में 9 बजे के बाद होस्टल के सुपरटेंडेंट आकर अटेंडेन्स लिया करते थे। यह घटना कुछ उसी पर आधारित है।

उस समय मैं अपने कालेज के मेंस होस्टल के 'B' ब्लौक में था और वहां अनुशासन उतना कड़ा नहीं था। पर अटेंडेन्स हर दिन हुआ करता था। एक रोज की बात है। मेरे कुछ मित्र(नाम बता कर गालियां नहीं खानी है :)) अपने कमरे में बैठकर पोर्न मूवी देख रहे थे। उन्हें पता नहीं था कि दरवाजा अच्छे से बंद नहीं है और ये समय भी अटेंडेन्स का ही है। ठीक उसी समय हमारे सुपरटेंडेन्ट रामलिंगम सर अपना अटेंडेन्स रजिस्टर लेकर पहूंच गये। उन्होंने धीरे से दरवाजे को धक्का दिया तो वो खुल गया। अब क्या था, सारे लड़कों के चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगी। ये कोई सरकारी कालेज का होस्टल तो थ नहीं जहां ये सब खुल्लम-खुल्ला चलता है, हमारे कालेज में इसकी सजा में होस्टल तक से निकाला जा सकता है। उन्हें जैसे ही लड़कों ने देखा वैसे ही ALT+F4 दबाने लगे, मगर वो मूवी किसी ऐसे प्लेयर पर चल रहा था जिसपर ये काम नहीं किया। फिर मेरे एक मित्र ने झट से मानिटर को बंद कर दिया। अब क्या था वो पोर्न मूवी दिखना तो बंद हो गया पर आवाजें तो अभी भी आ रही थी। कुल मिला कर वो क्षण बहुत ही हास्यास्पद हो चुका था। फिर किसी ने कंप्यूटर को ही बंद कर डाला तब जाकर ये तमाशा बंद हुआ। और इतनी देर तक हमारे रामलिंगम सर बेचारे ठगे हुये से खड़े ये सब तमाशा देख रहे थे।

रामलिंगम सर का स्व्भाव बहुत ही अच्छा था सो उन्होंने कुछ किया नहीं, यहां तक कि चेतावनी भी नहीं दिया(शायद वे जानते थे कि चाहे कितना भी रोक लगाओ, होस्टल में ये सब नहीं रूकने वाला है)। उन्होंने बस एक आग्रह करके सभी को छोड़ दिया कि जो भी करना है कम-से-कम दरवाजा तो बंद करके किया करो।

अगली सुबह जब मैं मेस में नास्ते के लिये पहूंचा तब जाकर ये सब पता चला और तब तक हमारे वे मित्र हमलोगों के हंसी मजाक में अपनी जगह बना चुके थे जो पूरे 3 साल तक चला और आज भी भूलाये नहीं भूलता है।

Thursday, January 03, 2008

नये साल से पहले की धूम

दुनिया भर के लोग इधर नववर्ष का इंतजार कर रहे थे और मैं चाह रहा था की इसके आने में जितनी देरी हो उतना ही अच्छा क्योंकि मेरे दो मित्र क्रिसमस की छुट्टीयों में हमलोगों से मिलने के लिये चेन्नई आये हुये थे। अर्चना मुम्बई से तो चंदन बैंगलोर से। और दोनों को ही 30 को वापस लौटने की जल्दी थी जिससे वो सोमवार को अपने कार्यालय जा सकें। मेरे पास एक और कारण था जिस लिये मैं चाह रहा था की नया साल थोड़ी देर से आये और वो ये था कि मुझे अपने टीम(कार्यालय वाली) के साथ ट्रिप पर घूमने के लिये जाना था और वो भी 28 कि शाम को। और मैं अपने दोस्तों का साथ छोड़ना नहीं चाह रहा था। उस ट्रिप पर जाने के लिये मेरे प्रोजेक्ट मैनेजर ने दो बार पूछा था और मैंने मना कर दिया था पर बाद में शिवेंद्र के कहने पर मैंने अंततः हामी भर दी थी सो अब इंकार करने की कोई वजह ही बाकी नहीं बची थी।

मैंने आनन-फानन में अपना सामान ठीक किया और अपने दोस्तो के साथ निकल लिया स्पेंसर प्लाजा के लिये। वहां उन्हें "वेलकम" सिनेमा देखनी थी और मुझे वहां से चेन्नई सेंट्रल के लिये निकल लेना था।

मैं जब स्टेशन पहूंचा तो कई पूर्वाग्रहों से ग्रस्त था कि पता नहीं मैं दो दिन कैसे काटूंगा क्योंकि मुझे पता था की 1-2 को छोड़कर शायद ही कोई मुझे वहां मिलेगा जो हिंदी जानता होगा और पूरी कि पूरी टीम के सदस्य मेरे लिये नये थे। यहां तक कि कार्पोरेट जगत भी मेरे लिये अभी नया ही है और मुझे इसके शिष्टाचार कि ज्यादा जानकारी नहीं है।

मेरे साथ जाने वालों में 4 मेरे ट्रेनिंग के समय के साथी थे सो मैं ट्रेन में उनके साथ ही बातों में लगा हुआ था। थोड़ी हिचक भी थी कि मेरे साथ जो भी हैं वे सारे मेरे वरिष्ठ सहकर्मी हैं, मैं औपचारिकता निभाते हुये कैसे 3 दिन काटूंगा। मगर जब वहां पहूंचा तब मैंने पाया कि उन सभी का व्यवहार बहुत दोस्ताना था। मैं पहले से बस अपने PM(कार्थी) और PL(सुरेन) को ही जानता था और वो भी बहुत नजदीक से नहीं। मगर इस ट्रिप पर उनके दूसरे पहलू मेरे सामने खुलकर आ गये और मैं खासतौर पर अपने PM(कार्थी) की मन ही मन प्रशंसा किये बिना नहीं रह पाया।

कार्थी मेरे PM
मैं पहले ही बता चुका हूं कि मैं वहां अकेला था जिसे तमिल नहीं आती थी और हम 5 ऐसे थे जो सबसे कनिष्ठ थे, सो हमें लगभग बच्चों के जैसा ही रखा गया और जैसे-जैसे लोगों को पता चलता गया कि मुझे तमिल नहीं आती है वैसे-वैसे ही सभी मुझसे अंग्रेजी में बाते करने लगे और मैं भी धीरे-धीरे उन सब में रम गया।

हां मुझे कुछ लोग ऐसे भी मिले जो टूटी-फूटी हिंदी भी बोल लेते थे और उनमें सबसे प्रमुखे नाम संतोष और शिवा का है। कुछ नये और अच्छे लोगों से जान पहचान भी हो गई जिनमें प्रमुख नाम संतोष, चंद्रू, शिवा, सतीस, दिनाकरण, नंदकुमार, प्रसाद, नवीन हैं। और भी कुछ नाम हैं जो मुझे अभी ठीक से याद नहीं आ रहा है और गलत नाम लिखने से अच्छा है कि ना ही लिखूं।

हम लोग यरकौड नामक हिल स्टेशन पर घूमने गये थे जो सेलम के पास है। और ये कहा जा सकता है कि मैं इन 2-3 दिनों में बहुत आनंद लिया और साथ ही ढेर सारे अच्छे लोगों को जानने का मौका मिला। हां कहीं ना कहीं मन में ये भी आ रहा था कि मेरे मित्र जिन्हें मैं चेन्नई में छोड़ आया हूं उनसे अगली बार पता नहीं कब मिल पाऊंगा।

मैं खुद
कुल मिला कर कहा जा सकता है कि चेन्नई की गर्मी से दूर किसी पहाड़ी इलाके में भ्रमन करने का आनंद उठाया।

Wednesday, January 02, 2008

मेरा नया ब्लौग तकनीक संबंधी (गूगल का डूडल)

मेरे इस नये ब्लौग का नाम है PD Tech Talk। मैंने इस ब्लौग के साथ ही नये साल कि शुरुवात की है और जैसा कि नाम से ही झलकता है कि ये पूरी तरह से तकनीक से संबंधित होगा। आप लोगों के मन में एक बात जरूर आ रही होगी कि कहने को तो ये हिंदी ब्लौग है पर इसका नाम अंग्रेजी में क्यों रखा गया है? तो इसका जवाब यह है कि अगर मैं इसका नाम प्रशान्त तकनीकी समाचार(prashanttakaneekeesamaachaar.blogspot.com) रखता तो इसकी लम्बाई कुछ ज्यादा ही हो जाती और किसी मनुष्य के स्मरण शक्ति के बाहर की बात हो जाती।

सभी अग्रीगेटरों से मेरा अनुरोध है कि इसे वे अपने-अपने साईटों पर रजिस्टर कर दें, धन्यवाद।

मेरे इस नये ब्लौग के पहले पोस्ट का नाम है गूगल का डूडल। अब आप ही बतायें की मेरा ये नया ब्लौग आपको कैसा लगा।

नया साल और दिनकर जी की कविता

मैं पिछले 3-4 दिनों से नेट की आभासी दुनिया से बाहर अपनी जीवंत दुनिया में मस्त था। सो आज सुबह-सुबह जैसे ही मैंने अपना जी-मेल का इनबाक्स खोला तो पाया कि वहां चिट्ठों और सुभकामनाओं कि बाढ सी आयी हुई है। जिसमें से सबसे बढिया सुभकामना पत्र जो मुझे प्राप्त हुआ वो यहां मैं आज के अपने पोस्ट पर डाल रहा हूं। इस कविता को लिखने वाले मेरे सबसे मनपसंद कवि हैं।

सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं
स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं
बँधा हूँ, स्वप्न हूँ, लघु वृत हूँ मैं
नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं

समाना चाहता है, जो बीन उर में
विकल उस शून्य की झंकार हूँ मैं
भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में
सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं

जिसे निशि खोजती तारे जलाकर
उसी का कर रहा अभिसार हूँ मैं
जनम कर मर चुका सौ बार लेकिन
अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं

कली की पंखडीं पर ओस-कण में
रंगीले स्वप्न का संसार हूँ मैं
मुझे क्या, आज ही या कल झरुँ मैं
सुमन हूँ, एक लघु उपहार हूँ मैं

मधुर जीवन हुआ कुछ प्राण! जब से
लगा ढोने व्यथा का भार हूँ मैं
रूदन अनमोल धन कवि का, इसी से
पिरोता आँसुओं का हार हूँ मैं

मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का
चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं
पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी
समा जिसमें चुका सौ बार हूँ मैं

न देंखे विश्व, पर मुझको घृणा से
मनुज हूँ, सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं
पुजारिन, धुलि से मुझको उठा ले
तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं

सुनुँ क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा
स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का
प्रलय-गांडीव की टंकार हूँ मैं

दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा का
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं
सजग संसार, तू निज को सम्हाले
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं

बंधा तूफान हूँ, चलना मना है
बँधी उद्याम निर्झर-धार हूँ मैं
कहूँ क्या कौन हूँ, क्या आग मेरी
बँधी है लेखनी, लाचार हूँ मैं ।।


- रामधारी सिंह दिनकर

इसे मेरे मित्र संजीव नारायण लाल ने मुम्बई से भेजा है जो अभी पटनी कंप्यूटर साल्यूशन में कार्यरत हैं।