Tuesday, February 05, 2008

नये भारत की नई तस्वीर

एक कंकाल सा शरीर जो सकुचाता हुआ कहीं बैठने की जुगत में लगा हुआ था और बगल में खड़े टिप-टाप लोग उसे ऐसे देख रहे थे जैसे किसी गली के जानवरों से भी गया गुजरा हो। वो बैठा वहां, उसके साथ में एक 1-2 साल का बच्चा भी था। बस एक चिथड़ा जैसा कुछ लपेटे हुये। वो आदमी जिसके चेहरे से ही लग रहा था की वो कई दिनों से नहाया नहीं होगा क्योंकि शायद नहाना या दाढी बनाना उसकी प्राथमिकता में नहीं था।

किसी तरह से जगह ढूंढ कर वो फुटपाथ पर बैठ गया और अपनी पोटली खोली। उसमें चावल और सांभर था जो एक ही जगह रहने से गड्ड-मड्ड सा हो गया था। दोनों ही बड़े भुखे लग रहे थे पर फिर भी उस आदमी ने पहले उस बच्चे को अच्छे से खिलाया और जब उसने और खाने से मना कर दिया तब जाकर वो खुद खाना शुरू किया। मुझे आज दिन का अपना खाना याद आ गया जो मैंने पूरा बस इसिलिये नहीं खाया था क्योंकि मुझे आज की सब्जी अच्छी नहीं लग रही थी। उस आदमी को देखकर मन अपराधग्रस्त सा लगने लगा था।

वहीं बगल खड़े या वहां से गुजरने वाला लगभग हर आदमी अच्छे कपड़ों में था जो 10 रुपये का कोक के लिये 15 रुपये में खरीदने में भी नहीं हिचक रहा था। सामने एक नारियल पानी वाला 10-13 रुपये वाला नारियल 15-20 रुपये में इसलिये बेच रहा था क्योंकि वो एक साफ्टवेयर कम्पनी के बाहर बेच रहा था और उसे पता था की इस दाम पर भी लोग उससे नारियल पानी खरीदेंगे ही।

कई लोगों के हाथों में 4 से लेकर 8 रुपये तक के सिगरेट नजर आ रहे थे। और सभी की निगाह बस उस आदमी पर टिकी हुई थी। कुछ लोग उपहास भड़ी नजरों से उसे देख रहे थे। कुछ लोग आपस में बातें कर रहे थे की इसकी इतनी हिम्मत कैसे जो यहां बैठ गया। मगर कोई उसे कुछ भी नहीं बोला। पहली बार लगा की शराफत का मुखौटा ओढने का कुछ फायदा भी होता है।

आज जब मैं दोपहर में अपना मूड फ्रेश करने अपने आफिस से बाहर गया तो वहां का कुछ ऐसा ही नजारा था। शायद यही है नये विकसित होते भारत की नई तस्वीर जिस पर हमें गर्व है।

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3 comments:

  1. बहुत छू गयी यह पोस्ट।

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  2. आप की पोस्ट ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया ।

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  3. आपकी इस पोस्ट को पढ़कर सहज ही समझ आ जाता है कि मनुष्य चाहे जितनी भी प्रगति कर ले,समृद्धि पा ले, जब तक उसके आसपास के लोग भी सुखी व समृद्ध नहीं होते , उसकी खुशी अधूरी ही रहती है । आपकी भावनाओं का आदर करती हूँ । आशा है कि आपसे अगली पीढ़ी को अपने खाने को नापसन्द करने का अपराधबोध नहीं होगा क्योंकि सब लोग पसन्द नापसन्द करने लायक हो जाएँगे ।
    घुघूती बासूती

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