Friday, January 25, 2008

All The Best For Girls और पैसा वसूल

लड़कियों के मामले में अपनी तो किस्मत ही हर वक्त दगा दे जाती है। और अगर किसी ने All The Best जैसा जैसा कुछ बोल दिया फिर तो बंटाधार होना निश्चित है।

अभी कुछ दिनों पहले की बात है। मैं और मेरा दोस्त विकास एक सिनेमा देखने के लिये चेन्नई के प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित सिनेमा हालों में से एक सत्यम के लिये जा रहे थे। रास्तें में उपरोक्त डायलाग(All the best for girls) मेरे एक मित्र ने यूं ही मजाक में कहा कि जाओ शायद बगल वाली सीट पर कोई अच्छी और खूबसूरत लड़की बैठी हो।

वहां मैं पहूंचा और अपने ई-टिकट को दिखा कर सही टिकट लिया(मैंने नेट से बुकिंग की थी)। अब जैसा कि मैंने पाया है, महानगरों में आप किसी मल्टिप्लेक्स में रात वाले शो में जाते हैं और चूकिं टिकट बहुत महंगा होता है और उपर से अगर वो कोई अंग्रेजी सिनेमा हो तो अच्छी-अच्छी और खाते पीते घर कि लड़कियां बहुतायत में पहूंचती है जिसे हम जैसे युवा वर्ग के लोग हॉट क्राउड कहते हैं।

उस दिन इस तरह कि सारी परस्थितियाँ हमारे अनुकूल थी। रात 10 बजे का शो था, "I Am Legend" नामक सिनेमा की टिकट हमारे पास थी और महंगा मल्टिप्लेक्स था सो चेन्नई होते हुये भी क्राउड अच्छा था।

हम दोनों टिकट लेकर अंदर गये और अपनी-अपनी सीट पकड़ कर बैठ गये। फिर लगे इंतजार करने की कोई अच्छी और खूबसूरत लड़की बगल वाली सीट पर आकर बैठे। मगर किस्मत को कभी मेरे उपर दया नहीं आती है और अगर साथ में विकास भी हो फिर तो क्या कहने।

पूरा हॉल अच्छी-अच्छी लड़कियों से भरा परा था। पर मेरे बगल की तो बात छोड़िये, मेरे पूरे रो(ROW) में एक भी लड़की नहीं थी। खैर किसी तरह दिल को समझाया कि सिनेमा अच्छी हो तो पैसे वसूल हो जाये।

10 बज चुके थे, सिनेमा शुरू होने से पहले का प्रचार परदे पर आना चालू हो चुका था और हम उसे देखकर अपने चव्वनी-अठन्नी वसूल कर रहे थे। फिर शुरू हुआ सिनेमा मगर अभी तक किस्मत को हमपर दया नहीं आई था। और 5-6 सेकेंड सिनेमा चलने के बाद ही प्रोजेक्टर खराब हो गया। उसे ठीक करते-करते 11:15 हो गये। अब तक उन सारे दर्शकों का सब्र टूट चुका था जो संभ्रांत दिखने का मुखौटा ओड़ कर चुपचाप बैठे हुए थे। हम तो बस बैठ कर तमाशा देखते रहे। क्योंकि हमारे बोलने का ज्यादा फायदा नहीं होने वाला था। क्योंकि हम तमिल जानते नहीं थे और अंग्रेजी में आज-तक कभी चिल्ला कर बोले नहीं थे। और हमारे भदेस भाषा को वहां समझने वाले लोग कम ही थे।

खैर अंत में हमारे सारे पैसे वसूल हो गये। सिनेमा हाल वालों ने हमसे टिकट लेकर हमारे पैसे लौटा दिये। यहां तक कि पार्किंग के भी। और हम वापस घर आ गये। मन को समझाते हुये की चलो पैसे तो वसूल हो गये!!!

(अपने जीवन की इस घटना पर एक व्यंग जैसा कुछ लिखने का मैंने प्रयत्न किया है सो आप इसे अन्यथा ना लें। अब कितनी सफलता मिली है ये तो आप ही बतायें।)

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6 comments:

  1. आईटी में होकर हिंदी वालों की जमान में आगे हो बधाई, कुल मिलाकर इतनी साफगोई से लिखने का प्रयास अच्‍छा है।

    वैसे चिंता न कीजिए प्रशांत भाई कभी तो आपके भी पैसे वसूल होंगे,

    ऑल द बेस्‍ट

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  2. लड़कियों के मामले में अपनी तो किस्मत ही हर वक्त दगा दे जाती है।
    @@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@@

    जब साथ देना होगा, तो देगी जरूर। परमानेण्टली!

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  3. हे हे हे । चलो हमारी शुभकामनाएं हैं । इस फरवरी से कि़स्‍मत सुधर जाए प्रशांत तुम्‍हारी । क्‍यूपिड मंथ है ना भाई

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  4. हताश ना हों भगवान जब भी देगा छप्पर फाड़ कर देगा

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  5. सई है जी!!
    बाकी इस मामले मे अपनी किस्मत भी आपके जैसी है,
    हमरे ब्लॉग पे पढ़िएगा "किस्मत का लोचा"
    तो मालूम चल जाएगा!! ;)

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  6. ab aapki kismat par kya kahoon main....bas itna kahoonga "ALL THE BEST FOR GALS" :P

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