Thursday, January 07, 2010

दिल तो बच्चा है जी


सिनेमा देखते हुये वह सीन आया जब रैंचो के दोनों दोस्त यह सोच कर उदास थे कि चलो हम दोनों नीचे से ही सही, मगर पास तो हुये.. मगर अपना यार रैंचो फेल हो गया.. थोड़ी देर बाद पता चलता है कि रैंचो तो टॉप किया है और दोनों का चेहरा और लटक जाता है और पीछे से आवाज आती है, "अपने नंबर कम आने से ज्यादा दुख अपने दोस्त के टॉप करने पर होता है.." और मैं बगल मुड़कर विकास को गरिया देता हूं, "साला.. चोट्टा.. कमीना.." क्या हुआ? गरिया क्यों रहा है? अबे साले, तेरे टॉप आने पर कालेज में नहीं गरियाया, सो अभी गरिया रहा हूं..

दिल तो बच्चा है जी.....

ऑफिस में अपने कलीग एवं मित्र का कुछ काम कर दिया.. बहुत देर से परेशान हो रहे थे उसे लेकर... उनके पास समय नहीं था उसे करने के लिये और उस काम कि प्रायोरिटी बहुत हाई थी... उसे खत्म हुआ देख कर बहुत खुश हुये.. उनके लिये यह किसी सरप्राईज से कम नहीं था.. "थैंक्यू वेरी मच.." उन्होंने कहा... मैंने बिना सोचे रिप्लाई किया, "यू आर मगरमच्छ..." एक सेकेण्ड को हड़बड़ाये फिर मतलब समझ कर दोनों हंसने लगे...

दिल तो बच्चा है जी.....

घर से निकलता हूं दफ़्तर के लिये.. पहले से ही देर हो चुकी है.. हड़बड़ी में लम्बे-लम्बे डग बढ़ाता हुआ चला जा रहा हूं बस स्टॉप की ओर.. तभी एक छोटा सा कंकड़ मेरे जूते से टकरा कर थोड़ी दूर चला जाता है.. तीन-चार कदम पर फिर से वही पत्थर के पास हूं, और इस बार निशाना लगा कर जूते से जोड़ से मार दिया.. अब कहां की देरी और कहां का ऑफिस.. अब तो पहले उस पत्थर को अपने साथ बस स्टॉप तक ले जाने की जुगत भर बाकी है.. जूते का टो खराब होता है तो होने दो....

दिल तो बच्चा है जी.....

छुट्टियों कि एक शाम अपने घर के बरामदे में बैठा बच्चों को क्रिकेट खेलता देख रहा था.. उन्हीं बच्चों का हमौम्र एक बच्चा हवा मिठाई(जिसे बूढ़ी के बाल भी कहते हैं) बेचते हुये जा रहा था.. अब दोनों तरफ के बच्चे लालच में आ जाते हैं, एक बच्चे को क्रिकेट खेलने का लालच और बाकी बच्चों को हवा मिठाई का... दोनों मिल कर तय करते हैं कि पांच गेंद बैटिंग करने को मिलेगा और उसके बदले एक हवा मिठाई का पैकेट.... और उनके इस तमाशे का एकमात्र गवाह मैं... हवा मिठाई वाला बच्चा चार गेंद को बल्ले से मारता है और कम से कम 20 गेंद बरबाद करता है, बाकी बच्चे परेशान हो जाते हैं... और गेंद फेंकने से मना कर देते हैं... हवा मिठाई वाला बच्चा भी एक पैकेट देने से मना कर देता है और जाने लगता है... थोड़ी देर तक सरे बच्चे आपस में झगड़ते हैं... मैं सारे बच्चों को बुलाता हूं... 4-5 हवा मिठाई का पैकेट लेकर सारे बच्चों को दे देता हूं और 4-5 अपने लिये ले लेता हूं... पैसे भी बिना किसी मोल भाव के बच्चे को दे देता हूं... सभी खुश... मेरे मित्र भी हवा मिठाई खाकर खुश.... हैप्पी इंडिंग....

दिल तो बच्चा है जी.....

अकसर देर रात फोन पर बतियाते हुये ग्रील खोल कर बाहर सड़क पर निकल आता हूं.. अक्सर रातों को बतियाते हुये उन आवारा कुत्तों को भी देखता हूं जो आपस में भागदौड़ कर खेलते रहते हैं और किसी नये मेहमान के उस गली से गुजरने पर खूब भौंकते हैं... एक पत्थर उठाकर उन्हें डराता हूं, वे थोड़ी दूर भाग कर पलट कर देखते हैं... मैं दो कदम आगे बढ़ता हूं, वे चार कदम पीछे जाते हैं.. यह खेल 4-5 मिनट चलता है, मैं फिर से बात करने में मशगूल हो जाता हूं... थोड़ी देर बाद ध्यान आता है कि सामने वाले घर में अपने बरामदे में बैठे अंकल जी शायद मेरी इस हरकत को देखकर मुस्कुरा रहे थे... मैं भी उनकी ओर देख, मुस्कुरा कर अंदर चला आता हूं...

दिल तो बच्चा है जी.....

चलते-चलते : जब से इस गाने को सुना है, मन में बस यही गूंज रहा है.. जैसे इसे सुनकर थोड़ा बच्चा मैं भी हुआ जा रहा हूं.. यूं तो ये गीत बेहद नौस्टैल्जिक करने वाला है, मगर इसे सुनकर मैं नौस्टैल्जिक हो कर बचपन को याद करने के बजाये सीधा बच्चा ही हुआ जा रहा हूं.... देखिये कब यह खुमार उतरता है? शायद उसके बाद कुछ नौरमल हो जाऊं... ;)
अभी ये लिख ही रहा था कि बीच में इसी गाने पर विनीत का पोस्ट देखा.. आधा ही पढ़कर छोड़ दिया, सोचा कि अगर पूरा पढ़ लूंगा तो इस पोस्ट को पूरा ना करके उनके पोस्ट के साथ बह निकलूंगा... वैसे "पापा तुस्सी ग्रेट हो" वाला ख्याल तो हमेशा ही आते हैं मन में.. हां!! मगर अपने अनुभव विनीत के अनुभव से बेहद जुदा हैं...

24 comments:

  1. बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट....

    ReplyDelete
  2. ये कहाँ आ गए हम लिंक ले कर :)

    ReplyDelete
  3. दिल तो बच्चा है जी.....


    इसे बड़ा मत होने देना!!

    ReplyDelete
  4. मेरे जूते का टो तो हमेशा ख़राब ही रहता है.. मुझे ऐसा लग रहा है तुम कैसेट पलट रहे हो..
    ऐसी पोस्ट्स अन्दर एक गुदगुदी पैदा कर जाती है.. ज़िन्दगी हमारे आस पास कही पड़ी होती है और हम लोग उसे यहाँ वहां ढूंढते फिरते है.. बढ़िया पोस्ट हैभाई..

    ReplyDelete
  5. हर एक इंसान के अन्दर एक बच्चा होता है...लेकिन वो कभी कभी बाहर आता है..वो भी तब जब आप बच्चे नहीं होते हो..!! अच्छा है तुम्हारा बचपन भी उमर उमर के बाहर आ रहा है..!! जी लो इसको..!!

    ReplyDelete
  6. बचपन में कई ऐसी चीजें जो नहीं करते या फिर करते हैं उसे बड़ा होने पर भी करने को मन करता है। मैंने अपनी गुल्लक तोड़कर पापा को स्कूली बक्सा लाने को दिया था। वो बक्सा अल्युमुनियम या स्टेनलेस स्टील का का होता। मेरे लगभग सारे वही बक्सा लाते। स्कूल की छुट्टी होने के बाद बक्सा लड़ाने का आम रिवाज था। मेरा बक्सा टीन का होता जिस पर कायदे से एख चोट करते ही कुंडी खुल जाती,ताला लगाने का ठीक हिसाब नहीं बैठता औऱ सारी चीजें बिखर जाती। मैं रोता-कलपता और सारे सामान समेटता। तभी मैंने गुल्लक तोड़कर पैसे दिए थे लेकिन पापा उस पैसे को पचा गए औऱ आज दिन तक लाकर नहीं दिया। आपका जो शौक है वो इतने सभ्य तरीके का है कि उसे आज भी आप करेंगे तो एमटीवी वालों की तरह हैप और फंकी एफर्ट कहलाएंगे लेकिन आप बताइए आज अगर मैं अलमुनिया का बक्सा खरीद भी लूं तो उसे यूनिवर्सिटी ले जा सकता हूं?

    ReplyDelete
  7. हकीक़त यही है के हम सब असल जिंदगी में राजू जैसा बनना चाहते है ओर रेंचो को बस पसंद करते है ...

    ReplyDelete
  8. आहा विनीत भाई, क्या याद दिला दिये.. मेरे पास भी एक रंग-बिरंगा टीन का बक्सा हुआ करता था.. उसे झुलाते हुये एक फुट के नाले को पूरी ताकत से कूद कर पार करके स्कूल जाने का शार्टकर निकाले हुआ था.. एक बार कूदते समय उसका कुंडी खुल गया और सारा किताब कॉपी नाले में बह गया.. वह नाला घर से और स्कूल से बराबर दूरी पर था.. दूरी इतनी ही थी जिससे घर से नाला और नाले से स्कूल दिख जाये.. तीन घंटे वहां बैठकर रोता रहा.. स्कूल सुबह के समय हुआ करती थी.. जब पापा ऑफिस जाने के लिये निकले तो मुझे देख लिये, और वहां आकर गोद में उठाकर रास्ते भर दुलारते-पुचकारते घर ले आये..

    मेरे पापाजी हम बच्चों में कितने लोकप्रिय थे उसका मुन्ना भैया भी अपने एक पोस्ट में जिक्र किये थे.. उसका लिंक भी दिये जाता हूं.. http://dilli-darbhanga.blogspot.com/2008/06/blog-post.html

    वैसे विनीत भाई, आपके मन में जो कुछ भी है अगर वह असामाजिक नहीं है तो उसे जरूर पूरा कर लेना चाहिये.. ज्यादे-से-ज्यादे दुनिया यही समझेगी ना कि बौरा गया है.. किसी के समझने या ना समझने से क्या फर्क पड़ने वाला है? :)

    ReplyDelete
  9. @ कुश - अरे भाई, तुम्हारे पोस्ट ने तो वह कमाल दिखाया है कि पूछो ही मत.. तुम्हारे पोस्ट को पढ़ने के बाद ऐसे ही बचपन के किस्से को अपने ऑफिस के एक मित्र के सामने छेड़ दिया.. बेहद गंभीर से रहने वाले उस शख्स के पास इतने किस्से निकल आये कि बस पूछो ही मत.. उन किस्सो को सुनाते हुये उनके चेहरे पर जितनी खुशी मैंने देखी, उससे पहले कभी नहीं देखी थी.. 'ए' साईड वाकई जानदार हुआ करता था..

    @ डा.अनुराग जी - ये बात तो बिलकुल सही कही आपने.. मेरे ख्याल से रैंचो जैसा शायद ही कोई हो.. किसी सुपरमैन से कम नहीं दिखाया था उसे.. जो भी करता वही परफेक्ट.. असल जिंदगी में यह संभव ही नहीं..

    @ महफूज जी - पसंद करने के लिये धन्यवाद..

    @ समीर जी - बिलकुल, हम बच्चे बने ही रहेंगे..

    @ पाबला जी - थैंक्यू जी..

    @ सागर - थैंक्स दोस्त..

    @ संदीप शर्मा जी - थैंक्स डीयर..

    @ मनोज - ये उमर उमर कर आने वाली बात समझ में नहीं आई?? :P

    ReplyDelete
  10. @ महेश जी - वैसे आप किस लिंक से कूद कर यहां आये थे यह नहीं बताया? :)

    ReplyDelete
  11. वाह, ये पोस्ट तो आइडियाज दे रही है! बहुत बढ़िया!

    ReplyDelete
  12. ये गाना ही ऐसा है... मस्त लगा पहली बार सुनते ही.

    ReplyDelete
  13. मुझे तो बाद में पता चला की यह गाना है :)

    ReplyDelete
  14. विनीत की पोस्ट पढ़ने के बाद तुम्हारी सारी पोस्टें खोजकर दुबारा पढ़ीं जो तुमने अपने पापा के बारे में लिखी थी। उनका जिक्र भी किया।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/2010/01/blog-post_09.html

    ReplyDelete
  15. कंकड़ वाला खेल तो आज भी मेरा पसंदीदा खेल है
    तब कहाँ याद रहता है कि ३५ साल की उम्र हो गयी

    ReplyDelete
  16. थ्री इदियट्स तो देखने का मौका जाने कब मिले...लेकिन इस पोस्ट ने खामखां सेंटी किया है इतनी रात गये।

    साइड-बार में तुम्हारी हँसती तस्वीर दिखती है और मुझे तुमसे की गयी वो बातें याद आती हैं।

    ReplyDelete
  17. "लम्बे लम्बे कदम बढ़ाता..." लम्बाई का खूब showoff कर रहे हो, मुझे नाटी होने पर धिक्कार है! देखना न ४ फुट की बीवी मिलेगी तुम्हें :P

    इतना भर लिख कर फूटने वाले थे की kuch aur कमेन्ट दिख गया. नर्सरी में मेरे पास भी एक अलुमिनियम का बक्सा हुआ करता था, साल दो साल में बैग आ गया था पर वो बक्सा पूरे बचपन खजाना छुपाने के काम आता था. बहुत सालों तक रखा था उसे, फिर ट्रान्सफर हुआ पापा का तो देवघर में ही छूट गया. पटना में कई बार दुःख होता था अपने खजाने के खो जाने पर. आज फिर से हो रहा है. :(

    ReplyDelete
  18. दिल तो बच्चा है जी
    अपनी किसी शारीरिक अवस्था का क्षोब न करें
    दिल तो बच्चा है जी

    ReplyDelete
  19. हम्म्म्म्म....! दिल तो बच्चा है जी...! मैँ भी गिनवाना शूरु करूँ क्या...??

    ReplyDelete