Thursday, December 17, 2009

पता नहीं, प्रोसेसर स्लो है या हार्ड डिस्क फुल?

आज सुबह ऑफिस जाने की हड़बड़ी में था तभी देखा कि पापा जी का फोन आ रहा है.. और इससे पहले भी तीन बार उनका फोन आ चुका था जिसका मुझे पता नहीं चल सका.. उन्होंने बताया कि मेरे लिये किसी सईद का फोन आया था और उन्होंने मेरा नंबर उसे दे दिया है..

मैं तब से ही सोच रहा हूं कि ये सईद कौन है? और उसके पास मेरे घर पटना का नंबर कैसे आया? क्योंकि पटना में सबसे पहले जो नंबर लिया गया था वो अब बदल चुका है, और मेरे बहुत पुराने मित्रों, जिनसे मैं 5-6 साल से नहिं मिला हूं, के पास वही पुराना नंबर होगा.. और नया नंबर मेरे चुनिंदा मित्रों के ही पास है..

खैर!! जब से सुना हूं तब से मेरे हार्ड डिस्क में सर्चिंग चालू है.. मगर यह नाम अभी तक मिला नहीं.. अब मुझे समझ नहीं आ रहा है कि ये नाम सर्च करने में लगने वाले समय के पीछे कारण क्या है?

कुछ कारण मैंने खोजे हैं, बाकी कुछ चाहें तो आप भी जोड़ सकते हैं -
1. या तो मेरे हार्ड डिस्क में बहुत सारा डाटा है.
2. या फिर मेरा प्रोसेसर स्लो हो गया है.
3. या फिर वह नाम हिडेन मेमोरी में चला गया है.
4. या फिर साफ्टवेयर करप्ट हो गया है!!!!


और अगर वह डाटा मेरे मेमोरी में है ही नहीं तो यह सर्चिंग प्रोसेस इंफायनाईट लूप में क्यों चला गया है? कुछ तो गड़बड़ जरूर है.. :)

खैर जो भी हो, अगर उसे काम होगा तो वह खुद ही फोन करेगा.. :)

Wednesday, December 16, 2009

अब भी उसे जब याद करता हूं, तो बहुत शिद्दत से याद करता हूं

समय के साथ बहुत कुछ बदला है.. मैं भी बदला हूं, मेरी सोच के साथ-साथ परिस्थितियां भी बदली है.. कई रिश्तों के मायने बदले हैं.. पहले जिन बातों के बदलने पर तकलीफ़ होती थी, अब उन्ही चीजों को देखने का नजरिया भी बदला है और उन्हें उसी रूप में स्वीकार कर आगे बढ़ने की प्रवॄति भी आ गई है.. जिन चीजों के बदलने पर तकलीफ होती थी अब उन बातों को आसानी से स्वीकारने भी लगा हूं..

जिस मित्र के साथ हर बात बांचते थे और जिसके पास मेरे बैंक एकाऊंट का पासवर्ड होना भी कोई मायने नहीं रखता था, अब उन्ही मित्रों से कई बाते छुपा जाया करता हूं.. वे भी अमूमन वैसा ही करते हैं, जैसा मैं करता हूं.. वे भी तब वैसा ही करते थे जैसा मैं करता था.. मुझमें और उनमें कोई अंतर बाकी ना रहा.. ना तब, और ना अब..

पहले कुछ भी अपना नहीं होता था, अब कई चीजें सिर्फ अपने लिये होने लगी हैं.. कभी-कभी लगता है कि कहीं स्वार्थी तो नहीं होता जा रहा हूं? मगर फिर लगता है कि अगर यह स्वार्थीपना है तो हम चारों ओर स्वार्थियों से ही घिरे हुये हैं.. वहीं कभी आशावादी तरीके से भी सोचता हूं.. सोचता हूं कि यही तो जीवन का सत्य है.. मानव स्वभाव है.. इसमें स्वार्थीपना कहीं भी नहीं है.. हर कोई अपना एक स्पेस चाहता है, तो उस स्पेस में क्यों जबरन घुसा जाये?

अपने शहर में जाता हूं तो अपने घर के इर्द-गिर्द कई नये बेजान से मकानों को देखता हूं.. हर छः महिने में कम से कम 2-3 नये मकान.. उस मैदान पर जहां मैं क्रिकेट खेला करता था और जिस पर 2-3 टीम एक साथ खेलती थी, उस पर अब एक छोटी सी टीम के खेलने लायक जगह भी नहीं बची है.. बदलावों के बयार में तो हर कुछ बह रहा है..

अब रोना कम हो गया है.. पहले हर इमोशनल बातों पर रोना आता था.. अब वैसी बाते आने पर हंसी आती है.. खिसियानी हंसी.. लगता है जैसे खुद को धोखा देने कि कोशिश में लगा हूं.. दुनिया को दिखाना चाहता हूं कि देखो, मैं कितना प्रैक्टिकल हो गया हूं.. प्रक्टिकल होना या प्रोफेशनल होना अब भी मेरी समझ के बाहर की चीज है.. अब हर बात को पॉलिटिकली करेक्ट करने की कोशिश अधिक लगती है बजाये की दिल कि बात कही जाये.. प्रैक्टिकल होना या प्रोफेशनल होने का अभी तक एक ही मतलब समझ पाया हूं, महसूस कम करना.. कुछ भी महसूस ना करना.. जो जितना कम महसूस करता है, वह उतना ही प्रैक्टिकल है..

एक बात तो समझ में आती है कि मैंने मन में गांठ बांध लिया है की "बदलाव ही जीवन का अटूट सत्य है".. देर से ही सही, समझ में तो आया.. अब तुम्हारा वह पहाड़ी वाला शहर भी अधिक तकलीफ़ नहीं देता है, और ना ही यादों में अधिक ढ़केलता है.. सच कहूं तो तुम्हारे उस शहर में जाकर अंतरमन में रस्साकस्सी बहुत अधिक चलती है.. दिल उन यादों में डूबना चाहता है, मगर दिमाग कहीं और खींचना चाहता है..

कुछ दिन पहले उसी शहर में रहने वाला एक मित्र पूछ बैठा था तुम्हारे बारे में, "क्या उसे अब भी याद करते हो?" "ना!!" तुरत जबान से निकल पड़ा.. आधे मिनट की चुप्पी के बाद मैंने कहा, "अब यादों में डूबे रहना जमाने को प्रैक्टिकल नहीं लगता है.. मगर अब भी उसे जब याद करता हूं, तो बहुत शिद्दत से याद करता हूं.." पता नहीं क्यों, मैं उससे झूठ नहीं बोल पाया.. मगर कई बातें नहीं कह पाया.. जैसे.. उस शहर में अब भी तुम्हारी खुश्बू महसूस करना चाहता हूं, मगर अब उस अहसास का पीछा नहीं करता हूं.. समझ गया हूं.. यह एक मृग-मरिचिका से अधिक और कुछ नहीं है..

चलते-चलते : एक बात जो समझा हूं, एक चीज कभी नहीं बदलती है.. चाहे सारा जमाना बदल जाये.. सारे रिश्तों के मायने बदल जाये.. ब्रह्मांड के बदलाव के नियम को झूठलाते हुये ना बदलने वाली चीज है, मां-पापा का प्यार और स्नेह..

Tuesday, December 15, 2009

DDLJ के जादू का बाकी है असर


कुछ महिने पहले "दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे" के 14 साल पूरा होने के अवसर पर मैंने अपनी याद अजय जी के ब्लौग चव्वनी छाप पर आप लोगों से बांटा था.. आज उसे ही अपने ब्लौग पर भी बांचे जा रहा हूं.. डीडीएलजे ऋंखला के बाकी लेख पढ़ने के लिये इस लिंक पर जायें..

आजकल जिसे देखो वही डीडीएलजे की बातें कर रहा है.. करे भी क्यों ना? आखिर इसने चौदह साल पूरा करने के साथ ही जाने कितने ही लोगों और लगभग दो पीढि़यों को प्यार करना सिखाया होगा.. चलिये सीधे आते हैं अपने अनुभव के ऊपर..

उस समय हमलोग आधा पटना और आधा बिक्रमगंज में रहते थे.. पापा बिक्रमगंज में पदस्थापित थे और हम बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के चलते एक घर हमें पटना में भी लेकर रखना पड़ा था, क्योंकि बिक्रमगंज में "केंद्रीय विद्यालय" नहीं था.. उस समय हमारे घर में सिनेमा हॉल जाकर फिल्म देखने का प्रचलन लगभग ना के बराबर ही था और डीडीएलजे से पहले हमने अंतिम बार किसी सिनेमा हॉल में जाकर सिनेमा कब देखा था यह भी मुझे याद नहीं है.. हमलोग नये-नये जवान होना शुरू हुये थे और इस सिनेमा के आने से घर में हमारी जिद शुरू हो चुकी थी कि इसे देखेंगे तो सिनेमा हॉल में ही..

स्कूल में कई लड़के स्कूल से भागकर यह सिनेमा देखने जाते थे.. जिस दिन उन्हें स्कूल से भागकर सिनेमा देखना होता था उससे एक दिन पहले ही सभी मिलकर प्लानिंग करते थे.. शायद 10 साल बाद आये रौबिन शर्मा के उपन्यास(द मौंक हू सोल्ड हिज फरारी) का एक पंच लाईन वे उसी समय समझ गये जिसे रौबिन शर्मा को समझने में 10 साल और खपाना पड़ा.. "If you fail to plan, means you are planning to fail.." और उनका प्लान कभी फेल होता भी नहीं था.. वे पैसे का इंतजाम कहां से करते थे, यह भी मुझे नहीं पता चलता था और ना ही इतनी हिम्मत थी की स्कूल से भागकर उनके साथ सिनेमा देखने जा सकूं.. उन दिनों हर दिन कोई ना कोई नया डायलौग हमारे सामने होता था और हर लड़की 'सेनेरिटा' होती थी.. अगर कोई अच्छी लग रही है तो वह 'सेनेरिटा'.. अगर किसी का नाम नहीं जानते हैं तो वह 'सेनेरिटा'.. राह चलते कोई दिख जाये तो वह 'सेनेरिटा'..

खैर घर में पापा को मनाया गया.. पापाजी मान भी गये.. संयोग से उस समय पापाजी पटना आये थे और हमारे जिद के आगे झुक कर रिजेंट सिनेमाहॉल की ओर भी बढ़े.. आज भी उस रोमांच की याद ताजा है, क्योंकि जाने कितने ही साल के बाद सिनेमाहॉल के दर्शन होने वाले थे.. ना हमे पता था और ना ही पापा जी को, कि पटना के सिनेमा हॉल के टिकट के लिये कैसी मारा-मारी होती है.. सो बिना अग्रिम बुकिंग किये ही हम वहां पहूंच गये थे, और टिकट वाली खिड़की पर हाउसफुल का बोर्ड हमारा मुंह चिढ़ा रहा था..

वहीं एक बच्चा मिला जो टिकट ब्लैक कर रहा था.. अधिक से अधिक 12-13 साल का होगा.. उसने बताया की उसके पास फर्स्ट क्लास का टिकट है.. हम सभी खुश, वाह जब नाम ही है फर्स्ट क्लास तो सीट भी आरामदायक होगा.. 15 रूपये प्रति टिकट ले कर हम सिनेमाहॉल के अंदर गये.. अंदर जाने पर पता चला की अच्छा फर्स्ट क्लास हॉल के सबसे आगे वाली सीट को कहते हैं.. बामुश्किल हम वहां 15-20 मिनट बैठे और उसके बाद वहां बैठे लोगों के हुल्लड़ हंगामे के चलते हमें बाहर का दरवाजा देखना पड़ा.. जब हम वहां से उठकर जा रहे थे तब वहां के सभी लोगों की नजर हम पर ही थी कि पूरा परिवार अचानक से क्यों जा रहा है..

घर में जाने कितने ही दिनों तक इसके गाने बजते रहे.. इसकी ऑडियो सीडी भी खरीदी गई जिसकी कीमत तब शायद 275 रूपये थी.. उन दिनों भैया को विडियो कैसेट खरीद कर जमा करने का नया-नया शौक जागा था.. वे इंतजार में थे कि कब इसका ओरिजिनल कैसेट बाजार में आये और इसे खरीदा जाये.. उन दिनों सिनेमा और संगीत के बाजार में गहरी हलचल मची हुई थी.. लोग वीसीपी और वीसीआर से वीसीडी प्लेयर की ओर जा रहे थे.. कैसेट की जगह सीडी ले रहा था.. इन्ही सबके बीच जाने कब डीडीएलजे का ओरिजिनल कैसेट बाजार में आया और गुम हो गया.. आज हाल यह है कि कम से कम बीस बार यह सिनेमा देखने के बाद भी जब कभी किसी चैनल पर यह आ रहा होता है वहां रिमोट कुछ क्षण के लिये ठिठकता जरूर है.. मगर यह सिनेमा इतनी आसानी से उपलब्ध होने के बाद भी आज मेरे एक्सटर्नल हार्ड डिस्क में नहीं है जिसमें कम से कम 250-300 सिनेमा पड़ी हुई है..

चाहे कुछ भी हो, मगर इस सिनेमा के जादू का असर अब भी कहीं ना कहीं बाकी जरूर है जिसने होश संभालने के बाद सिनेमा हॉल का दर्शन भी कराया और उसके बारे में जिज्ञास भी जगाई.. इसके जादू के असर कितना था यह आप इससे जान सकते हैं कि जब मैं तमिलनाडु आया तब किसी भी स्थानिय व्यक्ति से, जो हिंदी नहीं जानता था, से हिंदी गाना गाने के लिये कहता था तो वह टूटी-फूटी हिंदी में "तुझे देखा तो ये जाना सनम" ही सुनाता था(और है भी)..

Sunday, December 13, 2009

एक कविता कोडिंग पर

कोई अपने ही घर में चोरी करता है क्या? नहीं ना? मगर मैंने किया है.. ज्ञान जी के शब्दों में यह रीठेल है.. यह कविता मेरे एक बेहद पुराने पोस्ट पर डा.अमर जी ने कमेंट किया था जिसे यहां ठेले जा रहा हूं.. आजकल ब्लौगिंग करने की फुरसत भी नहीं है और कुछ लिखने की इच्छा भी नहीं, तो सोचा क्यों ना अपना शौक कुछ इसी तरह पूरा कर लूं, अपने ही पोस्ट से चुरा कर कुछ डालता चलूं.. :)

तुम भी तो कोडिंग किये जा रहे हो,
हम भी ये कोडिंग किये जा रहे हैं,
ज़हन में दोनों के खयाल है लरज़ा,
क्यों बेसाख़्ता ज़िंदगी जिये जा रहे हैं ??

ये डिफेक्टों की लिस्ट में ये बगों का सामना,
दोनों ही बैठे किये जा रहे हैं,
PM ही जीता है लड़ाई में आखिर,
ज़ख़्म क्यों हम ही झेले जा रहे हैं ??

रहे सामने वो क्लायंट की हाज़िरी में,
हम ही क्यों पर्दे के पीछे जा रहे हैं !!
C.E.O. के Ethics किसी ने न देखे,
हमें ही सारी ट्रेनिंग दिये जा रहे हैं !!

HR यहां है, Manager वहां है,
हमारे सिवा क्या मैनेज किये जा रहे हैं ??
ब्रेक-डाउन में सैलरी के किये हैं घपले,
हम हैं कि सब कुछ सहे जा रहे हैं !!!

पता है हमें भी, पता है तुम्हें भी,
कि सपने कैसे कैसे बुने जा रहे हैं !!
कभी न कभी तो PM बनेंगे,
अरमान यही दिल में किये जा रहे हैं !!

करेंगे वो ही जलसे, के घूमेंगे हम भी,
प्लानिंग अभी से किये जा रहे हैं…
हैं हम भी ढक्कन! कि कोडिंग के बदले
ये फालतू की लाईनें लिखे जा रहे हैं …

Wednesday, December 02, 2009

बैंगलोर में मार-कुटाई की बातें

दो लोग मेरी जिंदगी में ऐसे भी हैं जिन्हें देखते ही धमाधम मारने का बहुत मन करने लगता है.. पता नहीं क्यों.. एक को तो अबकी पीट आया हूं और दूसरे को धमका आया हूं कि जल्द ही आऊंगा, मार खाने को तैयार रहना.. यह मत सोचना कि लड़की समझ कर छोड़ दूंगा.. :)

ये दोनों ही मेरे कालेज के मित्र हैं.. पहले जब कभी बैंगलोर जाना होता था तब मेरी प्राथमिकता में तीन लोग हुआ करते थे, जिनसे मिले बिना मैं नहीं आना चाहता था, बाकी काम बाद में.. चंदन, प्रियंका और रविन्द्र.. जिसमें चंदन और प्रियंका मेरे एम.सी.ए. के मित्र हैं और रविन्द्र मेरे उन सबसे पुराने मित्रों में से है जिससे पहले पहल पटना में दोस्ती हुई थी.. अबकी बार बैंगलोर गया तो एक नाम और जुड़ गया, नीता.. यह भी एम.सी.ए. वाले दोस्तों में से ही है.. बैंगलोर शिफ्ट हुये जुम्मा-जुम्मा चार दिन भी नहीं हुये हैं इसे.. अबकी बार बैंगलोर गया तो नीरज और गार्गी से भी मुलाकात होनी थी, या यूं कहें कि उन्हीं दोनों से मिलने के लिये खास बैंगलोर गया था(चंदन, प्रियंका और नीता अभी बैंगलोर से कहीं भागने वाले भी नहीं हैं).. नीरज के भैया की शादी ती और उसी कारण से वे दोनों कलकत्ता से बैंगलोर आये थे..


बायें से - मैं, नीता और चंदन

अबकी बार बैंगलोर के लिये निकला तो अपने लिस्ट में दो और नाम जुड़े हुये थे जिनसे मुलाकात करने की बहुत इच्छा थी, मगर मुलाकात हो ना सकी.. पहला नाम तो पूजा मैडम का था और दूसरा नाम मेरी पटना कि ही स्कूल के जमाने की मित्र निवेदिता उर्फ रोजी थी.. सच कहूं तो रोजी से मिलने से ज्यादा उसकी बिटिया से मिलने का मन अधिक था..

पिछले 3-4 बार से जब भी बैंगलोर गया था तब हमेशा यह शहर मेरा स्वागत ठंढ़ी फुहारों से करता रहा है, मगर शायद यह शहर भी एकरसता से ऊब गया होगा.. तभी इस बार नहीं बरसा.. सुबह-सुबह चंदन के घर पहूंच कर उसकी पिटाई की तब जाकर मन को तसल्ली मिली.. बहुत दिनों से साले को पीटा नहीं था.. :D

पता नहीं शिवेंद्र को इतनी नींद आती कहां से है? और आती है तो रखता कहां है?(एक सिनेमा से इन्सपायर्ड डायलॉग मारा हूं :)).. रात भर सोने के बाद भी चंदन के घर में पहूंचते ही बिस्तर देख लम्बा हो गया.. वह भी मेरे साथ चेन्नई से बैंगलोर आया था.. फिर थोड़ी देर बाद प्रियंका के घर को निकल लिये पेट-पूजा करने को.. मेरे और प्रियंका के बीच पहले ही बात तय हो चुकी थी कि मुझे चिकेन खिलायेगी.. उसने जब पूछा कि शिव कैसे खायेगा? मेरा कहना था, "शिव खाता नहीं है, मगर सूंघने से उसे परहेज थोड़े ही ना है?" खैर चिकेन भी आया और दबाकर खाया भी गया.. शाम में चंदन और शिवेन्द्र की इच्छा ना होते हुये भी, प्रियंका और मैं जबरदस्ती उठा ले गये सिनेमा दिखाने को, कुर्बान नाम है सिनेमा का.. सिनेमा महा बकवास थी, मगर दोस्तों का साथ था यह क्या कम था? फिर घर पहूंच कर दिन का बचा चिकेन भी दबा गया.. उधर नीता दिनभर एक अदद घर की तलाश में भटकती रही..

अगले दिन नीता से भी मुलाकात हुई और नीरज-गार्गी से भी.. कुछ ही महिने पहले इनसे कलकत्ते मे भी मुलाकात हुई थी और शिव भैया(शिव कुमार मिश्रा जी) को भी इनसे मिलवाया था.. वहीं अंतिम बार नीता से भी मुलाकात हुई थी.. मगर इतने पास होने पर भी बैंगलोर जाकर नहीं मिलने का बस एक ही मतलब था कि इन सबसे खूब गालियां खाना.. सोचा कि क्यों ना भैया की शादी का पर्टी ही खा लूं, गालियां खाने को तो ऑफिस है ही.. सो चला आया था यहां..


बायें से - नीता, प्रियंका, शिवेन्द्र, गार्गी, मैं और नीरज(सबसे दाये वाला नीरज का मित्र है जिसका नाम मुझे नहीं पता)

अब शुरू हुआ नीता के इंतजार का सिलसिला जिसके चक्कर में मैंने पूजा और रोजी को मना कर दिया था इस बार मिलने से.. मगर वह तब आयी जब चंदन ने अपने घोड़े(बाईक) को उसके घर तक लगभग 35 किलोमीटर दौड़ाया.. फिर रात ढ़लने से पहले ही उस जगह भी पहूंच ही गये जहां पार्टी चल रही थी.. इसके लिये नीता और प्रियंका भी जिम्मेदार थी जो आश्चर्यजनक रूप से बस 10 मिनट में ही तैयार हो गई थी.. :D

पार्टी में पहूंच कर मैंने नीरज से सबसे पहले बोला, "अबे तू वेटर जैसा नहीं लग रहा है, मुझे तो लगा था की पांच सितारा होटल में तू वेटर जैसा ही दिखेगा.." चलो अच्छा ही हुआ जो उसने मेरे कमेंट को कंप्लीमेंट समझ लिया, नहीं तो पांच सितारा होटल में खाने का मौका हाथ से निकल जाता.. ;)

खैर एक बार फिर से चिकेन दबा कर खाया और निकल लिये ट्रेन पकड़ने को.. आते समय नीता को धमका आया कि चंदन को तो कहीं भी पीट सकता हूं, मगर तुम्हें बीच सड़क पर पीटूंगा तो खुद ही पिट जाऊंगा.. सो यह प्रोग्राम अगली बार के लिये स्थगित..

चलते-चलते : आज(मेरे लिये तो यह अभी भी आज ही है, सुबह उठुंगा तब यह कल होगा :) ) 1 दिसम्बर को नीता का जन्मदिन भी है..

Friday, November 27, 2009

दर्द की कोई उम्र नहीं होती


दर्द की कोई उम्र नहीं होती, वो ना तो एक साल की होती है और ना ही सौ साल की.. चाहे वह 26/11 हो, मुंबई बम ब्लास्ट हो, 2002 गुजरात हो, सिख दंगे हो या कुछ भी.. वह हमेशा उतनी ही सिद्दत से महसूस की जाती है जैसे पहली बार..

ठीक एक साल पहले, जैसी भागम भाग यहां चेन्नई की सड़को पर थी वैसी ही आज भी है.. लगभग वैसी ही गाड़ियों का जमावड़ा, वैसी ही भीड़, वैसा ही ट्रैफिक.. कुछ भी तो नहीं बदला है.. बदला है तो बस एक सवाल.. किसी परिचित के मिलने पर लोग पूछते थे कि मुंबई में क्या हो रहा है? आज भी कुछ लोग मिले, उनका सवाल भी वही था.. बस शहर अलग थे.. मुंबई का स्थान कानपुर ने ले लिया था.. सभी पूछ रहे थे कानपुर टेस्ट का क्या हुआ? मगर इस प्रश्न में चिंता नहीं झलक रही थी, सभी खुश थे कि चलो भारत अच्छे से जीतने के कगार पर पहूंच गया है.. क्रिकेट की चिंता सभी को थी, मगर एक अदद सवाल देश के नाम पर नहीं था..

आज किसी ने एक बार भी मुंबई का नाम नहीं लिया, ऑफिस के कामों के अलावा अगर किसी बात की चर्चा हुई तो वो बस क्रिकेट ही था.. मैंने ही बात आगे बढ़ाते हुये कहा कि आज 26/11 है? तो उसके जवाब में अधिकतर लोगों का रवैया बेहद उदासीन था.. किसी ने भी मेरी बात पर सहमती जताने के अलावा अपनी कोई बात नहीं रखी.. मुझे याद है आज से एक साल पहले की बात.. 26/11 से पहले एक एक करके भारत के लगभग हर बड़े शहर में बम धमाके हो चुके थे, बस एक ही महानगर अछूता था, चेन्नई.. मेरे मन में कहीं ना कहीं ये बात बैठी हुई थी कि आज नहीं तो कल चेन्नई की बारी भी आने वाली है.. खैर यह बातें फिर कभी..

अगर 26/11 कि बात करें तो हमारे इस रवैये पर दो बातें कही जा सकती है.. आप जिसे चाहे आशावादी या निराशावादी कह-सुन सकते हैं..
1. हम बीती ताही बिसारिये कि तर्ज पर पिछले साल के मुंबई को छोड़कर आगे निकल चुके हैं..
2. हम अब इतने असंवेदनशील हो चुके हैं कि इन सब बातों का हम पर कोई असर नहीं होता है..

कुछ भी हो, मुझे तो अब यही लगने लगा है कि देश का गुस्सा जिसे मिडिया ने भी खूब हवा दी थी, किसी पेसाब के झाग की तरह ही था.. जो कभी का बैठ चुका है..

चलते-चलते : कल मैंने अपने और्कुट का कैप्शन कुछ ये लगाया था "न्यूज चैनल को टीआरपी, न्यूज पेपर को सर्कुलेशन और राजनितिज्ञों को चंद मुद्दों मिले, मगर हमें 26/11 से कोई सीख भी ना मिली.."

Thursday, November 26, 2009

ये बूढ़ी पहाड़ियां अक्सर उदास सी क्यों लगती हैं?


जब कभी किसी हिल स्टेशन पर घूमने जाता हूं तो वहां की पहाड़ियां अक्सर मुझे बहुत उदास सी लगती हैं.. लगता है जैसे कुछ कहना चाहती हों.. अपना दर्द किसी से बांचना चाहती हों, मगर उन्हें सुनने वाला वहां कोई ना हो.. लम्बे-लम्बे देवदार के अधिकांश अधसूखे, अधमुर्झाये और जो पेड़ साबूत बचें हो उन्हे बचाने की गुहार की मुद्रा में ये पहाड़ियां मुझे लगती हैं..

जब हमने चेन्नई से अपनी यात्रा शुरू की तब हमने भी उस नियम को निभाया जिसे "इंडियन टाईमिंग" के नाम से जाना जाता है.. सुबह 7.15 पर कार्यालय के सामने मिलने की बात तय करके सभी आराम से आये, और 7.30 में यात्रा शुरू होने के बजाय 8.10 में यात्रा शुरू हुई.. 7.45 के लगभग फनिन्द्र का एक एस.एम.एस. आया की वह किन्ही निजी कारणों से नहीं आ पायेंगे.. कुछ मन तो उदास हुआ मगर उदास होने से क्या होता है, जब जाना ही है तो खूब मजे करके लौटना है, यही सोच कर उसे खुद पर हावी नहीं होने दिया.. रास्ता चेन्नई-बैंगलोर हाईवे से होकर जाता है जो वेल्लोर से कुछ आगे जाकर हाईवे छोड़ येलगिरी की ओर निकल पड़ता है.. वेल्लोर से गुजरते हुये वो पहाड़ी(जहां की तस्वीर अपने ब्लौगर प्रोफाईल में लगा रखी है) और अपना कालेज भी नजर आया और रास्ते में सलमान खान के वांटेड सिनेमा का तमिल संस्करण, जिसके हीरो विजय हैं, भी देखा.. एक-एक सीन हिंदी वाले सिनेमा जैसा ही था..

रास्ते में दो-तीन जगह रूकना भी हुआ और जिस कारण से धीमे-धीमे सूरज भी भी सर पर चढ़कर नीचे उतरने को चल पड़ा.. अंततः सूरज के नीचे भागने से पहले ही हम अपने गंतव्य पर पहूंच गये.. वहां पहूंचते ही, लोग "Where is Mike?" के नारे बुलंद करने लगे.. और मैं सोच रहा था की हम लोग किसी तरह का लाऊडस्पीकर लेकर तो आये नहीं हैं तो ये लोग "Mike" क्यों ढ़ूंढ़ रहे हैं? खैर थोड़ी ही देर मे यह उलझन भी सुलझ गई.. पता चला की "Mike" नाम का व्यक्ति इस रिसोर्ट की देखभाल करता है.. :)

आम तौर पर मैं किसी भी पहाड़ी वाले जगह पर जाते समय, घाटियों से गुजरते हुये ढ़ेर सारे चित्र अपने कैमेरा से लेता हूं, मगर इस बार जाते समय मैंने नहीं लिया.. चलती गाड़ी से वैसे भी कुछ अच्छा आता नहीं है, ऊपर से हर घाटी मुझे एक जैसी ही लगती है(शोले का एक डायलॉग याद आ रहा था, "मुझे तो हर पुलिस वाले की शक्लें एक सी ही लगती है")..

अगर येलगिरी की बात की जाये तो मुझे यह पर्यटन स्थल जैसा नहीं लगा.. अभी तक पर्यटन स्थल जैसी भीड़-भाड़ नहीं है यहां.. ना ही पर्यटन स्थल जैसी सुविधायें हैं, मगर यही कुछ कारण है जिसके कारण मुझे यह जगह बेहद पसंद आया.. वैसे भी जैसे लगभग शहर एक जैसा ही होता है, एक जैसे मॉल, एक जैसी ना समझ में आने वाली सड़कें.. ठीक वैसे ही सारे हिल स्टेशन भी एक से ही लगते हैं मुझे.. कम से कम यहां जीवन का स्वभाविक प्रवाह तो है.. एक जगह है ट्रेकिंग के लिये, जिसके लिये जगह-जगह एक बोर्ड टंगा हुआ है कि क्या करें और क्या ना करें? पता नहीं कितने लोग उन संदेशों का पालन करते हैं? घाटी में घुसते ही ढ़ेर सारे पालीथिन इधर-उधर फेंके हुये देख कर मुझे तो नहीं लगता कि सभी उस तरह के निर्देशों को मानते ही होंगे.. पास में एक छोटी सी झील भी है जहां लोग बोटिंग का मजा लेते हैं.. इसके अलावा अगर आप यहां आना चाहते हैं तो तभी आयें जब आपके पास ढ़ेर सारा समय हो और आप एकांत की तलाश में हों.. नहीं तो यह जगह बेकार है आपके लिये..

खाना खाकर कुछ लोग क्रिकेट खेलने में व्यस्त हो गये, तो कुछ लोग फुलबॉल.. और मेरे जैसे चंद लोग तालियां बजाने और फोटो लेने में व्यस्त हो गये.. शाम ढ़लते ही आग जला दिया गया, जिसमें लोग हाथ सेंक सके.. तो वहीं कुछ दूरी पर पीने-पिलाने का भी दौर चल निकला.. एक बात मैंने हर जगह कॉमन देखी है, पीने के बाद लोग ना जाने कैसे एक दूसरे के भाई बन जाते हैं और अपनी भाषा को छोड़कर अंग्रेजों की शरण में चले जाते हैं.. "तू तो मेरा भाई जैसा है.." या फिर "यू आर लाईक माय एल्डर ब्रदर.." जैसे जुमले भी उछलने लगे.. वहीं लड़किया और महिलायें अंताक्षरी जैसे खेलों में लग गई.. और मैं पीने वाले लोगों के बीच बैठ कर उनकी बहकी-बहकी बातों का मजा लेने लगा.. :) बगल में गाने बज रहे थे, और मेरे कुछ मित्र नाच भी रहे थे.. मैं भी थोड़ी देर उनमें शरीक हो गया.. थोड़े ठुमके लगा कर फिर से उन लोगों को ढ़ूंढ़कर बाते करने लगा जो पीकर अलग ही रंग में आ चुके थे..


अगले दिन सुबह उठकर सभी लोग झील की ओर निकल लिये.. कुछ बाहर झील के किनारे बैठकर आनंद उठाये और कुछ लोग नौकायन के मजे लेकर.. फिर वापस आकर खाना खाकर कुछ खेल खेले गये और फिर वहां से रवाना होने का समय आ गया..

चलते-चलते - कल मैं अपना मोबाईल घर में ही भूल गया.. पूरे दिन भर कई बार मुझे ये भ्रम होने लगा था की मोबाईल के अलावा भी कुछ है जो मैं भूल रहा हूं.. मगर कुछ था नहीं.. ये मोबाईल की आदत भी बहुत बुरी हो चली है.. खैर कल का दिन इसी बहाने कम से कम शांती से तो बीता.. :)

Monday, November 23, 2009

क्या शीर्षक दूं, समझ में नहीं आ रहा है

अभी कल ही दो दिनों के ट्रिप से लौटा हूं.. येलगिरी नामक जगह पर गया था जो तमिलनाडु का एक हिल स्टेशन है.. अभी फिलहाल इन चार चित्रों को देखें, लिखने का मन किया तो वहां के भी किस्से सुनाऊंगा..








ये पिल्ला अपनी मां और भाई-बहनों को जाता देख रहा है..

Friday, November 20, 2009

भगवान का होना ना होना मेरे लिये मायने नहीं रखता है(एक आत्मस्वीकारोक्ति)

मैंने आज तक इस विषय पर कभी कोई पोस्ट नहीं लिखा है और शायद आगे भी नहीं लिखूं.. मैं भगवान को नहीं मानता हूं और उन्हें मानने या ना मानने को लेकर किसी से कोई तर्क-वितर्क नहीं करता हूं.. जब मैं भगवान को नहीं मानता हूं तो खुदा या ईसा को मानने का सवाल ही पैदा नहीं होता है.. फिर भी मुझे अपने हिंदू होने पर गर्व है.. क्योंकि यही वह धर्म है जो इस बात की भी खुली छूट देता है कि आप उसके अस्तित्व को भी नकार सकते हैं जिसे लेकर यह धर्म बनाया गया है..

मैं कर्म प्रधानता पर विश्वास रखने वालों में से हूं और समय के साथ थोड़ा भाग्यवादी भी होता जा रहा हूं.. मगर फिर भी अच्छे भाग्य के लिये भगवान की प्रार्थना करना मुझे मेरे स्वाभिमान को ठेस पहूंचाने जैसा लगता है.. अगर जीवन की किसी परेशानी से मैं भगवान की शरण में जाऊं तो मुझे यह लगेगा की मैं अंदर से हद दर्जे तक का स्वार्थी भी हूं, जो कभी तो भगवान को नहीं मानता था मगर जैसे ही मुसीबत आन पड़ी वैसे ही पूजा-पाठ में तल्लीन हो गया..

मेरे लिये किसी की इबादत करने से अधिक महत्वपूर्ण है उन जरूरतमंदो की फिक्र करना जिन्हें सच में मदद चाहिये.. किसी भिखारी को पैसे देने से अच्छा मैं समझता हूं उसे खाने को कुछ खरीद देना(जो भिखारी अक्सर नहीं लेते हैं, उन्हें तो पैसा चाहिये).. किसी बूढ़ी अम्मा को सड़क पार करवाना, चाहे उसके बदले मुझे ऑफिस में 5 मिनट और देर हो जाये(आज भी एक अम्मा याद आती है जिन्हें सड़क पार करवाने के एवज में ललाट पर एक प्यार भरा किस और ढ़ेर सा आशीर्वाद मिला था).. किसी छोटे अनजान बच्चे को किसी दुकान से पचास पैसे वाली कैंडी खरीद कर देना मेरे लिये भगवान को पूजने से अधिक महत्वपूर्ण है..

चलते-चलते : आज सुबह-सुबह एक महाशय मुझसे भिड़ गये कि भगवान को मानो.. मेरा कहना था कि मैं तो आपको नहीं कह रहा हूं की आप भगवान को ना माने और ना ही कोई बहस कर रहा हूं? फिर आप जबरी मेरे पीछे क्यों लग गये हैं कि भगवान को मानो? मानने वाले के अपने तर्क हैं और ना मानने वाले के अपने.. दोनों ही समानांतर रेखा की भांती कभी नहीं मिल सकते हैं.. खैर इस चक्कर में आप लोगों को यह झेलना पर गया.. :)

Thursday, November 19, 2009

नौस्टैल्जिक होने के बहाने कुछ गुमे से दिन

यूं तो नौस्टैल्जिक होने के कई बहाने हम-आप ढ़ूंढ़ सकते हैं, तो एक बहाना संगीत का भी सही.. आज सुबह से ही 'माचिस' फिल्म का गीत "चप्पा-चप्पा चरखा चले" का एक लाईन जबान पर चढ़ा हुआ है..


"गोरी-चटखोरी जो कटोरी से खिलाती थी,
जुम्मे के जुम्मे जो सुरमें लगाती थी..
हो कच्ची मुंडेर के तले.....
चप्पा-चप्पा चरखा चले.."


अब पता नहीं, लोग इस गाने को किस नजर से देखते हैं और किस तरह से नौस्टैल्जिक होते हैं.. मुझे तो ये गीत पटना की गलियों तक खींच लाता है.. उन पुराने बूढ़े से होते गलियों का भटकाव याद आने लगता है, जहां आवारगी के दिनों में कदमों से दूरियों को भुलाया करते थे..

जब पुरानी गलियों में भटकने के किस्से सुना ही रहा हूं तो गलियों वाला माचिस का गीत कैसे भला कोई भूल सकता ? "छोड़ आये हम, वो गलियां.." शायद यही आज के इस युवा वर्ग का यथार्थ भी बनता जा रहा है.. जाने कौन कितनी ही गलियों के विछोह का मारा-मारा अपनी जमीन से बेदखल दूसरे प्रदेशों में फिर रहा है? भले ही उस गीत में गुलजार साहब ने कुछ और तरह के विस्थापन के दर्द को दिखाने का प्रयास किया हो..

मेरे लिये नौस्टैल्जिक होने वाले कुछ अन्य गीतों में रात की आवारगी दर्शाता हुआ तेजाब का गीत "सो गया ये जहां, सो गया आसमान.." भी शामिल है.. जिसे सुनते हुये उन पुरानी यादों में चला जाता हूं जब पटना में रात के समय दोस्तों के साथ आवारागर्दी किया करता था(पटना में रात बिरात घूमना उस समय और भी बड़ी समस्या थी, गुजरात दंगों का दौर था और अक्सर अफवाहों के कुछ तूफान गुजरा करते थे) और उस पर भी तुर्रा यह की मेरी आवारगी उन्हीं इलाकों में होती थी जिसे अखबार वाले मुस्लिम बहुल इलाका कहा करते हैं(पटना सिटी)..



जब रात और दोस्तों की बात करता हूं तो एक गीत, जिसमें रात तो कहीं नहीं है, मगर फिर भी बहुत याद आता है.. 'आतिफ़' का गाया हुआ "हम किस गली जा रहे हैं".. यह गीत मुझे उन यादों में खिंचता है जब कालेज के अंतिम पड़ाव से गुजर रहा था और चेन्नई में रहकर अपना प्रोजेक्ट पूरा कर रहा था.. किसी काम से वापस कालेज जाने पर रात के समय कभी कालेज के बाहर वाले ढ़ाबे से खाना खा कर लौटते समय रास्तों पर दोस्तों के साथ कुछ गीत गला फाड़ कर गाया जाता था उसमें यह गीत प्रमुख हुआ करता था.. आस पास के राहगीर या रहने वाले लोग हमें उन निगाहों से देखते थे जैसे पागलों या अपराधियों को देखा जाता है.. हो भी क्यों ना, रात के 12-1 बजे कोई ऐसा करे तो भला और किसी से क्या उम्मीद करें? "वैसे रात की आवारगी वाले गानों में से एक हालिया प्रदर्शित गीत मुझे पसंद तो बहुत है मगर मुझे नौस्टैल्जिक नहीं कर पाता है, शायद अभी नया है इसलिये.. कुछ साल बाद शायद इसे भी किन्ही कारणों से याद करूं.."

अपने कुछ पसंदिदा गीतों की ओर बढ़ने पर पाता हूं कि कुछ गीत मुझे दीदी की बहुत याद दिलाता है.. उन गीतों में एक भी वैसे गीत शामिल नहीं हैं जो रक्षाबंधन पर चित्रहार या रंगोली में बजा करते थे.. ये उन गीतों में से आते हैं जो दीदी को परेशान करने के इरादे से गाया गया था.. रात में दीदी किचन में रोटियां पकाने जाती थी और मैं गर्धवराग में नुसरत के चंद गीत चिल्ला-चिल्ला कर किचन में गाने पहूंच जाता था.. जिनमें से ये दो कव्वाली खास हुआ करती थी, -

"ये जो हल्का-हल्का सूरूर है,
ये जो तेरी नजर का कुसूर है,
जो शराब पीना सिखा दिया.."


और

"यादे नबी का गुलशन महका-महका लगता है..
महफ़िल में मौजूद हैं आका, ऐसा लगता है.."


वैसे अगर भाई-बहनों के ऊपर बने गीतों की बात की जाये तो मुझे 'काजल' सिनेमा का गीत "मेरे भैया, मेरे चंदा, मेरे अनमोल रतन. तेरे बदले, मैं जमाने की कोई चीज ना लूं" वाला गीत सबसे अधिक भाता है..

एक सिनेमा जो बहुचर्चित रहा, मगर किसी और कारण से उस चर्चित सिनेमा के गीत कम ही लोग जानते हैं.. जो उन गानों को आज जानते हैं उनमें भी बड़ी संख्या वैसे लोगों की है जिन्होंने इसे किसी रियैल्टी शो में सुना है और रिलीज के समय होने वाले विवाद के कारण इसके शानदार गाने कहीं गुम से हो गये थे.. मैं "बैंडिट क्वीन" की बात कर रहा हूं.. इसके गीतों में ना तो कहीं तयशुदा लंबाई है और ना ही कोई मीटर, मगर फिर भी अपने आप में यह किसी अनमोल नगीने से कम नहीं है.. इसके गानों को जब कभी भी सुनता हूं, एक अलग तरह कि ही भावनायें उमड़ती है.. सुनकर बेहद उदास भी होता हूं, मगर फिर भी बार-बार सुनता हूं.. एक अजीब सी कशिस महसूस होती है.. उस पायरेटेड वर्सन वाले प्यार की भी याद आती है जिसका लाईसेंस लेने से पहले ही वह एक्सपायर हो चुका था.. आप भी इसके एक गाने पर जरा गौर फरमायें -

सावन आया रिमझिम सांवरे
आये बादल कारे कारे मतवारे
प्‍यारे प्‍यारे मोरे अंगना झूम के
घिर घिर आई ऊदी ऊदी देखो मस्‍त घटाएं
फुरफर आज उड़ाएं आंचल मोरा सर्द हवाएं
डारी डारी पे भंवरा घूम के आये कलियों के मुखड़े चूम के
जिया मोरा जलाए हाय प्‍यारी प्‍यारी रूत सांवली..

मेरे सैंयां तो हैं परदेस मैं क्‍या करूं सावन को
सूना लगे सजन बिन देस.
मैं ढूंढूं साजन को..

देखूं राहें, चढ़के अटरिया
जाने कब जाएं सांवरिया
जब से गए मोरी ली ना खबरिया
छूटा पनघट फूटी डगरिया
सूना लागे सजन बिन देस,
मैं ढूंढूं साजन को..

क्‍यूं पहनूं मैं पग में पायल
मन तो है मुझ बिरहन का घायल
नींद से खाली मोरी अंखियां बोझल
रोते रोते बह गया काजल .
सूना लागे सजन बिन देस मैं ढूंढूं साजन को


इसका एक और गीत जो मुझे बेतरह पसंद है, वह है "सांवरे, तेरे बिना जिया जाये ना.." इस गाने की शुरूवात नुसरत के सरगम से होती है.. आजकल लोग राहत के सरगम को सुनकर मदहोशी में डूबते हैं, मगर जिन्होंने भी नुसरत के सरगम को सुना है वे जानते हैं कि नुसरत के आगे वे कितने फीके हैं.. आखिर हो भी क्यों ना, नुसरत उनके उस्ताद भी जो रह चुके हैं.. इस गीत में पीछे से आती हुई लड़की की आवाज कुछ ऐसा सुकून देता है जैसे अगरबत्ती की भीनी सी खुश्बू.. साथ ही उस आवाज में एक बिछोह का दर्द अंदर से परेशान सा कर जाता है.. इसके बोल कुछ दिये जा रहा हूं -

"सांवरे, तेरे बिना जिया जाये ना!
जलूं तेरे प्यार में,
करूं इंतजार..
किसी से कहा जाये ना!!

ढ़ूंढ़े मेरी प्रीत रे,
तू है कहां मीत रे,
असुवन गीत रे,
काहे संगीत रे.."


आज की महफिल यहीं खत्म करता हूं.. फिर कभी अपने पसंद के गीतों के साथ आता हूं.. आज का विषय यादों को लेकर था, अगली बार कुछ और होगा.. :)