Saturday, November 05, 2011

यह लठंतपना शायद कुछ शहरों की ही बपौती है - भाग २

जब कभी भी इन रास्तों से सफ़र करने का मौका मिला हर दफ़े एक अजब सा लठंतपने को देखने का मौका भी मिला, मगर उसी लठंतपना का ही असर बाकी है जो मुझे पटना की ओर खींचता है.. चेन्नई से देल्ली तक का सफ़र वही आराम से और सुकून भरा था, मगर देल्ली से!! सुभानल्लाह.. दिल्ली उतर कर मुझे दूसरी फ्लाईट पकडनी थी.. दिल्ली में फ्लाईट डोमेस्टिक एयरपोर्ट पर लैंड किया, और मुझे वहाँ से टर्मिनल 3 पर जाना था.. समय पास में लगभग तीन घंटे का था.. एयरपोर्ट बस सर्विस का लाभ उठाया और पहुँच गया वहाँ.. टिकट लेने से लेकर चेक-इन तक हर काम समय पर और ठीक तरीके से मुकम्मल हुआ.. अब समय था उस लठंतपने का सामना करने का.. जिस दरवाजे से फ्लाईट पकड़ने था वहाँ कतार का कोई अत पता नहीं था.. फिर मैंने ध्यान दिया तो पाया की कुछ शहरों के लिए जाने वाली उड़ान के लिए कतारों का कोई मतलब ही नहीं था, मानों हम सब इन बातों से ऊपर उठ चुके हों.. :) उन शहरों का नाम नहीं लूँगा, मगर यह जरूर बताना चाहूँगा की उनमें हर एक नाम उत्तर भारत का ही है..

एक मजेदार घटना, जो ठीक अभी अभी घटी.. "एक जानकारी - हवाई जहाज के उड़ान भरते समय सभी सीटों को सीधा कर लेने के लिए कहते हैं.." अब घटना - मेरे ठीक पीछे वाले महाशय को एयर होस्टेज दो दफ़े समझा कर गई की अपनी सीट सीधी कर लें.. तीसरी बार का मौका उन्होंने नहीं दिया और खुद ही सीट सीधा कर लिया.. अब जब हमारा जहाज उड़ान भर चुका था तब मैंने अपनी सीट को हल्का पीछे की ओर झुका लिया.. ओ भाईसाब!! मत पूछिए, किसी स्कूली बच्चे की तरह उनका व्यवहार हुआ.. तुरंत टीचर को, मेरा मतलब एयर होस्टेज को बुलाकर शिकायत की गई.. तब उसने उन्हें कहा की आप भी अपनी सीट अब झुका सकते हैं.. भाईसाहब ने कुछ कहा तो नहीं, मगर उनका चेहरा देखने लायक ही होगा, चूँकि वो मेरे ठीक पीछे बैठे थे सो मैंने पीछे मुड कर उनका चेहरा देखना मुनासिब नहीं समझा..

शीघ्र ही पटना की सीमा रेखा को भी हवाई जहाज छूने लगा.. पटना की सडकों की रोशनी को देखते ही लगभग चीख पड़े वह "पटना में ढुक गए".. उनके बगल में बैठे उनके साथ के लोग उन्हें शांत कराये की भाई, इतना एक्जाईटेड(एक्साईटेड) क्यों हो रहे हैं!! शुक्र मना रहा हूँ की वे इसे नहीं पढ़ रहे हो.. वो मेरे ठीक पीछे बैठे हैं.. :)

खैर उतरते समय मैंने उनका शक्ल देखा तो पाया की सत्तर के आस-पास की उम्र रही होगी उनकी..

11 टिप्पणी:

नीरज गोस्वामी said...

हवाई यात्रा सस्ती होने का ये फायदा हुआ के अब आम इंसान भी इसमें सफ़र करने लगे हैं, याने अब ये अभिजात्य वर्ग की बपौती नहीं रही...आम इंसान यात्रा करेगा तो आम जनों जैसा ही बर्ताव करेगा...इसमें अचरज क्या? मेरे साथ ऐसे अनुभव हर शहर की यात्रा के दौरान देखने में आये हैं इसमें उत्तर भारत को अलग नहीं किया जा सकता. हम सब भारत वासियों की मानसिकता एक सी ही है, बल्कि दुनिया के हर इंसान की मानसिकता एक सी है सिर्फ उन्नीस बीस का फर्क हो सकता है बस...

नीरज

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

सही है कि हमें उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम की तर्ज़ पर नहीं सोचना चाहिए पर यूपी-बिहार के कारण अराजकता दूर-दूर तक फ़ैल चुकी है.
दिल्ली को ही देखिये, अब तो यह लगता है के सबसे बदतमीज और बददिमाग लोग यहीं रहते हैं. अपने एमपी को भी इन प्रदेशों का घुन लग गया है.

PD said...

मैंने कहीं भी ये नहीं लिखा है की उत्तर भारतीयों ने ही ऐसा किया हो.. उन उड़ानों में चढ़ने वाले हर जगह के लोग थे, यहाँ तक की विदेशी भी.. मगर वही लोग किसी और जगह की उड़ानों में चढ़ते वक्त हर कायदे मानने को तैयार रहते हैं मगर... जो मेरा अनुभव था वह लिखा, और ऐसा अनुभव कोई पहली दफ़े मिला हो ऐसा तो कतई नहीं है..

@निशांत मिश्र जी - मुझे आपके लिखे इस वाक्य पर सख्त आपत्ति है जिसमें आपने लिखा है पर यूपी-बिहार के कारण अराजकता दूर-दूर तक फ़ैल चुकी है

rashmi ravija said...

ओह!! ये कतार वाली बात मैने भी कहीं लिख दी थी और फिर लोगो ने लम्बी-चौड़ी बहस की वहाँ ...:)

अंतिम पंक्ति में उन साहब के उम्र के जिक्र ने मुस्कान ला दी...ऐसी सौ हरकतें सर आँखों पर...उन्हें मौका तो मिला हवाई सफ़र का...और जाने क्यूँ ये यकीन करने का मन हो रहा है कि .उनके बेटे ने उन्हें इस हवाई यात्रा का मौका दिया होगा...:)

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

भाई पीडी, मैं अपनी टिपण्णी में लिखी बात के लिए आपसे क्षमा मांगता हूँ. सादर.

रचना said...

PD
I read the last one also and this as well and will continue reading ,
naration is intresting

keep it up

प्रवीण पाण्डेय said...

यात्रा के साथ मनोरंजन का सुख तो केवल यहीं पर ही मिल सकता है।

दीपक बाबा said...

एक तो उत्तर भारतियों के कारण आनंद मिलता है उस पर भी आप उप बिहार का तुर्रा छोड़ रहे हैं....


ये अच्छी बात नहीं.:)

PD said...

@रश्मि जी - जैसा आप सोच रही हैं ठीक वैसा ही मैं भी सोच रहा था उस समय.. पूरे रास्ते भर उनका बक-बक, उनका चेहरा देखने के बाद वह खला नहीं.. :)

@रचना जी - Thanks.

@प्रवीण जी & दीपक जी - :)

रंजन (Ranjan) said...

सोच रहा हूँ कि पीछे वाले अंकल अगर ब्लॉग लिख रहे होते तो क्या लिखते?

अनूप शुक्ल said...

रोचक किस्सा।

मुझे ऐसा लगता है कि समय के साथ हम लोग इतने टाइप्ड होते चले जाते हैं कि जिस तरह से हम कुछ कर रहे होते हैं उससे अलग अगर कोई करता है तो उसको उसका पिछड़ापन मानकर मस्त हो जाते हैं। यह भी एक किस्म का खास कूपमंडूकपन है -शायद अभिजात्य समाज का कूप मंडूक पन! :)

जो लोग नियमित जहाज में चढ़ते होंगे उनके लिये उसके नियम-कानून कायदे सहज बात होंगे लेकिन जो पहली दूसरी बात बार जहाजों से यात्रा कर रहे होंगे वे तो अपने हिसाब से ही यात्रा चलेंगे न!

जब तुम एयरहोस्टेस से हिंदी में बात करते होगे तो साथ के कुछ लोग, जो हवाई जहाज में सिर्फ़ अंग्रेजी बोलने में यकीन करते होंगे, कनखियों से देखते भी होंगे!

पटना में ढुक गये जब हमें पढ़ने में इतना प्यारा लग रहा है तो तुम्हारे क्या हाल हुये होंगे -समझ सकते हैं।

इस पढ़कर फ़िर अपनी पोस्ट याद आई- यात्राओं में बेवकूफ़ियां चंद्रमा की कलाओं की तरह खिलती है जब इसको फ़िर से पढ़ा तो इसका एक वाक्य और भी सार्थक लगा -बहस शुरू करने का आलस्य हमेशा सुकूनदेह होता है।

बस्स इसी वाक्य की सलाह मानते हुये बहस का मूड कैसल कर दिया। :)

मजे आये इस पोस्ट को पढ़कर और टिप्पणियों को भी! :)