Tuesday, February 08, 2011

कहीं किसी शहर में, किसी रोज

दो साल बाद मिल रहे थे दोनों, दोनों कि बेचैनियाँ भी बराबर ही थी.. लड़का सारी रात रेलगाड़ी के डब्बों को गिनते हुए बिताया था, लड़की सारी रात करवटें बदलते हुए पीजी कि एकमात्र दीवार को गिन कर.. दोनों ही अपने शहर से जुदा एक नए शहर में थे..

लड़के को एक एक करके वो सारी घटनाएं याद आ रही थी, कैसे कई दिनों तक छुप-छुप कर उसे देखा करता था, कैसे उसने इजहार-ए-इश्क किया था, कैसे पहली बार उसने उसे डांटा था, कैसे उसने भी उसकी बातों से मुत्तफिक़ होते हुए शरमा कर अपना चेहरा छुपाया था..

लड़की को एक एक करके वो सारी घटनाएं याद आ रही थी, कैसे अपने सालगिरह के एक दिन बाद भी वह उन्हीं कपड़ों में आया था 'बचपना कितना था उसमे' कैसे उसे कनखियों से ताकते हुए उसके दिलों के तारों से खेल जाता था, कैसे उसने पहली बार उसका हाथ थामा था और वह चीख उठी थी उसे भरी सभा में..

फिर दोनों दो अलग जगहों पर रहते हुए भी दोनों कि सोच एक हो चली.. कैसे उन्होंने उस अलग होने वाले दिन एक दूजे का हाथ कस कर थाम रखा था, कैसे हिज्र कि रात एक एक करके इतनी लंबी हो चुकी थी, कैसे एक-दूजे को देखने को दोनों तड़प रहे थे..


यह बेचारा पिछले चार महीने से ड्राफ्ट में बैठा घुट रहा था, इस इन्तजार में की कुछ और जोड़ा जायेगा इसमें.. आज ऐसे ही आपके सामने है, बिना कुछ जुड़े-घटे..

8 comments:

  1. कोई नहीं :) हमें ऐसे ही पसंद आ गया ....
    बिना कुछ जोड़े...बिना कुछ घटाए :)

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  2. हमें तो लगा अभी की यात्रा में कुछ :)

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  3. वसंत पंचमी पर हुलस कर निकला ...

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  4. जब भाव गहरा जाते हैं तो उसे और सुर मिल जाते हैं। बहुत अच्छा। मन का खजाना छिपाकर न रखें, बाँट लें।

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  5. मुझे भी लगा इस बार ही कुछ खुशखबरी है...
    बड़ा अच्छा है जी, जोड़ना -घटाना ज़रूरी नहीं लगा...

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  6. बगैर कुछ जोड़े घटाए ही कहानी बहुत अच्छी लगी| धन्यवाद|

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  7. अरे शेखर बाबु ऐसे खुशखबरी आती तो ब्लॉग का नाम ही खुशखबरी हम तो रखवा देते......बरहाल प्रशांत बेय..शानदार पोस्ट....ड्राफ़ के कुछ और किस्से निकालिए....

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