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सब पीछे छोड़ कर मैं २ साल आगे निकल चूका था..
जिंदगी कल फिर से मुझे घसीट कर वहीँ पहुंचा गई..
ऐसा लग रहा है जैसे फिर से उसी मुकाम पर खडा हूँ जहां से शुरू किया था..
ये जिंदगी भी अजीब होती है..
चिढा कर कहीं झुरमुठों में छुप सी जाती है..
आज सुबह मैं बैगलोर से वापस लौटा और वहां G Vishwanath जी से भी मिला(और उनकी रेवा कार में घूमने का मौका भी मिला :)).. एक बिलकुल नया सा और अच्छा अनुभव मिला.. शायद अगले २-३ पोस्ट उनके नाम हो जाए.. आज मन कुछ नहीं लग रहा है, सो कल मैं उनके बारे में और उनकी रेवा कार के किस्से सुनाता हूँ..
मेरे अनाम मित्र..
मैं ना तो कुछ साबित करना चाहता हूं और ना ही खुद को हीरो दिखाने कि कोई मंशा है.. मैं तो बस अपनी खुशी के लिये लिखता हूं और अगर कोई मेरी खुशी में खुश होना चाहता है तो उन्हें भी अपने साथ ले लेता हूं..
जहां तक आपने लिखा है कि आपने कोई ऐसी बात नहीं लिखी जिससे आप हीरो दिख सकें और दूसरी तरफ आपने उसका उत्तर भी दे दिया कि कोई और आपको हीरो कहे तो बात बने.. अब मेरे कुछ कहने की जरूरत ही नहीं है कि मैं वैसी कोई घटना क्यों नहीं लिखता हूं.. अपने जीवन में मैंने कुछ अच्छे काम भी किये हैं मगर उसे मैं अपने किसी करीबी मित्र से भी नहीं बांटता हूं फिर भला ब्लौग पर कैसे लिख दूं?
और हां मैं खुद को हीरो मानता ही नहीं हूं.. क्योंकि मुझे पता है कि मैंने अपने जीवन में कितने सही और कितने गलत काम किये हैं.. कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में शत-प्रतिशत कभी सही नहीं होता है.. मेरे करीबी जानते हैं कि मेरा जीवन एक खुली किताब जैसी है, जो मैंने अभी तक जिया है(सही या गलत) वो सभी के सामने है.. कुछ भी छुपा हुआ नहीं..
और रही बात कुपित होने कि तो मैं इतनी छूट तो अपने पाठकों को दे ही रखा है कि वो अनाम तत्व बन कर भी कमेंट कर सकें, मैंने तो मॉडेरेटर भी नहीं लगा रखा है.. सो मुझे इसके लिये तैयार रहना ही चाहिये कि कोई मेरी बुराई कर सके.. आज सुबह तो खुद मेरे पिताजी मेरे ब्लौग को लेकर बोल रहे थे कि आज-कल अच्छा नहीं लिख रहे हो.. हां, अगर किसी अनाम मित्र से अपशब्द मिले तो फिर ऐसा कुछ सोच सकता हूं, जो कम से कम अभी तक तो नहीं हुआ है.. वैसे अगर आप अपने नाम से भी कमेंट करते तो भी मैं आपको लेकर कोई पूर्वाग्रह नहीं बनाता..
जब मैंने हिंदी में ब्लौगिंग शुरू कि थी तब मैं यहां किसी को नहीं जानता था, लगभग एक साल बाद(सितम्बर 2007) मैंने पाया कि ढेर सारे लोग मेरे चिट्ठे पर अचानक से आने लग गये हैं, तब जाकर मैंने पाया कि नारद, ब्लौगवाणी और चिट्ठाजगत जैसे एग्रीगेटर ने मेरा रजिस्ट्रेसन खुद ही कर दिया है.. उसके बाद मैं हिंदी ब्लौग जगत से जुड़ा.. उससे पहले मैं अपनी खुशी के लिये लिखता था.. मैं जैसा पहले लिखता था वैसा ही आज भी लिखता हूं.. मतलब अपनी और अपनों खुशी के लिये..
30-40 लोगों कि बात अगर आप कर रहें हैं तो जब वे नहीं आते थे तब भी मैं लिखता था.. जब वे आने लगे तब भी मैं लिखता था.. जब 300-400 आने लगेंगे तब भी मैं वही कुछ लिखूंगा जो अभी लिखता हूं.. मेरे चिट्ठे का ही नाम है मेरी छोटी सी दुनिया.. मेरी दुनिया में जो कुछ भी घटता है बस उसी के लिये इस चिट्ठे पर जगह है.. दूसरी चीजों के लिये मेरे पास दूसरे चिट्ठे हैं..
धन्यवाद.
आज सुबह मुझे एक अमान मित्र का कमेंट मिला जिसका उत्तर लिखने बैठा तो पाया कि ये मेरे किसी एक पोस्ट से भी लंबा हो गया है तो मैंने इस पर एक पोस्ट ही बना डाली.. उनका कमेंट कुछ ऐसा था :आप जो भी हो भाई मैं काफी दिनों से आपको नोटिस कर रहा हुं.
मेरा मतलब है मैं आपके ब्लौग पढ़ रहा हुं.
मैंने जो नोटिस किया है वो ये है कि आप वास्तविक जीवन में नहीं जी रहे हैं. वास्तविकता से आप काफी दूर हैं.
पता नहीं क्या साबित करना चाहते हैं आप अपनी बातों से.
भई साहब इस् तरह लिखने से हो सकता है आप 50-100 लोगों के बीच फेमस हो जायें.और हो सकता है आपकी मंशा भी यही हो. लेकिन जैसा आपने अपने सेल्फ़ इंट्रोडक्शन में लिखा है वैसा करें तो बात बने. षायद आप करते भी हों. हमे नहीं मालूम. बट आपने अभी तक ऐसा कुछ अपने ब्लौग पर नहीं शेयर किया. भाई साहब अपने आपको तो हीरो सभि मानते हैं. कोई अपने को बुरा नहीं मानता. मजा तो तब है जब दूसरे इस बात को माने. सॉरी अगर हमारी वजह से आप हर्ट हुए हों. लेकिन क्या करें हम अपना विचार व्यक्त करने से अपने आपको रोक नहीं पाये.ये रोमण में हिंदी लिखा हुआ था जिसे मैंने देवनागरी में बदल कर लिख दिया..
अनाम मित्र को एक और वजह से धन्यवाद क्योंकि उनके कारण मैंने आज एक पोस्ट लिखा नहीं तो आज लिखने के मूड में नहीं था.. :)
जो आप नहीं कर पाई,
वो दुनिया ने कर दिखाया..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..
कुछ अच्छा लगता है तो
मुस्कुरा देता हूँ..
कुछ बुरा लगता है तो
मुस्कुरा देता हूँ..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..
वो अछूत सी लगने वाली सब्जी,
भी अब खा लेता हूँ..
रात में अब चावल से भी
परहेज नहीं है..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..
कोई अब पूछता नहीं,
की कहाँ जा रहे हो..
कोई अब पूछता नहीं
की किससे मिल के आ रहे हो..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..
कोई अब पूछता नहीं
की खाना खाए या नहीं..
कोई अब पूछता नहीं
की खाए तो क्या खाए..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..
कोई दोस्त अब कहीं
बुलाते नहीं..
उनके साथ ना जाने पर
पहले जैसे कुछ सुनाते नहीं..
हर पल ये अहसास दिलाते हैं..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..
कुछ मिलने पर ना अब वो
पहले सा उत्साह आता है..
ना कुछ खोने पर आँखें
नम होती है..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..
जिसकी चाहत बचपन से थी,
बड़ा होने की..
अब वो नहीं चाहता हूँ..
पर क्या करूं माँ..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..
ये कविता मैंने बहुत पहले लिखी थी.. मदर्स डे पर.. मुझे याद है, मम्मी बहुत भावुक हो गई थी इसे पढ़कर..
अकसर लोग
प्यार कर बैठते हैं
किसी ऐसी लड़की से
जो छोटे से शहर
से निकल कर,
बड़े शहर की
चका-चौंध में
कहीं खो सी जाती है..
मैं भी उन चंद लोगों में से हूं..
जमाने के साथ
चलने का शौक था उसे,
मगर ना जाने किससे डरती थी..
मेरा साथ पाकर
वो डर जाता रहा
और जमाने के साथ
कदम ताल करते हुये
ना जाने किधर निकल गई..
नजरें आज भी खोजती है,
हर रिक्से पर..
शायद वो दिख जाये कहीं..
सिमटी हुई,
सकुचाती हुई,
छुई-मुई सी,
सिकुड़कर बैठी हुई..
इस डर से
कहीं कोई देख ना ले
कि वो किसी से मिलने आ रही है..
शायद मुझसे?
भ्रम भी अजीब होते हैं..
है ना?
एक लड़की,
ख्वाबों में जीने वाली लड़की,
ख्वाबों में ही मेरे पास आती,
ख्वाबों में ही मुझे गले लगाती,
ख्वाबों में ही कभी यूं ही,
मेरी राहों से होकर गुजर जाती,
ख्वाबों में अक्सर मैं उसका होता,
मुझे पाकर कभी वो चूम लेती,
कभी गले लगा लेती,
मुझे पाकर वो खुश होती,
हंसती खिल-खिलाकर,
अक्सर मैं कहता,
एक हंसी उधार दे दो,
मैं हंसता कम हूं,
वो कहती,
मैं आपकी ही हूं,
जो चाहे ले लो,
हकीकत का आभास भी था उसे,
मगर वो ख्वाबों में जीती थी..
एक लड़की,
ख्वाबों में जीने वाली लड़की,
कैंपस सेलेक्सन के दिनों में जिनका कैंपस हो जाता था वे लोग भी किसी को पार्टी नहीं देते थे.. बस इस इंतजार में कि जब मेरे सारे मित्रों का हो जाये तभी मैं पार्टी दूंगा.. सच कहूं तो पूरी कक्षा में एकता ऐसी हो गई थी जो मिशाल देने लायक थी.. मेरे साथ ये अक्सर होता आया है कि जिसकी मुझे चाह होती है वो मुझे नहीं मिलता है और जिसकी चाह नहीं होती है वो बैठे-बिठाये झोली में आ धमकता है.. मेरे साथ कैंपस के दिनों में भी यही हुआ..
21 जुलाई सन् 2006 का दिन था.. ठीक 1 महिना पहले मैं 21 जून को अपने पहले कंपनी में बैठा था(IBM).. 21 जुलाई को CSS कैंपस के लिये हमारे कालेज में आयी हुई थी.. हमारे बीच इस कंपनी कि छवि बहुत अच्छी नहीं थी और ना ही हमारे सिनीयर के बीच.. इस कारण से मुझे इस कंपनी में नौकरी करने की इच्छा भी नहीं थी.. मगर उस समय मेरे पास कोई भी नौकरी नहीं होने के कारण मेरे पास कोई और चारा भी नहीं था.. मेरे साथ मेरे कालेज के लगभग 450 विद्यार्थी भी इसके रिटेन परीक्षा में बैठे और उसमें से 18 विद्यार्थी को सेलेक्ट किया गया.. जब मैं रिटेन दे रहा था तब मन में सोच रहा था कि मेरा रिटेन में ना हो तो बढिया हो.. मगर जैसे-जैसे प्रश्न पढ़ता गया वैसे-वैसे उत्तर भी सूझता गया.. अब सही के बदले गलत उत्तर लिखना ना तो मेरी प्रकॄति है और ना ही मैं वैसा करने की स्तिथि में था क्योंकि मेरे पास कोई नौकरी नहीं थी.. हां मगर एक बात तो थी कि इसमें चोरी नहीं हुई थी और अगर हुई भी होगी तो मुझे पता नहीं चला.. Online परीक्षा हुई थी, सो चोरी के चांस बहुत काम हो गए थे..
जब रिजल्ट आने वाला था तब मैं अपने प्लेसमेंट भवन के नीचे अपने दोस्तों के साथ बैठा हुआ था.. शुरू में बस 5 लोगों का नाम भेजा गया कि इनका सेलेक्सन साक्षात्कार के लिये हो गया है.. मेरी मित्र श्रुति ने ना जाने कहा से मेरा नाम भी उसमें देख लिया और मुझे बधाई देने चली आई.. जब मैंने कहा कि मेरा नहीं हुआ है और वापस होस्टल जाने लगा तो उसने पूरे आत्मविश्वास से कहा कि कुछ देर रूक जाओ शायद कुछ और नाम आये और उसमें तुम्हारा भी हो.. थोरी देर मैं और रूक गया और अगली लिस्ट में मेरा भी नाम था.. तब उसने कहा कि होने पर पहली मिठाई मुझे ही मिलनी चाहिये..
मेरा अपना अनुभव है कि जब साक्षात्कार शुरू होता है तब जो कोई भी साक्षात्कार में पहले जाता है उसका सेलेक्सन होने की संभावना ज्यादा होती है क्योंकि उस समय साक्षात्कार लेने वाले बिलकुल फ़्रेश होते हैं और उनकी सोच सकारात्मक.. जैसे-जैसे समय बढता जाता है वैसे ही वो सुस्त होते जाते हैं और उनकी सोच भी धीरे-धीरे नकारात्मक होती जाती है..
मैं फिर से बाहर कक्ष में बैठा पेप्सी के प्रचार वाले लड़के की तरह सोच रहा था कि मेरा नंबर कब आयेगा.. जो आया बहुत बाद में.. मेरे मन में ये बैठ चुका था कि आज भी मेरा सेलेक्सन नहीं होगा और कहीं ना कहीं से मैं खुश भी था कि चलो ये अफसोस तो नहीं होगा कि मैंने जान-बूझ कर ये कंपनी छोड़ी और सच्चाई ये थी कि इस कंपनी में मैं जाना भी नहीं चाहता था..
साक्षात्कार लेने वाले Resume पर ज्यादा ध्यान दे रहे थे और जो भी उसमें लिखा था उसी से संबंधित प्रश्न पूछ रहे थे उससे ज्यादा कुछ भी नहीं.. मुझसे सबसे पहले उन्होंने लगभग 15-20 मिनट यूनिक्स पर प्रश्न पूछे और मैंने सारे का सही उत्तर दिया.. एक प्रश्न में अटका मगर उसका उत्तर भी दिया ये कहकर कि मैं इस उत्तर को लेकर संतुष्ट नहीं हूं मगर शायद यही होना चाहिये.. बाद में पता चला कि मैंने सही उत्तर दिया था.. फिर डाटा-स्ट्रक्चर से संबंधित प्रश्न पूछे गये जो लगभग आधे घंटे चला.. उसमें सारे का मैंने सही उत्तर दिया..
एक मजेदार घटना घटी डाटा-स्ट्रक्चर वाले राउंड में.. उन्होंने मुझसे मर्ज सार्ट बताने के लिये कहा.. मैंने बताया.. फिर उन्होंने मुझसे कहा कि इसका 'C' भाषा में प्रोग्राम लिख सकते हो क्या? मैंने कहा कि हां लिख सकता हूं.. फिर पूछा गया कि इसका अल्गोरीथ्म याद है तुम्हें? मैंने कहा कि नहीं याद है मगर मुझे इसका लाजिकल कांसेप्ट पता है सो मैं लिख दूंगा.. उन्होंने लिखने के लिये कहा.. मैंने लिखना शुरू किया.. मेरे हर एक लाईन लिखने के बाद वो मुझसे किसी दूसरे विषय पर प्रश्न पूछते फिर सॉरी कह कर आगे लिखने को कहते.. लगभग 5 मिनट के बाद उन्होंने मुझसे कहा कि कितना समय लोगे? मैंने कहा कि कम से कम 20 मिनट.. उन्होंने कहा कि कंपनी में शायद इतना समय तुम्हे ना मिले.. अब चूंकि मेरे मन में कोई डर था नहीं, कि सेलेक्सन हो चाहे ना हो कोई बात नहीं, सो मैंने वैसे ही उत्तर दे दिया कि कंपनी में मेरे पास अल्गोरीथ्म होगा और नहीं भी होगा तो कम से कम उस समय अल्गोरीथ्म रटने कि मुझे कभी जरूरत नहीं होगी, मैं उसे नेट पर सर्च करूँगा और वहाँ से अल्गोरिथम ले लूँगा.. मैं तो ये सोचकर उत्तर दिया था कि शायद मेरे जवाब से वे चिढ जायेंगे मगर हुआ ठीक इसके उल्टा, वो प्रभावित हो गये.. आखिर वो एक और गधे का दिन था.. :)
एक मजेदार घटना 'C' वाले राऊंड में भी घटी.. उन्होंने प्रश्न पूछ कि बिना किसी तीसरे वैरियेबल को प्रयोग में लाये 2 वैरियेबल के वैल्यू(Value) को स्वैप(Swap) कैसे करते हैं.. अब उन्हें ये नहीं पता था कि मैंने अपने जीवन का सबसे पहला 'C' प्रोग्राम यही बनाया था सो ये प्रोग्राम तो मैं आंख मूंदकर भी लिख दूंगा.. मगर उस समय मैंने नाटक करते हुये ये दिखाया कि इसका लॉजिक मैं यहीं सोच रहा हूं.. और 3-4 बार काटने के बाद मैंने सही बना कर दिखा दिया.. कुल मिला कर मुझसे यूनिक्स, 'C', 'C++', डाटा-स्ट्रक्चर, डाटाबेस, 'VC++' और ऑपरेटिंग सिस्टम से प्रश्न पूछे गये थे..
दो राऊंड में लगभग 2-3 घंटे इंटरव्यू चला और उन्होंने मुझे सेलेक्ट कर लिया.. मैंने जो उस दिन ना जाने कितनी ही गलतियाँ की (कुछ जान बूझकर और कुछ अंजाने में) वो सभी मेरे लिये अच्छा ही साबित हुआ.. क्योंकि वो दिन मेरा था.. कुछ इसी तरह के सोच ने मुझे इसका शीर्षक जब "अल्लाह मेहरबान तो गधा पहवान" रखने के लिये प्रेरित किया.. उस दिन ये गधा भी पहलवान बन ही गया.. मेरा एक और करीबी मित्र उस दिन सेलेक्ट हुआ, शिवेन्द्र(इसके बारे में फिर कभी)..

कालेज के बाहर एक पोस्टर के साथ मस्ती करते हुये..

2006 में मेरे जन्मदिन के पार्टी की तस्वीर, ये दोनों ही चित्र मेरे कैंपस होने के महीने भर के भीतर की ही है.. :)
पिछले एक सप्ताह से लगभग रोज ही मैं और मेरे कालेज कि मित्र मनस कभी एच.आर. तो कभी अपने पी.एल. से बोल रहे थे कि हमारे अप्रैजल का समय आ गया है तो हमें अभी तक अप्रैजल क्यों नहीं मिला है? एच.आर. वालों से तो मैंने लगभग झगड़ा तक कर लिया था कि जब आपको कोई काम समय पर चाहिये होता है तो हम खाना-सोना छोड़ कर बस काम करते रहते हैं, तो ये काम आप लोगों का है कि हमें समय पर अप्रैजल मिले.. हमें जो भी काम मिलता है उससे आपको भी कोई मतलब नहीं होता है कि वो काम हम कैसे खत्म करें ठीक उसी तरह मुझे भी कोई फर्क नहीं परता है कि आप इसे कैसे खत्म करते हैं.. हमें भी अपनी चीज समय पर चाहिये..
खैर हमारी मेहनत रंग लायी और आज (पूरे 1 सप्ताह देरी से ही सही) अप्रैजल मिल गया.. अपने जीवन का पहला प्रोमोशन.. मुझे जब उससे संबंधी कागजात दिये जा रहे थे तब मुझसे पूछा गया उसके बारे में.. मेरा जवाब था की मैं खुश हूं क्योंकि ये मेरा पहला प्रोमोशन है, मगर मैं संतुष्ट नहीं हूं क्योंकि सैलेरी हाईक मेरी उम्मीदों पर खड़ा नहीं उतरा है.. खैर जो भी हो.. फिलहाल तो प्रोमोशन मिल गया.. :)
मैं आजकल बहुत व्यस्त हूं इसलिये "जब अल्लाह मेहबान तो गधा पहलवान" कि अंतिम कड़ी नहीं लिख पा रहा हूं.. अगली पोस्ट में ही उसे पूरा कर दूंगा.. मगर मुझे पता नहीं कब..
मेरे कालेज के मित्र, जो मेरे चिट्ठे को बराबर पढ़ते रहते हैं उन्होने मुझे कहा की आज-कल तम्हारा पोस्ट पुराने दिनों की याद जेहन में ताजा कर दे रहा है.. अच्छा लगा पढ़कर-सुनकर.. अब आगे बढ़ते हैं..(क्रमशः से आगे...)मेरे बगल में मेरे कुछ मित्र बैठे हुए थे.. अगर मिनट के हिसाब से गिनती करें तो जितने मिनट की परीक्षा थी उससे ज्यादा सवाल थे(जैसा की हर कंपटीटीव परीक्षा में होता है).. सवाल कुल 125 थे और समय डेढ़ घंटे, यानी 90 मिनट.. मगर मेरी रफ़्तार उससे ज्यादा थी और समय पूरा होने से लगभग ५-७ मिनट पहले ही मैंने उसे पूरा बना डाला.. अब मैंने अपने बगल में बैठे हुए मित्र के तरह मुडा.. मैंने पाया की उसके अधिकांश उत्तर मेरे उत्तर से पूरी तरह भिन्न थे मगर मुझे भरोसा था की मेरे उत्तर सही थे.. मैंने उसे कहा की मेरे सारे उत्तर कापी कर लो और जहाँ तक संभव हो सका उसने कर लिया और फिर उसने अपने बगल में बैठे हुए हमारे एक और मित्र को भी यही करने को कहा.. बाहर निकल कर अब पूरी तरह से मेरी जिम्मेदारी बन गयी थी, की अगर उनका नहीं निकला तो मुझे ही कहा जाएगा की तूने सारा गलत दिखाया था.. मगर ऐसा नहीं हुआ.. कट-आफ बहुत ऊपर गया था मगर फिर भी हम तीनो का रिटेन में सेलेक्सन हो गया था..
वहाँ इंटरव्यू से पहले एक ग्रुप डिस्कसन था.. मैं जिस ग्रुप में था उसका टापिक था "कैपिटल पनिशमेंट".. जब जी.डी. शुरू हुआ तब मुझे ऐसा लगा की अधिकतर लड़के समझ भी नहीं पा रहे थे इस टापिक का सही मतलब.. मैंने ही शुरूवात की.. और जिंदगी की पहली जी.डी. में असफल भी रहा.. हुआ कुछ ऐसा, की जैसे ही मैंने बोलना शुरू किया वैसे ही सभी लोग मेरी तरफ देखने लग गए.. थोडी देर बाद मैं कुछ असहज महसूस करने लगा और फिर घबराहट इतनी अधिक बढ़ गई की मैं कुछ बोल ही नहीं सका.. खैर, इसमे मैं शत-प्रतिशत अपनी ही गलती मानता हूँ.. पी.सी.एस. में फिर से मेरे कुछ और करीबी मित्रों का सेलेक्सन हो गया जैसे अर्चना, संजीव, अनुज, श्रुति.. अफ़सोस तब हुआ जब अच्छे से जी.डी. देने के बाद भी मैंने अपने जिन दो दोस्तों को अपना पेपर दिखाया था, वे भी जी.डी. क्लियर नहीं कर पाए..
अगली कम्पनी मेरे लिए Hexaware थी.. उसमे भी खूब चोरी चली, मगर मैं इस बार न तो किसी प्रकार का कोई व्यूह बनाया और ना ही चोरी की.. खैर इस बार मैं रिटेन में भी सेलेक्ट नहीं हो पाया मगर पी.सी.एस. का रिटेन निकालने के बाद मेरे आत्मविश्वास में बहुत इजाफा हुआ था.. जब पता चला की Hexaware आने वाली है तो एक रात पहले मैंने संजीव को कहा की कल से मैं भी बैडमिन्टन खेलने आ रहा हूँ, घबराओ मत.. और जब इसमे नहीं हुआ तो अगली कम्पनी में भी मैंने यही बात कही जो सही हो गया.. :) दरअसल होता यह था कि मेरे जिन दोस्तों का सेलेक्शन हो चुका था वे सभी दिन के 6-7 घंटे बैडमिंटन खेलने में बिताने लगे थे, और मेरे जैसा बैडमिंटन का प्रेमी कुछ तैयारी के चक्कर में और कुछ अवसाद में पड़कर खेलने नहीं जाता था..(अगला अन्तिम भाग...)

मेरे होस्टल के बगल वाला हिस्सा.. इसे आप पार्क नहीं कह सकते हैं मगर था पार्क जैसा ही कुछ.. पूरे वेल्लोर में अगर कुछ हरियाली देखनी हो तो बस VIT आ जाइए :)..

मेरा होस्टल, वाणी के कैमरा से लिया हुआ.. उस समय मेरे पास कैमरा नहीं था सो वाणी से कुछ दिनों के लिए उधार लिया था.. उसके कैमरे से बहुत अच्छी तस्वीर आती है.. :)
कैंपस सेलेक्सन के दिनों में हर दिन एक नई अफवाह सुनने को मिलता कि आज ये कंपनी आने वाली है.. प्राईवेट कालेज होने के कारण कालेज प्रशासन कभी सही खबर का खुलासा नहीं करती थी.. हर दिन उड़ते-उड़ते खबर मिलती थी कि आज शाम तक या कल सुबह तक फलाना कंपनी आ रही है और ये खबर ना सिर्फ उनके लिये महत्वपूर्ण होता था जिनका कैंपस सेलेक्सन नहीं हुआ था बल्की वे भी खुश होते थे जिनका कैंपस हो चुका था.. कारण के ,सभी अपने साथ-साथ अपने सभी दोस्तों को भी नौकरी के साथ देखना चाहते थे.. सबसे बरी बात तो ये थी कि कैंपस के समय में क्या दोस्त और क्या दुश्मन.. बस पूरी कक्षा एक थी.. जिनसे कोई मदद कि उम्मीद भी नहीं कर सकते थे वे भी हर समय मदद के लिये तैयार रहते थे.. हां, अपवाद हर जगह होता है और यहां भी थे.. कुछ ऐसे भी थे जो कैंपस सेलेक्सन के साथ ही बदल गये थे.. अपने पास कि एक नयी दुनिया को पहचानने का ये मौका था सभी के लिये.. सफलता के साथ लोगों को बदलते देखने का ये एक अलग अनुभव था.. जिंदगी हर रोज कुछ नया सिखाती है और ये सबक कुछ ज्यादा ही कठोर था..(पिछले भाग से जारी...)आई.बी.एम. में भले ही मेरा सेलेक्सन नहीं हुआ था मगर मेरे कई प्रिय मित्रों जैसे चंदन, वाणी, प्रियंका, प्रियदर्शीनी का सेलेक्सन आई.बी.एम. में हो गया था.. सच कहूं तो मन थोड़ा उदास तो था मगर ये उदासी अपने उन मित्रों के चेहरे कि खुशी के सामने बहुत कम थी.. बस ये अफसोस रह गया कि अगर मैं भी इसमें सेलेक्ट हो गया रहता तो इन्हीं के साथ आफिस में भी कुछ दिन और गुजारने का मौका मिल जाता..
मेरे लिये अगली कंपनी थी एच.पी... हम सारे लोग, जो बचे हुये थे, पूरे जोर शोर के साथ उसका रिटेन देने के लिये गये.. वहां पी.पी.टी.(प्री प्लेसमेंट टॉक) में ही कुछ नकारात्मक बातें उभर कर आ गई थी.. फिर भी सभी परीक्षा दिये.. हमारे वे सभी मित्र जिनका सेलेक्सन किसी और कंपनी में हो चुका था वो परीक्षा भवन के बाहर चक्कर लगाते रहे.. और ये सिलसिला लगभग पूरे सेमेस्टर चला.. जब मैं नहीं बैठता था तब मैं भी बाहर चक्कर लगाता रहता था.. मन में ये सोचते हुये कि इस बार सभी दोस्तों का कहीं ना कहीं सेलेक्सन हो जाये.. जब एच.पी. का रिजल्ट आया तब हमने पाया कि वो बस एम.टेक. के विद्यार्थियों का ही सेलेक्सन किये थे.. किसी भी बी.टेक. या एम.सी.ए. के विद्यार्थी रिटेन के बाद साक्षात्कार के लिये नहीं चुने गये थे.. चूंकि पेपर बहुत ही आसान था सो सभी ये उम्मीद लग कर बैठे थे कि इंटरव्यू के लिये तो हम चुन ही लिये जायेंगे.. बाद में पता चला कि उन्होंने बी.टेक. और एम.सी.ए. के विद्यार्थियों का पेपर चेक ही नहीं किया था..
वैसे मैं जब बाहर आया था तब मेरा सोचना दूसरों से कुछ अलग था और मैंने बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं लगा रखी थी.. क्योंकि पेपर बहुत आसान आया था और मेरा मानना था कि कट-ऑफ बहुत ऊपर जायेगा.. ये कुछ बातें मैंने उस समय सीखी थी जब मैं बैंक पी.ओ. कि तैयारी करता था.. उस समय मैंने जाना था कि किस प्रश्न को कब हल किया जाये और किस प्रश्न को कब छोड़ दिया जाये.. मेरा किसी बैंक में तो नहीं हुआ(क्योंकि मैं एम.सी.ए. करने वेल्लोर आ गया था), मगर उस समय कि गई तैयारी का फायद मुझे अभी तक मिल रहा है.. कहते हैं न, परिश्रम कभी निष्फल नहीं जाता है..
मेरे लिये अगली कंपनी पटनी कंप्यूटर साल्यूसन PCS थी.. इसमें मैं और मेरे कई और साथी रिटेन के लिये बैठे.. सभी अपने लिये एक व्यूह तैयार करके आये थे और जिहोंने व्यूह नहीं बनाया था वो परीक्षा हॉल में आकर किसी ना किसी व्यूह में शामिल हो गये.. व्यूह कुछ ऐसा कि थोड़ा-थोड़ा सभी उस तरह के प्रश्न हल करेंगे जिसे हल करने में उन्हें महारत हाशिल है और उसे सभी से बांट लिया जायेगा.. मेरे पास पहले से कोई इस तरह की योजना नहीं थी मगर वहां पहूंचकर और ये माहौल देखकर अपने लिये मैं भी व्यूह तैयार करने लगा.. आमतौर पर कई कंपनी इस तरह की परीक्षा में कालेज प्रशासन का सहयोग नहीं चाहती है और किसी तीसरे पक्ष पर ज्यादा भरोसा करती है.. पी.सी.एस. ने भी माईंड ट्रैक नामक तीसरी कंपनी पर भरोसा किया था जो इस तरह के काम में एक्सपर्ट मानी जाती है..
मैं भी अपने कुछ चुनिंदा दोस्तों के साथ व्यूह बना कर बैठ गया.. मगर ठीक परीक्षा शुरू होने से पहले मुझे जगह बदल देने के लिये कहा गया और मुझे दूसरे छोड़ पर बैठ जाने के लिये कहा गया.. पहले तो लगा कि ये मेरे साथ ठीक नही हुआ, मगर फिर ये भी ख्याल आया कि पहले भी मैं अपने भरोसे ही आया था और फिर से अपने भरोसे ही परीक्षा दूंगा.. उस परीक्षा में खूब चोरी चली और किसी को भी उससे ऐतराज नहीं था.. ना लड़कों को और ना ही कालेज प्रसाशन को..(क्रमशः...)

ELECTRIFYING PERFORMANCE: VIT University students perform at a Western music programme at `Riviera '07' in Vellore on Monday. — Photo: D. Gopalakrishnan
साभार द हिंदू
मैंने अपने इस पोस्ट श्रृंखला का नाम रखा है "जब अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान".. क्योंकि अभी तक के अनुभव से यही सीखा है कि जब किसी कालेज में कोई कंपनी कैंपस के लिये जाती है तो कई गधों को पहलवान बना कर वापस लौटती है और कई सच के पहलवान गधों कि तरह मुंह बाये ताकते रह जाते हैं.. कुल मिला कर उस वक्त उस श्लोक का सार समझ आता है जिसके अनुसार "समय से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता है.." कैंपस सेलेक्सन के बारे में मेरा ये ख्याल है कि अगर वो दिन आपका है तो आप कितनी भी गलती करें मगर आपका सेलेक्सन होना ही है.. आपकी हर गलती साक्षात्कार लेने वाले को आपकी खूबी के रूप में ही दर्शाएगा.. हां मगर आपके पास इतना ज्ञान होना ही चाहिये जिससे आप साक्षातकार लेने वाले को प्रभावित कर सकें..(पिछले भाग से जारी...)मैं इंटरव्यू रूम के बाहर बैठ कर पेप्सी के प्रचार वाले लड़के की तरह सोच रहा था कि मेरा नंबर कब आयेगा.. खैर वो भी आया.. आई.बी.एम. वाले लगभग 10-15 इंटरव्यू पैनेल लेकर आये हुये थे.. मेरा इंटरव्यू जिस पैनेल ने लिया वो बैठकर बर्गर खा रहे थे.. ठीक उसी समय मुझे बुला भेजा.. मुझे बर्गर भी ऑफर किया जिसे मैंने औपचारिकता वश मना कर दिया और बाद में अफ़सोस हुआ कि क्यों मना किया.. :) छीन कर खा लेना चाहिए था.. :)
वे पूरी तरह से नकारात्मक भाव लेकर इंटरव्यू ले रहे थे.. मुझसे कुछ तकनिकी प्रश्न पूछे गये जिनका मैंने सही-सही उत्तर देने लगा.. जब उन्हें लगता कि ये उत्तर दे देगा तो तुरत प्रश्न बदल कर कुछ और पूछने लग जाते.. लगभग आधे घंटे तक ऐसा ही चलता रहा.. और फिर वो तकनिकी प्रश्न छोड़ कर एच.आर. वालों कि तरह सवाल-जवाब करने लगे.. कुछ देर तक मैं उत्तर देता रहा मगर एक अनुभव प्राप्त व्यक्ति और मुझ जैसे अनुभवहीन व्यक्ति का अंतर नजर आने लगा.. और जैसे ही मैं किसी प्रश्न में फंसा वैसे ही उन्होंने मुझे बाहर जाने के लिये बोल दिया..
बाद में पता चला कि उस पैनेल वाले ने जिस किसी का इंटरव्यू लिया था उन सभी के साथ उसने यही किया था.. बाद में किसी सीनियर ने बताया कि जहां भारी मात्रा में सेलेक्सन किया जाता है वहां कंपनियां रिजेक्सन पैनेल भी लेकर जाती है जिनका काम होता है बस जिसका भी इंटरव्यू लो उसे रिजेक्ट कर दो.. शायद ये वैसा ही पैनेल था..
चलो कोई बात नहीं, दिल को खुश रखने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है के तर्ज पर मुझे भी कुछ चाहिए था दिल को समझाने के लिए..
मुझे अफ़सोस बस इस बात का रहा कि मैंने उनका बर्गर छीन कर क्यों नहीं खा लिया.. :)(क्रमशः...)
मेरा होस्टल