सुबह अमूमन देर से उठता हूं, दफ़्तर का समय भी कुछ उसी समय होता है.. मगर आज जल्दी नींद खुल गई.. सुबह के दैनिक क्रिया से निवृत होकर अपना मेल बाक्स चेक कर ही रहा था कि उधर से मेरे मित्र का फोन आया.. बेहद हड़बड़ी में था.. हेलो बोले बिना बोला "जल्दी से मेरे लिये पटना का एक फ्लाईट बुक करा दो".. उसका इतना कहना था और मैं समझ गया कि मसला क्या है.. मगर फिर भी प्रतिक्रिया में मेरे मुंह से अचानक निकल गया, "पटना!! क्यों क्या हुआ?" उधर से बस इतनी आवाज आई "पापा!!" और फफकर रोने लगा.. दो-तीन सेकेण्ड बाद फोन काट दिया.. मिनट भर किंकर्तव्यविमूढ़ जैसी स्थिति में रहने के बाद मैंने नेट पर टिकट चेक किया और नेट पर टिकट मिलने में देर लगने कि स्थिति जान अपने दूसरे मित्र को फोन किया, कि तुम टिकट बुक कराओ और मैं उसे लेने घर से निकलता हूं..
दो मिनट के भीतर मैं घर से बाहर अपने बाईक पर था.. बाईक चलाना मेरे शौक में शामिल होते हुये भी चलाने में दिल नहीं लग रहा था और इसी कारण से मैंने अपने घर से अशोक पिलर तक की दूरी नापने में अभी तक का सबसे अधिक समय लगा.. बहुत संभल कर और धीरे-धीरे चला रहा था.. रास्ते में दो-चार आंसू भी ढलक गये..
बाद में जब अपने मित्र को फ्लाईट पर चढ़ा कर वापस घर आया तब जाकर यह अहसास हुआ कि दुःख से अधिक मन में कहीं डर बैठा था.. कभी ना कभी मेरे साथ भी यही होने वाला है जैसा डर.. अपने आस पास खुद से बड़े उम्र के लोगों में ऐसी स्थिति पहले भी देखी है, यहां तक कि अपने पापा-मम्मी के साथ भी.. मगर अपने बेहद अभिन्न मित्र के साथ भी ऐसा ही होने पर मन बेहद टूटा सा महसूस हो रहा है..
बार-बार सोच रहा हूं, "क्या इसी के लिये हमें घर से बाहर निकलना पड़ता है? जिसे लोग जीवन कि उन्नति समझते हैं वो ऐसे कीमत पर भी मिले तो भी क्या हम सफल होते हैं?" अभी मेरे मन में श्मशान वैराग्य जैसा कुछ भी नहीं है.. थोड़े से आक्रोश के साथ थोड़ी सी लज्जा भी है मन में इस जीवन के प्रति.. अपनो के लिये कुछ ना कर पाने कि छटपटाहट भी है साथ में..
लज्जित हूं अपने मन में आयी एक बात को लेकर.. मन में एक बात आयी थी कि कुछ और बेहतर स्थिति में आने पर पापा-मम्मी को लेकर अपने पास आ जाऊंगा.. फिर मुझे इसमें अपना स्वार्थ दिखने लगा.. जिस जगह उन्होंने अपना पूरा जीवन गुजार दिया, उसे छोड़ कर आने में क्या उन्हें कष्ट नहीं होगा? और मैं सब छोड़ कर वापस जाने कि स्थिति में हूं नहीं..
अजीब सा कश-म-कश चल रहा है मन में.. जीवन कि विडंबनायें भी अजीब होती हैं..

चलते-चलते : वैसे यह अजीब शब्द भी कुछ अजीब नहीं होते हैं!! कुछ समझ में ना आये तो वह अजीब.. कुछ लीक से हटकर घटे तो वह अजीब.. नई चीज अगर समझ में ना आये तो वह अजीब.. यूं तो इस संसार में हर कोई किसी ना किसी मायने में अजीब ही होते हैं..
अभी एक दो दिन पहले कि ही बात है.. हम चार मित्र बैठकर यूं ही बातें कर रहे थे.. मेरे मित्र ने बातों ही बातों में कहा कि उसके गांव के लोगों का मानना है कि अगर इस गांव में किसी एक कि मौत होती है तो एक के बाद एक लगातार चार और लोगों कि भी मृत्यु होती ही है और अभी तक दो लोगों कि मृत्यु हो चुकी है.. हमने मजाक ही मजाक में कहा कि हम सभी मिलकर तुझे ही मार देते हैं.. आज जब उसे विदा करने को फिर से हम चारों मित्र एयरपोर्ट पर थे तब वही बात उठी, और हमारा कहना था कि अब अगर ऐसे हालात हों तो इस अंधविश्वास पर हमारे मित्र का विश्वास और भी बढ़ जायेगा, और एक तरह से यह भी और दो का इंतजार करने लगेगा.. जब हम ये बातें कर रहे थे तब हमारा मित्र कहीं और गया हुआ था..
दो मिनट के भीतर मैं घर से बाहर अपने बाईक पर था.. बाईक चलाना मेरे शौक में शामिल होते हुये भी चलाने में दिल नहीं लग रहा था और इसी कारण से मैंने अपने घर से अशोक पिलर तक की दूरी नापने में अभी तक का सबसे अधिक समय लगा.. बहुत संभल कर और धीरे-धीरे चला रहा था.. रास्ते में दो-चार आंसू भी ढलक गये..
बाद में जब अपने मित्र को फ्लाईट पर चढ़ा कर वापस घर आया तब जाकर यह अहसास हुआ कि दुःख से अधिक मन में कहीं डर बैठा था.. कभी ना कभी मेरे साथ भी यही होने वाला है जैसा डर.. अपने आस पास खुद से बड़े उम्र के लोगों में ऐसी स्थिति पहले भी देखी है, यहां तक कि अपने पापा-मम्मी के साथ भी.. मगर अपने बेहद अभिन्न मित्र के साथ भी ऐसा ही होने पर मन बेहद टूटा सा महसूस हो रहा है..
बार-बार सोच रहा हूं, "क्या इसी के लिये हमें घर से बाहर निकलना पड़ता है? जिसे लोग जीवन कि उन्नति समझते हैं वो ऐसे कीमत पर भी मिले तो भी क्या हम सफल होते हैं?" अभी मेरे मन में श्मशान वैराग्य जैसा कुछ भी नहीं है.. थोड़े से आक्रोश के साथ थोड़ी सी लज्जा भी है मन में इस जीवन के प्रति.. अपनो के लिये कुछ ना कर पाने कि छटपटाहट भी है साथ में..
लज्जित हूं अपने मन में आयी एक बात को लेकर.. मन में एक बात आयी थी कि कुछ और बेहतर स्थिति में आने पर पापा-मम्मी को लेकर अपने पास आ जाऊंगा.. फिर मुझे इसमें अपना स्वार्थ दिखने लगा.. जिस जगह उन्होंने अपना पूरा जीवन गुजार दिया, उसे छोड़ कर आने में क्या उन्हें कष्ट नहीं होगा? और मैं सब छोड़ कर वापस जाने कि स्थिति में हूं नहीं..
अजीब सा कश-म-कश चल रहा है मन में.. जीवन कि विडंबनायें भी अजीब होती हैं..

चलते-चलते : वैसे यह अजीब शब्द भी कुछ अजीब नहीं होते हैं!! कुछ समझ में ना आये तो वह अजीब.. कुछ लीक से हटकर घटे तो वह अजीब.. नई चीज अगर समझ में ना आये तो वह अजीब.. यूं तो इस संसार में हर कोई किसी ना किसी मायने में अजीब ही होते हैं..
अभी एक दो दिन पहले कि ही बात है.. हम चार मित्र बैठकर यूं ही बातें कर रहे थे.. मेरे मित्र ने बातों ही बातों में कहा कि उसके गांव के लोगों का मानना है कि अगर इस गांव में किसी एक कि मौत होती है तो एक के बाद एक लगातार चार और लोगों कि भी मृत्यु होती ही है और अभी तक दो लोगों कि मृत्यु हो चुकी है.. हमने मजाक ही मजाक में कहा कि हम सभी मिलकर तुझे ही मार देते हैं.. आज जब उसे विदा करने को फिर से हम चारों मित्र एयरपोर्ट पर थे तब वही बात उठी, और हमारा कहना था कि अब अगर ऐसे हालात हों तो इस अंधविश्वास पर हमारे मित्र का विश्वास और भी बढ़ जायेगा, और एक तरह से यह भी और दो का इंतजार करने लगेगा.. जब हम ये बातें कर रहे थे तब हमारा मित्र कहीं और गया हुआ था..


