Wednesday, December 03, 2008

हमारे पूर्वज नहीं हम बंदर हैं और नचाने वाला यह सिस्टम

आज कल जिसे देखो वही सिस्टम को गालियां दे रहा है.. मैं भी हूं उसी जमात में.. नेताओं को गाली, सिस्टम को गाली, पाकिस्तान को गाली.. खैर ये सब बातें बाद में करता हूं पहले आपको एक कहानी सुनाता हूं.. ये कहानी मैनेजमेंट कालेजों में बहुत प्रसिद्ध है..

एक बार 10 बंदर जंगल से पकड़े गये.. दसों को एक ही पिंजरे में रखा गया जिसके बीच में एक खंभा था और खंभे के ऊपर ढ़ेर सारे केले लटके हुये थे.. बंदरों ने जैसे ही वो केला देखा सारे के सारे एक साथ लपके उसे खाने को.. जैसे ही एक बंदर ने खंभे पर चढने कि कोशिश की वैसे ही सारे बंदरों पर बर्फ जैसा ठंढा पानी डाल दिया गया.. बंदर हैरान परेशान.. मगर फिर से हिम्मत दिखा कर केले लेने को लपके.. जैसे ही बंदर खंभे पर चढ़ने कि कोशिश की फिर से ठंढा पानी आ गिरा उनके ऊपर.. अब तो ये जैसे नियम बन गया.. कोई बंदर खंभे पर चढ़ने कि कोशिश करता और पानी उस पर आ गिरता..

यह सिलसिला कई दिनों तक चला.. अब बंदर समझ गये थे कि उस खंभे पर चढ़ने पर ही ठंढा पानी उनके ऊपर गिरता है सो कोई उस खंभे के पास भी नहीं फटकता.. केले खाने का लालच सभी के भीतर था मगर फिर भी कोई खंभे के पास फटकता भी नहीं था..

फिर एक दिन एक नया बंदर लाया गया और एक पुराने बंदर को निकाल लिया गया.. नये बंदर को कुछ भी पता नहीं कि उस खंभे पर चढ़ने पर ऊपर से ठंढा पानी गिरता है सो वह केले खाने के लिये खंभे कि ओर लपका.. जैसे ही वो केले खाने के लिये खंभे के पास पहूंचा तभी सभी बंदर ये सोच कर कि कहीं इसके खंभे पर चढ़ते ही ठंढा पानी ना गिरे, सो उसे खंभे पर चढ़ने से पहले ही पीट दिया.. वो बेचारा बंदर हक्का-बक्का कि उसे क्यों पीटा गया? मगर हिम्मत जुटा कर वो फिर से खंभे कि ओर गया.. फिर से पिटाई हो गई.. उसकी समझ में इतना ही आया कि जो खंभे पर चढ़ने जाता है उसकी पिटाई कि जाती है..

अब हर दिन एक नया बंदर लाया जाता और एक पुराने बंदर को बाहर निकाला जाता.. नया बंदर केले खाने को खंभे के पास जाता और उसकी पिटाई होती.. धीरे-धीरे सभी पुराने बंदर बाहर आ गये और नये बंदर अंदर.. किसी को पता नहीं कि खंभे के पास जाने से ऊपर से ठंढा पानी गिरता है, वो तो बस इतना जानते थे कि जो खंभे के पास जाता है उसकी पिटाई की जाती है.. क्यों? किसी को पता नहीं.. बस की जाती है तो बस की जाती है और इस तरह एक सिस्टम का निर्माण हो चुका था.. बस महीने भर में..


हमारा सिस्टम भी कुछ इतना ही खोखला है.. सभी को पता है कि क्या सही है और क्या गलत, मगर कभी कोई यह नहीं पूछता है कि ये गलत क्यों हो रहा है? अगर कोई सही गलत की बात भी करे तो सबसे पहेले लोग उसी कि हंसी उड़ाते हैं और बाद में सभी सिस्टम को गालियां देते हैं कि साला सिस्टम ही खराब है.. ये भ्रष्टाचारी सरकारी मुलाजिम हों या फिर कूड़े सी मानसिकता रखने वाले नेता(इन्हें राजनेता कहते मुझे शर्म आती है), ये सभी सिस्टम हैं और हम बंदर..

अगर आशावादी होकर लिखूं तो कह सकता हूं कि आओ संकल्प करें कि हमेशा सही बात पर ही सिस्टम का साथ देंगे और धीरे-धीरे ही तो सिस्टम बदलता है..

और अगर निराशावादी होकर लिखूं तो यही कहूंगा कि कुछ नहीं बदलने वाला है, सिस्टम को बदलने कि बात ही खोखली है.. साला सिस्टम ही खराब है.. अब यह आप पर छोड़ता हूं कि आप आशावादी हैं या निराशावादी?

अंत में - जैसा कि मैं पहले भी लिखता आया हूं कि मेरे घर में सभी मेरे चिट्ठे को पढ़ते हैं, मुझे नहीं पता कि मेरी पिछले पोस्ट को पढ़कर उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी.. मगर इतना तो जानता हूं कि वो खुश नहीं होंगे.. खैर ये भी पता है कि अगले 3-4 दिनों तक वो इसे नहीं पढ़ने वाले हैं.. जो भी हो वो भी यह जानते हैं कि मैं अपनी हर सही-गलत बात उनसे साझा करता हूं, एक ये भी सही..

Sunday, November 30, 2008

जल्द ही भारत में सभी के पास नौकरी होगी और सभी लखपति होंगे

जल्द ही भारत में सभी के पास नौकरी होगी और सभी लखपति होंगे.. जी हां, लखपति होना वह सपना है जो हर मध्यमवर्गीय भारतीय देखता है और साथ में सरकारी नौकरी भी हो तो क्या कहना.. कौन कहता है अभी वाली सरकार हिजड़ों कि जमात है या पिछली वाली थी? सभी झूठे हैं, बकवास करते हैं.. सरकार सारे अच्छे थे, सभी लोगों को लखपति और रोजगार देने वाली थी और है.. ऊपर से कुछ भाग्यवान लोग तो अब कड़ोड़पति भी बनने लगे हैं.. अजी जितनी मौतें उतनी सरकारी नौकरी और हादसों के हिसाब से लाखों रूपया..

अब मौत चाहे बम फटने से हुई हो या फिर फिर नक्सलियों कि गोली से.. अपनी सरकार है ना.. कुछ हो चाहे ना हो मगर कागजों पर तो लखपति बन ही जाओगे साथ में एक अदद नौकरी भी.. बस जरूरत है, हर घर में एक लाश की.. शर्त यह कि वो किसी राष्ट्रीय स्तर कि घटना में मरा हो.. देखो सरकार भी दुखी है, 4817 लोगों कि जान जो बचा ली गयी है.. अब इतने लोग लखपति बनने से बच जो गये.. धन्य हो ऐसी सरकार..

अंत में - आज मेरा हिंदी ब्लौगिंग में दो साल पूरा हो गया है.. मैंने बहुत पहले इस पर कुछ पोस्ट लिखे थे और सोचा था कि आज के दिन पोस्ट करूंगा मगर मन नहीं कर रहा है अभी उसे पोस्ट करने का.. फिर कभी पोस्ट करता हूं उसे..

Saturday, November 29, 2008

सबसे बुरी चीज होती है संस्कार

अगर ढंग से जीना हो तो सबसे पहले संस्कार को त्यागना होगा.. हमारा संस्कार ही किसी भी कार्य को करने में सबसे बड़ी बाधा बनती है.. कुछ उदाहरण मैं देना चाहूंगा, मैं अपने कार्यालय में कई बार जितना काम करता हूं उसका दोगुना या ढेड़ गुना दिखाता हूं.. मन में बहुत तकलीफ होती है.. ऐसा लगता है कि मैं गलत कर रहा हूं.. मगर अगर ऐसा ना करूं तो सबसे बड़ी समस्या पैदा हो जायेगी.. ढ़ंग से जीना भी हराम हो जायेगा.. मगर मन की तकलीफ का क्या करूं? वो तो हर पल सालता रहता है..

घर के दिये संस्कार हर पल बीच में आते रहते हैं.. कुछ भी गलत करने जाओ, बस मन के भीतर एक दूसरा मन रोकता है.. बताता है कि ये गलत है.. और बस हो गया, तरक्की का एक रास्ता बंद.. लेकिन एक बात तो जरूर है कि बाद में उसी फैसले पर गर्व सा महसूस होता है.. मगर आगे बढ़ने का रास्ता बंद..

ये क्षणिक विचार आये हैं मन में, मुझे पता है कि कई भाई इससे सहमत नहीं होंगे, मगर क्या करूं अभी यही विचार मन में आ रहे हैं.. खैर तब तक आप ये गीत सुने, ये पोस्ट लिखते हुये मैं यही गीत सुन रहा हूं..

कोई सागर दिल को बहलाता नहीं..
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दिन ढ़ल जाये हाये, रात ना जाये..
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यहां किसे फिकर है मुंबई की?

यहां किसे फिकर है मुंबई की? इसे आप व्यंग्य कि तरह लें या फिर सच्चाई कि तरह, मगर आज चेन्नई में यही हो भी रहा है.. यहां लोगों का जीवन चेन्नई में आयी इस प्राकृतिक आपदा से जूझने में ही लगा हुआ है.. किसी के लिये भी सबसे बड़ी जरूरत अपना और अपनों के प्राणों कि रक्षा करनी होती है, और लोग यही कर भी रहे हैं..

यहां जब मैं पहली बार आया था तब मेरे भीतर काफी आक्रोश था कि यहां के लोग उत्तर भारतियों के प्रति रूखा व्यवहार करते हैं.. मगर इतने दिनों से यहां रहते हुये मुझे भी अब समझ में आने लगा है कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती है.. अगर किसी ऐसे राजनितिक घटना को छोड़ दें जो सीधा देश की राजनिति पर असर डालता हो तो यहां के किसी भी घटना या दुर्घटना राष्ट्रीय स्तर पर कहीं कोई खबर नहीं बनती है.. मुझे पता नहीं कि अंडा पहले या मुर्गी? हां मगर एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि पहले जितना वैमनष्य उत्तर-दक्षिण को लेकर अब नहीं है यहां पर और यह दिनों दिन कम होता जा रहा है..

मेरे घर के तरफ बिजली-पानी कि समस्या अभी तक नहीं हुयी है, पांचवी मंजिल पर होने के कारण घर में पानी घुसने का खतरा भी नहीं है.. मगर अपने मित्रों से पता चला है कि ना जाने कितनों के घरों में कमर से ऊपर तक पानी भरा हुआ है.. कई जगहों पर पिछले 36 घंटों से बिजली-पानी नहीं है.. हमारे घर कि भी बिजली कभी भी जा सकती है..

आप इन तस्वीरों से अंदाजा लगा सकते हैं कि चेन्नई कि जिंदगी कितनी भयावह स्थिति में है अभी..

चेन्नई सेंट्रल


'12 बी' बस, जिससे हर रोज मेरा आना जाना होता है.


आर्कट रोड जो चेन्नई-बैंगलोर हाईवे पर जाकर मिलता है.



ये दोनों तस्वीरें है टी.नगर के पास वाले सबवे कि जो लबालब पानी से भरा हुआ है.. ये चेन्नई के सबसे व्यस्त सड़कों में से है..

अंत में मुंबई आतंकी हमलों में मारे गये सभी लोगों को श्रद्धांजली.. ध्यान रहे, मैं यहां लोगों कि बात कर रहा हूं.. भेड़ियों कि नहीं..

Friday, November 28, 2008

निशा अपना निशान छोड़ गई, चेन्नई अस्त-व्यस्त

आज सुबह अपने ऑफिस के एक मित्र के फोन से नींद खुली.. उन्होंने मुझे इससे पहले भी दो एस.एम.एस.भेज कर ऑफिस ना आने कि बात कही थी.. मगर मेरी तरफ से कोई उत्तर ना पाकर उन्होंने फोन किया.. उनसे पता चला कि आज ऑफिस को बंद कर दिया गया है.. पूरी टीम को ऑफिस आने से मना कर दिया गया है.. इसके बदले हमें किसी और दिन शनिवार या रविवार को काम करना परेगा.. तकनिकी भाषा में इसे कॉम्प ऑफ या कंपेन्सेशन ऑफ कहा जाता है..

हुआ ये कि पिछले शुक्रवार से हुई लगातार तेज वर्षा ने पूरे तमिलनाडु को अस्त-व्यस्त कर रखा है.. पूरे तमिलनाडु में अब तक 60 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और दक्षिण कि ओर जाने वाली अधिकतर रेलों को भी बंद कर दिया गया है.. मुख्यमंत्री करूणानिधि ने 100 करोड़ रूपये राहत कार्य में देने कि घोषणा भी कर रखी है.. तमिलनाडु में आये इस तूफान का नाम निशा रखा गया है.. मेरे कुछ तमिलनाडु के मित्र मुझसे पूछ रहे थे कि निशा का मतलब क्या है.. कितनी अजीब बात है ना, जहां तूफान आया हो वहीं के लोग उस तूफान के नाम का मतलब नहीं जानते हैं.. क्योंकि यह शुद्ध हिंदी शब्द है..

कल जब मैं ऑफिस से लौट रहा था उसी समय सोच रहा था कि कल ऑफिस जाते समय बहुत परेशानी का सामना करना परेगा.. अच्छी बात यह कि ऑफिस ही बंद कर दिया गया.. मुझे आज रात बैंगलोर के लिये निकलना था, मगर अब सोच रहा हूं कि कैसे जाऊं..



यह सेटेलाईट से लिये गये कुछ चित्र हैं जिसमें आप साफ देख सकते हैं कि किस तरह और किस आकार का यह चक्रवात था..

Thursday, November 27, 2008

मेरे अपने सब ठीक हैं मुंबई में, और मैं खुश


"बरसात बहुत जोर से हो रही है.. न्यूज में पढ़ा था कि पूरे तमिलनाडु में 30 के लगभग लोग मर गये हैं.." बाईक चलाते हुये उसने मुझसे कहा.. मैं पीछे बैठा हुआ था..

ट्रैफिक बहुत था और चारों ओर घुटने से थोड़ा कम ही पानी जमा हुआ था.. लोग बिना शोर किये, हार्न बजाये बिना बस चुपचाप खड़े ट्रैफिक के ख्त्म होने का इंतजार कर रहे थे.. एक भाईसाहब बाईक पर ही इत्मिनान से छतरी खोल कर बैठे हुये थे.. जैसे उन्हें पता हो कि अगले 10-15 मिनट तक ट्रैफिक नहीं खुलने वाला हो..

"हां.." मैंने बात आगे बढ़ाते हुये कहा.. इस ट्रैफिक के कारण बात करने का मौका मिल गया था.. "3-4 दिनों से खूब बरसात हो रही है.. वैसे आपने आज कि खबर पढ़ी?" मैंने उड़ता हुआ सवाल उनकी ओर फेका..

"हां.. जो भी हुआ अच्छा नहीं हुआ.." पल भर को चिंता उनके चेहरे पर दिखने लगी जो क्षण भर में ही गायब हो गयी.. थोड़ी खुशी के साथ आगे उन्होंने कहा "एक अच्छी बात यह है कि मेरे जान पहचान में से मुंबई में कोई भी नहीं है.. सो मैं निश्चिंत हूं.. वैसे भी चेन्नई में बम नहीं फूटता है कभी.."

"क्यों? चेन्नई में क्यों नहीं फूटता?" मैंने अगला सवाल किया..

"देखो मैं तमिलनाडु का ही रहने वाला हूं, मैं यहां के लोगों को अच्छे से जानता हूं.. यहां के अधिकतर लोग तमिल को धर्म से भी ऊपर रखते हैं.. उनके लिये पहले मैं तमिल हूं फिर जाकर हिंदू या मुसलमान.. तमिल होना उनका पहला धर्म है, तब जाकर कुछ और.." इतने दिनों से यहां रहते हुये मैं भी अब यह समझने लगा हूं.. मुझे उनकी बातों में सच्चाई लगी..

ट्रैफिक खुल चुकी थी और वो बाईक चलाने में व्यस्त हो चुके थे.. मैं भी सोचने लगा था.. "कल रात मैंने भी क्या किया? अपने सभी जान-पहचान के लोगों कि खबर ले ली और सुबह ऑफिस जाना है सोचकर चैन से सो गया, सोचा कि होगी कोई छोटी सी घटना और ऐसी घटना तो रोज ही घटती है.. एक भैया जो कोलावा में नेवी क्वाटर में रहते हैं, कुछ कालेज के दोस्त और ब्लौग जगत के मित्र.. सभी कुशल से हैं, और मैं भी निश्चिन्त.. क्या हम सभी के लिये ये आम घटना नहीं थी.. आज जिसे देखो उसका खून खौल रहा है इस पर.. 10 दिनों बाद न्यूज चैनलों के लिये ये कोई खबर भी नहीं रहेगी.. फिर आने वाले चुनाव में इसे खूब भुनाया जायेगा.. आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलने लगेगा.. जो आतंकवादी पकड़ा गया है उसका धर्म देखा जायेगा.. 10 साल बाद जब कोर्ट उसे मौत कि सजा सुनायेगी तब कुछ बेहद गिरे हुये नेता उसके बचाव में आ खड़े होंगे, उस पर भी राजनीति करेगें.. इस बीच कुछ और बम धमाके.. कुछ और आतंकवादी हमला.. बस हम और हमारे लोग ठीक हैं, हम इसी गुमान में जीते रहेंगे.."

Tuesday, November 25, 2008

क्रिकेट कि दिवानगी, बरसात और बैंगलोर/बैंगलूरू

रविवार का दिन, सुबह आसमान साफ था.. मैं बैंगलोर में बेलांदुर नामक जगह पर अपने कालेज के मित्रों के घर पर रुका हुआ था.. वहां से चंदन के घर जाना था.. चंदन भी साथ में ही था.. रात काफी देर से सोये थे, रात भर गप्पों और ताश का दौर चलता रहा था.. छोटे से रूम में ही क्रिकेट भी चला था.. शनिवार शाम जब मैं और चंदन वहां पहुंचे थे तब बत्ती गुल थी और फ्लड लाईट में ही क्रिकेट चल रहा था.. टेनिस कि गेंद और बल्ला, साथ में शू स्टैंड विकेट.. दो तरफ से इमरजेंसी लाईट जल रही थी.. अब सामने कंप्यूटर का मानिटर रखा हो या कुछ भी, उससे कोई फर्क नहीं परने वाला था.. बस दे दनादन क्रिकेट चालू..

सच कहूं तो बहुत दिनों से भूल सा गया था कि क्रिकेट में दिवानगी भी होती है.. बहुत दिनों बाद इसे महसूस किया.. जब तक क्रिकेट के मतवालों का झुंड ना मिले तब तक इसे महसूस नहीं किया जा सकता है.. पुराने दिन याद आ गये जब मैं पटना में रहता था और पढ़ाई के लिये घर से बाहर नहीं निकला था.. भारत का मैच आने पर चाहता था कि आज बरसात ना हो और अगर भारत हार रहा हो तो तुरत पलटी मार कर मनाने लगता था कि इतनी बरसात हो कि डकवर्थ लुईस रूल भी काम में ना आ सके..

बैंगलोर में भी मेरे दोस्तों के बीच स्थिती कुछ वैसी ही थी.. चंदन को 10 बजे कहीं जाना था सो सुबह 8.30 में बेलांदुर से निकला और उसके घर 9 बजे के लगभग पहूंच गया.. फिर चंदन निकल गया बोल कर कि 2 बजे तक आता हूं.. अब घर में बस मैं और विशाल थे जो कि मेरे कालेज का ही सहपाठी है.. वो हर आधे घंटे पर बाहर आसमान को झांक आता था और मना रहा था कि आज बरसात ना हो और मुझे गालियां दे रहा था कि शनिवार से पहले बरसात नहीं हो रही थी, तुम चेन्नई से बादल भी साथ लेते आये.. इसी बीच पार्थो भी घर पर आ गया जो कि मेरे ग्रैजुएशन और पोस्ट ग्रैजुएशन दोनो ही का मित्र है..

खैर मैच अपने नियत समय पर शुरू हुआ.. सहवाग और सचिन खेलना चालू किये, सचिन आऊट भी हो गया.. तभी हमारे घर के तरफ(जहां मैं ठहरा हुआ था) जोरदार बरसात शुरू हो गई.. और लगे सभी बरसात को कोसने कि अभी थोड़ी देर बाद स्टेडियम में भी बरसात होगी और जितने वेग से बरसात हो रही थी उसे देखकर लग रहा था कि मैच कहीं धुल ना जाये.. ठीक 10-15 मिनट बाद स्टेडियम में भी बरसात शुरू हो गई..

मैच शुरू होने के थोड़ी देर पहले चंदन के ऑफिस का एक मित्र भी घर पर आया था, खासतौर से मैच देखने.. अब सभी निराश.. लगभग 1 घंटे के बाद इधर बरसात रूकी और फिर सभी जुट गये कि मैच कब शुरू होता है? बीच-बीच में स्टेडियम में बैठे कुछ मित्रों से मैदान कि भी खबर ली जा रही थी.. उधर मैदान को सुखा कर मैच के लिये तैयार किया गया और इधर हमारे घर तरफ फिर से बरसात चालू हो गई.. हमलोग फिर से इंतजार करने लगे कि कब वहां फिर से बरसात शुरू होती है..

लोग इधर बरसात के थमने का इंतजार मैच के लिये कर रहे थे और मैं इंतजार कर रहा था कि बरसात रूके तो मैं चेन्नई के लिये बस पकड़ने के लिये निकलूं.. थोड़ी चिंता यह भी थी कि चेन्नई जाने के लिये बस स्टैंड बदल गया है और शांतिनगर नामक बस टर्मिनल से चेन्नई के लिये बस खुलने लगी है.. अब वो जगह भी ढूंढना था.. बरसात के रूकते ही मैं और चंदन चल परे.. एम.जी.रोड के सामने से गुजरते हुये स्टेडियम का फ्लड लाईट भी दिखा, पता नहीं क्यों जब कभी भी फ्लड लाईट का नाम सुनता हूं तो स्कड मिसाईल का नाम दिमाग में घूमने लगता है.. शायद दोनो का उच्चारण एक समान है इसलिये.. :)

कुछ दूर आगे जाने पर हम लोग अनजाने में वन वे में घुस गये और ट्रैफिक पुलिश ने हमें पकर भी लिया.. खैर वहां से निकले तो मुझे रास्ता जाना पहचाना सा लगा, फिर याद आया कि ये सड़क विल्सन गार्डेन कि ओर जाता है.. बी.एम.टी.सी. बस स्टैंड पहूंचने के बाद हम दोनों को समझ में आया कि यही शांतिनगर बस टर्मिनल है.. कुछ यादें जुड़ी है इस जगह से, इसे कैसे भूल जाता..

अब हमारा लक्ष्य था कि चेन्नई जाने वाली कोई सी भी बस में बैठ कर निकल लो.. जो पहली बस में टिकट मिला उसी में बैठकर मैं चल पड़ा और चंदन भी अपने घर चला गया.. रात भर ना जाने किन ख्यालों में डूबा रहा और नींद नहीं आयी.. सुबह घर ठीक 5.30 में पहूंच गया और टी.वी.खोलकर समाचार देखा तो पता चला मैच बरसात से धुला नहीं और भारत ने वो मैच डकवर्थ लुईस नियम से जीत लिया.. खैर क्या फर्क परता है, फिर से ऑफिस कि भागदौर में जिंदगी कटने वाली है सोचकर सोने कि कोशिश करने लगा.. सोमवार कि सुबह हो चुकी थी..

Saturday, November 22, 2008

यादों कि उम्र और बैंगलोर/बैंगलूरू

आज सुबह बैंगलोर पहूंचा.. बरसात कि रिमझिम बूंदों ने मेरा स्वागत बखूबी किया.. कल रात जब ऑफिस से चला तब चेन्नई में मूसलाधार बरसात हो रही थी.. बरसात इतनी तेज थी कि मैं सोच में पर गया था, जाऊं या ना जाऊं? मगर घर समय पर पहूंच गया और जल्दी से सामान बांध कर निकल परा बस स्टैंड कि ओर.. ऑफिस से जब निकल रहा था तब मेरे साथ काम करने वाले मित्रों ने पूछा कि टिकट लिये हो या नहीं? मैंने कहा नहीं.. इस पर उनका कहना था कि यही तो मजा है बैचलर लाईफ का.. कहीं भी अचानक और कैसे भी जा सकते हैं और साथ में आहें भी भर रहे थे कि वो अब यह सब नहीं कर सकते हैं.. :)

खैर आज का दिन तो निकल गया.. कहीं जाने कि इच्छा नहीं थी सो सारा दिन मित्रों के साथ ही बिताया.. अब कल क्या करता हूं पता नहीं.. वैसे अभी से कोई प्लान भी नहीं..

चलते-चलते कुछ लाईन भी लिखते जाता हूं.. मुझे नहीं पता कि मैं यह किसी कि पंक्तियों से प्रेरित होकर लिखा या यूं ही मन में आ गया हो.. खैर जब आ ही गया है तो आप इसे पढ़ कर मुझे बता भी दें कि क्या इस तरह कि कुछ पंक्तियां आपने पहले पढ़ी हैं क्या?

यादों के चेहरे पर झुर्रियां नहीं परती..
वो ताश के महलों सी नहीं होती जो छूते ही बिखर जाये..
कहते हैं कुछ यादों कि उम्र बहुत लम्बी होती है..


अंत में - ज्ञान जी, क्या आप बता सकते हैं कि यह पोस्ट कि कौन सी कैटोगरी में आती है? सुबुकतावादी या अंट-संटात्मक? :)

Tuesday, November 18, 2008

क्या आवाज में भी नमी होती है

कल शाम एक चिट्ठा बनाया, उसे चारों तरफ से सुरक्षित करके सुकून से बैठ गया.. उसे बनाने का मकसद बस अपने मन कि बातों को, जिसे मैं किसी से कह नहीं सकता.. किसी से बांट नहीं सकता.. बिलकुल एक निजी डायरी कि तरह.. कोई उसे पढ़ नहीं सके.. उसमें बस मैं रहूं और मेरी बातें रहे..

अभी मम्मी का फोन आया.. पूछी कहां हो? घर पहूंच गये क्या? मैं तुरत घर पहूंच कर, कपड़े बदल कर कंप्यूटर चालू करके नेट चलाया ही था.. मम्मी बतायी कि कैसे आजकल मेरी बिटिया(भगीनी) बातें करती है.. मम्मी का फोन आते ही दौड़कर फोन उठाती है और कहती है, "आपको अपनी बेटी से बात करनी है क्या?" और मम्मी के हां कहते ही जोर से चिल्लाती है, "मम्मी! तेरी मम्मी का फोन आया है.."

"तुम्हारे पाहुनजी आज भिवाड़ी ज्वाईन कर लिये हैं.." मम्मी यह खबर सुनायी.. साथ ही यह भी जोड़ दी कि भिवाड़ी में क्या-क्या है घूमने के लिये.. हमारे यहां जीजाजी को पाहुनजी कहने का रिवाज है और हम जीजाजी को पाहुनजी ही बुलाते हैं.. यह फैसला मैं और मेरे भैया, हम दोनों का लिया हुआ है..

बातों ही बातों में मैंने उन्हें अपने इस चिट्ठे के बारे में बताया.. कुछ तकनिकी बातें भी बतायी कि मैंने इसे कैसे सुरक्षित किया है.. मुझे पता है कि उन्हें कुछ समझ में नहीं आ रहा है फिर भी.. फीड को बंद किया, परमिशन हटाया और भी ना जाने क्या-क्या.. मैंने बताया कि मैंने इसे क्यों बनाया? इसे अपनी निजी डायरी कि तरह प्रयोग में लाना चाहता हूं.. मम्मी ने कुछ भी इंटेरेस्ट नहीं दिखाया उसे पढ़ने के लिये..

आगे मैंने कहा कि कोई कुछ भी और कितना भी निजी क्यों ना हो मगर पापा-मम्मी के सामने मेरे लिये कुछ भी निजी नहीं है.. क्या आप सुनना चाहेंगी कि मैंने क्या लिखा है? मम्मी को शायद पता था कि मैं क्या लिख सकता हूं.. उधर से कोई आवाज नहीं आयी.. मैंने सुनाना शुरू किया.. पहला पोस्ट पढ़कर खत्म हुआ.. मम्मी बोली कि अब इस सबसे बाहर निकलो.. भूल जाओ इन सबको.. तब तक मैंने दूसरा पोस्ट पढ़ना शुरू कर दिया..

उसके खत्म होते-होते मम्मी बोली अब नींद आ रही है.. सोने जा रही हूं.. मगर उनके आवाज से एक नमी सी झलक कर मेरे सामने गिर सी गई और मैं उसे बटोरने कि कोशिश करता रह गया..

देखा है कई बार आंखों कि नमी को..
पोछा है उसे इन हाथों से..
मगर मां के आवाज कि नमी का क्या करूं?
इसे तो बस दिल से महसूस किया जा सकता है..

Sunday, November 16, 2008

कथनी और करनी का अंतर

मैं आज अपनी इस पोस्ट में अपने कुछ अनुभव को बांटते हुये अपनी कुछ बातों को साफ करना चाहूंगा क्योंकि मुझे लगता है कुछ लोग मेरे पिछले पोस्ट को दूसरे तरीके से ले लिये थे.. सबसे पहले बात करते हैं राजेश जी के कल के पोस्ट पर.. उनका कल का पोस्ट बहुत ही अनुकरणीय था और मेरा मानना है कि हर किसी को एक बार उनका पोस्ट जरूर पढ़ना चाहिये.. उन्होंने लिखा था -

"बांग्‍लादेश के ग्रामीण बैक की स्‍थापना मोहम्‍मद युनूस ने 1983 में रखी थी…नोबेल प्राईज उन्‍हें 2006 में मिला था.. एक हम हैं पोस्‍ट लिखते हैं और पेज रिफ्रेश कर तत्‍काल देखते हैं कि क्‍या कोई कमेंट आया है क्‍या?"

साथ ही उन्होंने यह भी लिखा कि

"2008 का नवबंर महीना, मैं पोस्‍ट लिख रहा हूं, कई लोग लिख रहे होंगे…लेकिन कई लोग ऐसा भी कुछ कर रहे होंगे जिनके बारे में 2012 में कहीं लिखा कहा जाएगा कि यह 2008 में फलां फलां कर रहे थे…"

कुछ विचार उन्होंने गांधी जी के बारे में भी दिये जिससे मैं पूर्णतः सहमत हूं.. उन्होंने लिखा था -

"आप सभी लोग उस इंसान के बारे सोचिए जिनके आप कद्रदान हैं…उनके बारे में सोचिए जिनके काम करने के तरीके का आप नकल उतारने की कोशिश करते हैं…उनमें भी कमी होगी…
मैं गांधी को संपूर्ण के करीब मानता हूं…संपूर्ण नहीं मानता क्‍योंकि गलतियां उन्‍होंने भी की है…हर कोई करता है. मैं, आप..हम सभी लोग.."


अब मैं अपने कल के पोस्ट पर आये कुछ कमेंट्स कि बात करता हूं फिर अपनी बात कहूंगा.. कल के पोस्ट पर अजित जी ने कहा -
"सही है। राजेश के वक्तव्य में कुछ हडबड़ी, जल्दबाजी के निष्कर्ष हैं,मगर गलत नहीं। तुमने सही संदर्भ दिया। अच्छा लगा। अपने प्रति ईमानदारी ज़रूरी है। किन्हीं मूल्यों के प्रति समर्पण भी होना चाहिए।"

ताऊ जी ने कहा -
"जीवन में कुछ लोग फोकट यथार्थवाद ढूंढ़ते हैं ! प्रसंशा की एक सैनिक को भी आवश्यकता होती है ! भले फोकट ही हो बिना प्रसंशा के आदमी में कुछ करने का जज्बा ही नही आ सकता !"

कुछ लोगों ने राजेश जी को भी सही ठहराया.. और अंत में डा.अनुराग जी का भी कमेंट आया -
"प्रिय प्रशांत
आपकी इस सदाशयता के लिए आभारी हूँ पर शायद कही न कही @राजेश रोशन के मर्म को समझने की भूल हुई है ..वे शायद इस समाज की असवेदंशीलता से त्रस्त है .....हमारे ब्लॉग में टिपियाने के तरीके को लेकर असहमत है......शायद वक़्त की कमी या शब्दों का सही चुनाव न होना ...कुछ भ्रम पैदा कर गया है...
इन साठ सालो की आज़ादी के बाद भी इस देश का केवल एक तबका " हाईटेक " हुआ है ....ये देश का दुर्भाग्य ही है ..यही अब्दुल कलाम जिनको पुरा देश नवाजता है जब राष्टपति पड़ के लिए दुबारा नामांकित होते है .तो राजनैतिक गलियों के गठजोड़ में उनकी सारी योग्यता अचानक गायब हो जाती है..आख़िर में चलते चलते कभी एक चिन्तक ओर विचारक रामचंद्र ओझा जी का एक लेख मैंने कही पढ़ा था जिसमे उन्होंने कहा था
"हम संवेदना से परहेज नही कर सकते क्यूंकि संवेदना हमारा मूल है ,हमारे सारे मूल्य ओर यहाँ तक की "लोजिक "की जननी भी संवेदना ही है ...बुद्दि-विवेक के साथ उत्तरदायित्व होना भी मनुष्य के लिए जरूरी है.."


अब आता हूं मैं अपनी बात पर.. सबसे पहले तो मैं यह बता देना चाहता हूं कि मैं राजेश जी कि बातों से असहमत नहीं था तो साथ ही पूर्णतया सहमती भी नहीं थी.. जैसा कि डा.अनुराग जी ने कहा, "शायद वक़्त की कमी या शब्दों का सही चुनाव न होना ...कुछ भ्रम पैदा कर गया है.." से मैं सहमत हूं.. अपने इस छोटे से जीवन में मेरा खुद का ढेरों ऐसे अनुभव हैं जिसमें मैंने पाया है कि कहने को तो लोग बरी बरी बातें करते हैं मगर जब करने कि बात आती है तो वही लोग पहले सबसे पिछले कतार में दिखते हैं और धीरे-धीरे खिसक लेते हैं.. मगर इसका मतलब यह नहीं कि जो कर रहे हैं उनके किये को भी हम सारे लोगों के साथ डाल दें..

हर व्यक्ति अपने जीवन को दो हिस्सों में जीता है.. पहला सामाजिक और दूसरा पारिवारिक.. अगर कहीं भी यह संतुलन खराब होता है तो बस वहीं से परेशानी कि शुरूवात हो जाती है.. एक उदाहरण के तौर पर मैं गांधी जी को ही लेता हूं(राजेश जी कि तर्ज पर ही).. उन्होंने अपना सामाजिक जीवन खूब जिया और उसमें बहुत सफल भी रहे, मगर मेरा प्रश्न यह है कि क्या वह अपने परिवार के लिये भी उदाहरण देने में सफल रहे? मैं तो सफल नहीं मानता, अगर मैं गलत हूं तो कृपया मुझे सही करें..

मेरा हाल का एक अनुभव-
अभी कुछ दिन पहले बिहार कोशी से जूझ रहा था, उस समय कई ऐसे लोगों से मुलाकात हुई जो बिहार के लिये कुछ करना चाहते थे.. सच बात तो यह है कि इससे पहले मैं कभी भी इस तरह के सामाजिक कार्यों से जुड़ा नहीं था.. पहली बार जुड़ा और पाया कि कुछ लोग सच में कुछ करने को तैयार हैं और वो भी पर्दे के पीछे रहकर.. तो साथ ही कुछ लोग बस बरी-बरी बातें करके चंपत हो लिये.. कुछ काम मैंने भी किये(जिनकी चर्चा मैं नहीं करना चाहता हूं) जो मेरे लिये बिलकुल नया अनुभव था, तो काफी कुछ सीखा भी.. पर्दे के पीछे रह कर काम करने वालों से भी मिला, जो बस अपना काम करना जानते हैं.. अब भले ही उनके किये हुये कार्यों का प्रचार हो या ना हो.. खासतौर पर मैं एक व्यक्ति "चंदन जी" के बारे में बताना चाहूंगा जो सब छोड़ कर पिछले तीन महिने से अभी तक जमीनी स्तर पर राहत कार्य में लगे हुये हैं.. मेरे लिये यह संभव नहीं था कि मैं भी सब छोड़कर वहां चला जाऊं और कार्य करूं मगर चेन्नई में रहते हुये जो सबसे उत्तम प्रबंध मैं कर सकता था वह मैंने किया..

मैं अपने इस पोस्ट से यह संदेश देना चाहता हूं कि सबसे जरूरी है कि सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बना कर चलना.. नहीं तो अगर हम बस सामाजिक कार्यों पर ही ध्यान देंगे तो हम अपना कार्य तो उचित तरीके से करेंगे, मगर अपने परिवार के अपनी अगली पीढ़ी के लिये ज्यादा कुछ नहीं दे पायेंगे.. हमें सारा समाज तो पूजेगा मगर अपने परिवार वालों के साथ वैसी स्तिथि नहीं होगी.. और इसके ठीक विपरीत अगर हम बस पारिवारिक जीवन में ही उलझ कर रह जाते हैं और समाज को कुछ भी नहीं देते हैं तो इस अपराध को कई नस्ल याद रखेगी..