आज कल जिसे देखो वही सिस्टम को गालियां दे रहा है.. मैं भी हूं उसी जमात में.. नेताओं को गाली, सिस्टम को गाली, पाकिस्तान को गाली.. खैर ये सब बातें बाद में करता हूं पहले आपको एक कहानी सुनाता हूं.. ये कहानी मैनेजमेंट कालेजों में बहुत प्रसिद्ध है..
एक बार 10 बंदर जंगल से पकड़े गये.. दसों को एक ही पिंजरे में रखा गया जिसके बीच में एक खंभा था और खंभे के ऊपर ढ़ेर सारे केले लटके हुये थे.. बंदरों ने जैसे ही वो केला देखा सारे के सारे एक साथ लपके उसे खाने को.. जैसे ही एक बंदर ने खंभे पर चढने कि कोशिश की वैसे ही सारे बंदरों पर बर्फ जैसा ठंढा पानी डाल दिया गया.. बंदर हैरान परेशान.. मगर फिर से हिम्मत दिखा कर केले लेने को लपके.. जैसे ही बंदर खंभे पर चढ़ने कि कोशिश की फिर से ठंढा पानी आ गिरा उनके ऊपर.. अब तो ये जैसे नियम बन गया.. कोई बंदर खंभे पर चढ़ने कि कोशिश करता और पानी उस पर आ गिरता..
यह सिलसिला कई दिनों तक चला.. अब बंदर समझ गये थे कि उस खंभे पर चढ़ने पर ही ठंढा पानी उनके ऊपर गिरता है सो कोई उस खंभे के पास भी नहीं फटकता.. केले खाने का लालच सभी के भीतर था मगर फिर भी कोई खंभे के पास फटकता भी नहीं था..
फिर एक दिन एक नया बंदर लाया गया और एक पुराने बंदर को निकाल लिया गया.. नये बंदर को कुछ भी पता नहीं कि उस खंभे पर चढ़ने पर ऊपर से ठंढा पानी गिरता है सो वह केले खाने के लिये खंभे कि ओर लपका.. जैसे ही वो केले खाने के लिये खंभे के पास पहूंचा तभी सभी बंदर ये सोच कर कि कहीं इसके खंभे पर चढ़ते ही ठंढा पानी ना गिरे, सो उसे खंभे पर चढ़ने से पहले ही पीट दिया.. वो बेचारा बंदर हक्का-बक्का कि उसे क्यों पीटा गया? मगर हिम्मत जुटा कर वो फिर से खंभे कि ओर गया.. फिर से पिटाई हो गई.. उसकी समझ में इतना ही आया कि जो खंभे पर चढ़ने जाता है उसकी पिटाई कि जाती है..
अब हर दिन एक नया बंदर लाया जाता और एक पुराने बंदर को बाहर निकाला जाता.. नया बंदर केले खाने को खंभे के पास जाता और उसकी पिटाई होती.. धीरे-धीरे सभी पुराने बंदर बाहर आ गये और नये बंदर अंदर.. किसी को पता नहीं कि खंभे के पास जाने से ऊपर से ठंढा पानी गिरता है, वो तो बस इतना जानते थे कि जो खंभे के पास जाता है उसकी पिटाई की जाती है.. क्यों? किसी को पता नहीं.. बस की जाती है तो बस की जाती है और इस तरह एक सिस्टम का निर्माण हो चुका था.. बस महीने भर में..
हमारा सिस्टम भी कुछ इतना ही खोखला है.. सभी को पता है कि क्या सही है और क्या गलत, मगर कभी कोई यह नहीं पूछता है कि ये गलत क्यों हो रहा है? अगर कोई सही गलत की बात भी करे तो सबसे पहेले लोग उसी कि हंसी उड़ाते हैं और बाद में सभी सिस्टम को गालियां देते हैं कि साला सिस्टम ही खराब है.. ये भ्रष्टाचारी सरकारी मुलाजिम हों या फिर कूड़े सी मानसिकता रखने वाले नेता(इन्हें राजनेता कहते मुझे शर्म आती है), ये सभी सिस्टम हैं और हम बंदर..
अगर आशावादी होकर लिखूं तो कह सकता हूं कि आओ संकल्प करें कि हमेशा सही बात पर ही सिस्टम का साथ देंगे और धीरे-धीरे ही तो सिस्टम बदलता है..
और अगर निराशावादी होकर लिखूं तो यही कहूंगा कि कुछ नहीं बदलने वाला है, सिस्टम को बदलने कि बात ही खोखली है.. साला सिस्टम ही खराब है.. अब यह आप पर छोड़ता हूं कि आप आशावादी हैं या निराशावादी?
अंत में - जैसा कि मैं पहले भी लिखता आया हूं कि मेरे घर में सभी मेरे चिट्ठे को पढ़ते हैं, मुझे नहीं पता कि मेरी पिछले पोस्ट को पढ़कर उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी.. मगर इतना तो जानता हूं कि वो खुश नहीं होंगे.. खैर ये भी पता है कि अगले 3-4 दिनों तक वो इसे नहीं पढ़ने वाले हैं.. जो भी हो वो भी यह जानते हैं कि मैं अपनी हर सही-गलत बात उनसे साझा करता हूं, एक ये भी सही..
एक बार 10 बंदर जंगल से पकड़े गये.. दसों को एक ही पिंजरे में रखा गया जिसके बीच में एक खंभा था और खंभे के ऊपर ढ़ेर सारे केले लटके हुये थे.. बंदरों ने जैसे ही वो केला देखा सारे के सारे एक साथ लपके उसे खाने को.. जैसे ही एक बंदर ने खंभे पर चढने कि कोशिश की वैसे ही सारे बंदरों पर बर्फ जैसा ठंढा पानी डाल दिया गया.. बंदर हैरान परेशान.. मगर फिर से हिम्मत दिखा कर केले लेने को लपके.. जैसे ही बंदर खंभे पर चढ़ने कि कोशिश की फिर से ठंढा पानी आ गिरा उनके ऊपर.. अब तो ये जैसे नियम बन गया.. कोई बंदर खंभे पर चढ़ने कि कोशिश करता और पानी उस पर आ गिरता..
यह सिलसिला कई दिनों तक चला.. अब बंदर समझ गये थे कि उस खंभे पर चढ़ने पर ही ठंढा पानी उनके ऊपर गिरता है सो कोई उस खंभे के पास भी नहीं फटकता.. केले खाने का लालच सभी के भीतर था मगर फिर भी कोई खंभे के पास फटकता भी नहीं था..
फिर एक दिन एक नया बंदर लाया गया और एक पुराने बंदर को निकाल लिया गया.. नये बंदर को कुछ भी पता नहीं कि उस खंभे पर चढ़ने पर ऊपर से ठंढा पानी गिरता है सो वह केले खाने के लिये खंभे कि ओर लपका.. जैसे ही वो केले खाने के लिये खंभे के पास पहूंचा तभी सभी बंदर ये सोच कर कि कहीं इसके खंभे पर चढ़ते ही ठंढा पानी ना गिरे, सो उसे खंभे पर चढ़ने से पहले ही पीट दिया.. वो बेचारा बंदर हक्का-बक्का कि उसे क्यों पीटा गया? मगर हिम्मत जुटा कर वो फिर से खंभे कि ओर गया.. फिर से पिटाई हो गई.. उसकी समझ में इतना ही आया कि जो खंभे पर चढ़ने जाता है उसकी पिटाई कि जाती है..
अब हर दिन एक नया बंदर लाया जाता और एक पुराने बंदर को बाहर निकाला जाता.. नया बंदर केले खाने को खंभे के पास जाता और उसकी पिटाई होती.. धीरे-धीरे सभी पुराने बंदर बाहर आ गये और नये बंदर अंदर.. किसी को पता नहीं कि खंभे के पास जाने से ऊपर से ठंढा पानी गिरता है, वो तो बस इतना जानते थे कि जो खंभे के पास जाता है उसकी पिटाई की जाती है.. क्यों? किसी को पता नहीं.. बस की जाती है तो बस की जाती है और इस तरह एक सिस्टम का निर्माण हो चुका था.. बस महीने भर में..
हमारा सिस्टम भी कुछ इतना ही खोखला है.. सभी को पता है कि क्या सही है और क्या गलत, मगर कभी कोई यह नहीं पूछता है कि ये गलत क्यों हो रहा है? अगर कोई सही गलत की बात भी करे तो सबसे पहेले लोग उसी कि हंसी उड़ाते हैं और बाद में सभी सिस्टम को गालियां देते हैं कि साला सिस्टम ही खराब है.. ये भ्रष्टाचारी सरकारी मुलाजिम हों या फिर कूड़े सी मानसिकता रखने वाले नेता(इन्हें राजनेता कहते मुझे शर्म आती है), ये सभी सिस्टम हैं और हम बंदर..
अगर आशावादी होकर लिखूं तो कह सकता हूं कि आओ संकल्प करें कि हमेशा सही बात पर ही सिस्टम का साथ देंगे और धीरे-धीरे ही तो सिस्टम बदलता है..
और अगर निराशावादी होकर लिखूं तो यही कहूंगा कि कुछ नहीं बदलने वाला है, सिस्टम को बदलने कि बात ही खोखली है.. साला सिस्टम ही खराब है.. अब यह आप पर छोड़ता हूं कि आप आशावादी हैं या निराशावादी?
अंत में - जैसा कि मैं पहले भी लिखता आया हूं कि मेरे घर में सभी मेरे चिट्ठे को पढ़ते हैं, मुझे नहीं पता कि मेरी पिछले पोस्ट को पढ़कर उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी.. मगर इतना तो जानता हूं कि वो खुश नहीं होंगे.. खैर ये भी पता है कि अगले 3-4 दिनों तक वो इसे नहीं पढ़ने वाले हैं.. जो भी हो वो भी यह जानते हैं कि मैं अपनी हर सही-गलत बात उनसे साझा करता हूं, एक ये भी सही..







