Thursday, July 03, 2008

एक डायनामिक पर्सनैलिटी, Mr.G.Vishvanath(Part - 2)



विश्वनाथ सर ने मेरे आग्रह करने पर अपनी कुछ तस्वीर मुझे ई-मेल की जिसे मैं धीरे-धीरे आपलोगों से बाटूंगा.. इस फोटो में सर जिस कपड़ों में दिख रहे हैं उसी में मुझसे मिलने आये थे.. बिलकुल वैसे ही जैसा मैंने उन्हें देखा था.. एकदम सिंपल.. अपनी रेवा कार के साथ.. :)


बैंगलोर में जब हम मिले तब विश्वनाथ सर ने बहुत ही गर्मजोशी के साथ मेरा स्वागत किया और अपने कार में बैठा कर ले चले अपने आफिस कि ओर.. विश्वनाथ सर पिछले कुछ दिनों से एक ऐसी मशीन खरीदना चाह रहे थे जो उनकी छोटी मोटी जरूरतों को पूरा कर सके जैसे नेट सर्फ करना, प्रजेंटेशन और वर्कशीट तैयार करने जैसा काम कर सके.. इसके लिये वो एक छोटा सा लैपटॉप भी पसंद कर चुके थे जो लाईनक्स ऑपेरेटिंग सिस्टम से चलता है.. जब हमने फोरम में मिलना तय किया तब इन्होंने सोचा कि उधर जा ही रहे हैं तो ये भी लेता चलूं.. जब हम इनके आफिस पहूंचे तब हमारे साथ एक बहुत ही प्यारा और हैंडी लैपी भी था.. एक ऐसी मशीन जो इनकी जरूरतों को पूरा कर सके.. मुझे उसमें बस एक कमी नजर आ रही थी जो आज के जमाने में कोई मायने नहीं रखती है, उसका स्पेस बस 4 जी.बी. था.. मेरे अपने लैपी में बस 40 जी.बी. का स्पेस है मगर मेरे पास लगभग 550 जी.बी. का एक्सटर्नल हार्ड डिस्क है जो मेरी सभी जरूरतों को पूरा कर देता है.. सो अगर कोई मुझसे पूछे तो वो कमी कोई कमी नहीं थी.. ASUS की वो मशीन बहुत ही प्यारी सी थी.. जिसे विश्वनाथ सर अपनी पत्नी को गिफ्ट करना चाह रहे थे जब वो यू.एस.ए. से वापस आती..

इनके आफिस पहूंचने तक हमने कई तरह की बातें की.. घर की, समाज की आफिस की, नौकरी कि.. मगर हमने ब्लौग जगत की कोई बात नहीं की.. :)

आफिस पहूंच कर उन्होंने पूरे उत्साह के साथ अपने आफिस का कोना-कोना दिखाया.. उनका उत्साह देख कर मुझे आश्चर्य हो रहा था कि इतनी उर्जा उनके भीतर कैसे है? इतना तो शायद मेरे भीतर भी नहीं है.. सच कहूं तो बरबस ही अपने पापा की याद आ गई थी, उनके भीतर भी इस समय तक उर्जा की कमी नहीं है और वो दोनो हम उम्र ही होंगे..

जब हम उनके आफिस की ओर बढ़ रहे थे तब यूं ही उन्होंने कहा कि उनके आफिस में सबसे अधिक उम्र का लड़का भी बस 29 साल का ही है और आफिस में एक दूरी बने रहने के कारण उनलोगों से बस ऑफिसियल बातें ही होती है.. शायद मैं भी उनके आफिस में होता तो मैं भी इतने आराम से बैठ कर उनसे बातें नहीं करता होता.. शायद सही कहा था उन्होंने.. मगर मैं तो फिलहाल उस समय किसी और बात से बेफिक्र होकर उनकी बातों का लुत्फ उठा रहा था.. :)


(क्रमशः...)

मैं बैंगलोर से लौट कर बीमार हो गया था..दो दिन ऑफिस नहीं गया.. और जब गया तो लगता है वहीं का होकर रहना पर जायेगा.. ढ़ेर सारा काम जो रखा हुआ है मेरे लिये.. इसलिये मुझे आज-कल समय ज्यादा नहीं मिल पा रहा है.. धीरे-धीरे मैं सारा पोस्ट करूंगा..

Tuesday, July 01, 2008

एक डायनामिक पर्सनैलिटी, Mr.G.Vishvanath(Part - 1)

शनिवार की शाम मैंने विश्वनाथ सर को फोन लगाया.. उधर से उनकी आवाज आई, "हेलो!".. आवाज से मुझे लगा कि ये आवाज किसी 25-30 से ज्यादा उम्र वाले व्यक्ति कि नहीं हो सकती है सो मुझे लगा कि हो ना हो मैंने रौंग नम्बर लगा दिया है.. मैंने इस बात कि पुष्टी के लिये कि मैंने सही व्यक्ति को ही फोन लगाया है पूछा, "Is this Mr. G.Vishvanath?" उधर से आवाज आयी, "Yes!" फिर मैंने अपना परिचय दिया.. पहले प्रशान्त नाम से वो नहीं पहचान पाये मगर जब मैंने ब्लौग का नाम लिया तो उन्होंने कहा "पी.डी.?" तब मुझे याद आया कि मैं ब्लौग जगत में पी.डी. के नाम से ही जाना जाता हूं :).. फिर हमने अगले दिन मिलने का समय और जगह तय कर लिया.. 11 बजे दिन में फोरम के पास.. पहचान उनकी रेवा कार..

हमने(मैं, चंदन और शिवेन्द्र) शनिवार को अपने एक मित्र से उसकी स्कूटी ले ली थी जो Oracle में काम करती है.. रविवार को शिवेन्द्र और चंदन को शिरीष से मिलने जाना था और मुझे विश्वनाथ सर से.. सो हमने तय किया कि हम तीनों साथ निकलेंगे.. वो दोनों चंदन कि बाईक से उधर कि ओर निकल गये और मैं फोरम के लिये निकल लिया.. H.S.R.Layout वाले सिग्नल के पास जाकर ना जाने क्या हुआ मगर उसकी स्कूटी पूरा एक्सलेरेटर नहीं ले पा रही थी.. और इसी कारण मुझे वहां पहूंचने में थोड़ी देर हो गई..

फोरम के पास पहूंचने पर मैंने पाया कि वो मेरा इंतजार कर रहे हैं.. उनकी रेवा कार के कारण मुझे उन्हें पहचानने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई.. वैसे शायद वो ऐसे भी मिलते तो भी उन्हें पहचानने में मुझे ज्याद दिक्कत नहीं होती क्योंकि मैंने उनकी तस्वीर कई बार देख रखी थी.. जैसे ही मैं उनके पास पहूंचा उन्होंने बहुत ही गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया और कार में बैठने के लिये कहा..

सबसे पहले उनकी रेवा कार के बारे में --
मुझे इससे पहले कई कारों में बैठने का मौका मिला है.. कुछ पिताजी की बदौलत कुछ दोस्तों के कारण तो कुछ अपनी बदौलत मैंने मारूती 800 से लेकर बी.एम.डबल्यू. तक में बैठ चुका हूं.. मगर रेवा कार में बैठने का एक अलग ही उत्साह था मन में.. छोटी सी और बहुत प्यारी सी.. जिसे कोई भी देखे तो एक नजर में ही प्यार हो जाये.. विश्वनाथ सर ने मुझे उसकी एक-एक फंक्सनैलिटी बहुत बारीकी से बताये.. कैसे चलता है, मीटर में कितने तक बैटरी की सुई रहने पर कितनी दूरी तक चल सकती है, कितने समय में ये पूरा चार्ज होता है, कितनी आसानी से इसे ड्राईव किया जा सकता है वगैरह-वगैरह.. अगर कोई मुझसे पूछे तो मेरा कहना होगा कि किसी शहर में चलाने के लिये एक सम्पूर्ण कार और इको फ्रेंडली भी..


(बाकी अगली किस्त में...)
मैं बैंगलोर जाते समय अपना कैमरा ले जाना भूल गया और मेरे मोबाईल से अच्छी तस्वीर नहीं आती है सो मैंने कोई तस्वीर नहीं ली.. इसलिये मेरे पास कोई तस्वीर नहीं है.. :(

Monday, June 30, 2008

जिंदगी की छेड़-छाड़

सब पीछे छोड़ कर मैं २ साल आगे निकल चूका था..
जिंदगी कल फिर से मुझे घसीट कर वहीँ पहुंचा गई..
ऐसा लग रहा है जैसे फिर से उसी मुकाम पर खडा हूँ जहां से शुरू किया था..
ये जिंदगी भी अजीब होती है..
चिढा कर कहीं झुरमुठों में छुप सी जाती है..

आज सुबह मैं बैगलोर से वापस लौटा और वहां G Vishwanath जी से भी मिला(और उनकी रेवा कार में घूमने का मौका भी मिला :)).. एक बिलकुल नया सा और अच्छा अनुभव मिला.. शायद अगले २-३ पोस्ट उनके नाम हो जाए.. आज मन कुछ नहीं लग रहा है, सो कल मैं उनके बारे में और उनकी रेवा कार के किस्से सुनाता हूँ..

Thursday, June 26, 2008

अनाम मित्र के नाम पत्र

मेरे अनाम मित्र..

मैं ना तो कुछ साबित करना चाहता हूं और ना ही खुद को हीरो दिखाने कि कोई मंशा है.. मैं तो बस अपनी खुशी के लिये लिखता हूं और अगर कोई मेरी खुशी में खुश होना चाहता है तो उन्हें भी अपने साथ ले लेता हूं..

जहां तक आपने लिखा है कि आपने कोई ऐसी बात नहीं लिखी जिससे आप हीरो दिख सकें और दूसरी तरफ आपने उसका उत्तर भी दे दिया कि कोई और आपको हीरो कहे तो बात बने.. अब मेरे कुछ कहने की जरूरत ही नहीं है कि मैं वैसी कोई घटना क्यों नहीं लिखता हूं.. अपने जीवन में मैंने कुछ अच्छे काम भी किये हैं मगर उसे मैं अपने किसी करीबी मित्र से भी नहीं बांटता हूं फिर भला ब्लौग पर कैसे लिख दूं?

और हां मैं खुद को हीरो मानता ही नहीं हूं.. क्योंकि मुझे पता है कि मैंने अपने जीवन में कितने सही और कितने गलत काम किये हैं.. कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में शत-प्रतिशत कभी सही नहीं होता है.. मेरे करीबी जानते हैं कि मेरा जीवन एक खुली किताब जैसी है, जो मैंने अभी तक जिया है(सही या गलत) वो सभी के सामने है.. कुछ भी छुपा हुआ नहीं..

और रही बात कुपित होने कि तो मैं इतनी छूट तो अपने पाठकों को दे ही रखा है कि वो अनाम तत्व बन कर भी कमेंट कर सकें, मैंने तो मॉडेरेटर भी नहीं लगा रखा है.. सो मुझे इसके लिये तैयार रहना ही चाहिये कि कोई मेरी बुराई कर सके.. आज सुबह तो खुद मेरे पिताजी मेरे ब्लौग को लेकर बोल रहे थे कि आज-कल अच्छा नहीं लिख रहे हो.. हां, अगर किसी अनाम मित्र से अपशब्द मिले तो फिर ऐसा कुछ सोच सकता हूं, जो कम से कम अभी तक तो नहीं हुआ है.. वैसे अगर आप अपने नाम से भी कमेंट करते तो भी मैं आपको लेकर कोई पूर्वाग्रह नहीं बनाता..

जब मैंने हिंदी में ब्लौगिंग शुरू कि थी तब मैं यहां किसी को नहीं जानता था, लगभग एक साल बाद(सितम्बर 2007) मैंने पाया कि ढेर सारे लोग मेरे चिट्ठे पर अचानक से आने लग गये हैं, तब जाकर मैंने पाया कि नारद, ब्लौगवाणी और चिट्ठाजगत जैसे एग्रीगेटर ने मेरा रजिस्ट्रेसन खुद ही कर दिया है.. उसके बाद मैं हिंदी ब्लौग जगत से जुड़ा.. उससे पहले मैं अपनी खुशी के लिये लिखता था.. मैं जैसा पहले लिखता था वैसा ही आज भी लिखता हूं.. मतलब अपनी और अपनों खुशी के लिये..

30-40 लोगों कि बात अगर आप कर रहें हैं तो जब वे नहीं आते थे तब भी मैं लिखता था.. जब वे आने लगे तब भी मैं लिखता था.. जब 300-400 आने लगेंगे तब भी मैं वही कुछ लिखूंगा जो अभी लिखता हूं.. मेरे चिट्ठे का ही नाम है मेरी छोटी सी दुनिया.. मेरी दुनिया में जो कुछ भी घटता है बस उसी के लिये इस चिट्ठे पर जगह है.. दूसरी चीजों के लिये मेरे पास दूसरे चिट्ठे हैं..
धन्यवाद.


आज सुबह मुझे एक अमान मित्र का कमेंट मिला जिसका उत्तर लिखने बैठा तो पाया कि ये मेरे किसी एक पोस्ट से भी लंबा हो गया है तो मैंने इस पर एक पोस्ट ही बना डाली.. उनका कमेंट कुछ ऐसा था :

आप जो भी हो भाई मैं काफी दिनों से आपको नोटिस कर रहा हुं.
मेरा मतलब है मैं आपके ब्लौग पढ़ रहा हुं.
मैंने जो नोटिस किया है वो ये है कि आप वास्तविक जीवन में नहीं जी रहे हैं. वास्तविकता से आप काफी दूर हैं.
पता नहीं क्या साबित करना चाहते हैं आप अपनी बातों से.
भई साहब इस् तरह लिखने से हो सकता है आप 50-100 लोगों के बीच फेमस हो जायें.और हो सकता है आपकी मंशा भी यही हो. लेकिन जैसा आपने अपने सेल्फ़ इंट्रोडक्शन में लिखा है वैसा करें तो बात बने. षायद आप करते भी हों. हमे नहीं मालूम. बट आपने अभी तक ऐसा कुछ अपने ब्लौग पर नहीं शेयर किया. भाई साहब अपने आपको तो हीरो सभि मानते हैं. कोई अपने को बुरा नहीं मानता. मजा तो तब है जब दूसरे इस बात को माने. सॉरी अगर हमारी वजह से आप हर्ट हुए हों. लेकिन क्या करें हम अपना विचार व्यक्त करने से अपने आपको रोक नहीं पाये.


ये रोमण में हिंदी लिखा हुआ था जिसे मैंने देवनागरी में बदल कर लिख दिया..

अनाम मित्र को एक और वजह से धन्यवाद क्योंकि उनके कारण मैंने आज एक पोस्ट लिखा नहीं तो आज लिखने के मूड में नहीं था.. :)

Wednesday, June 25, 2008

अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..


जो आप नहीं कर पाई,
वो दुनिया ने कर दिखाया..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कुछ अच्छा लगता है तो
मुस्कुरा देता हूँ..
कुछ बुरा लगता है तो
मुस्कुरा देता हूँ..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

वो अछूत सी लगने वाली सब्जी,
भी अब खा लेता हूँ..
रात में अब चावल से भी
परहेज नहीं है..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कोई अब पूछता नहीं,
की कहाँ जा रहे हो..
कोई अब पूछता नहीं
की किससे मिल के आ रहे हो..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कोई अब पूछता नहीं
की खाना खाए या नहीं..
कोई अब पूछता नहीं
की खाए तो क्या खाए..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कोई दोस्त अब कहीं
बुलाते नहीं..
उनके साथ ना जाने पर
पहले जैसे कुछ सुनाते नहीं..
हर पल ये अहसास दिलाते हैं..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

कुछ मिलने पर ना अब वो
पहले सा उत्साह आता है..
ना कुछ खोने पर आँखें
नम होती है..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

जिसकी चाहत बचपन से थी,
बड़ा होने की..
अब वो नहीं चाहता हूँ..
पर क्या करूं माँ..
अब मैं बड़ा हो गया हूँ माँ..

ये कविता मैंने बहुत पहले लिखी थी.. मदर्स डे पर.. मुझे याद है, मम्मी बहुत भावुक हो गई थी इसे पढ़कर..

Tuesday, June 24, 2008

एक लड़की जो छोटे शहर से निकलकर, बड़े शहर में कहीं खो सी गई..


अकसर लोग
प्यार कर बैठते हैं
किसी ऐसी लड़की से
जो छोटे से शहर
से निकल कर,
बड़े शहर की
चका-चौंध में
कहीं खो सी जाती है..
मैं भी उन चंद लोगों में से हूं..
जमाने के साथ
चलने का शौक था उसे,
मगर ना जाने किससे डरती थी..
मेरा साथ पाकर
वो डर जाता रहा
और जमाने के साथ
कदम ताल करते हुये
ना जाने किधर निकल गई..

नजरें आज भी खोजती है,
हर रिक्से पर..
शायद वो दिख जाये कहीं..
सिमटी हुई,
सकुचाती हुई,
छुई-मुई सी,
सिकुड़कर बैठी हुई..
इस डर से
कहीं कोई देख ना ले
कि वो किसी से मिलने आ रही है..
शायद मुझसे?
भ्रम भी अजीब होते हैं..
है ना?

Sunday, June 22, 2008

एक लड़की


एक लड़की,
ख्वाबों में जीने वाली लड़की,
ख्वाबों में ही मेरे पास आती,
ख्वाबों में ही मुझे गले लगाती,
ख्वाबों में ही कभी यूं ही,
मेरी राहों से होकर गुजर जाती,
ख्वाबों में अक्सर मैं उसका होता,
मुझे पाकर कभी वो चूम लेती,
कभी गले लगा लेती,
मुझे पाकर वो खुश होती,
हंसती खिल-खिलाकर,
अक्सर मैं कहता,
एक हंसी उधार दे दो,
मैं हंसता कम हूं,
वो कहती,
मैं आपकी ही हूं,
जो चाहे ले लो,
हकीकत का आभास भी था उसे,
मगर वो ख्वाबों में जीती थी..

एक लड़की,
ख्वाबों में जीने वाली लड़की,

Friday, June 20, 2008

और गधे को पहलवान बना ही डाला(अंतिम भाग)

कैंपस सेलेक्सन के दिनों में जिनका कैंपस हो जाता था वे लोग भी किसी को पार्टी नहीं देते थे.. बस इस इंतजार में कि जब मेरे सारे मित्रों का हो जाये तभी मैं पार्टी दूंगा.. सच कहूं तो पूरी कक्षा में एकता ऐसी हो गई थी जो मिशाल देने लायक थी.. मेरे साथ ये अक्सर होता आया है कि जिसकी मुझे चाह होती है वो मुझे नहीं मिलता है और जिसकी चाह नहीं होती है वो बैठे-बिठाये झोली में आ धमकता है.. मेरे साथ कैंपस के दिनों में भी यही हुआ..

21 जुलाई सन् 2006 का दिन था.. ठीक 1 महिना पहले मैं 21 जून को अपने पहले कंपनी में बैठा था(IBM).. 21 जुलाई को CSS कैंपस के लिये हमारे कालेज में आयी हुई थी.. हमारे बीच इस कंपनी कि छवि बहुत अच्छी नहीं थी और ना ही हमारे सिनीयर के बीच.. इस कारण से मुझे इस कंपनी में नौकरी करने की इच्छा भी नहीं थी.. मगर उस समय मेरे पास कोई भी नौकरी नहीं होने के कारण मेरे पास कोई और चारा भी नहीं था.. मेरे साथ मेरे कालेज के लगभग 450 विद्यार्थी भी इसके रिटेन परीक्षा में बैठे और उसमें से 18 विद्यार्थी को सेलेक्ट किया गया.. जब मैं रिटेन दे रहा था तब मन में सोच रहा था कि मेरा रिटेन में ना हो तो बढिया हो.. मगर जैसे-जैसे प्रश्न पढ़ता गया वैसे-वैसे उत्तर भी सूझता गया.. अब सही के बदले गलत उत्तर लिखना ना तो मेरी प्रकॄति है और ना ही मैं वैसा करने की स्तिथि में था क्योंकि मेरे पास कोई नौकरी नहीं थी.. हां मगर एक बात तो थी कि इसमें चोरी नहीं हुई थी और अगर हुई भी होगी तो मुझे पता नहीं चला.. Online परीक्षा हुई थी, सो चोरी के चांस बहुत काम हो गए थे..

जब रिजल्ट आने वाला था तब मैं अपने प्लेसमेंट भवन के नीचे अपने दोस्तों के साथ बैठा हुआ था.. शुरू में बस 5 लोगों का नाम भेजा गया कि इनका सेलेक्सन साक्षात्कार के लिये हो गया है.. मेरी मित्र श्रुति ने ना जाने कहा से मेरा नाम भी उसमें देख लिया और मुझे बधाई देने चली आई.. जब मैंने कहा कि मेरा नहीं हुआ है और वापस होस्टल जाने लगा तो उसने पूरे आत्मविश्वास से कहा कि कुछ देर रूक जाओ शायद कुछ और नाम आये और उसमें तुम्हारा भी हो.. थोरी देर मैं और रूक गया और अगली लिस्ट में मेरा भी नाम था.. तब उसने कहा कि होने पर पहली मिठाई मुझे ही मिलनी चाहिये..

मेरा अपना अनुभव है कि जब साक्षात्कार शुरू होता है तब जो कोई भी साक्षात्कार में पहले जाता है उसका सेलेक्सन होने की संभावना ज्यादा होती है क्योंकि उस समय साक्षात्कार लेने वाले बिलकुल फ़्रेश होते हैं और उनकी सोच सकारात्मक.. जैसे-जैसे समय बढता जाता है वैसे ही वो सुस्त होते जाते हैं और उनकी सोच भी धीरे-धीरे नकारात्मक होती जाती है..

मैं फिर से बाहर कक्ष में बैठा पेप्सी के प्रचार वाले लड़के की तरह सोच रहा था कि मेरा नंबर कब आयेगा.. जो आया बहुत बाद में.. मेरे मन में ये बैठ चुका था कि आज भी मेरा सेलेक्सन नहीं होगा और कहीं ना कहीं से मैं खुश भी था कि चलो ये अफसोस तो नहीं होगा कि मैंने जान-बूझ कर ये कंपनी छोड़ी और सच्चाई ये थी कि इस कंपनी में मैं जाना भी नहीं चाहता था..

साक्षात्कार लेने वाले Resume पर ज्यादा ध्यान दे रहे थे और जो भी उसमें लिखा था उसी से संबंधित प्रश्न पूछ रहे थे उससे ज्यादा कुछ भी नहीं.. मुझसे सबसे पहले उन्होंने लगभग 15-20 मिनट यूनिक्स पर प्रश्न पूछे और मैंने सारे का सही उत्तर दिया.. एक प्रश्न में अटका मगर उसका उत्तर भी दिया ये कहकर कि मैं इस उत्तर को लेकर संतुष्ट नहीं हूं मगर शायद यही होना चाहिये.. बाद में पता चला कि मैंने सही उत्तर दिया था.. फिर डाटा-स्ट्रक्चर से संबंधित प्रश्न पूछे गये जो लगभग आधे घंटे चला.. उसमें सारे का मैंने सही उत्तर दिया..

एक मजेदार घटना घटी डाटा-स्ट्रक्चर वाले राउंड में.. उन्होंने मुझसे मर्ज सार्ट बताने के लिये कहा.. मैंने बताया.. फिर उन्होंने मुझसे कहा कि इसका 'C' भाषा में प्रोग्राम लिख सकते हो क्या? मैंने कहा कि हां लिख सकता हूं.. फिर पूछा गया कि इसका अल्गोरीथ्म याद है तुम्हें? मैंने कहा कि नहीं याद है मगर मुझे इसका लाजिकल कांसेप्ट पता है सो मैं लिख दूंगा.. उन्होंने लिखने के लिये कहा.. मैंने लिखना शुरू किया.. मेरे हर एक लाईन लिखने के बाद वो मुझसे किसी दूसरे विषय पर प्रश्न पूछते फिर सॉरी कह कर आगे लिखने को कहते.. लगभग 5 मिनट के बाद उन्होंने मुझसे कहा कि कितना समय लोगे? मैंने कहा कि कम से कम 20 मिनट.. उन्होंने कहा कि कंपनी में शायद इतना समय तुम्हे ना मिले.. अब चूंकि मेरे मन में कोई डर था नहीं, कि सेलेक्सन हो चाहे ना हो कोई बात नहीं, सो मैंने वैसे ही उत्तर दे दिया कि कंपनी में मेरे पास अल्गोरीथ्म होगा और नहीं भी होगा तो कम से कम उस समय अल्गोरीथ्म रटने कि मुझे कभी जरूरत नहीं होगी, मैं उसे नेट पर सर्च करूँगा और वहाँ से अल्गोरिथम ले लूँगा.. मैं तो ये सोचकर उत्तर दिया था कि शायद मेरे जवाब से वे चिढ जायेंगे मगर हुआ ठीक इसके उल्टा, वो प्रभावित हो गये.. आखिर वो एक और गधे का दिन था.. :)

एक मजेदार घटना 'C' वाले राऊंड में भी घटी.. उन्होंने प्रश्न पूछ कि बिना किसी तीसरे वैरियेबल को प्रयोग में लाये 2 वैरियेबल के वैल्यू(Value) को स्वैप(Swap) कैसे करते हैं.. अब उन्हें ये नहीं पता था कि मैंने अपने जीवन का सबसे पहला 'C' प्रोग्राम यही बनाया था सो ये प्रोग्राम तो मैं आंख मूंदकर भी लिख दूंगा.. मगर उस समय मैंने नाटक करते हुये ये दिखाया कि इसका लॉजिक मैं यहीं सोच रहा हूं.. और 3-4 बार काटने के बाद मैंने सही बना कर दिखा दिया.. कुल मिला कर मुझसे यूनिक्स, 'C', 'C++', डाटा-स्ट्रक्चर, डाटाबेस, 'VC++' और ऑपरेटिंग सिस्टम से प्रश्न पूछे गये थे..


दो राऊंड में लगभग 2-3 घंटे इंटरव्यू चला और उन्होंने मुझे सेलेक्ट कर लिया.. मैंने जो उस दिन ना जाने कितनी ही गलतियाँ की (कुछ जान बूझकर और कुछ अंजाने में) वो सभी मेरे लिये अच्छा ही साबित हुआ.. क्योंकि वो दिन मेरा था.. कुछ इसी तरह के सोच ने मुझे इसका शीर्षक जब "अल्लाह मेहरबान तो गधा पहवान" रखने के लिये प्रेरित किया.. उस दिन ये गधा भी पहलवान बन ही गया.. मेरा एक और करीबी मित्र उस दिन सेलेक्ट हुआ, शिवेन्द्र(इसके बारे में फिर कभी)..


कालेज के बाहर एक पोस्टर के साथ मस्ती करते हुये..

2006 में मेरे जन्मदिन के पार्टी की तस्वीर, ये दोनों ही चित्र मेरे कैंपस होने के महीने भर के भीतर की ही है.. :)

Thursday, June 19, 2008

I Got My First Promotion

पिछले एक सप्ताह से लगभग रोज ही मैं और मेरे कालेज कि मित्र मनस कभी एच.आर. तो कभी अपने पी.एल. से बोल रहे थे कि हमारे अप्रैजल का समय आ गया है तो हमें अभी तक अप्रैजल क्यों नहीं मिला है? एच.आर. वालों से तो मैंने लगभग झगड़ा तक कर लिया था कि जब आपको कोई काम समय पर चाहिये होता है तो हम खाना-सोना छोड़ कर बस काम करते रहते हैं, तो ये काम आप लोगों का है कि हमें समय पर अप्रैजल मिले.. हमें जो भी काम मिलता है उससे आपको भी कोई मतलब नहीं होता है कि वो काम हम कैसे खत्म करें ठीक उसी तरह मुझे भी कोई फर्क नहीं परता है कि आप इसे कैसे खत्म करते हैं.. हमें भी अपनी चीज समय पर चाहिये..

खैर हमारी मेहनत रंग लायी और आज (पूरे 1 सप्ताह देरी से ही सही) अप्रैजल मिल गया.. अपने जीवन का पहला प्रोमोशन.. मुझे जब उससे संबंधी कागजात दिये जा रहे थे तब मुझसे पूछा गया उसके बारे में.. मेरा जवाब था की मैं खुश हूं क्योंकि ये मेरा पहला प्रोमोशन है, मगर मैं संतुष्ट नहीं हूं क्योंकि सैलेरी हाईक मेरी उम्मीदों पर खड़ा नहीं उतरा है.. खैर जो भी हो.. फिलहाल तो प्रोमोशन मिल गया.. :)

मैं आजकल बहुत व्यस्त हूं इसलिये "जब अल्लाह मेहबान तो गधा पहलवान" कि अंतिम कड़ी नहीं लिख पा रहा हूं.. अगली पोस्ट में ही उसे पूरा कर दूंगा.. मगर मुझे पता नहीं कब..

Sunday, June 15, 2008

जब अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान(भाग 4)

मेरे कालेज के मित्र, जो मेरे चिट्ठे को बराबर पढ़ते रहते हैं उन्होने मुझे कहा की आज-कल तम्हारा पोस्ट पुराने दिनों की याद जेहन में ताजा कर दे रहा है.. अच्छा लगा पढ़कर-सुनकर.. अब आगे बढ़ते हैं..

(क्रमशः से आगे...)
मेरे बगल में मेरे कुछ मित्र बैठे हुए थे.. अगर मिनट के हिसाब से गिनती करें तो जितने मिनट की परीक्षा थी उससे ज्यादा सवाल थे(जैसा की हर कंपटीटीव परीक्षा में होता है).. सवाल कुल 125 थे और समय डेढ़ घंटे, यानी 90 मिनट.. मगर मेरी रफ़्तार उससे ज्यादा थी और समय पूरा होने से लगभग ५-७ मिनट पहले ही मैंने उसे पूरा बना डाला.. अब मैंने अपने बगल में बैठे हुए मित्र के तरह मुडा.. मैंने पाया की उसके अधिकांश उत्तर मेरे उत्तर से पूरी तरह भिन्न थे मगर मुझे भरोसा था की मेरे उत्तर सही थे.. मैंने उसे कहा की मेरे सारे उत्तर कापी कर लो और जहाँ तक संभव हो सका उसने कर लिया और फिर उसने अपने बगल में बैठे हुए हमारे एक और मित्र को भी यही करने को कहा.. बाहर निकल कर अब पूरी तरह से मेरी जिम्मेदारी बन गयी थी, की अगर उनका नहीं निकला तो मुझे ही कहा जाएगा की तूने सारा गलत दिखाया था.. मगर ऐसा नहीं हुआ.. कट-आफ बहुत ऊपर गया था मगर फिर भी हम तीनो का रिटेन में सेलेक्सन हो गया था..

वहाँ इंटरव्यू से पहले एक ग्रुप डिस्कसन था.. मैं जिस ग्रुप में था उसका टापिक था "कैपिटल पनिशमेंट".. जब जी.डी. शुरू हुआ तब मुझे ऐसा लगा की अधिकतर लड़के समझ भी नहीं पा रहे थे इस टापिक का सही मतलब.. मैंने ही शुरूवात की.. और जिंदगी की पहली जी.डी. में असफल भी रहा.. हुआ कुछ ऐसा, की जैसे ही मैंने बोलना शुरू किया वैसे ही सभी लोग मेरी तरफ देखने लग गए.. थोडी देर बाद मैं कुछ असहज महसूस करने लगा और फिर घबराहट इतनी अधिक बढ़ गई की मैं कुछ बोल ही नहीं सका.. खैर, इसमे मैं शत-प्रतिशत अपनी ही गलती मानता हूँ.. पी.सी.एस. में फिर से मेरे कुछ और करीबी मित्रों का सेलेक्सन हो गया जैसे अर्चना, संजीव, अनुज, श्रुति.. अफ़सोस तब हुआ जब अच्छे से जी.डी. देने के बाद भी मैंने अपने जिन दो दोस्तों को अपना पेपर दिखाया था, वे भी जी.डी. क्लियर नहीं कर पाए..

अगली कम्पनी मेरे लिए Hexaware थी.. उसमे भी खूब चोरी चली, मगर मैं इस बार न तो किसी प्रकार का कोई व्यूह बनाया और ना ही चोरी की.. खैर इस बार मैं रिटेन में भी सेलेक्ट नहीं हो पाया मगर पी.सी.एस. का रिटेन निकालने के बाद मेरे आत्मविश्वास में बहुत इजाफा हुआ था.. जब पता चला की Hexaware आने वाली है तो एक रात पहले मैंने संजीव को कहा की कल से मैं भी बैडमिन्टन खेलने आ रहा हूँ, घबराओ मत.. और जब इसमे नहीं हुआ तो अगली कम्पनी में भी मैंने यही बात कही जो सही हो गया.. :) दरअसल होता यह था कि मेरे जिन दोस्तों का सेलेक्शन हो चुका था वे सभी दिन के 6-7 घंटे बैडमिंटन खेलने में बिताने लगे थे, और मेरे जैसा बैडमिंटन का प्रेमी कुछ तैयारी के चक्कर में और कुछ अवसाद में पड़कर खेलने नहीं जाता था..

(अगला अन्तिम भाग...)


मेरे होस्टल के बगल वाला हिस्सा.. इसे आप पार्क नहीं कह सकते हैं मगर था पार्क जैसा ही कुछ.. पूरे वेल्लोर में अगर कुछ हरियाली देखनी हो तो बस VIT आ जाइए :)..


मेरा होस्टल, वाणी के कैमरा से लिया हुआ.. उस समय मेरे पास कैमरा नहीं था सो वाणी से कुछ दिनों के लिए उधार लिया था.. उसके कैमरे से बहुत अच्छी तस्वीर आती है.. :)