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सारी रात मैंने अपनी ज़िन्दगी तबाह की
कुछ गिनते हुए,
गायें नहीं
पौंड नहीं
फ़्रांक नहीं, डालर नहीं...
न, वैसा कुछ भी नहीं
सारी रात मैंने अपनी ज़िन्दगी तबाह की
कुछ गिनते हुए,
कारें नहीं
बिल्लियाँ नहीं
मुहब्बतें नहीं...
न!
रौशनी में मैंने अपनी ज़िन्दगी तबाह की
कुछ गिनते हुए,
क़िताबें नहीं
कुत्ते नहीं
हिंदसे नहीं...
न!
सारी रात मैंने चांद को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
बोसे नहीं
वधुएँ नहीं
बिस्तर नहीं...
न!
लहरों में मैंने रात को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
बोतलें नहीं
दाँत नहीं
प्याले नहीं...
न!
शान्ति में मैंने युद्ध को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
सड़कें नहीं
नगमें नहीं...
न!
छाया में मैंने ज़मीन को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
बाल नहीं झुर्रियाँ नही
गुम गई चीज़ें नहीं...
न!
ज़िन्दगी में मैंने मौत को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
क्या उस सबको भी जोड़ा जाय ?
याद नहीं पड़ता...
न!
मौत में मैंने ज़िन्दगी को तबाह किया
कुछ गिनते हुए,
नफ़ा कहूँ या नुकसान !
नहीं जानता
न ज़मीन ही...
वग़ैरह वग़ैरह..
सुरेश सलिल जी द्वारा स्पेनिश से हिंदी में अनुवादित.
नेरूदा के बारे में अधिक पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ..
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nice
ReplyDeleteकविताओं में गहरी रुचि जागृत हो रही है..शादी के पहले यह अच्छे सिम्पटम नहीं हैं बालक!! :)
ReplyDeleteइधर आपके लेखन में रात का जि्क्र कई बार आ चुका है, आप वैसी ही कविताओं की तरफ प्रेरित भी हो रहे हैं:)
ReplyDeleteपर यह वैरागी भाव ही है अंतत:
समीर जी की चिंता इसलिए जायज है:)
तो अब तुम्हारा मन कविता में ज्यादा लग रहा है, मन कवि हो रहा है, पर दिशा गलत है, थोड़ा रुमानी हो जाओ, सबका फ़ायदा होगा :)
ReplyDeleteअच्छी लगी कविता. मन कविता-कविता हो गया. अनुवाद अच्छा बन पड़ा है. कुछ अपना भी लिखो न अच्छा सा... कोई कविता. मनभावनी सी... रोमैंटिक सी.
ReplyDeleteपता है पीडी, मैने तुम्हारी एकदम शुरुआती दौर की एक पोस्ट पढी थी जो एक कविता ही थी.. भावो से भरी हुयी.. भई मुझे तो बहुत अच्छी लगी थी.. इसलिये हमे तो पता है कि तुम कवि हो और मुक्ति से सहमत हू कि एक कविता लिखी जाये दोस्त.. :)
ReplyDelete’शुरुआती दौर की पोस्ट्स पढने मे एक अलग मजा है.. चीज़े एकदम ’रा’ होती है...’
इस कविता को शेयर करने के लिये धन्यवाद..
कविराज..!
ReplyDeleteशायर ए आजम!
बहुत बढ़िया
ReplyDeleteसुंदरता से लिखा पाब्लो की कलम ने .........
ReplyDeletevery nice poem....
ReplyDeleteअच्छी अभिव्यक्ति
ReplyDeleteसुंदर टुकरे हैं , बिखरे मोतियों सरीखे ,अनुवाद में भी एक शिल्प होता है ,हम भी सीख रहे हैं
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