Friday, September 17, 2010

एक अधूरी कविता

उस दिन जब तूने छुवा था
अधरों से और किये थे
कुछ गुमनाम से वादे..
अनकहे से वादे..
चुपचाप से वादे..
कुछ वादियाँ सी घिर आयी थी तब,
जिसकी धुंध में हम गुम हुए से थे..
कुछ समय कि हमारी चुप्पी,
आदिकाल का सन्नाटा..
अपनी तर्जनी से
मुझ पर कुछ आकार बनाती सी,
फिर हवाओं में
उस आकार का घुलता जाना..
किसी धुवें की तरह..
अभी मैं भी तो अधूरा ही हूँ..


17 comments:

  1. हें हें हें ...ई टाईप कविता सब लिखने लगे न .....चलो बढिया है ...देखो शादी का कार्ड नहीं भी भेजोगे तो चलेगा ..हम अपनी तरफ़ से सबको पोस्ट कार्ड डाल देंगे ...अरे ब्लॉगर सबको ...आखिर तुम्हारी कविता पढी है सबने ....तो इस कविता के अंतिम परिणाम तक तुम्हरे साथ रहेंगे कि नहीं ....लिखो लिखो ..और लिखो ...

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  2. .
    कुछ गुमनाम से वादे..
    अनकहे से वादे..
    चुपचाप से वादे..

    Promises are made to be broken....
    .

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  3. ठीक ठाक तो हो न भाई ...:)वैसे अधूरी कविता पसंद आई

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  4. खूबसूरती से लिखे एहसास

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  5. कहाँ भटक रहे हो ? पहले अपने कैरियर पर कन्सेन्ट्रेट करो ।

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  6. हम्म ! रोमैंटिक ... कोई पुरानी याद आ गयी है, लगता है. होता है, होता है, बरसात है ना...

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  7. :) अधूरी ही सही पर बढ़िया है .

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  8. अच्छी कविता है.




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    टीम हमारीवाणी

    आज की पोस्ट-
    हमारीवाणी पर ब्लॉग पंजीकृत करने की विधि

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  9. इंसान ऐसी कविता लिखने लगे तो उसे शादी कर लेनी चाहिए. :)

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  10. यह अधूरापन सदा सालता है मुझे।

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  11. @ अभिषेक ओझा - साले हमेशा मेरे पीछे लगा रहता है, तू कब करेगा ये तो बताता नहीं है.. (गाली देकर दोस्ती और भी पक्की कर रहा हूँ.. :) )

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  12. बहुत सुन्दर .बधाई

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  13. अच्छी प्रेम कविता है ।

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  14. बडी भावपूर्ण रचना ... अपने अहसास खूबसूरती से पेश किये हैं आपने

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  15. jab rachna achhi ho to dubara padhne mein harz kya hai..
    isliye chala aaya..
    ================================
    मेरे ब्लॉग पर इस बार थोडा सा बरगद..
    इसकी छाँव में आप भी पधारें....

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