Wednesday, December 15, 2010

दो बजिया बैराग का एक और संस्करण

एक जमाने के बाद इतने लंबे समय के लिए घर पर हूँ.. एक लंबे समय के बाद मैं इतने लंबे समय तक खुश भी हूँ.. खुश क्यों हूँ? सुबह-शाम, उठते-बैठते इनकी शक्लें देखने को मिल जाती है.. सिर्फ इतना ही बहुत है मेरे लिए.. इतना कि मुझे अपने Loss of Payment का भी गम नहीं.. जी हाँ, Loss of Payment पर छुट्टियाँ लेकर घर पर हूँ.. मगर फिर भी खुश.. इतने लंबे समय तक खुश रहने कि आदत भी खत्म हो चली थी, सो कभी-कभी दुःख कि कमी भी सालती है.. मगर फिर भी खुश हूँ.. मैं इन्हें देख कर खुश हूँ, और वे मुझे देख कर.. जी हाँ, मैं पापा-मम्मी कि ही बात कर रहा हूँ..

अभी-अभी मैं इधर घर आया और भैया का तबादला पटना से कहीं दूर, लगभग हजार किलोमीटर दूर, हो गया.. सो फिलवक्त यहाँ सिर्फ पापा, मम्मी और मैं ही हूँ.. ये अपने बच्चों(दीदी, भैया अथवा मैं) के पास अधिक समय नहीं रहना चाह रहे हैं, इन्हें पटना में ही रहना है.. इनके पास भी कुछ जायज वजहें हैं, जिसे मैं नकार भी नहीं सकता.. और स्वीकार करना भी बेहद कठिन जान पड़ता है.. जब तक मैं यहाँ हूँ, तभी तक.. अभी तो कुछ और दिनों तक यहीं रह कर Work From Home करने कि जुगत में हूँ.. चार कमरे, दो बड़े-बड़े हॉल वाले घर में मात्र तीन आदमी का होना ही उसे सुनसान सा बना देता है.. हाँ मुझे चिढ है इस बड़े घर से.. एक कमरे में अगर मोबाईल कि घंटी भी बजे तो दूसरे कमरे में सुनाई नहीं देता है.. ये सोचता हूँ कि जब मैं भी नहीं होऊंगा तब इन दो प्राणियों को कितना खटकेगा यह घर?

जहाँ मैं रहता हूँ वहाँ से, और जहाँ भैया नए-नए पदस्थापित हुए हैं वहाँ से भी, पटना आना एक टेढ़ी खीर(भैया के बेटे कि तोतली भाषा में खीर नहीं, 'तीर') ही है.. चेन्नई से कम से कम साढ़े आठ घंटे(वो भी तब जब आप जैसे ही एयरपोर्ट पहुंचे तभी आपको दिन में वाया मुंबई, वाया दिल्ली, फिर पटना जाने वाली एकमात्र फ्लाईट मिल जाए) लगते हैं.. भैया जहाँ गए हैं वहाँ से सबसे पास के बड़े शहर पुणे(वहाँ तक जाने में दो घंटे, फिर फ्लाईट वाया दिल्ली फिर पटना) जाकर पटना आने में भी नौ दस घंटे लगेंगे.. लब्बोलुआब यह कि कोई तुरत आना भी चाहे तो दस घंटे सबसे कम समय सीमा है..

मुझे कई दफे पापा ने कहा कि बिहार सरकार में ही अथवा बिहार में ही कम्प्युटर से सम्बंधित कोई नौकरी अथवा कोई काम शुरू कर दो.. मगर मैं अपनी कुछ व्यावसायिक मजबूरियों(स्वार्थ का ही Sophisticated शब्द मजबूरी) के चलते अभी इधर शिफ्ट नहीं होना चाहता..

इधर पिछले कुछ सालों से जब भी घर(पटना) आना हुआ है तब हमेशा मम्मी को स्वास्थ्य रुपी समस्याओं से घिरा ही पाया हूँ.. हर बार कुछ और निष्क्रियता देखता हूँ.. इस हद तक कि उन्हें अपनी पसंद कि सब्जी बनाने के लिए बोलने से पहले मैं खुद ही वह बना दूँ, उन्हें कोई कष्ट ना हो.. माँ के हाथ कि सब्जी का लालच छोड़ कर.. बाहर के सारे काम पापाजी को करते देखता हूँ.. कम से कम जब मैं नहीं होता हूँ तो कोई और चारा भी नहीं होता उनके पास.. शुरुवाती दिनों में बहुत कष्ट होता था उन्हें सब्जी लाते देख कर भी.. जिस तरह कि जिंदगी उन्होंने जिया है, उसमें उन्हें(या हमें भी) कभी भी सब्जी खरीदने तक कि जरूरत नहीं देखी.. हर वक्त कुछ लोग होते थे यह सब काम करने के लिए.. मगर वहीं उन्हें देखा कि रिटायर होने के बाद अचानक से बेहद खास से बेहद आम होते गए.. मेरे लिए आश्चर्य का विषय मगर पापा के लिए बेहद सामान्य.. शायद जड़ से जुड़ा आदमी ऐसे ही व्यक्ति को कहते हैं.. जो दस नौकर-चाकर के साथ जिंदगी गुजारने के बाद अचानक से वह सब त्याग कर, बिना किसी अहम के सारे कार्य खुद करने लग जाएँ(वे हमें बचपन से ही कहते रहे हैं, "तुम लोग अफसर के बच्चे हो, मैं तो किरानी का बेटा हूँ")..

अभी कुछ दिन पहले पापा कि तबियत जरा सी खराब होते देख मुझे कुछ भविष्य दिखने लगा.. मुझे कुछ यूँ दिखा कि अब मैं भी नहीं हूँ.. वापस अपने कार्यक्षेत्र जा चुका हूँ.. पापा कि तबियत जरा सी खराब हुई, और घर के सारे जरूरी काम ठप्प से पड़ गए अथवा उन पड़ोसियों के जिम्मे आ गए जिनसे हमारे बेहद मधुर सम्बन्ध हैं.. और उस वक्त अगर हम में से कोई आना चाह भी रहा हो तो आ नहीं पा रहा हो..

इधर इन्हें अपने पोते का मोह भी खिंच रहा है.. खैर, जब तक मैं हूँ तब तक फिर भी ठीक है.. कमी कुछ कम खलेगी.. मेरे बाद?? ऐसा पोता जो जन्म से लेकर अभी तक(दो साल से ऊपर तक) इन्हीं के लाड-प्यार के साथ बड़ा हुआ हो.. दिन में एक बार उसकी आवाज सुनने तक को छटपटाते देखा हूँ(जबकि अभी उसे जाने में पन्द्रह दिन बाकी है).. मोह माया का शायद कभी अंत नहीं..

बहुत कठिन जान पड़ता है ये सब अब!!! खुद पर भी, या ऐसे कहूँ कि अपने स्वार्थ पर बेहद शर्मिन्दा भी हूँ.. मगर फिर भी उसे छोड़ नहीं सकता हूँ..

13 comments:

  1. रात बहुत हो चुकी है सोचा पढ़ कर चला जाऊँगा, लेकिन बिना टिपियाये नहीं रह सका....ऐसा लगा जैसे किसी ने बिना मुझसे कुछ पूछे मेरे मन की व्यथा लिख दी हो....इस पूरे लेख की एक एक लाइन मेरी ज़िन्दगी में भी लागू होती है सिवाय एक के... फिलहाल मेरे पास कोई नौकरी नहीं है..चाहकर भी बंगलौर या चेन्नई का रुख नहीं कर पाता.....
    ऐसा लगता है कोई गुनाह करने जा रहा हूँ...माँ-पापा के इस बुढ़ापे में उनके साथ न रह पाना जैसे अन्दर से कचोट जाता है...ये कैसी ज़िन्दगी है ??? फिलहाल बिहार में ही कोई नौकरी की तलाश में हूँ...बस भगवान् से यही प्रार्थना है कि माँ-पापा के लिए कुछ कर सकूं .....

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  2. आज शायद नींद नहीं ही आयेगी...ये अच्छा नहीं किया आपने.. ऐसी पोस्ट रात में मत डाला करो यार....:(

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  3. तभी तो इसका नाम दो बजिया बैराग है मेरे दोस्त.. :)

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  4. घर के पास नौकरी करने का मोह तो छोड़ना ही पड़ेगा और वैसे भी दूरियाँ कितनी कम हो रही हैं। विवाह तो कर ही डालिये, माता जी को तो पोते का मुँह दिखा दीजिये, इसमें अनुराग उत्पन्न कीजिये, वैराग्य नहीं।

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  5. दो टकियों की नौकरा और लाखों का सावन.

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  6. घर के पास नौकरी करने का मोह तो छोड़ना ही पड़ेगा और वैसे भी दूरियाँ कितनी कम हो रही हैं। विवाह तो कर ही डालिये, माता जी को तो पोते का मुँह दिखा दीजिये, इसमें अनुराग उत्पन्न कीजिये, वैराग्य नहीं।

    प्रवीण जी की बात में दम है..

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  7. अब दूरियां बची ही कहाँ हैं Think positive..

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  8. इन सारे अनुभवों से मैं रूबरू हो चुकी हूँ बाबू... और मेरे पिताजी तो बिल्कुल अकेले थे, अम्मा भी नहीं थी. पर कर क्या सकते हैं. तुम इस अपराध-बोध को मन से निकाल दो कि तुम जॉब में अपने स्वार्थ की वजह से हो. व्यवस्था ही ऐसी है, क्या किया जा सकता है बोलो? नॉर्थ के किसी भी शहर में (दिल्ली को छोड़ दें तो) अच्छी नौकरी मिल सकती है क्या? हमारे यहाँ के लड़के सिविल की तैयारी में अपना इतना कीमती समय इसीलिये बर्बाद कर देते हैं क्योंकि प्राइवेट सेक्टर में कोई काम ही नहीं है यहाँ.
    और रही मम्मी-पापा के अकेलेपन की बात तो उन्हें अपने ही घर में रहने दो. वो दोनों साथ तो हैं ना, यही बड़ी बात है. हाँ, छुटके की याद का कुछ नहीं किया जा सकता. उसके लिए तो वो लोग अपने आपको समझा ही लेंगे.
    तुमने अच्छा किया कि एक लंबी छुट्टी ले ली. तुम बहुत अच्छे लड़के हो :-) और मुछ्वा कटवा लिए कि वैसी ही है अभी :-)

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    आपका अच्छा ब्लौग भी वहां शामिल है.

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  10. जीवन के बहुत से पहलू हैं.. हां, एक रंग यह भी है..

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  11. ये तो जीवन का कटु सत्य है.
    आप और हम कर भी क्या सकते हैं.
    आप शिखा को ही देख लें, शिखा लन्दन में.. रश्मि चेन्नई में और राहुल दिल्ली में..
    चाचा चाची अकेले पटना में.

    आपका लिखा "दो बाजिया बैराग" पढ़ने के बाद मैं भी काफी देर तक सोचती रही तब जाकर कुछ कमेन्ट करने की स्थिति में आई.

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  12. भाई तुम वही सब बात लिखे हो जिसको कुछ दिन पहले हम(मैं और मेरे दोस्त बद्दी जी) डिस्कस कर रहे थे...

    :(

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