Tuesday, April 06, 2010

मां रेवा तोरा पानी निर्मल, खलखल बहतो जायो रे!!


अभी कुछ दिनों पहले रविश जी ने फेसबुक पर "इंडियन ओशन" के एक गीत "मां रेवा" का जिक्र करते हुये कहा था "मां रेवा...तेरा पानी निर्मल..कल कल बहतो जाए...इंडियन ओशन का जब यह गाना सुनता हूं तो मां रेवा हलक के भीतर उतरने लगती है। नर्मदा के दीदार की तमाम ख्वाहिशें मचलने लगती हैं। इंडियन ओशन का संगीत सकारात्मक उन्माद पैदा करता है।"

उनका लिखा यह पढ़ते ही यह गीत सीधा दिल तक उतर आया.. अपने लैपटॉप के हार्डडिस्क में खूब ढ़ूंढ़ा मगर कमबख्त जाने कहां गुमा हुआ सा बैठा था कि नहीं मिला.. फिर इंटरनेट महाराज ने मुझ पर असीम कृपा दिखाई और मैंने यह गीत डाउनलोड करके अपने मोबाईल में डाल लिया..

ईश्वर जैसी चीजों को मैं हमेशा से ही नकारता रहा हूं, मगर मानता रहा हूं कि विश्व कि किसी भी सभ्यता के शुरूवाती क्षणों में लोग प्रकृति की ही पूजा किया करते थे.. वे हर उन चीजों को पूजते थे जिसे वह जीवन के लिये जरूरी मानते थे.. हमारी भारतीय संस्कृति में भी हम नदियों को मां और पर्वतों को पिता का दर्जा देते आये हैं..

मैंने कभी मां नर्मदा को देखा नहीं है.. बचपन उत्तर बिहार के लखनदेई नदी और चक्रधरपुर के पहाड़ी नदी के किनारे बीता है और किसोरावस्था से जवानी की दहलीज तक पांव रखते हुये मां गंगे को नजदीक से देखा हूं, सो यह गीत सीधा दिल को चीर कर अंदर तक घुसता प्रतीत होता है.. रविश जी सच ही इसे एक सकारात्मक उन्माद का नाम दिये हैं.. एक ऐसा उन्माद जो आपको प्रकृति की ओर खिंचता है..

मां रेवा तोरा पानी निर्मल,
खलखल बहतो जायो रे..
मां रेवा!!!

अमरकंठ से निकली है रेवा,
जन-जन कर गयो भाड़ी सेवा..
सेवा से सब पावे मेवा,
ये वेद पुराण बतायो रे!!

मां रेवा तोरा पानी निर्मल,
खलखल बहतो जायो रे..
मां रेवा!!!


शाम तक इसे पॉडकास्ट करता हूं..


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बाद में जोड़ा गया..

Sunday, April 04, 2010

दो बजिया वैराग्य पार्ट टू


घर से कई किताबें लाया हूँ जिनमे अधिकतर फणीश्वरनाथ रेणु जी कि हैं.. उनकी कहानियों का एक संकलन आज ही पढ़ कर खत्म किया हूँ, 'अच्छे आदमी'.. पूरी किताब खत्म करने के बाद फुरसत में बैठा चेन्नई सेन्ट्रल रेलवे स्टेशन पर अपने मित्र के ट्रेन के आने का इंतजार कर रहा था, तो उस किताब कि बाकी चीजों पर भी गौर करना शुरू किया.. उसके पहले पन्ने पर पापाजी कुछ लिख रखे थे, जिसमे उस किताब के ख़रीदे जाने के समय वह कहाँ पदस्थापित थे और वह उनके द्वारा ख़रीदे जाने वाली कौन से नंबर का उपन्यास है.. "चकबंदी, बाजपट्टी".. उस समय पापाजी वही पदस्थापित थे.. इससे मैंने अंदाजा लगाया कि यह किताब सन १९८२ से १९८६ के बीच कभी खरीदी गई होगी.. मगर किताब के ऊपरी भाग को देखने से कहीं से भी यह किताब उतनी पुरानी नहीं लगती है, हाँ अंदर झाँकने पर पृष्ठ कुछ भूरे रंग के हो चले हैं और पुरानी किताबों जैसी सौंधी सौंधी सी खुशबू भी आती है.. एक जिम्मेदारी का एहसास होता है कि जिस तरह उन्होंने इसे संभाल कर अभी तक इन किताबों को रखा है, मुझे भी ऐसा ही व्यवहार इन किताबों के साथ करना चाहिए..

कुछ याद भी आया, जो पापाजी का किताबों के प्रति दीवानापन दिखाता है.. मैं बचपन से लेकर अभी तक खरीदी हुई लगभग हर चम्पक, नंदन, बालहंस, सुमन-सौरभ और कामिक्सों को भी ऐसे ही संभाल कर रखा हुआ हूँ जैसे पापाजी इन उपन्यासों को.. किसी भी कहानी कि किताब का एक पन्ना भी कोई ना मोड़े और अगर किसी को उसे मोड कर पढ़ना है तो कम से कम मेरी कहानी कि किताबों को तो मत ही छुवें.. उसे मोड़ कर पढ़ने का अधिकार मैंने पापाजी को भी नहीं दे रखा है..

कुछ पुरानी यादों में गोते भी मारा, वैसे भी कोई और काम था नहीं.. बगल में एक दो-ढाई साल की बच्ची के साथ आँख मिचौली भी बैठे-बैठे ही खेला.. पीले रंग की फ्रॉक पहन कर इतराती फिर रही थी, दीन-दुनिया से बेखबर.. उस किताब के ख़रीदे जाने के समय मैं अधिक से अधिक तीन से पांच साल का रहा होऊंगा..

बिहार एक बेहद रूढ़िवाद से जकडा हुआ प्रदेश है जहाँ जाति और समाज के कुचक्रों से बचकर निकलना बहुत मुश्किल है.. ऐसे माहौल में भी पापाजी का हम बच्चों से सदा मित्रवत व्यवहार रहा.. उन्होंने अपना बचपन संघर्षों में ही बिताया है और B.A.S. में आने से पहले उन्हें कई सीढियाँ नापनी पड़ी थी.. अपने भीतर के आत्मविश्वास को भी जगाना पड़ा था.. और जब आत्मविश्वास इस स्तर तक पहुंचा की वह I.A.S. के बारे में सोचें भी, उस परीक्षा में बैठने की उनकी उमर गुजर चुकी थी.. उन्होंने कभी भी अपनी बात, अपने सपने हम पर नहीं थोपे.. मगर फिर भी हमें यह भली भांति पता है की उनका एक सपना था की उनका कोई बेटा I.A.S. बने..

बचपन से ही पढाई-लिखाई के मामले में पापाजी का मुझ पर एक ऐसा अटूट भरोसा था जिसे मैं अक्सर तोड़ता फिरता था.. यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक मैं कंप्यूटर सीखना शुरू नहीं किया था.. जब भरोसा ऐसा था तब मुझसे भी बिना कहे, लगभग मूक संवाद जैसा ही कुछ, उन्हें यह उम्मीद भी थी की यह बेटा भी I.A.S. बने.. उनकी इस उम्मीद पर सबसे पहले मैंने पानी फेरा, यह कहकर की मैं कंप्यूटर फील्ड नहीं छोड़ने वाला हूँ.. और बाद में भैया ने भी यह स्पष्ट कर दिया की अगर मुझे I.A.S. ही बनना था तो मुझे M.Tech. तक की पढाई करने की क्या जरूरत थी? और बाद में भैया ने आधे स्तर पर ही सही पापाजी का आधा सपना पूरा कर दिया I.E.S. ज्वाइन करने के बाद..

मेरा तब भी और अब भी यही मानना है की हम तीनो भाई बहन में दीदी सबसे अधिक इंटेलेक्ट थी और है भी.. और दीदी के लिए I.A.S. निकालना 'पीस ऑफ अ केक' के ही सामान था.. मगर दीदी हमेशा अपने सपनो में ही गुमी सी रहने वाली लड़की थी.. जिसमे कुछ आसमान, कुछ तितलियाँ, कुछ चिड़ियों ने अपनी जगह बना रखी थी.. घर में हम तीनो भाई-बहन में अगर कोई कभी भी I.A.S. की परीक्षा में बैठा था तो वह दीदी थी.. मगर दीदी कभी भी उसे सीरियसली नहीं ली..

पापाजी की एक आदत है.. कभी-कभी वह अक्सर जान बूझकर कुछ ऐसी बात कह जाते हैं जिससे हम हद दर्जे तक इरिटेट हो जाएँ.. इधर हम इरिटेट हुए और उनके चहरे पर एक विजयी मुस्कान आ जाती है.. यह भी कुछ वैसा ही है जैसे हम अपने किसी सबसे अच्छे मित्र को जानबूझ कर इरिटेट करते फिरते हैं..

एक दफ़े उनसे बात करते-करते उन्होंने कहा की मेरे बच्चे बेवकूफ हैं जो काबिलियत होते हुए भी I.A.S. नहीं बने.. मैंने आगे जोड़ा, नहीं पापाजी.. आपके बड़े बच्चे बेवकूफ होंगे, मैं तो नालायक हूँ.. उनका कहना था की सिर्फ मुझे ही पता है की मेरा छोटा बेटा क्या है और उसमे क्या करने की क्षमता है.. मैं सोचने लग गया था.. "हर माँ-बाप को अपने बच्चे पर इस तरह का अन्धविश्वास क्यों होता है? या फिर यह एक ऐसा विश्वास है जो बच्चों में कुछ भी कर गुजरने की ताकत दे देता है?"

बहुत बकवास कर लिया आज.. बाकी फिर कभी.. :)
दो बजिया वैराग्य पार्ट वन

Tuesday, March 30, 2010

अब मुझे कोई इन्तजार कहाँ

मेरे कितने जिद करने पर तुमने मुझे चूमने के लिए अपने होंठो को आगे कर दिया था.. आँखे भी बंद थी तुम्हारी.. तुम्हारी वह मासूमियत देख कर तुम्हारे होंठो को चूम भी नहीं पाया था मैं.. बस देखता रह गया था वह समर्पण.. कुछ देर बाद आँखें खोलने पर तुमने मुझे मुस्कुराता पाया था.. तुम झेंप गई थी.. झेंप मिटाने कि कोशिश में मुझसे लड़ पड़ी थी.. मगर मैंने तुम्हारी वह छवि आँखों में बंद कर ली थी.. आँखों में अब भी तुम्हारी वह छवि कैद है.. इन्हें आजाद करने के लिए मुझे तुम्हे चूमना जरूरी है.. किसी को यूँ ही कैद में नहीं रखना चाहिए..

देर रात ट्रेन कि खिडकी से झांकते चाँद को देख तुम्हे अक्सर मेरी याद आ जाती थी.. तुम्हारा ख़्वाब था कि कभी मैं भी इन रूमानी हालातों में तुम्हारे साथ रहूँ, चाँद के साथ चलूँ.. यह सब फोन पर उसी वक्त बताया था तुमने.. रेल कि खिडकी से मैं भी अक्सर झांकता हूँ.. साथ दौड़ते कई तारों को देखता हूँ जो अचानक उलझते-सुलझते रहते हैं.. रिश्ते भी अक्सर उतनी ही तेजी से उलझ जाया करते हैं.. काश रिश्ते भी उसी तेजी से मैं सुलझा पाता कभी.. एक हुनर सीखनी बाकी है अभी..

तुम मेरे सीने पर सर रख कर सोना चाहती थी.. उस दिन मेरे सीने पर सर रखकर सोते हुए कहा था तुमने.. जाने किस भय से मुझमे समा जाना चाहती थी तुम.. उस दिन तुम दरवाजे को बंद करना भूल गई थी.. संयोग से कोई गुजरा नहीं वहाँ से.. वह पहला और आखिरी दिन था.. आख़िरकार तुम्हारे ख़्वाब पूरे हो गए थे, मेरे सीने पर सर रख कर सोने का.. कुछ ख्वाहिशें अधूरी है अभी.. जिंदगी से कुछ विशलिस्ट उधार ले रखा है.. कुछ ख़्वाब अभी भी तुम्हारी राह तक रहे हैं.. तुम्हारा आना जरूरी है अब.. ख़्वाबों को भी उनकी जमीन मिलनी चाहिए जहाँ वह कुछ और ख़्वाब पैदा कर सके.. तुम्हारा इन भूमिहीन ख़्वाबों से सामंतों सा व्यवहार ठीक नहीं है..

उस दिन तुम्हारे जाने से पहले जिद कि थी, उस मीठी वाले कैंडी की, उसी बनिए के दूकान से.. जिसे पूरी नहीं कर सका था मैं.. रविवार जो था उस दिन.. बंद दुकानों का बंद दिन.. सोचा अगली बार वह जिद पूरा कर दूँगा.. वह अगली बार कभी नहीं आया.. जिंदगी के दोराहे में दोनों अलग हो गए, कभी ना मिलने के लिए.. थोडा दंभ, थोड़ी बेफिक्री में और अधिक लाचारी में सोचा कहाँ जायेगी? वह जो एक क्षण भी मेरे बगैर नहीं रह पाती है.. दिन हफ्तों में, हफ्ते महीनो में और महीने सालों में बदलते गए.. नहीं आना था तुम्हे, नहीं आयी.. मैंने कहा था ना तुम्हे, एक हुनर सीखनी बाकी है अभी.. समझती क्यों नहीं हो तुम?

अब मुझे कोई इन्तजार कहाँ..
वो जो बहते थे आबसार कहाँ..

आँख के एक गाँव में, रात को ख़्वाब आते थे..
छूने से बहते थे, बोले तो कहते थे..
उड़ते ख़्वाबों का एतबार कहाँ..
अब मुझे कोई इन्तजार कहाँ..

जिन दिनों, आप थे, आँख में धूप थी..
जिन दिनों आप रहते थे..
आँख में धूप रहती थी..
अब तो जाले ही जाले हैं..
ये भी जाने ही वाले हैं..
वो जो था दर्द का, करार कहाँ..
अब मुझे कोई इन्तजार कहाँ..

अब मुझे कोई इन्तजार कहाँ..
वो जो बहते थे आबसार कहाँ..


Ishqiya - 03 - Ab ...


Note - कंचन दीदी के शह पर लिखा गया यह पोस्ट. :)

Sunday, March 28, 2010

क्या हम खुद को गलत मानने कि हद तक मैच्योर हैं?

११ मार्च को आखिरी दफ़े कुछ लिखा था यहाँ.. १५ दिन से ऊपर गुजर गए हैं यहाँ कुछ भी लिखे हुए.. मैं कभी भी इस मुगालते में नहीं रहा कि लोग मुझे पढ़ने को बेचैन हैं और मुझे अपने पाठकों के लिए कुछ लिखना चाहिए.. मुझे पता है कि लोगों कि यादाश्त बहुत कमजोर होती है और जो सामने उन्हें दिखता है बस उसे ही याद करती है.. बाकी बाते तो इतिहास के पन्नों में छिप जाया करती है.. अच्छे-अच्छे लेखक को भी लोग भूल जाया करते हैं, मैं तो लेखक भी नहीं हूँ..

कई लोग हैं जो मुझसे यह बात पूछ चुके हैं कि तुम कुछ लिख क्यों नहीं रहे हो? कुछ फोन पर, कुछ चैट पर और कुछ ई-पत्र के जरिये.. मैं अच्छे से जानता हूँ कि इसका कारण मेरा लिखा पढ़ने कि इच्छा के बदले उनको यह जानने कि उत्सुकता है कि मैं कभी भी इतने अंतराल तक अपने ब्लॉग को खाली नहीं छोड़ा करता हूँ.. आज भी कुछ बकवास ही लिख कर जा रहा हूँ..

चलिए मैं बता ही देता हूँ कि इन दिनों क्या किया?

इन दिनों खूब पढ़ा हूँ, जिसमे कंप्यूटर कि किताबों से लेकर साहित्य और दर्शन तक शामिल है.. अभी भी कई किताबें बची हुई है जो समयाभाव में मेरी राह तक रही हैं.. अपने स्वाभानुसार खूब सोचा भी हूँ, जिसमे इन साहित्य और दर्शन से लेकर अपने जीवन और भविष्य से संबंधित बाते भी हैं.. कई नए अनुभव भी मिले हैं इन पन्द्रह दिनों में ही जो शायद जीवन में तब तक काम आयें जब तक उसे गलत साबित करने वाले नए तथ्य सामने ना आ जाये..

काफी कुछ लिखा भी हूँ.. मगर सिर्फ और सिर्फ अपने लिए.. किसी और को उस जगह झाँकने नहीं देना चाहता हूँ.. क्योंकि मेरा मानना है कि हिंदी ब्लॉग जगत अभी तक उतना मैच्योर नहीं है कि उसे हजम कर सके.. लोग यहाँ चार-पांच साल पुराने लिंक को भी संभाल कर रखते हैं जिससे समय आने पर सामने वाले पर कीचड़ उछाला जा सके.. सामने वाले को नंगा कर खुद को सभ्रांत लोगों में शुमार दिखना चाहते हैं.. कुछ कुछ यही हाल मैं समाज के बारे में भी कहूँगा.. समाज के लोग तिलमिला उठते हैं ऐसी बाते सुनकर.. अपनी भ्रांतियों को टूटते देखना उनकी आदत में नहीं है.. कुछ लोग जल्दी और कुछ देर से मगर तिलमिलाते सभी हैं, और उसपर भी अगर बात सच्ची हो और उसे काटने का कोई तर्क उन्हें नहीं दिखे तो उसे अश्लील या वल्गर कहकर ख़ारिज कर देना चाहते हैं..(सनद रहे कि मैं भी इसी समाज और हिंदी ब्लॉग जगत ही ही बासिन्दा हूँ.. सो यह सब मुझपर भी लागू होता है..)

सभी कुछ लिखता हूँ अपनी वेब डायरी में.. एक ऐसे ब्लॉग पर जो मेरा नितांत निजी ब्लॉग है और उसपर मेरे अलावा किसी और को भटकने का अधिकार मैंने नहीं दिया है.. कुछ ख़्वाब ख्यालात कि बाते भी हैं उस पर, कुछ रूमानी बाते भी और कुछ समाज, दोस्ती और रिश्तों कि बाते भी.. कुछ बाते मैंने अपने कुछ मित्रों से भी कि उन विषयों पर जिन पर मैंने वहाँ लिख छोड़ा है, मगर उनके शब्द या व्यवहार फिर से बिना किसी तर्क के उसे ख़ारिज करने पर ही लगा हुआ था.. हो सकता है कि कभी मैं खुद ही उन्हें खारिज कर दूं, और बिना किसी गवाह या सबूत के उसे डिलीट होने का सजा भी सुना दूँ..

फिलहाल जिन किताबों को पढ़ रहा हूँ उसका चित्र मैं यहाँ लगा रहा हूँ.. जिन्हें जल कर ख़ाक होना है वह हो जाए और जिन्हें यह सोचकर गर्व करने का मौका मिल जाए कि "हुंह, यह सब तो मैंने दस साल पहले ही पढ़ रखे हैं" तो वे गर्वित भी हो सकते हैं..



कुछ अंग्रेजी कि पुस्तके भी हैं, जिनकी तस्वीर यहाँ नहीं लगा रहा हूँ, जिनमे प्रमुख रूप से रोबिन शर्मा कि किताबें शामिल है..

फुटकर नोट : कभी कभी लगता है वे मनुष्य जो सबसे अधिक अनैतिक होते हैं, नैतिकता का सबसे बड़ा लेक्चर उन्ही के पास होता है..

Thursday, March 11, 2010

बाथ टब कि कहानी


"पछान्त मामू, आपके पास टब है?" उसके अजीब सवालों में एक और सवाल शामिल था अभी.. मुझे समझ में नहीं आया कि अचानक से साईकिल चलाते हुए वह टब या यूं कहें कि बाथ टब पर कैसे आ गई.. मैंने भी उसके बालमन को दिलासा देते हुये "हां" कह दिया..

"कितना बड़ा है आपका वाला टब?" अगला सवाल.. मुझे घर में घुसे हुये बस दो-तीन घंटे ही हुये थे, सो अभी तक मेरा धैर्य उसके सवालों का जवाब देते हुये चूका नहीं था.. फिर भी मुझे समझ में नहीं आया कि क्या कहूँ, कि कितना बड़ा है? उसी ने समझाते हुए पूछा, "वन है या हन्ड्रेड?" मैंने पूछा "वन और हन्ड्रेड क्या होता है?"

मेरे नासमझ से सवाल ने उसे हंसा दिया.. मन ही मन सोची होगी कि मामू इत्ते बड़े हो गए हैं फिर भी कित्ते बुद्धू हैं.. "वन मतलब थोडा सा, और हन्ड्रेड मतलब सबसे बड़ा.." बोलते हुए वह अपने छोटे से हाथ को जितना फैला सकती थी, फैला लिया.. अब जबकि सारा मामला साफ़ था तब भला कोई खुद को कम क्यों बताये? मैंने भी हन्ड्रेड ही बताया..

"आप मुझे नहाने दोगे?"
"नहीं."
"मैं अच्छी लड़की हूँ.. बदमाशी भी नहीं करती हूँ.."
"अच्छा! क्या-क्या बदमाशी नहीं करती हो? पहले ये बताओ फिर हम बताएँगे कि तुमको नहाने देंगे कि नहीं."
"मैं जो हूँ न.. मैं जो हूँ न.." सोचते हुए थोडा सा हकलाने लगी.. जो उसके झूठ बोलने कि कोशिश करने कि शुरुवात जैसा कुछ लगा.. "मैं अप्पू को नहीं मारती हूँ.." हाँ, झूठ ही बोलने वाली थी.. दीदी से जब भी बात होती है तब ये जरूर सुनने को मिलता है कि आज फिर दोनों बहन झगडा कि है.. ये दीगर बात है कि ये अपनी छोटी बहन अप्पू को तभी मारती है जब उसकी शैतानियाँ इसके बर्दास्त से बाहर होता है..

"और क्या बदमाशी नहीं करती हो?" मेरे मन में अब उसकी सभी बदमाशियों को जानने का लालच जाग गया था..
"मैं किसी से किट्टा भी नहीं होती हूँ.. मम्मी से तो कभी नहीं.." उसने कभी नहीं पर जोर डालते हुए कहा.. हफ्ते भर पहले ही दीदी से हुई एक बात याद आ गई, जब यह मुझे दीदी से बात नहीं करने दे रही थी और दीदी के डांटने पर उससे बार-बार किट्टा हो रही थी.. मैं मन ही मन अपनी कामयाबी पर खुश होते हुए मुस्कुरा दिया..

"और?"
"और, मैं हूँ ना.. पौटी भी नहीं बोलती हूँ.." मुझे उसके भोलेपन पर प्यार आ गया.. मुझे याद आया जब मैं उससे पिछली बार मिला था तब वह गुस्से में आकर पौटी बोलती थी और सभी उसे समझते थे कि यह अच्छा शब्द नहीं है.. उसका कहना होता था कि क्या पौटी लगने पर भी पौटी नहीं बोलना चाहिए? तब फिर से उसे समझाना पड़ता था कि जब पौटी लगे तभी पौटी बोलना चाहिए.. नहीं तो नहीं.. इस बार उसके मुह से एक बार भी किसी और के लिए पौटी शब्द नहीं सुना.. लगा शायद पहले से अधिक समझदार हो गई है..

फिर बात आई-गई हो गई.. २ घंटे कि नींद भी मैंने मार लिया.. और वह जो दिन में नहीं सोती है सो मामू के पास रहने के लालच में मेरे पास ही सो भी गई.. उसके पास खिलोने वाला घर भी है, जिसे वह हाउस कहती है.. उसके लिए छोटे-छोटे फर्नीचर भी हैं.. मुझसे जिद करके वह सारा फर्नीचर उस छोटे से घर में सजवाया गया.. मैंने भी बहुत जतन से उसे सजाया भी.. मगर उससे क्या होता है भला.. मैंने जिस काम के लिए आधे घंटे का समय लिया था उसे उसने बस आधे मिनट में ही तितर-बितर किया और फिर से मेरे पास लेती आई.. "मामू ये खराब हो गया.. फिर से सजा दो.."

रात में फिर से उसे मेरा टब याद आया.. "मामू, आपका टब बहुत बड़ा है?"
"हाँ.."
तभी किसी कमरे से अप्पू कि रोने कि आवाज आने लगी.. उसे इसमे भी एक नया सवाल मिल गया..
"मामू, जो बच्चे रोते हैं वो गंदे बच्चे होते हैं ना?"
"किसने बोला?"
"मिस ने.." शायद स्कूल वाले मिस कि बात हो..
"नहीं बेटू, जो बच्चे बिना बात के रोते हैं वो गंदे होते हैं.."
"तो जब मैं आकांक्षा को मारती हूँ और वह रोती है तब वह गन्दी बच्ची नहीं होती हूँ ना?"
मन ही मन में हंसी आ गई.. खुद बुरा काम करके आकांक्षा को अच्छी बच्ची साबित कर रही है.. मगर यह आकांक्षा है कौन? यह सवाल मन में आया मगर मैंने पूछा नहीं.. उसकी ही रौ में बहना अच्छा लग रहा था..
"लेकिन किसी को मारना बहुत बुरी बात होती है.." मैंने कहा..
"जो बच्चा किसी को मारता है उसे आप टब में नहीं नहाने देते हैं?"
"नहीं.."
"अब से मैं किसी को नहीं मारूंगी.." मगर मेरे चहरे पर सपाट भाव देख उसे लगा कि मैं उसकी बात पर भरोसा नहीं कर रहा हूँ.. "सच्ची मामू.." मुझे हर हाल में वह सहमत करना चाह रही थी..
"ठीक है.. फिर नहाने दूँगा.."

रात के खाने के बाद वह दीदी से जिद करने लगी कि मैं मामू के पास सोऊंगी.. दीदी उसे मन कर रही थी.. मैंने दीदी को बोला कि सोने दो आज.. दीदी का कहना था कि तुम्हारे साथ तो कोई बात नहीं है, मगर कोई बाहरी मेहमान आएगा तब भी ये जिद करने लगेगी.. इसकी आदत यही हो जायेगी.. मेरा कहना था कि एक दिन में कोई आदत नहीं लगेगी और उसे अपने पास सुला लिया..

अचानक से उसे फिर से उसका टब याद हो आया.. अब यह जादुई टब मेरा कहाँ रहा.. अब तो उसी का हो गया था.. उसे भरोसा हो गया था कि यह मेरा और उसका ज्वाइंट वेंचर है.. और हम दोनों जिसे चाहेंगे उसे ही उसमे नहाने देंगे.. बोली, "मामू, जो कच्छा बोलता है उसे भी नहीं नहाने दूँगी न?"
"नहीं", मैंने कहा फिर पूछा, "कौन कच्छा बोलता है?"
"राहुल जो है ना, वो बोलता है.." अब राहुल कौन है भाई? मगर पूछा नहीं.. अगले दिन अहले सुबह वाली फ्लाईट कि याद आ गई.. और सोने कि जुगत में लग गया..

सुबह-सुबह उसे सोता ही छोड़ मैं घर से निकल गया.. चेन्नई उतरने के बाद दीदी को फोन लगाया तो पता चला कि मेरे जाने के १५ मिनट बाद ही उसकी नींद खुली और मुझे नहीं देख कर दीदी के पास गई.. लगभग रोने ही वाली थी कि दीदी उसे गले से लगा कर सुला दी.. सुबह उसे याद ही नहीं कि मामू आया था और चला गया.. स्कूल से आने के बाद अचानक से याद आने पर अपनी मम्मी के पास जाकर फूट-फूट कर रोने लगी कि मामू चला गया.. चुप होने से पहले वाली आखिरी सिसकी में बोली "मामू मुझे टब में भी नहीं नहाने दिया.." बाद में जब दीदी से टब के बारे में बताया टब दीदी बोली कि टब में पानी बहुत खर्च होता है सो इसे नहीं नहाने देते हैं.. इसलिए तुमसे बोल रही थी कि मुझे टब में नहाने दो..


अदिति अप्पू साथ-साथ. अदिति रूठी हुई है और अप्पू पीछे से उसके रूठने जैसी एक्टिंग करने कि कोशिश कर रही है.

Saturday, March 06, 2010

शाईनिंग इंडिया और कैटल क्लास

मैं अबकी जब घर आ रहा था तब चार साल के बाद स्लीपर में यात्रा किया.. मैं रास्ते भर खूब इंज्वाय किया.. तरह तरह के लोग आते थे और अपने तरह से अपना बिजनेस कर रहे थे.. कोई पान-मसाला बेच रहा था तो कोई नट बन कर पैसे कमा रहा था.. कभी कोई लैंगिक विकलांग आकर जबरी वसूली कर रहा था, तो कोई गा रहा था.. कोई भीख मांग रहा था तो कोई भगवान का रूप धारण किये हुआ था.. पटना पहूंचने से ठीक पहले मुझे अचानक से लगा कि यह लोग चाहे जैसे भी अपने जीने की जद्दोजेहद में लगे हुये हैं... और मैं इन्हें देखकर मजे ले रहा हूं? क्या मैं भी उन सो-कौल्ड एलीट वर्ग में आ गया हूं जो थर्ड ए.सी., सेकेण्ड ए.सी. या फिर हवाई जहाज से यात्रा करने वालों की जमात में शामिल हो गया हूं? और उनके लिये ये सारे लोग तमाशा हो गये हैं, कुछ उसी तरह जैसे हम चिड़ियाघर में जानवरों का तमाशा देखने जाते हैं!! फिर अपने ऊपर शर्म आने लगी.. मन में आया कि यही है शाईनिंग इंडिया, जहां किसी का दर्द औरों के लिये तमाशा से अधिक और कुछ नहीं होता है..

हमारे देश में जब तक यह अमीर-गरीब की खाई यूं ही बढ़ती रहेगी तब तक भारत कभी भी उन्नती के पथ पर आगे नहीं बढ़ सकता है..

Thursday, February 25, 2010

ऐसा खुदा जिसने आवारागर्दी और यायावरी सिखाया


अब वह बात पुरानी हो चुकी है.. लोग उसे भगवान कहते कहते शायद भगवान मान भी लिए हों क्रिकेट का.. छुटपन में सपने देखते थे कि सचिन वन डे में दोहरा शतक जमाये.. बड़े होने के साथ वह दीवानगी कम होती गई.. आज जब उसने लगा ही दिया तब याद आया, कि इसी तवारिख़ का इन्तजार हमें बीस वर्षों से था..

मजे कि बात तो यह कि जब वह दोहरा शतक लगा रहा था तब एक बेजान सी बात पर हमारे टीम के सभी सदस्य बहस कर रहे थे.. वे बेचारे क्या जाने कि इस शतक का मोल क्या है? क्या पता उन्हें अपने बाकी बचे जीवन में फिर यह नजारा देखने को मिले भी या नहीं? और अगर मिले भी तो कहीं वह भारत के ही खिलाफ ना हो.. इधर बहस गर्म होती जा रही थी और उधर हमारा ध्यान सामने कमेंट्री सुन रहे कुछ लोगों पर था.. अचानक से एक थम्स-अप का इशारा आया, और हम समझ गए कि हो गया आज कारनामा..

उस समय शायद सात-आठ साल का रहा होऊंगा जब उसे टीवी पर खेलते देखा था.. एक बच्चा खुद से ७-८ साल बड़े को बच्चा कहने कि तोहमत भी लगा गया था.. अरे, एक बच्चा पाकिस्तानियों को पीट रहा है.. उस जमाने में 'साला' ही सबसे बड़ी गालियों में शुमार था.. मगर पाकिस्तानियों को साला कहने कि हिम्मत भी नहीं थी, मगर सचिन फिर भी उसे धोए जा रहा था..

उसके बाद के कुछ और किस्से याद हैं.. सन 1992 का आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड में हुआ विश्व कप.. छठी कक्षा में था तब.. जाड़े कि ठिठुरती ठंढ में स्कूल से भाग कर घर आया करते थे.. स्कूल से भागने का गुर भी इसी मुए ने सिखाया था हमें, जो कालेज के जमाने तक काम आया.. एक शुक्रिया उस यायावरी कि शुरुवात कराने के लिए भी..

अखबार और इण्डिया टुडे में उसके फोटो आने पर कटिंग काट कर अपने नोटबुक के भीतर छुपाते थे तब.. कुछ टुकड़े अब भी उस टीन कि पेटी के अंदर घुसी पड़ी होगी.. कुछ-कुछ अजायब घर सा माहौल रहता है उस पेटी का.. कुछ बचपन में पढ़ी कहानी कि किताबे.. कुछ पहले प्यार के कुछ किस्से गिफ्टों कि शक्ल लिए हुए.. कुछ कामिक्स के फ्री में मिले हुए मैग्नेटिक स्टीकर... और उन सब के बीच सचिन और माराडोना के अख़बारों से ली हुई कटिंग.. अब तो उस जमाने के कतरन कुछ-कुछ एंटीक पीस सा माहौल बनाते हैं.. ये दो खेल एक ऐसी दीवानगी लिए हुई थी कि पहले प्यार कि दीवानगी फीकी पर जाए.. शायद जैसे-जैसे उम्र बढती जाती हैं, वैसे-वैसे ही दीवानगी कि कीमत भी बढती जाती है.. जिसे अदा ना कर पाने कि एवज में उस दीवानगी से मरहूम रह जाते हैं..

मैट्रिक में खराब नंबर आने पर मैंने कहा, सचिन भी तो एक दफे फेल हो चुका है.. तो मैंने कौन सा बुरा काम कर दिया.. फिलहाल जो नंबर आया था उसकी सजा अब तक भुगत रहा हूँ.. थ्रू-आउट सिक्सटी परसेंट का होर्डिंग लगभग हर नौकरी देने वाले के दरवाजे पर टंगे दीखते हैं.. मानो एक ऐसा गुनाह किया हो जिसका मुआफीनामा भी कबूल नहीं..

फिर कुछ दिन यूँ ही गुजरे.. सचिन कप्तान बने और खुद कप्तानी छोड़ी.. उन दिनों उनके किसी इंटरव्यू में पढ़ा था और उसका खूब मजाक भी बनाया था.. सचिन ने कहा था कि उसका सपना वन डे में पन्द्रह हजार रन बनाने का है.. और तब सचिन उस खूबी से अपनी बल्लेबाजी कि जिम्मेदारियों को नहीं निभा पा रहे थे.. हम भी किसी संगदिल बेवफा सनम कि तरह सचिन का साथ छोड़ गांगुली के हिस्से टपक गए थे.. फिर 1996 आया और चला गया.. सचिन ने खूब खेला, मगर लोगों को काम्बली का रोता चेहरा और श्रीलंकाईयों का खुशी से उछालना ही याद रहा.. तब तक पटना का सफर हमने भी तय कर लिया था.. एक ऐसा युग जिसे मैं सचिन का डार्क एज कहता हूँ..

फिर सचिन ने कप्तानी खुद छोड़ी और पहुंचे बंगलादेश.. इंडिपेंडेंस कप खेलने.. १८ जनवरी का वह तारीख मुझसे भूले भी ना भूलता है.. जब पहली बार किसी टीम ने तीन सौ से अधिक आंकडो का पीछा करते हुए उसे हराया था.. अब अगर जीतने वाला भारत हो और हारने वाला पकिस्तान, और वह भी कोई रिकार्ड का सा बनाते हुए, तो भला उस तारीख को भूलने का जुर्म हम कैसे कर सकते हैं? फिर वह साल तो जैसे सचिन के ही नाम होकर रह गया.. पूरे नौ शतक.. कई खिलाडी पूरे जीवन भर नौ शतक नहीं बना पाते हैं और इस खुदा ने एक साल में वह कर दिखाया.. फिर वह शारजाह कि जमीं पर लगातार लगाये दो शतक, जिसने शेन वार्न के जीने कि दिशा ही बदल कर रख दी, उसे भला कौन भूल सकता है.. पहले लगाये शतक में पहले लगाये दो छक्कों के बार कमेंट्री बाक्स में जो हलचल और रोमांच पैदा की थी, वह रोमांच मैंने अभी तक के किसी भी टेलीविजन कमेंट्री में नहीं सुनी है..

एक किस्सा याद आ रहा है.. स्कूल में मार-पीट करने जैसे आवारा कामो कि सीख भी यही रहनुमा दे गया है मुझे.. तब कहीं से कोई खबर पढ़ी थी कि सचिन को बचपन में टेनिस खिलाडी बनने का शौक था और इसके हीरो शायद जिमी कार्नर हुआ करते थे.. फिर क्या था.. हमने तो बेफिक्री में कह दिया, सचिन सचिन है.. यह आज अगर टेनिस भी खेलता होता तो भारत के पास ३०-४० ग्रैंड स्लैम होते.. कुछ लड़के इसे मानने को तैयार नहीं थे.. अब कोई मेरे खुदा को ना माने और हम उसे काफिर ना करार दें, ऐसा भी कहीं होता है.. बस वह मुलाक़ात उसी वक्त मुक्का-लात में भी बदल गई.. सनद रहे के आवारागर्दी कि डायरी को मोटी करने में, कुछ पन्ने सचिन के नाम भी शहीद हुए है..

लिखते ही जा रहा हूँ.. अभी इसे यहीं रोकता हूँ.. अगर मिज़ाज ठीक रहे तो आगे भी लिखूंगा.. :)

Wednesday, February 24, 2010

मेरा सामान

एक दफ़ा जब याद है तुमको,
जब बिन बत्ती सायकिल का चालान हुआ था..
हमने कैसे, भूखे-प्यासे, बेचारों सी एक्टिंग की थी..
हवलदार ने उल्टा एक अठन्नी देकर भेज दिया था..
एक चव्वनी मेरी थी,
वो भिजवा दो..

सावन के कुछ भींगे-भींगे दिल रक्खे हैं,
और मेरी एक ख़त में लिपटी रात पड़ी है..
वो रात बुझा दो,
और भी कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है,
वो भिजवा दो..

पतझड़ है कुछ,
पतझड़ में कुछ पत्तों के गिरने की आहट,
कानों में एक बार पहन कर लौट आई थी..
पतझड़ कि वो साख अभी तक कांप रही है..
वो भिजवा दो,

एक सौ सोलह चांद की रातें,
एक तुम्हारे कांधे का तिल..
गिली मेंहदी की खुश्बु,
झूठ-मूठ के शिकवे कुछ..
सब भिजवा दो..

Monday, February 22, 2010

दिमाग का एक और फितूर


मन में ठान लिया था कि अब नहीं सोचूंगा, बहुत सोच लिये और सोच-सोच कर दुखी भी हो लिये.. अब खुश रहना चाहता हूं.. वैसे भी जीवन ने यही पाठ पढ़ाया है कि जिसके लिये हम सोचते हैं और दुखी होते हैं उसके लिये हमारे प्रति उन सोच, प्यार, आदर, सम्मान का कोई मोल नहीं होता है.. और जिसे हम बस यूं ही लेकर चलते हैं तो बाद में पाते हैं कि खजाना उधर ही छुपा हुआ है.. अधिकांश अनुभव तो ऐसे ही हैं अपने..

जिंदगी फिर एक नई करवट लेने का प्रयत्न कर रही है.. पता नहीं इस बार ऊंट किस करवट बैठेगा? बचपन से इस बात को घुट्टी में घोंट के पिला दिया गया है कि परिवर्तन ही संसार का अकाट्य सत्य है, और ये मन है कि जब तब इस बात को मानने से इंकार करने लगा तब जिंदगी ने भी वापस वही पाठ पढ़ाया.. पता नहीं दूसरे किस प्रकार के होते हैं, मैं तो किसी भी परिवर्तन से बहुत घबराता हूं.. चाहे बात रिश्तों में हुये परिवर्तन की हो या फिर किसी साफ्टवेयर का नया अपग्रेड वर्सन ही उपयोग में लाना हो.. हां, नई तकनीक को आसानी से स्वीकार करना व्यसायिक मजबूरियों ने सीखा दिया है, सो अब यहाँ सब आसान लगने लगा है.. नहीं तो वह भी आसानी से बदलना नहीं चाहता था मैं.. देखता हूँ कि जिंदगी कब सिखाती है परिवर्तन को आसानी से स्वीकार करना?

हां, मैं स्पष्ट रूप से स्वीकार करता हूं कि मुझे परिवर्तन अधिक नहीं सुहाता..

अभी घर जाने की कवायद चल रही है.. दफ़्तर में छुट्टियां लेने से लेकर कुछ खरीददारी करने तक.. हर बार घर जाने से पहले सोचता हूं कि मां से खूब बातें करूंगा.. जो बातें फोन पर नहीं कर पाता हूं, या फिर जिसे फोन पर कहने में हिचक होती है, वो सब कह डालूँगा.. मगर ये हो नहीं हो पाता है.. किसी ना किसी प्रकार कि व्यस्तता घेर लेती है.. फिर भी अगर समय निकलता है और मम्मी के गोद में सर रख कर चैन से लेटा होता हूं तब पाता हूं कि सामने वह बात कहना और भी मुश्किल है.. फोन अधिक आसान कर देता है कुछ भी कहना.. कई बाते ये सोच कर भी नहीं कहता हूँ कि शायद कह दूं तो वे यह सोच कर परेशान होंगे कि बेटा उदास है या फिर परेशान है..

छः साल बाद होली पर घर में रहूंगा.. मुझसे अधिक उत्साहित घर के लोग हैं.. एक तरह से इंतजार किया जा रहा है मेरा वहां..

फिलहाल तो छाया गांगुली जी का गाया एक गीत सुन रहा हूं.. जिसके बोल हैं,

"जब फागुन रंग झमकते हों,
तब देख बहारें होरी की..
परियों के रंग दमकते हों,
जब शीशे जाम झलकते हों..
महबूब नशे में छकते हों..
तब देख बहारें होरी की.."


अगर मौका लगा तो अगले पोस्ट में इसे पोडकास्ट करता हूँ.. :)

चित्र गूगल से सर्च करके लिया गया है. जिस साईट से लिया गया है वहाँ कापीराईट का कोई T&C मुझे नहीं दिखा. अगर किसी को आपत्ति हो तो बताये, आपत्ति जायज होगी तो चित्र हटा लिया जायेगा.

Monday, February 15, 2010

समय बड़ा बलवान हो भैया!!

जैसे-जैसे समय भागता जा रहा है, ठीक वैसे-वैसे ही मायूसी भी बढ़ती जा रही है.. लगता है जैसे दोनों समानुपाती हैं.. डर लगता है, कहीं मायूसी डुदासी का और उदासी अवसाद का सबब ना बन जाये.. मुझे इस मायूसी के कारणों का भी ज्ञान है, मगर वे कुछ वैसी ही बातें हैं जिसे मैं किसी से भी बांटना नहीं चाहूंगा!! देखता हूं कि आगे क्या होता है? वैसे भी कहा गया है, "समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता है" और मजे कि बात ये है कि आजकल मैं ये मानने भी लग गया हूँ..

कल रात बैंगलोर से बस पकड़ते समय मम्मी को एक एस.एम.एस.लिखा था.. "miss you mommy!! :'( "