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कोई अपने ही घर में चोरी करता है क्या? नहीं ना? मगर मैंने किया है.. ज्ञान जी के शब्दों में यह रीठेल है.. यह कविता मेरे एक बेहद पुराने पोस्ट पर डा.अमर जी ने कमेंट किया था जिसे यहां ठेले जा रहा हूं.. आजकल ब्लौगिंग करने की फुरसत भी नहीं है और कुछ लिखने की इच्छा भी नहीं, तो सोचा क्यों ना अपना शौक कुछ इसी तरह पूरा कर लूं, अपने ही पोस्ट से चुरा कर कुछ डालता चलूं.. :) तुम भी तो कोडिंग किये जा रहे हो,
हम भी ये कोडिंग किये जा रहे हैं,
ज़हन में दोनों के खयाल है लरज़ा,
क्यों बेसाख़्ता ज़िंदगी जिये जा रहे हैं ??
ये डिफेक्टों की लिस्ट में ये बगों का सामना,
दोनों ही बैठे किये जा रहे हैं,
PM ही जीता है लड़ाई में आखिर,
ज़ख़्म क्यों हम ही झेले जा रहे हैं ??
रहे सामने वो क्लायंट की हाज़िरी में,
हम ही क्यों पर्दे के पीछे जा रहे हैं !!
C.E.O. के Ethics किसी ने न देखे,
हमें ही सारी ट्रेनिंग दिये जा रहे हैं !!
HR यहां है, Manager वहां है,
हमारे सिवा क्या मैनेज किये जा रहे हैं ??
ब्रेक-डाउन में सैलरी के किये हैं घपले,
हम हैं कि सब कुछ सहे जा रहे हैं !!!
पता है हमें भी, पता है तुम्हें भी,
कि सपने कैसे कैसे बुने जा रहे हैं !!
कभी न कभी तो PM बनेंगे,
अरमान यही दिल में किये जा रहे हैं !!
करेंगे वो ही जलसे, के घूमेंगे हम भी,
प्लानिंग अभी से किये जा रहे हैं…
हैं हम भी ढक्कन! कि कोडिंग के बदले
ये फालतू की लाईनें लिखे जा रहे हैं …
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अच्छा लगा, दुबारा पढ़ कर।
ReplyDeleteबढ़िया है..यथार्थ ही कहें.
ReplyDeleteपर ये केवल PM को ही सारी बुराई क्यों, उसकी भी तो मजबूर किया जाता कभी कोडर मजबूर करता है कभी क्लाईंट !!
ReplyDeleteहमारा दर्द जाने न कोय..
कोडिंग के बदले ये फालतू की लाईनें हमने भी पढीं
ReplyDeleteसच्ची
बी एस पाबला
हा हा...लाजवाब शब्द-बंदी प्रशांत। पहले नहीं पढ़ी थी मैंने। अच्छा किया इसे रिठेल कर।
ReplyDeleteरि ठेल से नए लोगों को ज्ञान मिलता है :)
ReplyDeleteबहुत बढिया!!
ReplyDeleteकोडिंग को डिकोडित करती कविता।
ReplyDeleteसही मायने में यही है ब्लॉगंग!
ReplyDeleteman prasann hua padhkar... :)
ReplyDeleteवाह ! वाह !
ReplyDeleteथैंक्यू दोस्तों, यहां टिपियाने के लिये.. :)
ReplyDelete@ विवेक रस्तोगी जी - घबराते काहे को हैं, कल को हमारा भी हाल आपके जैसा होना ही है.. :)
@ फ़लक भाई - सुस्वागतम.. पहली बार हमारे घर पर आकर टिपियाने के लिये.. :)