Tuesday, October 13, 2009

एक बीमार की बक-बक

मेरे ख्याल से बीमार आदमी या तो बेबात का बकबकिया हो जाया करता है या फिर चुपचाप अपने में सिमटा रहता है और यह समय भी बीत जायेगा जैसे ख्यालों में रहता है.. जब तक घर में था तब जब कभी पापाजी बीमार पड़ते थे, उनके मुख से अनवरत कविता-कहानियों का निकलना चालू हो जाता था.. एक से बढ़कर एक कविता-कहानी.. किसी आशु कवि की ही तरह हर बात पर उनके पास एक कविता हाजिर मिलती थी.. वह जमाना ब्लौग का नहीं था, नहीं तो कम से कम 15-20 पोस्ट बस उन दो दिनों की बीमारी में ही बन जाती..

जहां तक मेरी बात है तो, बीमार पड़ने पर मैं किसी को उस समय नहीं बताता हूं, ठीक होने के बद ही किसी को इसके बारे में बताता हूं कि बीमार था.. मेरी दिनचर्या भी अन्य दिनों की तरह ही हुआ करती थी, मगर अभी हाल में कुछ बड़ा वाला बीमार पड़ गया था, जिसमें किसी को कुछ बताने की जरूरत नहीं पड़ी.. मेरे चेहरे पर ही हाल लिखा दिख रहा था.. अब घर में कोई था तो नहीं, सो अकेले में मैं भी खूब बकबकाया.. इतना हुनर खुदा ने दिया नहीं है कि खुद अपनी कविता बनाऊं सो कुछ पुरानी कविता-कहानी को ही याद करता रहा..

एक दिन बैठे-बैठे(कह सकते हैं लेटे-लेटे) मैंने सोचा कि अपनी वसीयत भी लिख ही दूं.. क्या पता शाम तक रहूं-ना-रहूं.. चंद चीजों के शिवा अपने पास था ही क्या जो किसी के नाम लिखूं.. सो उन चंद चीजों का ही बंटवारा कर डाला..

मेरा वसियतनामा -
एक अदद बाईक है मेरे पास.. दो मित्र साथ में रहते हैं जिसमें से एक को बाईक चलाना आता नहीं है.. सो जिसे चलाना आता है बाईक उसकी.. बाकी बचा एक टीवी, दो मोबाईल, एक आई-पॉड, एक लैपटॉप और कुछ बरतन.. सो उसे दूसरे मित्र के नाम कर देना ठीक लगा..

एक आखिरी इच्छा भी बताई अपने मित्र शिवेन्द्र को.. मैंने उससे कहा कि अगर शाम में ऑफिस से लौटो और मेरी लाश को पाओ तो घबराना मत.. और मेरी लाश के टुकड़े-टुकड़े करके चील-कौवों को खिला देना.. किसी के तो काम आ सकूं.. ;-) वैसे मेरा मित्र शिव कुछ ऐसा है कि एक बार शायद किसी तेलचट्टे को या चूहे को मार रहा था और उसे देखकर शिव लगभग रो ही दिया था.. अब ऐसे में मेरे लाश के टुकड़े-टुकड़े करना उसके लिये किसी पहाड़ तोड़ने से कम तो नहीं ही होता..

एक कविता भी लिख डाली जो मेरी नहीं, अनंत कुशवाहा जी कि है..
बाद मरने के, मेरी कब्र पर उगाना बैगन..
मेरी वो को भुरता बहुत पसंद है..


खैर, मैं फिलहाल ठीक हो चुका हूं.. बेचारों को जो भी मिलना था सो अब नहीं मिल पायेगा.. :)

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4 comments:

  1. लो बताओ..! तुम तो ठीक हो गए.. और हम यहाँ बैंगन के बीज लिए बैठे है..

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  2. अजी मर कर दोस्तो से बदला लेने का पक्का इंतजाम कर दिया था, आप की बाईक ले ले ओर लाश के टुकडे टुकडे यानि सीधा कत्ल का ... ओर गये सीधे जेल मै.... राम राम भाई रहम खाओ दोस्तो पर, माना सारे काम आप से करवा लेते है, अजी हम भी रहे है दोस्तो के संग, काम हम ने भी बांटे... लेकिन उन्हे जेल का .... ना बाबा:)
    चलिये आप अच्छे हो गये, बडिया है, अब कुश के बेंगन के बीज ???

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  3. शुक्र है,तुम ठीक हो गये मगर ये तो बताओ कि बैंगन का भुर्ता किसे पसंद है?

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  4. बाकी तो ठीक लेकिन बैगन वाली लाइन आज का स्टेटस मैसेज बनेगी. :)

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