Saturday, November 29, 2008

सबसे बुरी चीज होती है संस्कार

अगर ढंग से जीना हो तो सबसे पहले संस्कार को त्यागना होगा.. हमारा संस्कार ही किसी भी कार्य को करने में सबसे बड़ी बाधा बनती है.. कुछ उदाहरण मैं देना चाहूंगा, मैं अपने कार्यालय में कई बार जितना काम करता हूं उसका दोगुना या ढेड़ गुना दिखाता हूं.. मन में बहुत तकलीफ होती है.. ऐसा लगता है कि मैं गलत कर रहा हूं.. मगर अगर ऐसा ना करूं तो सबसे बड़ी समस्या पैदा हो जायेगी.. ढ़ंग से जीना भी हराम हो जायेगा.. मगर मन की तकलीफ का क्या करूं? वो तो हर पल सालता रहता है..

घर के दिये संस्कार हर पल बीच में आते रहते हैं.. कुछ भी गलत करने जाओ, बस मन के भीतर एक दूसरा मन रोकता है.. बताता है कि ये गलत है.. और बस हो गया, तरक्की का एक रास्ता बंद.. लेकिन एक बात तो जरूर है कि बाद में उसी फैसले पर गर्व सा महसूस होता है.. मगर आगे बढ़ने का रास्ता बंद..

ये क्षणिक विचार आये हैं मन में, मुझे पता है कि कई भाई इससे सहमत नहीं होंगे, मगर क्या करूं अभी यही विचार मन में आ रहे हैं.. खैर तब तक आप ये गीत सुने, ये पोस्ट लिखते हुये मैं यही गीत सुन रहा हूं..

कोई सागर दिल को बहलाता नहीं..
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दिन ढ़ल जाये हाये, रात ना जाये..
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10 comments:

  1. ये संस्कार भले ही आप की तरक्की के मार्ग में रोड़ा लगते होंगे। लेकिन वे आप को गलत रास्ते पर भटकने से रोकते हैं। यह हमारे पेशे में भी बहुत है। झूठ बोल कर क्लाइंट पटाना और फिर उस से धन ऐंठना खूब चलता है। लेकिन उन के दफ्तर हमेशा नए मुवक्किलों से भरे रहते हैं। हमारे दफ्तर को पुराने ही छोड़ कर नहीं जाते। आप कुछ बरसों में देखेंगे कि आप को कोई कंपनी छोड़ना नहीं चाहेगी। लेकिन तब साहस कर के आप को पुरानों को छोड़ना और नयों को अपनाना पड़ेगा। तब आप जानेंगे कि यह आप के संस्कारों की वजह से ही है।

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  2. एक अच्छा संस्कारी व्यक्ति ना किसी के सामने झुकता है, ना किसी को झुकाता है, लेकिन दुनिया खुद व खुद ही उस के समाने झुकती है,जिस भी व्यक्ति मै अच्छे संस्कार है , उसे किसी प्रकार का लोभ डगा नही सकता, मत छोडना अगर कोई अच्छी आदत है तुम मै.क्योकि यह वो धन है जो उम्र के साथ बढता है.
    धन्यवाद

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  3. आपने अपनी स्वाभाविक मनोदशा का चित्र खींचा है, पर हमारा संस्कार कहीं बढ़ा नहीं बनता. संस्कार व्यक्तित्व के निर्माण का एक हिस्सा है . मनुष्य का बहुत बड़ा विशेषण संस्कारवान होना भी है .

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  4. असल में हमारे चरित्र निर्माण में हमारे संस्कारों की भूमिका ज्यादा रहती है ! जैसे दया धर्म का मूळ है, यह हमें बाल-घुट्टी के रूप में पिलाया गया है , और हम इन कमीने आतंकियों से दयास्वरूप पेश आते हैं , फ़िर ये कमीने चंद सप्ताह बाद आकर फ़िर हमारी छाती के छिद्रों में गोलियाँ भोंक देते हैं !

    आपका लेख बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है

    रामराम !

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  5. सही लिखा है और अच्छा लिखा है।

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  6. प्रशांत बाबू... बड़े निराश लग रहे हो भाई.. क्या बात है.. कहीं प्यार - व्यार तो नहीं हो गया..

    वैसे गुरु मनो या न मानो, ये संस्कार ससुरी है बड़े काम की चीज़... 'They act as our guiding principle'

    वैसे शायद मुझको ऐसा प्रतीत हो रहा है, कि आप शायद सामजिक बंधनों को संस्कार कह के मिक्स कर रहे हैं.... दुनिया की एक परसेंट मत सुनिए.. सब बेकार है.. अगर आप सोचते हैं, कि संस्कार का मतलब समाज के बनाये हुए नियमों का पालन करना तो .. नहीं नहीं प्रशांत बाबू... आप गडबडा रहे हैं...

    जो आपको सही लगे... अपने संस्कारों के हिस्साब से करें... बाके दुनिया जाए भाड़ में :)

    लिखते रहिये.. अच्छा लिखते हैं आप... लगा कि आप कुछ निराश हो गए.. बहुत ही घर और जमीन से जुड़े हुए हैं आप... पीड़ा भी थोड़ा ज्यादा होगी.. पर हार थोड़े ही ना मानना है..

    लगे रहिये..

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  7. संस्कार और रूढिवाद में अंतर है भाई। संस्कार समाज को बनाता है और उसे छोडने का ही दूसरा नाम है आतंकवाद।

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  8. प्रशांत जी, संस्कार उतने बुरे भी नहीं होते, हाँ उनके साथ सांसारिकता से सामंजस्य बना पाना थोड़ा कठिन जरूर होता है. लेकिन यह कर पाने को ही तो ज़िन्दगी कहते हैं.

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  9. मेरे अपने दृ्ष्टीकोण से संस्कारों का त्याग् कर मनुष्य अपनी नैसर्गिक शीलता और सुन्दरता को खो देता है ।
    अपने दिल की नेकी बेच कर, क्या करोगे अगर बहुत बडे आदमी भी बन गये हो तो । क्या फायदा है ऍसा जीवन व्यतीत करने का जो कठोरता और मर्यादा हीनता से ही भरा हुआ हो .

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