Sunday, May 04, 2008

एक दिन अचानक

एक दिन अचानक
सब रूक सा जाता है..
पंछियों का शोर
मद्धिम सा पर जाता है..
एक आदत
जिसके छूट जाने का भय
ख़त्म सा होता दिखता है
जीने की आदत..

एक ओस की बूँद
किसी आँखों से टपकती
सी दिखती है..
एक दिन अचानक...

राग-दरबारी का शोर
सुनाई देना बंद सा हो जाता है..
मानो बहरों की जमात में
हम भी शामिल हो गए हैं..
कुछ न कह पाने से
गूंगे होने का अहसास
बढ़ता जाता है..
एक दिन अचानक...

एक लकीर सी खींचती दिखती है..
किसी धुवें की तरह..
कुछ दीवारों पर
तो कुछ दिल पर..
एक दिन अचानक...

Related Posts:

  • धोनी की घोड़ी, पहली बार सिर्फ इस ब्लॉग परआज मैं लेकर आया हूँ उस घोड़ी को जिस पर धोनी सवार होकर मंडप तक गए!! एक्सक्लूसिव, सिर्फ और सिर्फ, इसी ब्लॉग पर!! हमारे संवाददाता लगातार बने हुए हैं देहरा… Read More
  • "एक शहर जो हर शहर में बसता है" और बिहार2003 में पहली बार घर से बाहर पाँव रखा और दिल्ली कि और निकल पड़ा.. मुनिरका में अपना आसरा बनाया.. हर शहर में एक ही शहर बसता है.. मैंने पाया कि हर शहर में… Read More
  • एक कलयुगी जातक कथाइधर-उधर कि बात किये बिना मैं सीधे प्वाइंट पर मतलब कहानी पर आता हूँ..एक धोबी के पास एक गधा और दो कुत्ते थे.. गधा गधामजूरी करता था और दोनों कुत्ते घर कि… Read More
  • तबे एकला चलो रे।यह लड़ाई किससे है? कैसा है यह अंतर्द्वंद? लग रहा है जैसे हारी हुई बाजी को सजा रहा हूँ फिर से हारने के लिए । अंतर्द्वंद में कोई भी मैच टाई नहीं होता है,… Read More
  • "परती : परिकथा" से लिया गया - अंतिम भागगतांक से आगे :गुनमन्ती और जोगमन्ती दोनों बहिनियाँ अपने ही गुन की आग में जल मरीं ।...सास महारानी झमाकर काली हो गयी !उजाला हुआ । कोसी मैया दौड़कर दुलारीद… Read More

8 comments:

  1. प्रशान्त बहुत ही भाव भीनी कविता हे,लगता हे यह कविता दगॊं, या कुछ ऎसे ही हालात पर लिखी हे, यह कविता अति सुन्दर हे...
    एक लकीर सी खींचती दिखती है..
    किसी धुवें की तरह..
    कुछ दीवारों पर
    तो कुछ दिल पर..
    एक दिन अचानक...
    सब कुछ बेगाना सा लगता हे.
    धन्यवाद

    ReplyDelete
  2. बहुत ही भाव भीनी कविता हे

    अति सुन्दर

    ReplyDelete
  3. बहुत गहरे भाव हैं, बधाई.

    ReplyDelete
  4. आप की इस कविता का भाव बहुत ही उदासी भरा है। जैसे कोई महाप्रयाण पर जा रहा हो। ऐसा क्यों भाई? इस समय तो हम आप से ऊर्जावान आशावादी कविताओं की आशा कर सकते हैं।

    ReplyDelete
  5. ऐसी कविता लिखेंगे तो कविता पढ़ने की लत लग जाएगी।

    ReplyDelete
  6. इस कविता को पसंद करने के लिये आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद..
    @दिनेश जी - जब मेरा मन बहुत उदास होता है तभी कविता बाहर निकलती है.. इसमें मेरी कोई गलती नहीं है.. :)

    ReplyDelete
  7. देर से आया हूँ....अच्छी कविता के लिए बधाई...
    उदासी घर पे नासिर बाल खोले सो रही है जैसा भाव है....
    उदास रहना और होना बुरा नहीं है....आप उदास हों और और लिखें....

    ReplyDelete
  8. @ बोधिसत्व : आपके पत्र के लिये धन्यवाद.. सही कहूं तो मुझे पता ही नहीं था की आप मेरा चिट्ठा पढते भी हैं.. आपके कमेंट से बहुत प्रोत्साहन मिला.. :)

    ReplyDelete