Saturday, April 19, 2008

संघर्ष के दिनों का सच्चा साथी

मेरी यह रचना कल रेडियोनामा में छाप चुकी है और यह संभव है की आपमें से अधिकतर ये पोस्ट पहले ही पढ़ चुके होंगे.. मगर ये फिर से अपने चिट्ठे पर डालने का मकसद यह है की मेरे कई मित्र और सबसे खासतौर पर मेरे पापाजी जो बस मेरे चिट्ठे को जानते हैं और किसी और चिट्ठे पर नहीं भटकते हैं, वो भी इसे पढ़ सकें..


यूँ तो रेडियो से नाता बचपन से ही जुडा हुआ है मगर इसने सच्चे साथी की तरह तब साथ निभाया जब मैं अपने संघर्ष के दिनों में था और अक्सर अवसादों से घिर जाया करता था.. मैं उस समय BCA के अंतिम साल का छात्र था और अपने आखिरी सेमेस्टर में किसी भी आम बिहारी छात्र की तरह दिल्ली की और रवाना हो गया था.. वैसे तो मैं स्व-अध्ययन के लिए दिल्ली गया था जो मैं घर में रह कर भी कर सकता था.. मगर अपने शहर की मित्र मंडली से पीछा छुडाने के लिए ये बहुत ही जरूरी था.. मैं जब घर से निकला तो पापाजी ने मुझे एक ट्रांजिस्टर भी साथ में दे दिए जो उन्हें किसी ने दुबई से लाकर उपहार स्वरूप दिया था.. सन् २००४ में वैसा डिजिटल रेडियो मैंने शायद ही किसी के पास देखा था या फिर ये भी कह सकते हैं की मैंने उस समय तक ज्यादा दुनिया ही नहीं देखी थी..

पहली बार घर से निकलने पर जो कुछ भी किसी युवा में मन में चलता रहता है कुछ वैसा ही मेरे मन में भी चला करता था.. सोचता था की अब घर लौटूंगा तो कुछ बन कर ही.. मैंने अपने जीवनकाल में अब तक सबसे ज्यादा मेहनत भी वहीं किया था और कभी-कभी अवसाद में भी घिर जाता था.. मैंने दिल्ली पहुंच कर मुनिरका में अपना अड्डा जमाया जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के बिलकुल पास था सो उस विश्वविद्यालय को भी पास से देखने का मौका मिला.. दिन भर मैं JNU के पुस्तकालय में बैठ कर पढ़ता था.. वहाँ बाहरी लड़कों का बैठना मन था मगर जो कोई भी JNU जानते हैं वो ये भी जानते होंगे की ये बहुत ही आम है वहाँ..

वापस अपने कमरे में लौटते-लौटते रात के १० बज जाया करते थे और फिर शुरू होती थी हमारी रेडियो मंडली.. मैं जिस घर में रहता था उसमे ६ मंजिल थे और रात होते ही एक अलग नजारा होता था.. किसी मंजिल से FM Gold बजता होता तो कही कोई अंग्रेजी गाना.. कोई लव गुरू बड़े ध्यान से सुनता तो कहीं नए हिंदी फिल्मो के गाने.. हाँ मगर एक बात तो तय थी की मेरा रेडियो लगभग पूरी रात अपने ही धुन में बजता होता था और अधिकांशतः FM Gold पर ही जाकर अटका होता था.. जब पढ़ते हुए मन उचट जाता तो अपने उसी नोटबुक के पन्नों को मैं उन हसीन शब्दों से रंगीन करने लग जाता जो उस समय रेडियो पर आता होता था..

फिर समय आया जब हमारे BCA की अंतिम परीक्षा होने वाली थी और लगभग एक-एक करके मेरे सभी साथी मुझे छोड़ कर वापस पटना चले गए.. कुछ इस भाग दौर की जिंदगी से बचने के लिए हमेशा के लिए दिल्ली से अपना बोरिया बिस्तर बाँध लिए तो कुछ के साथ पैसे की समस्या थी.. जब सारे लोग वापस चले गए तो मैंने भी वहां से अपने भैया के घर में शिफ्ट होने का सोचा जो वहीं दिल्ली में भोगल में रहते थे(उस समय कुछ लोगों को बहुत हैरानी होती थी की दोनो सगे भाई अलग क्यों रहते हैं, खैर इस पर कभी और चर्चा करूंगा), मगर जाने से पहले लगभग १५ दिन मैं वहां अकेला रहा था और मेरी दिनचर्या वही बनी रही.. हाँ एक बदलाव जरूर आया की अब रात में कोई मुझसे लड़ता नहीं था की रेडियो बंद करो या फिर तुम्हारे पुराने गीत और गजल से तो मैं तंग आ चूका हूँ.. मेरा तो यही मानना था की सारे साथीयों के चले जाने के बाद भी रेडियो ही मेरा ऐसा सच्चा साथी था जो हर समय मेरा साथ निभाता रहा.. कभी गीतों के साथ तो कभी खबरों के साथ..


Keywords : JNU, New Delhi, All India Radio(AIR), My Old Memories

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3 comments:

  1. सच्चे साथी रेडियो काआप साथ मत छोडिए और क्या कहूँ ।

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  2. सच्चे साथी रेडियो काआप साथ मत छोडिए और क्या कहूँ ।

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  3. बहुत खुब अच्छा साथी था या अब भी हे? क्यो कि कार चलाते वक्त मे हमेशा रेडियो ओन रखता हू,जो मुझे चुस्त रखता हे,

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