आज डा.अनुराग आर्य के एक पोस्ट पर राजेश रोशन जी का एक कमेंट आया, उनकी बातें अपनी जगह पर सही भी है मगर मुझे उस पर कहने को कुछ था सो मुझे मेरा अपना ब्लौग मंच ज्यादा सही लगा.. उन्होंने कहा :
अगर मैं गलती नहीं कर रहा हूं तो ऐसा क्यों होता है कि जो बहुत कुछ कर सकते हैं केवल कलम चलाते हैं... अब कीबोर्ड चलाने लगे हैं... मैं भी और आप भी... हम उत्तेजना पैदा कर देते हैं. मॉनीटर के सामने बैठकर पोस्ट पर शानदार, बहुत अच्छा और पता नहीं कितने ही झूठी-सच्ची उपाधि दे देते हैं लेकिन इससे होगा क्या....
समस्या जस की तस बनी रहेगी. कुछ ऐसा काम करना होगा जो समाज में भद्र भी कहलाए और लोग वाह वाह भी कहें....तो पोस्ट ही लिख लो....
यह कमेंट मैं पोस्ट पर नहीं कमेंट्स को पढ़ कर दे रहा हूं....
सब बकवास है...काम करने की बारी आएगी तो तिनका नहीं हिलेगा और वाह-वाह की तो लाईन लगा दी जाएगी....
सचिन आउट हो गया तो उसे ऐसा खेलना चाहिए था, उसे वैसा खेलना चाहिए था. खुद टीवी पर नजर गड़ा कर सीख दी जाती है...नेता ने कुछ किया तो हमारे देश के नेता ऐसे ही हैं...
भाई लोग हमलोग क्यों नहीं बन जाते हैं सचिन या फिर नेता और खेले अच्छा भारत के लिए....हो पाएगा क्या.... किसी के पास जवाब हो तो जरूर दीजिएगा..
यह पढ़कर मुझे अपने होस्टल के दिन याद आ गये.. मैं तॄतीय सेमेस्टर में था.. उस समय हमारे राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जी हुआ करते थे.. किसी काम से उनका वेल्लोर आना हुआ था और उसी बहाने वो हमारे कालेज कि तफरी भी कर आये.. अनका भाषण बेहद प्रेरणाजनक और उत्साह से भर देने वाला था.. उस भाषण में उन्होंने विजन 2020 कि भी बात दोहराई थी..उनकी स्पीच खत्म होने के बाद सवाल जवाब चलने लगा था.. छात्र-छात्रायें उनसे सवाल पूछते थे और कलाम जी उसका उचित उत्तर देते थे.. किसी एक छात्र ने उनसे एक प्रश्न पूछा था जिसका सार कुछ ऐसा था, "हम साधारण छात्र-छात्रायें विजन 2020 के लक्ष्य को पाने के लिये अपने स्तर पर क्या कर सकते हैं?"
उसका उत्तर उन्होंने दिया था कि, "उसके लिये हमें साधारण मानव से ऊपर उठकर माहामानव बनने कि जरूरत नहीं है.. हम अपने आम जीवन में ही जो काम करते हैं उसी को पूरी ईमानदारी से करें.." अब चूंकि उस समय हम कॉलेज में थे सो उसी प्रकार से समझाते हुये उन्होंने उदाहरण दिया था कि, "अभी तुम सभी विद्यार्थी जीवन में हो और तुम्हें पता है कि तुममें से हर एक को अपने जीवन के लक्ष्य को पाने के लिये कितनी मेहनत कि जरूरत है.. मगर अधिकांश समय हम अपने आपको धोखा देते हैं.. सोचते हैं कि इस काम को बाद में करेंगे और वो बाद कभी नहीं आता है.. जीवन में सबसे जरूरी ईमानदारी है, अगर यही ईमानदारी हम सभी में हो तो एकल स्तर पर हम आगे बढते जायेंगे और जब सभी एकल अच्छे होंगे तो प्रगतिशील और स्वस्थ समाज खुद तैयार हो जायेगा.."
उनकी यह बात बहुत सही लगी थी और जेहन में बैठ सी गई है.. ये सच है कि किसी और को धोखा देने से पहले हम सभी अपने आप को धोखा देते हैं.. अब जैसा कि राजेश रौशन जी ने कहा है, "सब बकवास है...काम करने की बारी आएगी तो तिनका नहीं हिलेगा.." उम्मीद है कि इन सबका उत्तर उन्हें कलाम जी के उक्त कथन से मिल गया होगा..
अगर मैं गलती नहीं कर रहा हूं तो ऐसा क्यों होता है कि जो बहुत कुछ कर सकते हैं केवल कलम चलाते हैं... अब कीबोर्ड चलाने लगे हैं... मैं भी और आप भी... हम उत्तेजना पैदा कर देते हैं. मॉनीटर के सामने बैठकर पोस्ट पर शानदार, बहुत अच्छा और पता नहीं कितने ही झूठी-सच्ची उपाधि दे देते हैं लेकिन इससे होगा क्या....
समस्या जस की तस बनी रहेगी. कुछ ऐसा काम करना होगा जो समाज में भद्र भी कहलाए और लोग वाह वाह भी कहें....तो पोस्ट ही लिख लो....
यह कमेंट मैं पोस्ट पर नहीं कमेंट्स को पढ़ कर दे रहा हूं....
सब बकवास है...काम करने की बारी आएगी तो तिनका नहीं हिलेगा और वाह-वाह की तो लाईन लगा दी जाएगी....
सचिन आउट हो गया तो उसे ऐसा खेलना चाहिए था, उसे वैसा खेलना चाहिए था. खुद टीवी पर नजर गड़ा कर सीख दी जाती है...नेता ने कुछ किया तो हमारे देश के नेता ऐसे ही हैं...
भाई लोग हमलोग क्यों नहीं बन जाते हैं सचिन या फिर नेता और खेले अच्छा भारत के लिए....हो पाएगा क्या.... किसी के पास जवाब हो तो जरूर दीजिएगा..
यह पढ़कर मुझे अपने होस्टल के दिन याद आ गये.. मैं तॄतीय सेमेस्टर में था.. उस समय हमारे राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जी हुआ करते थे.. किसी काम से उनका वेल्लोर आना हुआ था और उसी बहाने वो हमारे कालेज कि तफरी भी कर आये.. अनका भाषण बेहद प्रेरणाजनक और उत्साह से भर देने वाला था.. उस भाषण में उन्होंने विजन 2020 कि भी बात दोहराई थी..उनकी स्पीच खत्म होने के बाद सवाल जवाब चलने लगा था.. छात्र-छात्रायें उनसे सवाल पूछते थे और कलाम जी उसका उचित उत्तर देते थे.. किसी एक छात्र ने उनसे एक प्रश्न पूछा था जिसका सार कुछ ऐसा था, "हम साधारण छात्र-छात्रायें विजन 2020 के लक्ष्य को पाने के लिये अपने स्तर पर क्या कर सकते हैं?"
उसका उत्तर उन्होंने दिया था कि, "उसके लिये हमें साधारण मानव से ऊपर उठकर माहामानव बनने कि जरूरत नहीं है.. हम अपने आम जीवन में ही जो काम करते हैं उसी को पूरी ईमानदारी से करें.." अब चूंकि उस समय हम कॉलेज में थे सो उसी प्रकार से समझाते हुये उन्होंने उदाहरण दिया था कि, "अभी तुम सभी विद्यार्थी जीवन में हो और तुम्हें पता है कि तुममें से हर एक को अपने जीवन के लक्ष्य को पाने के लिये कितनी मेहनत कि जरूरत है.. मगर अधिकांश समय हम अपने आपको धोखा देते हैं.. सोचते हैं कि इस काम को बाद में करेंगे और वो बाद कभी नहीं आता है.. जीवन में सबसे जरूरी ईमानदारी है, अगर यही ईमानदारी हम सभी में हो तो एकल स्तर पर हम आगे बढते जायेंगे और जब सभी एकल अच्छे होंगे तो प्रगतिशील और स्वस्थ समाज खुद तैयार हो जायेगा.."
उनकी यह बात बहुत सही लगी थी और जेहन में बैठ सी गई है.. ये सच है कि किसी और को धोखा देने से पहले हम सभी अपने आप को धोखा देते हैं.. अब जैसा कि राजेश रौशन जी ने कहा है, "सब बकवास है...काम करने की बारी आएगी तो तिनका नहीं हिलेगा.." उम्मीद है कि इन सबका उत्तर उन्हें कलाम जी के उक्त कथन से मिल गया होगा..








