Saturday, November 15, 2008

डा.अनुराग आर्य जी के पोस्ट पर आये कमेंट पर कुछ बातें

आज डा.अनुराग आर्य के एक पोस्ट पर राजेश रोशन जी का एक कमेंट आया, उनकी बातें अपनी जगह पर सही भी है मगर मुझे उस पर कहने को कुछ था सो मुझे मेरा अपना ब्लौग मंच ज्यादा सही लगा.. उन्होंने कहा :

अगर मैं गलती नहीं कर रहा हूं तो ऐसा क्‍यों होता है कि जो बहुत कुछ कर सकते हैं केवल कलम चलाते हैं... अब कीबोर्ड चलाने लगे हैं... मैं भी और आप भी... हम उत्‍तेजना पैदा कर देते हैं. मॉनीटर के सामने बैठकर पोस्‍ट पर शानदार, बहुत अच्‍छा और पता नहीं कितने ही झूठी-सच्‍ची उपाधि दे देते हैं लेकिन इससे होगा क्‍या....

समस्‍या जस की तस बनी रहेगी. कुछ ऐसा काम करना होगा जो समाज में भद्र भी कहलाए और लोग वाह वाह भी कहें....तो पोस्‍ट ही लिख लो....

यह कमेंट मैं पोस्‍ट पर नहीं कमेंट्स को पढ़ कर दे रहा हूं....

सब बकवास है...काम करने की बारी आएगी तो तिनका नहीं हिलेगा और वाह-वाह की तो लाईन लगा दी जाएगी....

सचिन आउट हो गया तो उसे ऐसा खेलना चाहिए था, उसे वैसा खेलना चाहिए था. खुद टीवी पर नजर गड़ा कर सीख दी जाती है...नेता ने कुछ किया तो हमारे देश के नेता ऐसे ही हैं...

भाई लोग हमलोग क्‍यों नहीं बन जाते हैं सचिन या फिर नेता और खेले अच्‍छा भारत के लिए....हो पाएगा क्‍या.... किसी के पास जवाब हो तो जरूर दीजिएगा..


यह पढ़कर मुझे अपने होस्टल के दिन याद आ गये.. मैं तॄतीय सेमेस्टर में था.. उस समय हमारे राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जी हुआ करते थे.. किसी काम से उनका वेल्लोर आना हुआ था और उसी बहाने वो हमारे कालेज कि तफरी भी कर आये.. अनका भाषण बेहद प्रेरणाजनक और उत्साह से भर देने वाला था.. उस भाषण में उन्होंने विजन 2020 कि भी बात दोहराई थी..उनकी स्पीच खत्म होने के बाद सवाल जवाब चलने लगा था.. छात्र-छात्रायें उनसे सवाल पूछते थे और कलाम जी उसका उचित उत्तर देते थे.. किसी एक छात्र ने उनसे एक प्रश्न पूछा था जिसका सार कुछ ऐसा था, "हम साधारण छात्र-छात्रायें विजन 2020 के लक्ष्य को पाने के लिये अपने स्तर पर क्या कर सकते हैं?"

उसका उत्तर उन्होंने दिया था कि, "उसके लिये हमें साधारण मानव से ऊपर उठकर माहामानव बनने कि जरूरत नहीं है.. हम अपने आम जीवन में ही जो काम करते हैं उसी को पूरी ईमानदारी से करें.." अब चूंकि उस समय हम कॉलेज में थे सो उसी प्रकार से समझाते हुये उन्होंने उदाहरण दिया था कि, "अभी तुम सभी विद्यार्थी जीवन में हो और तुम्हें पता है कि तुममें से हर एक को अपने जीवन के लक्ष्य को पाने के लिये कितनी मेहनत कि जरूरत है.. मगर अधिकांश समय हम अपने आपको धोखा देते हैं.. सोचते हैं कि इस काम को बाद में करेंगे और वो बाद कभी नहीं आता है.. जीवन में सबसे जरूरी ईमानदारी है, अगर यही ईमानदारी हम सभी में हो तो एकल स्तर पर हम आगे बढते जायेंगे और जब सभी एकल अच्छे होंगे तो प्रगतिशील और स्वस्थ समाज खुद तैयार हो जायेगा.."

उनकी यह बात बहुत सही लगी थी और जेहन में बैठ सी गई है.. ये सच है कि किसी और को धोखा देने से पहले हम सभी अपने आप को धोखा देते हैं.. अब जैसा कि राजेश रौशन जी ने कहा है, "सब बकवास है...काम करने की बारी आएगी तो तिनका नहीं हिलेगा.." उम्मीद है कि इन सबका उत्तर उन्हें कलाम जी के उक्त कथन से मिल गया होगा..

साला बहुत बोलता है.. चिल्ल मार यार

"मालेगांव बम विस्फोट में हिंदू आतंकवादियों का हाथ बताया जा रहा है.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"फलाना कह रहा था कि ये हिंदू आतंकवादियों का काम है.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"चिलाना बोल रहा था कि हिंदू-मुसलमान आतंकवादी कुछ नहीं होता है.. आतंकवाद को धर्म से जोड़कर नहीं देखना चाहिये..

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"साध्वी का चार-चार बार नार्को टेस्ट हुआ, मगर कुछ नहीं निकला..

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"सी.बी.आई. अभी तक आरूषी के कातिलों को नहीं पकड़ पाई है.. मिडिया भी अपना टी.आर.पी.बटोर चुकी और उसे भी अब उसमें कोई इंटेरेस्ट नहीं है"

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"अरे सुना क्या? कल रात दिन दहाड़े भीड़ भरे सड़क पर मर्डर हो गया?"

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"चेन्नई में भी अब छात्र राजनीति गरमाने लगी है, जो पहले नहीं था.. अब सुना है वहां भी जे.एन.यू. और दिल्ली यूनिवर्सिटी कि तर्ज पर ए.बी.वी.पी. और आईसा के नाम दिवारों पर दिख जाते हैं.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"कल तो सुना वहां मारपीट भी हुई.. वहां भी बैकवर्ड-फारवर्ड का चक्कर है, कोई कह रहा था कि अम्बेदकर का नाम क्यों नहीं लिखा.. एक लड़का मरनाशन स्तिथी में है.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"ओबामा कह रहे थे कि आऊटसोर्सिंग बंद करा देंगे.. इससे अमेरिका में रोजगार बढेगा.. मगर भारत में तो रोजगार छिनेगा.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"फिर से चुनावी दंगल छिड़ रहा है.. टिकट के समय से ही राजनीति चालू है.. सुना है नामांकन के समय ही कईयों के सर फूटे हैं.."

"तो क्या हुआ? भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, खुश रहो.."

"राज ठाकरे बहुत नफरत फैला चुका है.."

"साला बहुत बोलता है.. चिल्ल मार यार.. भारत क्रिकेट मैच तो जीत गया ना, बस खुश रहो.."

Tuesday, November 11, 2008

मेरे हिस्से का चांद



कभी देखा है उस चांद को तुमने?
ये वही चांद है,
जिसे बांटा था तुमने कभी आधा-आधा..
कभी तेज भागती सड़कों पर,
हाथों में हाथे डाले..
तो कभी उस पहाड़ी वाले शहर कि,
लम्बी सुनसान सड़क पर..
तुमने तो रेल कि,
खिड़की से झांकते चांद को भी..
बांट लिया था आधा..
मेरे आंगन में आज,
चांद चमक रहा है आधा..
शायद तुम्हारे हिस्से का है!
मेरे हिस्से वाला चांद,
तुम्हारे आंगन में होगा..
उसे लौटा दो..
मेरे हिस्से का चांद मुझे लौटा दो..



Sunday, November 09, 2008

मम्मी! प्रशान्त मामू बैड बॉय है ना?

शनिवार, रात 12.45 -

मेरी भांजी अदिती ने मेरी दीदी से कहा, "मम्मी, मुझे प्रशान्त मामू से बात करनी है.."

"नहीं बाबू, मामू सो गये होंगे.." दीदी ने कहा.. "कल बात करते हैं.. ठीक है ना?"

"ठीक.."

रविवार, सुबह 8.30 -

"मम्मी, प्रशान्त मामू से बात करनी है.." अदिती ने फिर से कहा..

"नहीं बेटा, मामू सो रहे होंगे.." फिर से वही उत्तर..

"अदिती जग गई, मम्मी भी जग गई.. दोनों अपने टीथ में ब्रस भी कर लिये, और ब्रेकफास्ट भी कर लिये हैं.. दोनों गुड गर्ल हैं.. मामू अभी तक सो रहे हैं, प्रशान्त मामू बैड बॉय हैं ना?" उसका मासूम सा जवाब था.. :)

आज 11.30 के लगभग अदिती का फोन आया.. उसने मुझे एक कविता भी सुनाई.. आप भी सुने उसे.. :)

एक दो,
कभी ना रो..

तीन चार,
रखना प्यार..

पांच छः,
मिल कर रह..

सात आठ,
पढ़ ले पाठ..

नौ दस,
जोर से हंस.. हा हा हा...


यह एक साल पुरानी तस्वीर है.. जयपुर में ली हुई.. इसमें दीदी कि दोनों बेटियां(अदिती और अपूर्वा) अपनी नानी के साथ है.. अपूर्वा को सभी प्यार से अप्पू बुलाते हैं मगर मेरे लिये वो गप्पू है.. गप्पू जैसे उसके दोनों फुले हुये गाल जो हैं.. :)

त्रिवेणी फिर कभी, आज यह कविता सही


कविता से पहले मैं अनुराग जी को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने मुझे त्रिवेणी संबंधित कुछ बढिया बाते बताई.. वैसे मैंने एक लिखी भी है मगर वो किसी और में डालूंगा.. पता नहीं वो त्रिवेणी ही है या कुछ और.. :)
परछाई

किसी परछाई का हाथ थामा है आपने?
मैंने थामा था एक बार..
कोरोमंगला कि तेज-भागती सड़कों पर..
हल्की बारिश कि बूंदों के बीच..
ट्रैफिक के हूजूमों में..
कभी ऑटो वाले को रुकने का
इशारा करते हुये..
तो कभी उसकी
खिलखिलाती हंसी के बीच..

अब भी उन सड़कों पर पहूंच कर,
अपने अस्तित्व का अहसास
खत्म सा महसूस होता है..
मानो पूरी दुनिया किसी परछाई में,
सिमट कर रह गई हो..
यह परछाई दिनो-दिन
और गहरी होती जाती है..
जैसे अमावस रात कि कालिमा..
फिर भी अच्छा लगता है,
उस परछाई का हाथ थामना...

Saturday, November 08, 2008

"कैसी रही दीपावली?"

दीपावली बीत जाने के बाद इस यक्ष प्रश्न ने कई बार रास्ता घेरा तो कईयों से मैंने भी यही पूछा.. दीपावली बीते कई दिन हो गये और अब तो छठ भी बीत गया है, मुझे पता है कि कैसे अगले साल कि दीपावली आ जायेगी ये भी पता नहीं चलेगा.. जो याद रह जायेगा वो बस यह कि पिछली दीपावली कैसी थी.. फिर से मैं किसी से पूछूंगा कि "कैसी रही दीपावली?" और कुछ लोग मुझसे भी यही प्रश्न करेंगे..

चलिये मैं आपको बताता हूं कि कैसी रही मेरी दीपावली..

जब आप घर से 2500 किलोमीटर दूर अकेले, अपने दोस्तों के साथ होते हैं और कोई खास पर्व आपके सामने होकर गुजर जाता है तो यह पल बहुत चुभते हैं.. बस वैसी ही रही मेरी भी दीपावली.. बचपन को याद करके नौस्टैल्जिक भी खूब हुआ.. मुझे याद आ रहा था कि कैसे मैं घर के सबसे छोटे सदस्य कि भूमिका बखूबी निभाता था.. मिठाई और पटाखों कि लंबी सूची बनाता था.. कई बार घर के लोग मना भी करते थे कि इतने पटाखे मत लो.. ये बस पैसे कि बरबादी है.. मगर अधिकतर मेरी मांगे पूरी हो ही जाती थी.. जो मांगें पूरी नहीं होती थी उनके बारे में मैं सोचता था कि बड़ा होकर खूब मस्ती करूंगा.. जैसे बड़े होने पर लोगों के पास पैसे अपने आप आ जाते हैं.. अब दुनिया की नजर में बड़ा भी हो चुका हूं, पैसे भी कमाने लग गया हूं.. मगर ना जाने कहां से एक संकोच कि दिवार भी खड़ी हो गई है.. पैसे आने पर उसे बचाने का भी सोचने लगा हूं.. यह बात और है कि कुछ बचता नहीं है.. :)

सबसे ज्यादा तब अखरा जब मन में पटाखे खरीदने कि इच्छा भी नहीं हुई.. डर सा गया.. कहीं यह बड़ा होने कि निशानी तो नहीं है? कहीं मैं बड़ा तो नहीं हो गया हूं? बचपन तो बचपन, 20 साल का होने के बाद भी चुटपुटिया चलाने वाली पिस्तौल हर दीपावली पर खरीदना नहीं भूलता था.. अपने अपार्टमेंट के कुछ बच्चों को उसे चलाता देख अच्छा लगा.. लगा जैसे कि बचपन अब भी वैसा ही है जैसा आज से 20 साल पहले हुआ करता था..

पिछले साल कि दीपावली भी याद आई, जब मैं 3 साल के बाद दीपावली में घर पर था.. मगर मेरे लिये वो दीपावली इसलिये खास थी क्योंकि भैया कि शादी के समय मैंने नयी-नयी नौकरी करनी शुरू कि थी जिस कारण छुट्टी नहीं मिल रही थी और मैं बिलकुल मेहमान कि तरह 2 दिनों के लिये घर गया था.. भाभी से ठीक से बाते भी नहीं कर पाया था.. अब उसके बाद पहली बार घर जा रहा था और वो भी दीपावली मे.. अब मुझसे ज्यादा खुश और कौन हो सकता था?

यूं तो मैं पूजा-पाठ से कोशों दूर रहता हूं मगर पिछले साल दीपावली में पूजा के समय आरती बहुत मन से गाया था.. आरती गाने के पीछे कारण श्रद्धा नहीं बल्की गीत था जो मैं गा रहा था.. उस आरती वाले विडियो का प्रयोग इस दीपावली में बखूबी हुआ.. घर में बस शिवेन्द्र ही था जिसके हिस्से पूजा-पाठ करने कि जिम्मेदारी थी, मगर उसे लक्षमी-आरती याद नहीं थी और उस खाली स्थान को मेरे गाये पिछले साल के आरती वाले विडियो से भरा गया..

अक्सर घर में साफ सफाई चलती ही रहती है खासकर तब से जब हमारे घर में खटमलों ने हमला बोला था मगर अब हम उस हमले को पूरी तरह से नेस्तनाबूत कर चुके हैं.. :) मगर उस दिन पूरे घर कि सफाई सुबह उठ कर मैंने और मेरे मित्रों ने कि.. अपना घर सजाने के लिये ना जाने कितने ही मकड़ियों का घर उजाड़ दिया.. दोपहर में अफ़रोज़ भी आ गया.. घर में गैस पिछले 2-3 दिनों से नहीं था और किसी के पास ऑफिस से उतना समय नहीं मिल रहा था कि गैस भराया जाये, सो यह काम भी उसी दिन करना था.. उत्तर भारत में दीपावली के दिन लोग अपनी दुकानें खुला रखते हैं और उनके बीच यह मान्यता है कि दुकान जितना चलेगा, लक्ष्मी उतना ही घर में आयेगी.. मगर उसके ठीक उलट यहां लोग अपनी दुकाने बंद किये हुये थे.. घर के पास वाले जिस होटल में हम खाते हैं, वो भी बंद था सो दुसरे होटल में जाना परा.. गैस वाले ने गैस तो रख ली मगर बोला कि आज ही दे पाना संभव नहीं होगा.. सो उस दिन बिना गैस के ही काम चलाना पड़ा..

सांझ ढलते-ढलते प्रियंका भी घर आ गयी.. फिर शिवेन्द्र और प्रियंका जाकर कुछ दिये और मोमबत्ती का इंतजाम भी कर आये.. थोड़ी देर बाद प्रियंका अपने घर पूजा करने चली गयी.. रात में जितनी थोड़ी सी गैस बची हुयी थी उससे मैगी बनाई फिर सो गये.. जहां फोन पर बधाईयां देनी थी वह भी दे डाला मगर बाहर से फोन कम ही आये, क्योंकि उत्तर भारत में दीपावली अगले दिन था..

अब सोचता हूं तो लगता है कि कैसे किसी पर्व-त्योहार पर पापा-मम्मी हमारी लगभग हर मांग पूरी करते थे? उनके पास कोई कुबेर का खजाना तो था नहीं.. वही बंधा-बंधाया वेतन मिलता था.. पांचवे वेतन आयोग के आने से पहले तो बहुत ही कम हुआ करता था.. अब पाता हूं कि हमारी हर मांग को पूरा करने के लिये वो कहीं ना कहीं अपने भविष्य कि योजनाओं में कटौती करते रहे होंगे.. क्योंकि अब समझ गया हूं, बड़े होने पर पैसा अपने आप नहीं चला आता है.. उसके लिये मेहनत करनी होती है..

अभी मैं सोच रहा था कि डा.अनुराग जी जैसे ही कोई त्रिवेणी हम भी अंत में लगाते हैं.. कुछ अजीब सा बन पड़ा जो मैं नहीं लिखने वाला हूं.. उम्मीद है डा.साहब ही अब इसका इलाज करेंगे.. :D

Friday, November 07, 2008

आज मेरा चिट्ठा तर गया!! :)

मेरी एक बहुत अच्छी मित्र है, मगर उसे मेरे अपने चिट्ठे पर कुछ निजी बातों को लिखना अच्छा नहीं लगता है सो शायद ही मैं कभी अपने चिट्ठे पर उसकी चर्चा किया हूं.. उसकी बातों का जिक्र मेरे चिट्ठे पर कुछ-एक बार हुआ है, मगर वो मेरी कलम से नहीं बल्की मेरे मित्र विकास कि कलम से.. अभी वो यू.एस.ए. में है, अपने ऑफिस के काम के चलते.. ढ़ाई महीने के लिये गयी हुई थी जो अब पूरा होने को आ रहा है.. आज सुबह उसने मेरे चिट्ठे पर पहली बार एक कमेंट किया.. सबसे पहले तो वो कमेंट देखकर बहुत खुशी हुई, मगर जल्द ही वो खुशी आश्चर्य में बदल गया.. मुझे तो कभी लगता भी नहीं था कि वो मेरे चिट्ठे को पढ़ती भी होगी.. वैसे ये भरोसा उसका कमेंट पढ़ने के बाद भी नहीं है :).. क्योंकि यह भी हो सकता है कि चूंकि मैंने पिछले दो पोस्ट दोस्तों के साथ बिताये पलों पर लिखा था सो उसे पढ़ने आयी हो.. वैसे उसे उसकी जरूरत नहीं थी क्योंकि मैंने अपने लगभग सभी मित्रों को वो लेख ब्लौग पर पोस्ट करने से पहले ही मेल कर दिया था.. सो अब वो पहले कि खुशी और बाद का आश्चर्य, दोनों मिलकर आश्चर्यमिश्रित खुशी में बदल गयी..

वैसे मुझे उसे जो भी लिखना था वो मैंने उसे और अपने दोस्तों को मेल करके लिख दिया है, मगर फिर भी मैं उसके कमेंट का उल्लेख अपने चिट्ठे पर करना चाहता था सो यह पोस्ट भी ठेल दिया.. :)

उसने कमेंट किया था -
Vani said...
2nd aur last snap bahut hi achha hai, per mujhe 2nd wala bhaut hi achha laga...tum sab ki yaad aa gayi...missing my friends:-(

मेरा उसे कहना है - अरे वाणी, टेंशन काहे को लेती हो.. एक हफ्ते में तुम फिर से चेन्नई में रहोगी.. फिर कभी हो आयेंगे.. :)

यहां वाणी ने अपने कमेंट में इस चित्र के बारे में लिखा था..

इसमें सबसे आगे विकास है उसके पीछे प्रियंका और उसके पीछे मैं हूं.. चित्र उतारने का काम शिवेन्द्र का था..

सन् 2006 नवम्बर में मैंने अपना चिट्ठा शुरू किया था.. उस समय बस मैं अपनी कवितायें ही लिखा करता था जो महीने-दो महीने में एक बार कुछ लिख देता था.. अपने ब्लौग पर अहसान कर देता था.. :) दिसम्बर की छुट्टियों में वाणी ने मेरा चिट्ठा अपने भैया को दिखाई, और उन्होंने मेरी कविताओं कि काफी तारीफ भी की.. वो तारीफ उस समय मेरे ब्लौग के लिये बहुत जरूरी था.. और जाने अनजाने में वाणी ने मुझे और लिखने के लिये प्रेरित भी किया.. आज भैया से संपर्क हुये बहुत दिन हो गये हैं.. इस बीच मुझे यह भी पता नहीं कि अब वो मेरा चिट्ठा पढ़ते भी हैं या नहीं.. खैर वाणी आये तो पूछता हूं..

हो सकता है कि वाणी को मेरा उसके बारे में यह सब लिखना अच्छा ना लगे.. मगर मेरे मन में जो भावनायें थी उसे तो मैंने लिख दिया.. अब चलता हूं.. :)

चेन्नई समुद्र तट पर सूर्योदय

रात में घर जाते जाते प्रियंका याद दिलाना नहीं भुली कि सुबह 3.30 का अलार्म लगा कर मुझे जगा देना.. उसके जाने के बाद विकास सोच में डूबा हुआ था कि कल का दिन कितना हेक्टिक रहेगा.. सुबह सुबह जल्दी उठना फिर देर रात में फैशन सिनेमा देख कर वापस लौटना और फिर अगले दिन सोमवार को फिर सुबह-सुबह ऑफिस जाना.. असल में हमारे यहां सुबह सबसे पहले विकास को ही ऑफिस जाना होता है..

विकास ने मुझसे पूछा, "ये सनराईज देखने का आईडिया किसका था?"

मैंने मुस्कुरा कर कहा, "I was the culprit.." वो कुछ बोला नहीं.. बस मुस्कुरा कर रह गया.. फिर खाना खा कर सभी सोने चले गये..

अगली सुबह 3.40 मे अलार्म से मेरी नींद खुली.. मैंने प्रियंका को फोन करके जगाया और नित्यक्रिया करने के लिये चला गया.. लौट कर पहले शिव को और फिर विकास को जगाया.. प्रियंका के आते-आते 4.40 हो गये और हमे निकलते-निकलते 5.20.. मेरे मित्र अमित के भाई कि बाईक हमारे अपार्टमेंट में ही पार्क थी और वो बैंगलोर गया हुआ था.. सो उसके बाईक का भरपूर इस्तेमाल हुआ.. प्रियंका कि गाड़ी पर विकास बैठा और मेरे साथ बाईक पर शिव और हम निकल परे मैरिना बीच कि ओर.. प्रियंका ने ही बताया था कि मैरिना बीच का सूर्योदय ज्यादा प्रसिद्ध है..

सुबह का समय था और पहली बार चेन्नई में ठंढक का अहसास भी हुआ.. शिवेंद्र मेरे पीछे सिमट कर बैठा हुआ था.. ठंढ मुझे भी लग रही थी मगर बाईक चलाने का मेरा जुनून और उसका लुत्फ़ लेने कि मेरी आदत उस ठंढ को पीछे छोड़ बस हवा से बाते कर रहा था.. सुबह ट्रैफिक बस नाम मात्र का ही था.. जो लोग भी दिख रहे थे वो सुबह के जौगिंग के लिये ही जा रहे थे.. हमलोग 6 बजने से पहले ही वहां पहूंच गये थे.. अभी तक हल्की लालिमा आकाश में दिखने लगी थी.. मैरिना बीच हमेशा कि तरह ही गंदा था..

"शायद यहां भी छठ पूजा हुआ लगता है.. कुछ ऐसा ही लग रहा है.." किसी ने मजाक किया..

"सुनामी... $%^&#@ सुनामी..." कोई चिल्लाया जब मैं पानी में था.. मैं पलट कर देखा कि एक और आदमी हमारे बीच वहां था.. बाद में समझ में आया कि वो मानसिक रूप से विक्षिप्त था..(यहां $%^&#@ को आप तमिल माने जो मुझे समझ में नहीं आया)

मुझे लग रहा था कि जैसे एक बार पांडिचेरी में हमलोग सूर्योदय का इंतजार करते रह गये थे और बाद में पता चला था कि बादलों के भीतर सूर्योदय हो भी चुआ है और हमें दिखा भी नहीं, कहीं वही बात यहां भी तो नहीं होने वाली है? कुछ-कुछ ऐसा ही लग भी रहा था.. ठीक जहां से सूर्योदय होना था वहीं बादल लगे हुये थे.. सूर्योदय तो नहीं ही दिखा मगर सूर्योदय के बाद वाला दृष्य नजर आ गया.. सभी खुश.. चलो आना सफल रहा.. इस मस्ती के पल में थोड़ी देर के लिये मैं थौटिंग मोड में भी पहूंच गया और पानी के बीच खड़ा होकर सोचने लगा कि ना जाने कितने शहरों में कितनी ही इमारतें सूर्योदय को निगल जाती है.. सोचा कि पिछली बार मैंने सूर्योदय कब देखा था तो मुझे महीना भी याद नहीं आया.. एक बात और भी पता चली, वो यह कि सूर्योदय से ठीक पहले जो समुद्र शांत दिख रहा था उसकी लहरें अचानक से ही सूर्योदय होने बाद तेज हो गयी..

फिर वापसी.. आते समय कैथेड्रल रोड पर एक फ्लाई ओवर था, जिस पर चढते समय ना जाने क्यों मुझे स्पीड बढाने का मन किया.. जो पहले 40 के औसत से चल रहा था वो अचानक 60-70-80-90 से होते हुये 98 पर पहूंचा मगर उससे ज्यादा नहीं बढाया क्योंकि ये भी ख्याल आया कि हम शहर के बीच चल रहे हैं, ना कि किसी हाईवे पर.. वैसे स्पीड बढाते समय शिवेन्द्र कि गालियां खाने का भी अलग ही लुत्फ़ है.. :)

सारे फोटो प्रियंका के N-96 से लिये हुये.. उसने मुझे कहा था कि कैमरा चार्ज कर लेना, मैंने चार्ज भी किया.. मगर मेरे कैमरे में ही कुछ दिक्कत आ गयी जिसके कारण मैं फोटो नहीं ले पाया.. मगर उसके मोबाईल कैमरे से भी अच्छी तस्वीरें आई.. :)

Wednesday, November 05, 2008

हम भाग जायेंगे यहां से

"हम भाग जायेंगे यहां से.." खिजते हुये प्रियंका ने कहा..

"हां! तुम तो बैंगलोर भाग ही रही हो.."

"नहीं! मन नहीं लग रहा है.. हम अभी भाग जायेंगे.."

"अच्छा रहेगा कि चलो कहीं घूम कर आते हैं.. क्या बोलती हो? समुद्र तट कैसा रहेगा?"

"हां.. चलो.."

विकास से पुछा, मगर उसे काम था और उसकी एक मित्र भी आई हुई थी सो साथ नहीं चलने कि स्थिति में था.. फिर थोड़ी देर में हमारा प्लान बदल गया..

"चलो पहले सत्यम चलते हैं.. वहां मूवी का टिकट देखते हैं.. उसके बाद समुद्र तट जायेंगे.." प्रियंका ने कहा..

"ठीक है.. चलो.."

प्रियंका गाड़ी चला रही थी और मैं पीछे बैठा हुआ था.. उस समय मैं गाड़ी चलाने के मूड में नहीं था, सो चलाने का ऑफर भी नहीं किया.. बस आराम से पीछे बैठा रहा.. उस समय लगा कि घर में जब होता हूं तो भैया हमेशा पीछे क्यों बैठते हैं.. बाईक चलाने का अपना अलग ही लुत्फ़ होता है मगर पीछे बैठने का मजा भी अलग ही होता है..

शनिवार रात का गोलमाल रिटर्न्स का टिकट मिल रहा था.. मगर वो किसी को नहीं देखना था.. फिर पता चला कि रविवार कि रात फैशन का टिकट मिल रहा है.. विकास को फोन किया, वो चलने को तैयार था.. अफ़रोज़ को फोन किया, उसने फोन नहीं उठाया.. शिवेंद्र को फोन ही नहीं किया, पता था कि वो कहेगा कि नहीं जाना है.. सो उससे बिना पूछे ही उसका भी टिकट ले लिये.. :)

"अब कहां चलें? सी बीच?" प्रियंका ने पुछ..

"चलो स्पेंसर प्लाजा चलते हैं, यहीं पास में है.. मुझे एक स्पोर्ट्स शू लेने का बहुत दिन से मन कर रहा है.. वहां एडिडास के शोरूम में डिस्काऊंट तो चल रहा होगा ना?"

"पता नहीं.. चल कर देख लेते हैं.."

फिर से प्रियंका गाड़ी चलाने लगी और मैं पीछे आराम से बैठ गया.. तभी सामने एक फ्लाईओवर दिखा.. मैंने पूछा, "ये रास्ता किधर जाता है?"

"पता नहीं.. चलो चल कर देख लेते हैं.."

फ्लाईओवर से उतरने पर पता चला कि हम रायपेट्टाह पहूंच गये हैं.. रास्ता मुझे कुछ जाना पहचाना लग रहा था मगर बिलकुल सही पता नहीं चल रहा था कि हम कहां हैं.. फिर भी आगे बढते चले गये.. मुझे बस दिशा ज्ञान था कि समुद्र तट जिस दिशा में है हम उसी दिशा में बढ रहे थे.. थोड़ी देर बाद पता चल ही गया कि हम उसी रास्ते पर हैं जिस इलाके में पहले मैं रहता था.. दिल खुश हो गया.. बहुत दिनों बाद इधर आना हुआ था.. उत्साह के साथ प्रियंका को बताना शुरू कर दिया कि देखो ये क्या है तो वो क्या है.. पता नहीं मन ही मन में कितनी गालियां दी होगी मुझे, मगर सामने कुछ बोली नहीं.. :)

उसने पूछा, "ईगा थियेटर कहां है?"

"चलो वो भी आज दिखा ही देता हूं.." फिर मैं उसे रास्ता बताने लगा.. माऊंट रोड से होते हुये चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन.. फिर वहां से पूनामल्ली हाई रोड पकड़ कर चेटपेट से होते हुये मैंने उसे ईगा थियेटर दिखाया.. ईगा थियेटर कि खूबी यह है कि चेन्नई में बस यही इकलौता सिनेमा हॉल है जहां सिर्फ हिंदी सिनेमा लगती है.. रास्ते में हमने अमरूद भी खरीदा जिसे मैं आराम से पीछे बैठ कर खाया..(पीछे बैठने का फायदा अब समझ में आया? :))

बीच ट्रैफिक में प्रियंका को दौड़ा पड़ने लगा.. :) कहती है, "मुझे चिल्लाने का मन कर रहा है.."

"हां, चिल्लाओ.. लोग तुम्हें तो कुछ नहीं कहेंगे.. मुझे ही मारेंगे.. अब लड़की के पीछे बैठा हुआ हूं और लड़की चिल्लाने लगे तो और क्या होगा?"

"नहीं मुझे चिल्लाना है.."

"ठीक है चिल्लाओ.."

और लगी वो चिल्लाने.. खैर अच्छी बात तो यह थी कि ट्रैफिक की आवाज में उसकी आवाज दब गई थी और किसी ने नहीं सुनी.. घड़ी में देखा तो 8 बजने जा रहे थे.. हम लगभग 30-35 किलोमीटर घूम चुके थे.. अभी तक अन्ना नगर का सिग्नल भी नहीं आया था जहां से हमें सी.एम.बी.टी. से होते हुये वडापलनी, अपने घर जाना था..

"आज रात 10.30 में सी-बीच चलोगे?" उसने पहले पूछा.. फिर झिझकते हुये कहा, "इतनी रात जाना ठीक रहेगा?"

"नहीं.. रात के समय सी-बीच पर कैसा माहौल रहता है वो मुझे नहीं पता.. मैरिना बीच का मुझे पता है कि वो रात में जाने लायक नहीं है.. बेसंत नगर बीच का मुझे पता नहीं.." थोड़ी देर के लिये शांति सी छा गयी.. वो चुप थी और ट्रैफिक का शोर बढ गया था.. मुझे लगा कि उसे सी-बीच जाने का बहुत मन है.. सो मैंने आगे कहा, "चलो कल सुबह सूर्योदय देखने चलते हैं.. क्या कहती हो?"

बस फिर क्या था.. प्रियंका खुश.. :) "हां हां.. ये ठीक रहेगा.. कल सुबह मुझे 3.30 मे उठा देना और अभी किसी को मत बताना.. सरप्राईज देंगे सभी को.."

मैंने कहा, "सभी को पहले ही बता दो, नहीं तो पता चलेगा कि सुबह-सुबह हमे सरप्राईज मिल रहा है और कोई नहीं गया.." और बस, हमारा प्लान पक्का हो गया.. फिर यूं ही बातें होती रही और प्रियंका बेहद भयंकर वाले ट्रैफिक में से बहुत कुशलता के साथ गाड़ी निकालते हुये घर पहुंचा दी..

अगले भाग में समुद्र तट का सूर्योदय..

Monday, November 03, 2008

The Devil Wears Prada और Fashion


अभी हाल-फिलहाल में मैंने फ़ैशन विषय के ऊपर दो सिनेमा देखी है.. पहला सिनेमा The Devil Wears Prada और दुसरा Fashion.. The Devil Wears Prada के साथ मैंने दीपावली कि रात गुजारी थी और Fashion मैं कल देर रात देख कर आया.. दोनों ही सिनेमा फैशन इंडस्ट्री के ऊपर बनाया गया है..

चलिये सबसे पहले बात करते हैं The Devil Wears Prada के बारे में.. यह सिनेमा सन् 2006 में आई थी.. इसमें Anne Hathaway ने Andrea "Andy" Sachs का किरदार निभाया है जो तुरत कॉलेज से पास होकर नौकरी कि तलाश में भटकते हुये न्यूयार्क जाती है और उसे वहां उसे काम मिलता है एक बेहद प्रसिद्ध फैशन मैगजिन के एडिटर Miranda Priestly की को-असिस्टेंट का.. इस सिनेमा में Miranda Priestly का किरदार निभाया है Meryl Streep ने..



इसमें कुछ ऐसा दिखाया था कि Anne Hathaway एक साधारण सी लड़की है जिसका अपने ब्वायफ़्रेंड के साथ लिव-इन रिलेशन है.. साधारण से कपड़े पहनती है और फैशन रिपोर्टिंग इंडस्ट्री में दूसरे लोगों से कुछ अलग हट कर सोचती है.. जैसे-जैसे समय बीतता जाता है वैसे-वैसे उसे समझ में आने लगता है कि यहां खुद के सोचने-समझने से कुछ नहीं होता है.. बस जो बॉस कहे उसे किसी भी हालत में पूरा करना ही एक मात्र कर्तव्य है.. इसी बीच पेरिस फैशन वीक आता है जिसमें जाने के लिये Anne Hathaway के साथ काम करने वाली उसकी एक सिनियर बहुत पहले से उत्साहित थी, मगर Miranda उसे ना ले जाकर ये ब्रेक Anne Hathaway को देती है.. वहां जाने से पहले भी उसके भीतर काफी अंतर्द्वंद चलता है क्योंकि उसे पता था कि उस फैशन वीक का महत्व उसके साथ काम करने वाली उसकी मित्र के लिये कितना महत्वपूर्ण था.. मगर सफलता प्राप्त करने का लालच उसके अंतर्द्वंद पर विजय पाता है.. पेरिस जाकर उसे इस इंडस्ट्री कि सच्चाई का पता चलता है.. जिसके बाद वो सब छोड़कर वापस न्यूयार्क अपने ब्वायफ़्रेंड के पास आ जाती है और फैशन रिपोर्टर से एक साधारण रिपोर्टर बन जाती है..


अब बात करते हैं फैशन सिनेमा की.. मेरे एक मित्र के शब्दों में, "बड़े पर्दे पर FTV देखना हो तो यह सिनेमा देख लो.." मधुर भंडारकर ने काफी मेहनत कि है इस सिनेमा पर मगर फैशन इंडस्ट्री के चमक दमक दिखाने के चक्कर में वो मूल कहानी से कई बार भटकते से नजर आये.. कई बार मुझे ऐसा लगा कि मधुर भंडारकर The Devil Wears Prada का नकल उतार रहे हैं.. उदाहरण के तौर पर इस सिनेमा में एक डायलॉग जब प्रियंका को किट्टू गिडवानी बताती है कि किस तरह तुमने पिछले मॉडल को रिप्लेस किया है शो स्टॉपर के जगह पर.. बिलकुल वैसे ही जैसे कि The Devil Wears Prada में Anne Hathaway कि बॉस उसे बताती है कि तुमने कैसे आगे बढने के लिये अपने साथी को पीछे धकेल दिया..

सच कहूं तो मेरे पास इस सिनेमा के बारे में ज्यादा कुछ कहने के लिये है भी नहीं.. मगर इतना तो जरूर है कि दोनों ही सिनेमा एक संदेश दे रही है कि कभी भी सफलता पाने के लिये खुद को नहीं खोना चाहिये.. इस सिनेमा को देखते हुये मुझे एक लड़की का भी ख्याल आया था जिसके लिये अचानक कैरीयर सबसे महत्वपूर्ण हो गया.. बाकी सारे रिश्ते पीछे छूट गये.. सिनेमा देखते हुये सोच में भी पड़ गया कि काश असल जिंदगी में भी सिनेमा के रंग भर जाते और हर अंत एक खुशनुमा सुबह लेकर आये..