मैं अबकी जब घर आ रहा था तब चार साल के बाद स्लीपर में यात्रा किया.. मैं रास्ते भर खूब इंज्वाय किया.. तरह तरह के लोग आते थे और अपने तरह से अपना बिजनेस कर रहे थे.. कोई पान-मसाला बेच रहा था तो कोई नट बन कर पैसे कमा रहा था.. कभी कोई लैंगिक विकलांग आकर जबरी वसूली कर रहा था, तो कोई गा रहा था.. कोई भीख मांग रहा था तो कोई भगवान का रूप धारण किये हुआ था.. पटना पहूंचने से ठीक पहले मुझे अचानक से लगा कि यह लोग चाहे जैसे भी अपने जीने की जद्दोजेहद में लगे हुये हैं... और मैं इन्हें देखकर मजे ले रहा हूं? क्या मैं भी उन सो-कौल्ड एलीट वर्ग में आ गया हूं जो थर्ड ए.सी., सेकेण्ड ए.सी. या फिर हवाई जहाज से यात्रा करने वालों की जमात में शामिल हो गया हूं? और उनके लिये ये सारे लोग तमाशा हो गये हैं, कुछ उसी तरह जैसे हम चिड़ियाघर में जानवरों का तमाशा देखने जाते हैं!! फिर अपने ऊपर शर्म आने लगी.. मन में आया कि यही है शाईनिंग इंडिया, जहां किसी का दर्द औरों के लिये तमाशा से अधिक और कुछ नहीं होता है..
हमारे देश में जब तक यह अमीर-गरीब की खाई यूं ही बढ़ती रहेगी तब तक भारत कभी भी उन्नती के पथ पर आगे नहीं बढ़ सकता है..
हमारे देश में जब तक यह अमीर-गरीब की खाई यूं ही बढ़ती रहेगी तब तक भारत कभी भी उन्नती के पथ पर आगे नहीं बढ़ सकता है..





