Monday, January 12, 2009

पैर पर पैर रखिये, सॉरी कहिये, आगे बढिए

"पैर पर पैर रखिये, सॉरी कहिये, आगे बढिए"..
"आउच.. देख कर नहीं चल सकते हो क्या? मेरे पैर पर चढ़ते चले आ रहे हो.."
"अब क्या करून बहन जी, इतनी भीड़ है.. और कंडक्टर भी तो कह रहा है, पैर पर पैर रखिये, सॉरी कहिये, आगे बढिए.. चलिए मैं भी सॉरी बोल देता हूँ.."

पिछली बार जब मैंने दिल्ली के बस में सफ़र किया था तो वहां बस के भीतर के हालत कुछ ऐसे ही थे.. वैसे तो चेन्नई में भी बसों के हालत कुछ अच्छे नहीं हैं मगर उस दिन दिल्ली में जम कर बारिश हो रही थी, मैं पूरा भींगा हुआ था और मेरे साथ मेरा भारी बैग भी था.. मुझे तो इस तरह के हालत देख कर जाने क्यों एक अलग सा सुकून मिल रहा था.. शायद यह तसल्ली हो रही थी कि उनकी बाते समझ में तो आ रही हैं.. यहाँ चेन्नई में कौन क्या कह रहा है, सब ऊपर से निकल जाता है..

डी.टी.सी. और ब्लू लाइन बस के किस्से तो आपने खूब सुने होंगे, आज चेन्नई के एक बस कि तस्वीर भी देख लीजिये..

इस तस्वीर को मेरे एक मित्र विशाल ने लिया था.. एक बस से दूसरे बस कि.. मैं काफी दिनों तक संभल कर रखा था इस तस्वीर को, ताकि कभी आप लोगों के सामने इसे ला सकूं.. :)

यह नजारा सुबह के समय का है.. चेन्नई में सुबह-सुबह बस में स्कूली बच्चों कि भीड़ होती है.. दिन चढ़ने के साथ ऑफिस जाने वालों कि भीड़ बढती जाती है जो तक़रीबन ११ साढ़े ११ बजे तक रहती है.. उसके बाद कालेज जाने वालों कि भीड़ का समय होता है.. फिर १-२ बजे के आस-पास सड़क थोडी खाली मिलती है जो ३-४ बजे तक रहता है.. फिर वैसे ही लौटने वालों का हुजूम आता है.. पहले स्कूली बच्चे, फिर कालेज वाले फिर ऑफिस से आने वाले.. भीड़ रात के ९ बजे जाकर कुछ थमती है.. मगर अफ़सोस मेरे रूट में यह रात के १० साढ़े १० बजे जाकर भीड़ कम होती है.. चलिए बहुत बता दिया चेन्नई के बसों के बारे में.. अब कभी भी चेन्नई आने का इरादा हो तो मेरे इस पोस्ट को पढना ना भूलें.. :)

एक कला और सिखला दो

सपने बुनने कि कला,
तुमसे सीखा था मैंने..
मगर यह ना सोचा,
सपने मालाओं जैसे होते हैं..
एक धागा टूटने से
बिखर जाते हैं सारे..
बिलकुल मोतियों जैसे..
वो धागा टूट गया या तोड़ा गया?
पता नहीं!!
लेकिन सपने सारे बिखर गये..
बिखरे सपनो को फिर कैसे सजाऊं,
तुमने यह नहीं बताया था..
खुद से इस कला को कैसे सीखूं?
आ जाओ तुम,
सिर्फ एक बार..
एक कला और सीखनी है तुमसे..

Sunday, January 11, 2009

तमिल और संस्कृत भाषा का मेलजोल

तमिल-परंपरा के अनुसार संस्कृत और द्रविड़ भाषाएँ एक ही उद्गम से निकली हैं.. इधर भाषा-तत्त्वज्ञों ने यह भी प्रमाणित किया है कि आर्यों की मूल भाषा यूरोप और एशिया के प्रत्येक भूखंड की स्थानीय विशिष्टताओं के प्रभाव में आकर परिवर्तित हो गयी, उसकी ध्वनियां बदल गयी, उच्चारण बदल गए और उसके भंडार में आर्येतर शब्दों का समावेश हो गया..

भारत में संस्कृत का उच्चारण तमिल प्रभाव से बदला है, यह बात अब कितने ही विद्वान मानने लगे हैं.. तमिल में र को ल और ल को र कर देने का रिवाज है.. यह रीती संस्कृत में भी 'राल्योभेदः' के नियम से चलती है.. काडवेल(Coldwell) का कहना है की संस्कृत ने यह पद्धति तमिल से ग्रहण की है..

बहुत प्राचीन काल में भी तमिल और संस्कृत के बीच शब्दों का आदान-प्रदान काफी अधिक मात्र में हुआ है, इसके प्रमाण यथेष्ट संख्या में उपलब्ध हैं.. किटेल ने अपनी कन्नड़-इंगलिश-डिक्शनरी में ऐसे कितने शब्द गिनाये है, जो तमिल-भंडार से निकल कर संस्कृत में पहुँचे थे.. बदले में संस्कृत ने भी तमिल को प्रभावित किया.. संस्कृत के कितने ही शब्द तो तमिल में तत्सम रूप में ही मौजूद हैं.. किन्तु, कितने ही शब्द ऐसे भी हैं, जिनके तत्सम रूप तक पहुँच पाना बीहड़ भाषा-तत्त्वज्ञों का ही काम है.. डा.सुनीतिकुमार चटर्जी ने बताया है की तमिल का 'आयरम' शब्द संस्कृत के 'सहस्त्रम' का रूपांतरण है.. इसी प्रकार, संस्कृत के स्नेह शब्द को तमिल भाषा ने केवल 'ने'(घी) बनाकर तथा संस्कृत के कृष्ण को 'किरूत्तिनन' बनाकर अपना लिया है.. तमिल भाषा में उच्चारण के अपने नियम हैं.. इन नियमो के कारण बाहर से आये हुए शब्दों को शुद्ध तमिल प्रकृति धारण कर लेनी पड़ती है..

दिनकर जी द्वारा लिखा 'संस्कृति के चार अध्याय' से लिया हुआ.. पृष्ठ संख्या ३७..

Saturday, January 10, 2009

एक माईक्रो पोस्ट- मेरी नई बाईक

आज मैंने अपनी नयी बाईक कि बुकिंग कि है.. मैं नीले रंग कि मोटरसाइकिल खरीदना चाह रहा था जो मोटरसाइकिल डीलर के पास नहीं था और उसने बताया कि ट्रांसपोर्टरों कि हड़ताल के चलते मुझे वह मशीन मिलने में 15 दिनों तक का समय भी लग सकता है.. अभी मैं इसके बारे में ज्यादा नहीं बताऊंगा, मगर इतना भी जरूर बताते जाऊँगा कि यह बाईक किसी भारतीय कंपनी द्वारा बनाये गए सबसे उन्नत बाईकों में से है.. एक बार मुझे यह मिल जाने दीजिये फिर मैं इसके बारे में विस्तार से बताता हूँ.. :)

नोट - युनुस जी और अमित से आग्रह है कि अगर वह यह पढ़ रहे हैं तो कृपया राज न खोलें.. (हिंदी ब्लौग जगत में बस यही दो व्यक्ति हैं जिन्हें यह बात पता है.. :)) :D

Friday, January 09, 2009

महंगाई दर घटने और तेल कि कमी की असमानतायें

आज के गूगल समाचार से ली गई यह तस्वीर देखिये जिसमें एक तरफ तो महंगाई दर घटने कि बात की जा रही है और वहीं दूसरे समाचार में तेल कि कमी से आम जीवन में प्रयोग में लायी जाने वाली चीजों को लेकर हाहाकार कि भी बात हो रही है.. अब ऐसे में भला महंगाई दर घटने से आम लोगों को क्या फायदा? मेरी समझ में तो यह साधारण सा मनोविज्ञान है जिसे सरकार भुनाना चाह रही है..



अब आपको पढ़ाता हूं एक और खबर जो इस तेल कि कीमतों को लेकर ही है..
"समाचार एजेंसियों के अनुसार राजधानी दिल्ली में 85 प्रतिशत पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल और डीज़ल का भंडार ख़त्म हो चुका है, जबकि व्यावसायिक राजधानी मुंबई में 60 प्रतिशत पेट्रोल पंपों पर 'स्टॉक नहीं है' का बोर्ड टंग चुका था.

इसी तरह कोलकाता में 30 प्रतिशत पेट्रोल पंप बंद हो गए थे तो चंडीगढ़ में सिर्फ़ 10 प्रतिशत पंपों पर पेट्रोल-डीज़ल उपलब्ध था. भोपाल में 75 में से 60 पेट्रोल पंप बंद थे तो पटना में आधे से अधिक पेट्रोल पंप बंद हो चुके हैं.

मुंबई में सीएनजी और पाइपों के ज़रिए पहुँचने वाली रसोई गैस की आपूर्ति में भी बाधा पहुँची है. हालांकि दिल्ली में सीएनजी की आपूर्ति जारी है. लेकिन इन दोनों ही शहरों में शुक्रवार के बाद से सीएनजी आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका है."


यह खबर आपको पढ़ाने का मेरा उद्देश्य बस इतना ही है कि मैं आप लोगों तक यह संदेश पहूंचा सकूं कि जब उत्तर भारत के लोग दक्षिण भारत को महत्व नहीं देंगे फिर यह उत्तर-दक्षिण भारत के बीच कि खाई कैसे कम होगी? इस खबर में किसी भी दक्षिण भारत कि खबर नहीं है.. जैसे दक्षिण भारत पर इसका कुछ असर पड़ा ही ना हो..

खैर यह तो रही समाचार पत्रों कि बातें.. कुछ अपने आस-पास कि बातें करें तो, मेरे घर के ठीक सामने, सड़क के उस पार, एक सेल का पेट्रोल पंप है.. कल सुबह और आज सुबह उस पर बेतरह भीड़ थी.. लम्बी कतारें लगी हुई थी और सारा यातायात अस्त-व्यस्त.. सामान्यतः मैं 11 बजे कार्यालय के लिये घर से निकलता हूं और कार्यालय पहूंचने में मुझे लगभग एक घंटे का समय लगता है.. मार आज इस पेट्रोल के लिये मारा-मारी और अस्त-व्यस्त यातायात के कारण लगभग एक घंटे और पैंतालिस मिनट में ऑफिस पहूंचा.. क्योंकि जहां कहीं भी पेट्रोल पंप खुला था वहां के हालात तकरीबन यही थे.. कल आधे दिन में ही सारे पेट्रोल पंप का तेल खत्म हो चुका था और उसके बाद से वे बंद थे और सड़कें सुनसान थी.. आज के हालात भी कल जैसे ही दिखाई दे रहे हैं..

Tuesday, January 06, 2009

जाने क्यों हर शय कुछ याद दिला जाती है

पिछले कुछ दिनों से नींद कुछ कम ही आ रही है.. कल रात भी देर से नींद आयी और आज सुबह जल्दी खुल भी गयी.. मगर बिस्तर छोड़कर नहीं उठा.. बिस्तर पर ही लेटा रहा चादर को आंखों पर खींच कर औंधा ही पड़ा रहा.. घर की याद हो आयी.. सोचने लगा कि कैसे जाड़े के मौसम में सुबह-सुबह पापा अपने ठंढ़े हाथों को मेरे गालों से सटा कर मेरी नींद तोड़ते थे और मैं भी वैसे ही नखरे मारता हुआ रजाई में और अंदर घुस जाता था.. यहां ना वो ठंढ़ है, ना पापा और ना ही वो ठंढ़े हाथों का प्यार भड़ा स्पर्श..

नौ बजे सोकर उठा, चाय-कॉफी मैं साधारणतया नहीं पीता हूं मगर आज कुछ चाय जैसी कुछ चीज पीने की इच्छा हो रही थी.. पापा कि एक शिक्षा याद हो आयी जिसका पालन कभी नहीं किया.. वो कहते थे, "आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु होता है.." मगर मैंने तो उस शत्रु के साथ दोस्ती गांठ ली है.. कुछ दिन पहले कॉफी लेकर आया था मगर बनाया बस एक बार ही.. आज भी पीने कि इच्छा होते हुये भी नहीं बनाया.. जब छोटा था तब चाय पीने की बात भी जुबान पर लाने से किसी पाप कि तरह होता था, मगर अब कभी घर जाता हूं तो बार-बार पूछा जाता है कि चाय पियोगे या नहीं? बार बार मना करने के बाद भी.. शायद अब पापा-मम्मी को कोई साथ देने वाला चाहिये होता है इसलिये.. थोड़ी देर घर में चहलकदमी करने के बाद एक सिगरेट जलाया.. तीन-चार कश मार कर आधे में ही फेंक दिया.. आज उसे पीने कि इच्छा भी नहीं हो रही थी..

थोड़ी देर कंप्यूटर पर किटर-पिटर करने के बाद तैयार होकर ऑफिस के लिये निकला.. याद आया कि जब घर में था तब कहीं बाहर जाने से पहले पापा-मम्मी का पैर छूकर, आशीर्वाद लेकर निकलता था.. एक रूटीन सा बन चुका था यह जिसका भैया अभी तक पालन कर रहे हैं पटना में.. होस्टल में था तो कमरे की मेज पर पापा-मम्मी की तस्वीर रखे हुआ था, और कालेज जाने से पहले उसी तस्वीर से आशीर्वाद लेकर कमरे से निकलता था.. यहां तो वो भी मैंने अपने ऑफिस के क्यूबिकल में लगा रखा है..

ऑफिस के लिये घर से निकलते ही सड़क को पार करते अपने ही उम्र के एक लड़के-लड़की को देखा.. मुझे उस लड़की कि याद हो आयी.. वो जब मेरे साथ होती थी तो सड़क पार करते समय कसकर मेरा हाथ पकर लेती थी, एक तरह से मेरी ओट में छुप सी जाती थी डरकर और सड़क पार करते ही अपनी झेंप छुपाने के लिये मुझसे लड़ने लगती.. "तुम्हें ठीक से सड़क पार करना भी नहीं आता.. वो कार.. वो ऑटो.. वो साईकिल.. वो बाईक.." और भी ना जाने क्या-क्या.. उसे सड़क पर चलती गाड़ियों से बहुत डर जो लगता था..

रास्ते में एक कालेज के सामने से गुजरते हुये कुछ लड़के आपस में चुहलबाजी करते हुये मिले.. अपने कालेज के दिन याद हो आये.. कैसे बिना बात के एक दूसरे कि टांग खिंचाई होती थी.. रात के दो बजे कैसे मैगी खाने कि लड़ाई होती थी.. कैसे दोस्तों कि खातिर प्रोफेसर तक से बिना आगा-पीछा सोचे बहस करते थे.. कभी किसी दोस्त को किसी नयी लड़की से बात करते देख कर ही हफ्तों तक खिंचाई होती थी, अब भले ही वो उस लड़की को कोई पता ही क्यों ना बता रहा हो.. किसी मित्र को उदास देखकर उसकी उदासी दूर करने को क्या-क्या जतन नहीं होता था.. किसी पेपर में खराब नंबर आने पर घरवालों से ज्यादा मानसिक सहयोग कैसे दोस्तों से मिलता था.. खैर, अब ये भी यादों का ही एक हिस्सा बना रहेगा..

ऑफिस पहूंच कर अपने सामानों को व्यस्त करने के बाद पापा-मम्मी कि तस्वीर देखी और याद आया कि बचपन में पापाजी के ऑफिस जाकर कितना खुश होते थे.. किसी राजकुमार कि भांति पूरे ऑफिस में घूमते थे.. पापाजी की मेज पर शुरू से ही मां सरस्वती कि एक तस्वीर होती है और पापाजी का तबादला जहां-जहां होता रहा वहां सबसे पहले पापाजी उस चित्र को ही स्थापित करते रहे हैं.. भगवान जैसी चीजों पर से आस्था खत्म होने के बाद मेरे लिये तो पापा-मम्मी कि यह तस्वीर ही हमेशा मेरे कार्यस्थल पर लगी रहेगी..

जाने यादों का यह कारवां आज कहां जाकर रूकने वाला है..

Monday, January 05, 2009

ताऊ का डॉगी भी ताऊगिरी में कम नहीं

कुत्ते को कुत्ता कहना जैसे कुत्ते को गाली देना है सो मैं उसे डॉगी कह रहा हूं.. बात यह है कि जब वही बात अंग्रेजी में कहते हैं तो लगता है जैसे अमृत वर्षा हो रही हो.. ये कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे किसी अंधे को अंधा नहीं कहकर आजकल हम ब्लाईंड परसन तो लगता ही नहीं है कि हम कुछ बुरा कह रहे हैं.. कुछ गालियां भी ऐसी ही है, जिन्हें अगर हम हिंदी में कहें तो अक्षम्य हो जाये मगर अंग्रेजी में तो सब क्षम्य होता है.. ये कुछ ऐसा ही है जैसे पंछियों में राज हंस की बोली और आदमियों में गोरों की.. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के शब्दों में कहूं तो, "जिसकी प्रशंसा हंस भी करे वह जरूर बड़ा तत्वज्ञानी होगा.. यह बात बहुत-कुछ ऐसी ही थी जैसे आजकल घटित हो रही है.. जिसकी प्रशंसा श्वेतकाय अंग्रेज कर दे उसे आज भी महान तत्वज्ञानी मान लिया जाता है.."

मैं आया था ताऊ के डॉगी के किस्से सुनाने और ना जाने क्या बक-बक करने लग गया.. क्या करें ब्लौगरी जो ना सिखाये.. कभी तिल का ताड़ बना डालते हैं तो कभी बिना बात के जाने क्या-क्या लिख जाते हैं.. तो चलिये सुनते हैं ताऊ के डॉगी के किस्से..

अब वह ताऊ का डॉगी था तो कुछ ताऊगिरी उसने भी सीख ली थी.. एक बार वह और ताऊ जंगल से जा रहे थे.. ताऊ अपने लठ्ठ के साथ मगन थे और चले जा रहे थे, तभी उनके डॉगी को खुजली होने लगी.. बस क्या था, लगा कभी कान खुजाने तो कभी मुंह खुजाने.. ताऊ को पता भी ना चला कि कब डॉगी उनसे बिछड़ गया.. ताऊ को तो पता ना चला मगर डॉगी बेचारा कभी इधर भागता तो कभी उधर.. उसे समझ में ही ना आया कि जाऊं तो किस दिशा में?

तभी एक शेर को आते देखा उसने.. शेर को देख डॉगी डर के मारे कांपने लगा थर-थर और सोचने लगा कि बेटा आज तेरा हो गया राम नाम सत्त.. तभी डॉगी को वहीं पड़ी हुई कुछ हड्डियां दिखी.. उसके दिमाग की बत्ती जली.. वह लगा उस हड्डी को बड़े चाव से चबाने और साथ ही जोर से बोलने लगा, "वाह आज तो बस मजा आ गया इस शेर का शिकार करके.. अब बस एक शेर और मिल जाये तो दावत ही हो जाये.." शेर ने जैसे ही ये बात सुनी, उसका दिमाग ठनका.. सोचने लगा कि अरे ये कुत्ता तो बड़ा कमीना निकला, ये तो शेर का शिकार करता है.. और वह शेर वहां से दुम दबा कर चंपत हो गया..

वहीं पेड़ पर बैठा एक बंदर यह तमाशा देख रहा था.. उसने सोचा कि जाकर शेर को सब बात बता देता हूं.. इसी बहाने शेर से भी दोस्ती हो जायेगी और जीवन भर के लिये जान का खतरा भी खत्म हो जायेगा.. बंदर उछलता कूदता पहूंचा शेर के पास और कह डाली सब बात.. शेर गुस्से में दहाड़ा और बंदर को बोला, "तू बैठ मेरी पीठ पर, मैं अभी उस कुत्ते को कच्चा चबा जाता हूं.."

उधर डॉगी जी(क्या करें इत्ता चालाक डॉगी और उपर से ताऊ का, तो इज्जत से बात करनी ही पड़ती है) बंदर को जाते हुये सोच रहे थे कि जरूर कुछ गड़बड़झाला है.. तभी शेर की पीठ पर् बंदर को आते देख वो सब समझ गया और सोच में पर गया कि अब क्या किया जाये? फिर से उसके दिमाग कि बत्ती जली और फिर से वह शेर कि ओर पीठ करके बैठ गया और जोर-जोर से बोलने लगा, "इस बंदर को भेजे इतनी देर हो गई, साला बंदर एक शेर तक को फांस कर नहीं ला सकता.."

इतना सुनना था कि शेर बंदर को वहीं पटक कर सर पर पांव रख भाग गया.. तब तक ताऊ भी वहां अपने डॉगी को खोजते हुये पहूंच गये और दोनों खुशी-खुशी अपनी राह चल दिये..

Saturday, January 03, 2009

ई आर.के.लछमन कउन चिड़िया के नाम है जी?

इधर रविश वाले कस्बा जी.. अर्रर्रर्र.. माफ किजियेगा, कस्बा वाले रविश जी हल्ला मचईले थे कि पवनवा ही उत्तर भारत का आर.के.लछमन है, और अभीये एक पोस्ट से पता चला कि नहीं ई त कौनो इरफ़ान भैया हैं.. हम त पूरे कंफूजिया गये हैं.. केकरा के बात मानल जाई? इनका बात माने तब दिक्कत, उनका बात माने तब दिक्कत.. हमरा अपना बिचार त ईहे है कि जो जैसन है ओकरा के वैसने रहने दिया जाये.. झूट्ठे के हल्ला करे से का मिली? कंपरीजन करे से कुच्छो मिलेगा थोड़े ही ना? आप ही कहिये? आप तो हियां ऊ दून्नू का कार्टून देखिये.. दून्नू में टैलेंट बहुते है..

पहले पवन भैया का तीनों कार्टून जो रविश भैया छापे थे -




रविश भैया के चिट्ठवा से उड़ईले हैं ई.. ;)

और ई इरफ़ान भैया का कार्टून -



विरोध से उड़ाये हैं.. ;)

हम अपना पर्सनल बात किसी को बताते तो नहीं हैं, लेकिन यार-दोस्त से का छुपाना? पवन भैया से मिले हैं 3-4 बार.. मुन्ना भैया के साथ घर पर आते थे.. और 1-2 बार शायद प्रभात खबर(पटना बला) के ऑफिसवा में.. शायद एसप्लेंडर से.. देख के लगता नहीं था कि कहियो मुंह-कान धोते थे, दाढ़ीयो नहीं बना होता था.. लेकिन बात त खूब मजेदार करते थे.. अब ऊ समय बच्चा थे सो हमसे तो बच्चे जैसा बात करते थे.. और रही बात इरफ़ान भैया कि तो कहियो मौका मिला तो इरफ़ान भैयो से जरूर मिलेंगे.. :)

Friday, January 02, 2009

आज जाने मैं क्या चाहता हूं

कुछ तमन्नाओं पे उम्र गुजारना चाहता हूं..
जैसे मैं तेरा कोई कर्ज उतारना चाहता हूं..

उम्र गुजरी हैं तेरी याद में इस कदर तन्हा..
तन्हाईयों को अब गले लगाना चाहता हूं..

एक तस्वीर छुपाये रखी थी बटुवे में कहीं..
आज फिर तेरी नजर उतारना चाहता हूं..

हिज्र की रात कुछ यूं हुई लम्बी..
अंधेरों में मैं भी सिमट जाना चाहता हूं..

धुवें में घिर आयी हैं तेरी परछाईयां..
दिल ही दिल में आज मैं जाने क्या चाहता हूं..

Thursday, January 01, 2009

एक शीर्षक हीन पोस्ट

नया साल
नयी सुबह
नया जोश
नयी उमंग
नये लोग
नये चेहरे
नये सपने
नयी उदासी
नये कहकहे
नयी खामोशी
नयी खबरें
नया एकाकीपन
हर चीज नया
मानों जिंदगी फिर मजाक उड़ा गई हो..