आप आये तो लगा जैसे,
गुलशन-ए-बहार आया..
जैसे बजते हुये किसी मीठी धुन में,
लेकर कोई 'गिटार' आया..
छम-छम सी चलती हुई कोई लड़की,
के हाथों में जैसे बिजली का तार आया..
खामोशियों के अफ़साने जहां बजते हों,
उस बस्ती को जैसे कोई उजाड़ आया..
मुरझाये हुये चेहरों पे जैसे,
खुशियों का अंबार आया..
बाकी लोग भी जल्दी आओ,
लगा जैसे कोई ऐसा पुकार आया..

ये हैं हमारे भाईज़ान अफ़रोज़ आलम
हमलोग कालेज के लगभग सभी मित्र हर दिन एक दूसरे को गुड मौर्निंग मेल करते हैं और सभी उसे रिप्लाई टू ऑल करते हैं.. कुछ इस तरह हम सभी एक दूसरे से कौंटैक्ट में भी रहते हैं और बातें भी होती रहती हैं.. आज शनिवार के दिन सबसे पहले मैं ऑफिस पहूंचा और मेल किया सबको, लगभग 2-3 बजे के आस अफ़रोज़ का मेल आया कि मैं हूं ऑफिस में और उनके स्वागत करते हुये मैंने उनके ऊपर एक व्यंगात्मक गज़ल दे मारी.. अब उन्हें कितना चोट लगा ये तो पता नहीं.. ;)
ये हमारे कालेज के मित्र हैं और अभी चेन्नई में ही हैं.. हम सभी इन्हें प्यार से भाईज़ान कहकर बुलाते हैं..
गुलशन-ए-बहार आया..
जैसे बजते हुये किसी मीठी धुन में,
लेकर कोई 'गिटार' आया..
छम-छम सी चलती हुई कोई लड़की,
के हाथों में जैसे बिजली का तार आया..
खामोशियों के अफ़साने जहां बजते हों,
उस बस्ती को जैसे कोई उजाड़ आया..
मुरझाये हुये चेहरों पे जैसे,
खुशियों का अंबार आया..
बाकी लोग भी जल्दी आओ,
लगा जैसे कोई ऐसा पुकार आया..
ये हैं हमारे भाईज़ान अफ़रोज़ आलम
हमलोग कालेज के लगभग सभी मित्र हर दिन एक दूसरे को गुड मौर्निंग मेल करते हैं और सभी उसे रिप्लाई टू ऑल करते हैं.. कुछ इस तरह हम सभी एक दूसरे से कौंटैक्ट में भी रहते हैं और बातें भी होती रहती हैं.. आज शनिवार के दिन सबसे पहले मैं ऑफिस पहूंचा और मेल किया सबको, लगभग 2-3 बजे के आस अफ़रोज़ का मेल आया कि मैं हूं ऑफिस में और उनके स्वागत करते हुये मैंने उनके ऊपर एक व्यंगात्मक गज़ल दे मारी.. अब उन्हें कितना चोट लगा ये तो पता नहीं.. ;)
ये हमारे कालेज के मित्र हैं और अभी चेन्नई में ही हैं.. हम सभी इन्हें प्यार से भाईज़ान कहकर बुलाते हैं..

