Saturday, December 20, 2008

हमारे भाईज़ान पर एक गज़ल

आप आये तो लगा जैसे,
गुलशन-ए-बहार आया..
जैसे बजते हुये किसी मीठी धुन में,
लेकर कोई 'गिटार' आया..

छम-छम सी चलती हुई कोई लड़की,
के हाथों में जैसे बिजली का तार आया..
खामोशियों के अफ़साने जहां बजते हों,
उस बस्ती को जैसे कोई उजाड़ आया..

मुरझाये हुये चेहरों पे जैसे,
खुशियों का अंबार आया..
बाकी लोग भी जल्दी आओ,
लगा जैसे कोई ऐसा पुकार आया..


ये हैं हमारे भाईज़ान अफ़रोज़ आलम

हमलोग कालेज के लगभग सभी मित्र हर दिन एक दूसरे को गुड मौर्निंग मेल करते हैं और सभी उसे रिप्लाई टू ऑल करते हैं.. कुछ इस तरह हम सभी एक दूसरे से कौंटैक्ट में भी रहते हैं और बातें भी होती रहती हैं.. आज शनिवार के दिन सबसे पहले मैं ऑफिस पहूंचा और मेल किया सबको, लगभग 2-3 बजे के आस अफ़रोज़ का मेल आया कि मैं हूं ऑफिस में और उनके स्वागत करते हुये मैंने उनके ऊपर एक व्यंगात्मक गज़ल दे मारी.. अब उन्हें कितना चोट लगा ये तो पता नहीं.. ;)

ये हमारे कालेज के मित्र हैं और अभी चेन्नई में ही हैं.. हम सभी इन्हें प्यार से भाईज़ान कहकर बुलाते हैं..

Friday, December 19, 2008

कबाड़ी के कबाड़ से निकला यादों का पुलिंदा

अभी कुछ दिन पहले कबाड़खाना पर कुछ गीतों का दौर चल रहा था.. जिसमें सबसे पहले "वो गाये तो आफ़त लाये है सुर ताल में लेवे जान निकाल" सुनने को मिला.. उसमें आये कुछ कमेंट के बाद सिद्धेश्वर जी ने "दिल सख़्त क़यामत पत्थर सा और बातें नर्म रसीली सी" नामक पोस्ट दे मारी.. मुझे भी कुछ जोश आया और मैंने भी एक पोस्ट गीतों के ऊपर ही लिख डाली "पिया बाज प्याला, पीया जाये ना"..

मैंने सिद्धेश्वर जी को एक ई-पत्र भी लिखा.. जिसे लिखते हुये मैं पटना की गलियों फिर से पहूंच गया.. जब मैंने इन गीतों को पहली बार सुना था उस समय मैं तुरंत ही मैट्रिक पास किया था.. कैसेट खरीदने का जिम्मा भैया के हाथों में होता था.. भैया मुझसे बस दो साल बड़े हैं, मगर उस छोटी उम्र में भी ना जाने कहां से अच्छे गीतों कि समझ उनमें पैदा हो गई थी, जबकी हमारे घर में किसी को गीतों कि शिक्षा मिली हो ऐसी कोई बात नहीं थी..

कहां-कहां से ढूंढ कर कभी हुश्न-ए-जाना तो कभी पैगाम-ए-मुहब्बत तो कभी नुसरत कि कव्वालिया तो कभी म्यूजिक टूडे पर आने वाले संगीतों कि श्रृखला खरीद कर लाते थे.. हम दोनो भाई जब भी बाजार जाते थे तो भैया कैसेट कि दूकान पर लपक लेते थे और मैं किताबों कि दुकान पर.. मैं 15 साल का था उस समय और भैया 17 साल के.. मगर शायद ही कभी ऐसा हुआ हो की भैया का खरीदा हुआ कोई कैसेट बेकार या फालतू निकला हो..

जब 12 साल का था तब मैं पहली बार नुसरत को सुना था.. उन दिनों चक्रधरपुर में रहते थे जो कि अब झारखंड में है.. उसे शहर कहना ठीक नहीं होगा, एक छोटा सा कस्बा था वह.. वहां मेरी मौसी नानी रहती थी और मैंने अपने मामा जी के पास नुसरता का वह एल्बम "उनकी गली में आना जाना" सुना और उनसे हमेशा के लिये मांग कर लेता आया.. मुझे याद है कि घर में नुसरत को सुनना उस समय किसी को पसंद नहीं था.. शायद ये 1994 कि घटना है.. उन्ही दिनों बैंडिट क्वीन सिनेमा आयी थी और हमारे उम्र के लड़कों के मुंह से उस सिनेमा कि चर्चा भी एक पाप जैसा समझा जाता था.. उन दिनों मैं विक्रमगंज में पापाजी के साथ था और भैय, दीदी और मम्मी पटना में थे.. एक बार जब मैं घर पहूंचा तब देखा कि भैया बैंडिट क्वीन का कैसेट खरीद रखे हैं और घर में बस नुसरत ही छाया हुआ है.. मैं तो उसका दिवाना इस कदर था कि मेरे मित्र मुझे नुसरत ही कहा करते थे.. अब भी उस जमाने के मित्र कहीं पटना की गलियों में टकरा जाते हैं तो आदाब नुसरत साहब कह कर ही अभिवादन होता है.. अब घर में भैया भी उसे खूब सुनने लगे थे और उनकी दिवानगी कुछ ऐसी हो चुकी थी कि नुसरत साहब की मॄत्यु पर 2-3 दिन तक भैया चुपचाप थे..

अब जबकी नुसरत भैया के हिटलिस्ट में था और कैसेट खरीदना भी उन्हीं के जिम्मे तो एक एक करके भारत में उपलब्ध नुसरत की सभी कव्वालियां और पाश्चात्य संगीत भैया ने घर में सजा दिये.. मुझे याद है कि एक कैसेट उन्हें नहीं मिला था जिसे मैं अब भी ढ़ूंढ़ता हूं.. "Dead Man Walking".. सोचता हूं कभी मिले तो भैया को गिफ्ट कर सकूं.. कुछ दिनों बाद मुन्ना भैया भी पटना आ गये और पत्रकारिता के शुरूवाती दिनों के संघर्ष में जुट गये.. अक्सर वो घर आते थे, और भैया और मुन्ना भैया के बीच गानों को लेकर खूब बाते होती थी.. एक तरफ कैरम और दूसरी तरफ अच्छे कर्णप्रिय गाने.. और मम्मी अपना सर पीटती थी कि पढ़ाई-लिखाई से इस सबको कोई मतलब ही नहीं है.. :)

बस यही कहना चाहूंगा, "काश कोई लौटा दे वो सुकून, चैन से भरे दिन.. गुनगुनी जाड़े की दूप, रविवार कि सुबह, जब हम सभी भाई-बहन और पापा-मम्मी साथ थे.. हर शाम कैरम का दौर चलता था.. जिसमें मैं अक्सर हारा करता था भैया से.. मगर उन्हें कैरम में डर भी मुझ से ही लगता था, क्योंकि कैरम में वो बस मुझ से ही कभी हारा करते थे.. मगर अब ये नहीं हो सकता है.. चिड़ियों के बच्चे अब बड़े हो चुके हैं, अपना आशियां तलाशने को घर से उड़ चुके हैं.. मन में दुनिया को जितने का जज्बा लिये और सर पर पापा-मम्मी का आशीर्वाद लिये.."

तब तक के लिये आप बैंडिट क्वीन सिनेमा का नुसरत का यह गीत सुने..

सजना, सजना तेरे, तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे ।
काटूं कैसे तेरे बिना बड़ी रैना, तेरे बिना जिया नाहीं लागे ।

पलकों में बिरहा का गहना पहना
निंदिया काहे ऐसी अंखियों में आए
तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे ।।

बूंदों की पायल बजी, सुनी किसी ने भी नहीं
खुद से कही जो कही, कही किसी से भी नहीं
भीगने को मन तरसेगा कब तक
चांदनी में आंसू चमकेगा कब तक
सावन आया ना ही बरसे और ना ही जाए
हो निंदिया काहे ऐसी अंखियों में आए
तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे ।।

सरगम खिली प्‍यार की, खिलने लगी धुन कई
खुश्‍बू से 'पर' मांगकर उड़ चली हूं पी की गली
आंच घोले मेरी सांसों में पुरवा
डोल डोल जाए पल पल मनवा
रब जाने के ये सपने हैं या हैं साए
हो निंदिया काहे ऐसी अंखियों में आए
तेरे बिना जिया मोरा नाहीं लागे ।।


गलती से नुसरत के गाये गाने के बजाये कुछ और पॉडकास्ट कर दिया था, मगर जो भी पॉडकास्ट हुआ था उसे भी मैं नहीं हटा रहा हूं क्योंकि वो भी शानदार गाया हुआ है.. वो सारेगामापा के किसी एपिसोड में किसी पाकिस्तानी गायक द्वारा गाया हुआ है.. फिलहाल आप दोनों ही गीतों के मजे लिजिये..
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Thursday, December 18, 2008

सौ में सौ से ज्यादा नंबर कैसे लायें?

मैंने कुछ दिन पहले अपने कालेज के दिनों का एक पोस्ट लिखा था कि कैसे साफ्टवेयर इंजिनियरिंग पेपर हमे परेशान कर रखा था.. खैर पहला इंटरनल निकल चुका था और उसमें हम सभी फेल हो चुके थे.. अब सुनते हैं आगे का किस्सा..


जब हमने अपनी-अपनी कॉपी देखना शुरू किया तब पता चला कि कॉपी चेक करने वाली मैम को हूबहू किताबी भाषा चाहिये थी और जिसने भी किताबी भाषा का प्रयोग बखूबी किया था बस वही पास हुआ था.. अब जबकी समझ में आ ही गया था तो हम सभी खुद को भरोसा दिला रहे थे, "बेटा तू भी रट्टा मार सकता है.. जो कभी नहीं किया उसे आज कर ही डालो.. मतलब रट्टा मारो.." विकास ने तो यहां तक एलान कर दिया कि दूसरे इंटरनल में जो भी 45 से ज्यादा नंबर ले आयेगा वो साला रट्टू तोता होगा.. वैसे हमने बाद में अपने बीच एक रट्टू तोता को भी पाया, जिसके बारे में मैं बाद में बताता हूं..

जिंदगी में पहली बार मुझे अपने भीतर छुपी इस कला का भी पता चला कि मैं भी रट्टा मार सकता हूं.. दूसरों का तो पता नहीं मगर मैं और विकास दूसरे इंटरनल के 15-20 दिन पहले से ही रट्टा मारना शुरू कर दिये.. हर दिन और कुछ पढ़े चाहे ना पढ़ें मगर एक-दो पन्ने की साफ्टवेयर इंजिनियरिंग जरूर हो जाया करती थी..


यूं ही करते-कराते दूसरा इंटरनल वाला दिन भी आ गया.. उस रात सभी की हालत पहले से भी खराब हो रही थी.. खासतौर पर शिवेन्द्र, रूपेश और संजीव की.. क्योंकि हम सभी रट्टा मारने में सबसे बड़े फिसड्डी थे सो जहां रट्टा मारने की बात आई वहां हालत खराब होनी ही थी.. कुल मिलाकर सबसे अच्छे हालत में विकास था और उसके बाद मैं.. अगली सुबह शिवेन्द्र ने परिक्षा हॉल जाने से मना कर दिया कि नहीं मैं नहीं जा रहा हूं, अगले सेमेस्टर में फिर से यह पेपर दे दूंगा.. उसकी हालत लगभग नर्वस सिस्टम फेल होने जैसी हो चुकी थी.. हम लोग किसी तरह समझा-बुझा कर उसे ले गये कि कुछ भी नंबर आये, मगर चलो और परिक्षा दे ही दो..

परिक्षा देते समय जितना कुछ पढ़ा था, लगा जैसे सब भूल गया हूं.. खैर कुछ दिन बाद नंबर भी आये और हममे सबसे ज्यादा विकास को ही आये.. पूरे 46, पचास में.. उसी ने कहा था कि जिसका 45 से ज्यादा आयेगा वो होगा पक्का रट्टू तोता और उसने खुद को रट्टू तोता साबित कर ही दिया.. मेरे आये थे 28 या 29.. रूपेश का याद नहीं है मगर शिवेन्द्र और संजीव फिर से पास नहीं कर पाये थे.. पास मार्क 25 था..


फिर सेमेस्टर परिक्षा ने भी दस्तक दे ही दिया.. साफ्टवेयर इंजिनियरिंग शायद अंतिम पेपर था.. जब मैं परिक्षा भवन से बाहर निकला तब मुझे पूरा भरोसा था कि मैं पास तो हो ही जाऊंगा, विकास को सोचना ही नहीं था कि पास होगा या नहीं.. उसे तो अच्छे नंबर की चिंता थी.. शिवेन्द्र और संजीव सोच रहे थे कि अगले सेमेस्टर में फिर से देने कि तैयारी करनी परेगी..


क्लास रूम कि एक तस्वीर, क्लास खत्म होने के बाद का

जब मैं परिक्षा दे कर बाहर आया था तब मुझे पूरा भरोसा था की मैं पास हो जाऊंगा मगर जैसे-जैसे मैं होस्टल की ओर बढ़ रहा था वैसे-वैसे मुझे पता चल रहा था कि मैंने इसका उत्तर गलत लिखा है, तो उसका उत्तर गलत लिखा है.. फिर जोड़-घटाव करके देखा तो पाया जितना मैंने सही लिखा है उसमें अगर पूरे नंबर मिल गये तभी पास होऊंगा, नहीं तो मुझे भी तैयारी शुरू करनी ही चाहिये..

अगले सेमेस्टर की नई सुबह.. रिजल्ट आने से पहले एक दिन मैं और विकास कालेज कैंपस में घूम रहे थे और आने वाले रिजल्ट के बारे में बात कर रहे थे.. ऐसे ही जोड़कर देखा तो पाया कि विकास को अगर पूरे सौ नंबर आते हैं तो उसका 'A' ग्रेड बनेगा और 'S' ग्रेड आने के लिये उसे 108 नंबर चाहिये.. और संयोग ऐसा कि उसी शाम रिजल्ट आया.. नेट पर हमने चेक किया तो पता चला कि विकास के 'S' ग्रेड हैं.. और जिसके पास होने की कोई उम्मीद नहीं थी वह भी पास कर गया है.. कुल मिलाकर हमने यही निष्कर्स निकाला की सभी को ग्रेस नंबर मिले हैं इसी कारण सिर्फ विकास ही नहीं और भी कुछ विद्यार्थियों के सौ से ज्यादा नंबर आये थे.. ऐसा ही कुछ सेकेण्ड सेमेस्टर में माईक्रोप्रोसेसर के पेपर में भी हुआ था..


क्लास के बाहर का गैलरी

तो ऐसे हमे सौ में सौ से ज्यादा नंबर भी मिलते थे.. मगर मुझे कभी नहीं मिला.. ;) जब विकास का नंबर देखा था तब मुझे बचपन में कही पापा की बाता याद हो आयी.. वो परिक्षा के समय आशीर्वाद देते थे कि ऐसा लिखना कि मास्टर बोले बेटा कमाल लिखा है सो इसे सौ में एक सौ आठ दे दूं.. :D

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मेरे पिछले पोस्ट पर मेरे कालेज के छोटे भाई क्षितिज ने कमेंट किया था और पूछा था की भैया आपको भी कहां से इस साफ्टवेयर इंजिनियरिंग कि याद आ गयी? उसका जवाब है, "क्या बताऊं भाई, कालेज में पीछा तो छूटा मगर उस दिन मुझे एक ट्रेनिंग लेने के लिये रिस्क एनालिसिस पढ़कर डाक्यूमेंट बनाना पर रहा था.. सो बरबस ही उसकी याद हो आयी.. अब समझ में आ गया है कि इससे जीवन भर पीछा नहीं छूटने वाला है..":)

आप कभी क्षितिज के ब्लौग पर जाईये और उसकी नज्में पढ़िये.. बहुत शानदार लिखता है.. मगर उसे ज्यादा पाठक कभी नहीं मिलते हैं.. सच कहूं तो इतना बढिया नज्म मैं लगातार कभी नहीं लिख सकता हूं..

Wednesday, December 17, 2008

पिया बाज प्याला, पीया जाये ना

मेरे मनपसंद गीतों में से एक..

पिया बाज प्याला,
पीया जाये ना..
पिया बाज यकतिल,
जिया जाए ना..

नहीं इश्क जिसे वो,
बड़ा ख़ूर है..
कभी उससे मिल,
बैसा जाए ना..

कुतुबशा ना दे मुझ,
दीवाने को पंद..
दीवाने को कुछ पंद,
दिया जाए ना..

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मुजफ्फर अली द्वारा कम्पोज किया हुआ..

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पोस्ट करते समय तो बस बेतरतीबी में पोस्ट कर डाला था मगर बाद में कमेंट पढ़ कर पता चला कि लोग इसके बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं.. मुझे जितनी जानकारी है इस गीत कि उतनी मैं यहां दे रहा हूं.. ज्यादा जानकारी के लिये किसी कबाड़ी से संपर्क करें.. मुझे यकीन है कि वहां से सारी जानकारी आपको मिल जायेगी..

एल्बम का नाम - हुश्न-ए-जाना 1997
संगीतकार - मुजफ्फर अली
गीत के रचयिता - कुली कुतुबशाह
स्वर - छाया गांगुली और इकबाल सिद्दीकी
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जैसा मैंने कहा था कि इस गीत के बारे में कोई कबाड़ी ही बता सकता है सो एक कबाड़ी सिद्धेश्वर जी आये और अपना कबाड़ पकड़ा गये.. :)
बहुत-बहुत धन्यवाद उन्हें.. उनके द्वारा दी गयी जानकारी से मैंने अपने इस पोस्ट की गलतियों को सही कर लिया है..

Sunday, December 14, 2008

इंद्रियां अभी जिंदा है मेरी

आज सबसे पहले मैं ये बता देता हूं कि आज के इस पोस्ट में मैं जिस हिंग्लिश में बात करता हूं वही भाषा आपको पढ़ने को मिलेगी.. शुद्ध हिंदी पढ़ने की चाह वाले इसे ना पढ़ें..

अक्सर मैं अपने दोस्तों को कहता था कि खाना मेरे लिये कभी फर्स्ट प्रायौरिटी नहीं है, यह हमेशा मेरे लिये सेकेण्ड ही रहेगा.. वो सभी यही समझने लगे कि इसे खाना में कोई इंटेरेस्ट ही नहीं है.. मगर मैं जो कहता था उसका रीयल मिनिंग नहीं समझ सके.. उसका मेरे लिये मतलब यही रहता था कि अगर अपने आत्म सम्मान को खुद से दूर हटा कर बस भौतिक सुख के पीछे भागूं तो मुझमे और जानवरों में क्या अंतर रह जायेगा? यहां खाना का मतलब सिर्फ खाना ही नहीं है, हर तरह के भौतिक सुख हैं.. भौतिक सुख की चाह किसे नहीं होती? जीभ है तो अच्छा खाना भी ढ़ूंढ़ेगा, निगाहें है तो अच्छे नजारें भी तलाशे जायेंगे.. इंद्रियां यूं ही नहीं मरती है किसी की.. मगर मेरे लिये आत्म सम्मान कि कीमत पर नहीं..

आज भैया लगभग डांटते हुये समझा रहे थे और साथ में पूछ भी रहे थे कि ठीक से खाना क्यों नहीं खाते हो? जब उन्होंने मुझसे यह बात कही तो अचानक मुझे यह बात याद हो आयी.. खैर इसे माईक्रो पोस्ट समझ कर ही पढ़ें.. कालेज के किस्से जिसे मैंने आधे पर ही छोड़ रखा है उसे कल पूरा करता हूं..

Thursday, December 11, 2008

हमारे अठारह, तेरे कितने?

पढ़ाई करो बस एक रात और उसमें भी चाहो कि नंबर आये अव्वल नंबर वाला.. ये कुछ इंसानों के लिये तो संभव है मगर मुझ जैसे साधारण प्राणियों के लिये असंभव.. मगर फिर भी ये आदत पूरे कालेज जीवन में नहीं बदली.. एक बार मैंने जोड़ा कि पूरे सेमेस्टर में कितने दिन मैं पढ़ाई करता था.. पांच जोड़ पांच, कुल जमा दस दिन दो इंटर्नल परीक्षा के लिये और दस दिन सेमेस्टर परीक्षा के लिये और चार दिन लैब परीक्षा के लिये.. सच कहूं तो लैब को छोड़कर बस उसी विषय पर दिल लगा कर पढ़ने कि कोशिश करता था जिसमें लटकने की कोई संभावना नजर आती थी, नहीं तो आराम से बैठे ठाले पिछहत्तर प्रतिशत से ज्यादा नंबर आ ही रहे हैं तो टेंशन काहे का? लैब भी इसलिये दिल लगाकर तैयारी करते थे क्योंकि बस प्रोग्रामिंग में ही तो दिल लगता था, और ऊपर से वो धीरे-धीरे प्रतिष्ठा का भी प्रश्न बन चुका था..

आज मैं आपके पास लेकर आया हूं कुछ कालेज के दिनों की कहानियां.. जिसमें मुझे सबसे पसंद है किस्सा-ए-साफ्टवेयर इंजिनियरिंग..

तीसरे सेमेस्टर में यह पेपर था.. जैसे किसी अन्य विषय कि तैयारी होती थी वैसे ही इसकी भी की गई.. परिक्षा से 3-4 दिन पहले से लेकर परीक्षा के दिन तक फोटो-कॉपी और नोट्स के लिये भागते रहे.. उस समय होस्टल में हम पांच मित्र इकट्ठे ही पढ़ाई किया करते थे.. विकास, शिवेन्द्र, रूपेश, संजीव और मैं.. साफ्टवेयर इंजिनियरिंग की पहली इंटर्नल परीक्षा से एक रात पहले लगे हुये थे सारे नोट्स को घोंट कर पी जाने में.. रात के 1-2 बजते-बजते सभी का बैटरी डाऊन होने लगा.. मगर विकास लगा हुआ था कि नहीं जब तक संतुष्टी ना हो तब तक पढ़ते रहना है..

"अरे यार तू और रूपेश क्यों चिंता करता है? तुम दोनों आज तक कभी फेल हुये हो क्या जो इस बार हो जाओगे? चिंता तो मुझे, संजीव और शिवेन्द्र को करना चाहिये.." मैंने उन दोनों से अपनी बात कही और खुद भी पढ़ने में जुट गया..


साफ्टवेयर इंजिनियरिंग वाली परीक्षा वाले दिन की गर्मी, रूपेश पस्त ;)

जैसे-जैसे रात गुजरती गई, वैसे-वैसे रोमांच और नींद अपनी चरम सीमा पर भी पहूंचता जा रहा था.. अंत में मैंने बस सारे फंडामेंटल बातों को ध्यान में रखा और सोने चला गया.. अगले दिन सुबह जल्दी उठ कर कोई नास्ता करने भी नहीं गया और लग गये पढ़ाई में.. खैर ऐसे ही होते-होते परीक्षा का समय भी आ गया.. हम सभी भागे परीक्षा भवन कि ओर.. आम तौर पर मैं और विकास पहले ही निकल लेते थे क्योंकि शिवेन्द्र और संजीव हमेशा परीक्षा शुरू होने के 5-10 मिनट बाद ही आते थे.. उस दिन भी वैसा ही हुआ.. परिक्षा शुरू हुआ और खत्म भी हो गया.. मैंने जो भी उत्तर लिखा था वो बिलकुल गलत नहीं तो शत-प्रतिशत सही भी नहीं था.. मैं सोच रहा था की शायद घींच-घाच कर पास हो जाऊंगा.. बाद में पता चला कि शिवेन्द्र 1 घंटे 30 मिनट का पेपर बस 45 मिनट में ही करके बाहर आ गया था.. सभी परेशान कि शिवेन्द्र इतनी जल्दी कैसे अपना पेपर खत्म कर दिया और सीना तान कर बाहर आ रहा है, मगर असलियत तो बस वही जान रहा था.. रूपेश का चेहरा ऐसे सूखा हुआ था जैसे कोई मर गया हो और हम सभी होस्टल ना जाकर शमशान जा रहें हों..

3-4 दिन बाद नंबर भी आने शुरू हो गये.. एक दिन साफ्टवेयर इंजिनियरिंग का भी नंबर आ गया.. पता चला कि पूरे 180 विद्यार्थियों में से 6-7 ही पास हुये हैं.. मेरे और शिवेन्द्र के 'नौ' नंबर आये पूरे 50 में.. अपने क्लास से जैसे ही बाहर आया सामने अर्चना दिखी.. पूछा कि तेरा कितना आया? वो बताने से मना कर रही थी कि नहीं बहुत खराब है.. जब मैंने आश्वासन दिया कि कितना भी खराब हो मगर मुझसे ज्यादा ही होगा तब जाकर उसने बताया कि उसके 11 या 13(अब ठीक से याद नहीं है) आये हैं.. अब उसने पूछा कि तुम दोनों के कितने आये? हमने साथ उत्तर दिया हमारे अठारह नंबर आये(हम दोनों ने अपना नंबर जोड़ कर बताया :)).. हम दोनों ऐसे भी लगभग साथ ही रहते थे, सो जो भी मिलता और पूछता कि कितना आया, दोनों बोलते हमारे अठारह आये..

वापस जब होस्टल पहूंचा तो विकास और रूपेश अलग से गाली दे रहा था मुझे, कि तुम्ही ने कहा था कि "तुम दोनों आज तक कभी फेल हुये हो क्या जो इस बार हो जाओगे?" लो तेरे कारण इस बार फेल हो गये.. ;) रूपेश को शायद 15 आये थे और विकास को 20 आये थे.. हां मगर एक बात तो जरूर हुआ कि उसके बाद से मैं जिस किसी को भी ये कहता कि आजतक तुम कभी फेल थोड़े ही हुये हो जो इस बार हो जाओगे? तो सामने वाले का अगला प्रश्न होता कि दुवायें मांग रहे हो या मना रहे हो मेरे फेल होने का?(साथ में गालियां भी) :)

ये बहुत लंबा पोस्ट हो गया है सो, अगले भाग में रूपेश और शिव का नर्वस ब्रेक डाऊन दूसरे इंटर्नल परिक्षा से पहले.. :)


होस्टल में मस्ती के पल
इस चित्र में शक्ल रूपेश की और हाथ मेरा है.. :)

Wednesday, December 10, 2008

तेरी भाभी ने मुझे सॉरी बोला

"क्या कर रहा है भाई?" दोपहर के खाने के बाद मैंने सेमटाईम पर पिंग करते हुये पूछा.. सेमटाईम हमारे कार्यालय में इंट्रानेट पर आपस में चैट करने के लिये प्रयोग में लाया जाता है..

"काम.. काम.. और बस काम.. और क्या कर सकता हूं?"

"कित्ता काम करेगा भाई? चल छोड़ ये सब, पता है? कल तेरी भाभी मुझे सॉरी बोली.. :)"

"अच्छा!!"

"हां, अब ये मत पूछना कौन वाली? :D"

"ये कंफ्यूजन तो है ही कि कौन वाली?"

"अबे वही, जब तू इस ब्रांच में था तब मैं उस पर लाईन मारता था.."

"फिर भी कंफ्यूजन है, कि कौन वाली? अबे तू भी तो इतने सारे पर लाईन मारता था.."

"अबे घबरा मत तेरी एंजलीना जोली पर अभी भी लाईन नहीं मारता हूं.. बस कभी हाय-हेलो हो जाता है.."

"तो फिर कौन है?"

"अबे वो एच.आर. फोर्थ फ्लोर वाली.."

"क्या सच में? वो सॉरी बोली!! क्यों भाई??"

"यही तो सीक्रेट है.. मगर कल मुझे सॉरी बोली.."

"बता भी दे कि क्यों बोली?"

"ठीक है, घर आकर बताता हूं.. बड़ी लम्बी कहानी है.."

"ठीक है.. चल अब काम कर और मुझे भी करने दे.."

ये लम्बी कहानी शिवेन्द्र को रात में भी पता चले या ना चले, मगर आपको सुना देता हूं.. दरअसल लम्बी छोटी कहानी जैसी कुछ बात नहीं है, वो तो हुआ यूं कि मैं कल आफिस से घर जाने के लिये निकल रहा था.. मेरे ब्रांच में सबसे नीचे वाले फ्लोर पर रिसेप्सन के बगल में एच.डी.एफ.सी. का ए.टी.एम. मशीन है जिसमें दरवाजा ना होकर एक परदा टंगा हुआ है क्योंकि वो मशीन बस मेरी कंपनी के कर्मचारियों के लिये ही है.. और जिस लड़की के बारे में मैं बाता कर रहा था वो वहां पैसा निकाल कर परदे से बाहर निकल रही थी और गलती से उसने अपना पैर मेरे पैर पर डाल दिया.. फिर अकचकाकर सॉरी बोली और मैंने इट्स ओके कहा.. फिर वो अपने रास्ते और मैं अपने रास्ते..

इसे दोस्त के साथ हुई एक चुहलबाजी समझ लें.. जिसके लिये मैंने बस यूं ही सस्पेंस बना डाला.. :)

Monday, December 08, 2008

जनता का ध्यान बटाने कि एक और कोशिश

नोट - मैंने यह पोस्ट तेल के दाम घटाये जाने से एक दिन पहले लिखा था, जिसे समयाभाव में समय पर पोस्ट नहीं कर सका था..

सबसे पहले मैं बता देना चाहता हूं कि मैं ना तो कोई आर्थिक विशेशज्ञ हूं और ना ही अर्थ व्यवस्था का बहुत बड़ा जानकार.. मैं यह लेख एक आम भारतीय नागरिक कि हैसियत से लिख रहा हूं.. जो वह हर दिन देखता समझता है और जो कुछ खबर उसे प्रिंट मिडिया या इलेक्ट्रोनिक मिडिया द्वारा पहुंचती है, उसमें अपनी समझ फेंट कर जो कुछ समझ सकता है वही मैं भी समझ रहा हूं और लिख रहा हूं..

आज सुबह यह खबर गूगल समाचार पर मैंने पढ़ी जिसका स्नैप शॉट मैं यहां नीचे लगा रहा हूं.. उसे साफ-साफ पढ़ने के लिये उस तस्वीर पर क्लिक करें..

कुछ बातें पहले मैं कहना चाहूंगा -
1. मुंबई पर अब तक का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला और पूरे भारत का अचानक नींद से जागना..
2. भारत के गृह मंत्री, महाराष्ट्र के गृह मंत्री और महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री को बली चढ़ा देना..
3. फिर अचानक से आतंकवाद एक समस्या ना बन कर नेता एक मुख्य समस्या बन जाना..
4. सारे पार्टियों के कुछ नेताओं द्वारा गैर जिम्मेदाराना बयानबाजी.. एक नेता का यहां तक कहना कि जो उन नेताओं का विरोध कर रहे हैं वे भी अलगाववादी ही हैं..
5. और आज अचानक तेल की कीमत घटाने कि बात करना जबकी कल तक वही सरकार तेल कंपनियों के पैरोकार बने हुये थे और कहते फिर रहे थे कि किसी भी हालत में तेल कि कीमत नहीं घटायेंगे..


अब जहां तक मेरी समझ है ये सब करके कांग्रेस सरकार एक तीर से दो निशाने साधने कि तैयारी कर रही है.. पहला यह कि जनता का ध्यान मुंबई के बाद फैले आक्रोश से खिंचने कि कोशिश और दूसरा अगले चुनाव तक के लिये अपना डगर आसान बनाना.. वैसे भी जनता याददाश्त बहुत कमजोर होती है, एक बार तेल का दाम घटने भर से ही सभी खुश होकर नाचने लगेंगे और उनका ध्यान बट जायेगा.. मैं तो कहता हूं कि किसी भी तरह हाथ-पैर जोड़कर इंगलैंड को क्रिकेट मैच के लिये बुला लिजिये और उनको बुरी टरह हारने के लिये भी मना लिजिये, हमारी जनता ऐसे ही सब भूल जायेगी..

अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब तेल का दाम 62 डॉलर प्रति बैरल था और भारत सरकार का कहना था कि जब यह 60 से नीचे आ जायेगी तब दाम घटाने के बारे में सोचा जा सकता है.. उस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में यह अनुमान लगाया जा रहा था कि यह इससे नीचे नहीं जायेगा.. मगर कांग्रेस सरकार का दुर्भाग्य, यह उससे बहुत नीचे चला गया फिर भी सरकार यही रटा-रटाया जवाब देती रही कि अभी तेल कंपनियों का घाटा पूरा नहीं हुआ है.. मेरा प्रश्न है कि अचानक मुंबई घटना के बाद यह घाटा कैसे पूरा हो गया?

चलिये अब बात करते हैं कि भारत कि जनता बस 200 लोगों के मरने पर ही क्यों जागी? इससे पहले भी तो कई आतंकवादी घटनाऐं इस देश में हुई हैं, मगर कभी पूरा देश इस तरह क्यों नहीं जागा? ये फिल्मी सितारे और बड़ी-बड़ी हस्तियां क्यों रैलियों में शामिल होकर अपना रोष प्रकट कर रहीं हैं? अब करें भी क्या, पहली बार उनको यह लगने लगा कि अब उनके जैसी हस्तियां भी सुरक्षित नहीं हैं.. अब बड़ी हस्तियां किसी रैली में शामिल हो जाये तो लोगों की भीड़ तो यूं ही उमर परेगी..

हमें इसलिये लग रहा है कि यह देश जाग गया है क्योंकि अब वे लोग भी अपना रोष प्रकट कर रहे हैं जो इससे पहले चुपचाप तमाशा देखते थे और जिनकी बातों को मिडिया हाऊस भी तवज्जो देता है.. और जब मिडिया उनकी बात हम तक पहूंचायेगी तो हमें तो लगेगा ही कि शायद सारा देश जाग गया है.. मैं अपने आस-पास के लोगों को यहां देख रहा हूं और यही पाया है कि यहां के लोग हिंदी चैनल नहीं देखते हैं सो उन्हें कुछ भी नहीं पता कि देश जागा हुआ है या सोया हुआ है.. उनके लिये यह आतंकी घटना भी किसी अन्य घटना की तरह ही है जो हमेशा कहीं ना कहीं घटती है..

Saturday, December 06, 2008

क्या होगा इस देश का?

इस सप्ताह काम कर करके दिमाग खराब हो गया है.. हर दिन कम से कम 11 बजे घर पहूंचना चाहे जो भी जतन लगा लो.. अभी भी ऑफिस में ही हूं, पता नहीं कब घर जाऊंगा.. या जाऊंगा भी या नहीं.. मेरे जैसा योग्य युवक इस साधारण बग फिक्सिंग जैसे कार्यों में पहंसा हुआ है अब आप ही कहीये ऐसे में इस देश का क्या होगा? :D

ये लो, पोस्ट करने से पहले ही ए.सी. भी बंद कर दिया.. हद है भाई.. :(

Friday, December 05, 2008

वृथा मत लो भारत का नाम

वृथा मत लो भारत का नाम।

मानचित्र में जो मिलता है, नहीं देश भारत है,
भू पर नहीं, मनों में ही, बस, कहीं शेष भारत है।

भारत एक स्वप्न भू को ऊपर ले जानेवाला,
भारत एक विचार, स्वर्ग को भू पर लानेवाला।

भारत एक भाव, जिसको पाकर मनुष्य जगता है,
भारत एक जलज, जिस पर जल का न दाग लगता है।

भारत है संज्ञा विराग की, उज्ज्वल आत्म उदय की,
भारत है आभा मनुष्य की सबसे बड़ी विजय की,

भारत है भावना दाह जग-जीवन का हरने की,
भारत है कल्पना मनुज को राग-मुक्त करने की।

जहां कहीं एकता अखण्डित जहां प्रेम का स्वर है,
देश-देश में खड़ा वहां भारत जीवित, भास्वर है।

भारत वहां जहां जीवन-साधना नहीं है भ्रम में,
धाराओं को समाधान है मिला हुआ संगम में।

जहां त्याग माधुर्यपूर्ण हो, जहां भोग निष्काम,
समरस हो कामना, वहीं भारत को करो प्रणाम।

वृथा मत लो भारत का नाम।

दिनकर जी द्वारा लिखा हुआ