मुझे उस चिड़िया का नाम पता नहीं है जो ओ गदही पुकारती थी.. हम तीनों भाई-बहन बहुत छोटे थे उस समय.. मैं छठी कक्षा में था, भैया आठवीं में और दीदी नौंवी में.. पापाजी हम तीनों को अलग-अलग नामों से पुकारते थे.. मुझे पुछरू(अब इस नाम से पुकारे गये जमाना बीत गया है), भैया को नकपिच्चू और दीदी को गदही.. इस नाम से पुकारे जाने पर पूरे जन्म भर का प्यार उमर आता था..(शायद अब भी पुकारे जाने पर वही एहसास रहे.).. दो कमरे और एक ड्राईंग रूम के अलावा दो लैट्रिन-बाथरूम, एक बाल्कनी, रसोई घर, डायनिंग हॉल और एक छोटा सा बगीचा हुआ करता था.. हम सभी सितामढी में रहते थे.. कुछ धुंधली सी यादें जानकी मंदिर कि भी है जिसके बारे में मान्यता है कि सीता जी का जन्म वहीं हुआ था..
बगीचे में 5-6 अमरूद के पेड़ थे, कुछ पपीते के और केला के पेड़ों का एक समूह भी जिसे बहुत छोटे में मैंने ही लगाया था और जब सूखने लगा था तब गुस्से से काट भी दिया था.. मगर बाद में चाचाजी ने उस कटे हुये पेड़ को फिर अच्छे से लगाया तो वह लग गया.. शायद 5-6 साल का रहा हो ऊंगा उस समय.. एक खास तरह कि चिड़िया अक्सर उन्हीं पेड़ों में से किसी पर आकर बैठती थी और "टू नी नी" जैसी आवाज निकालती थी.. एक दिन दीदी को पापाजी ने बताया कि वह ओ गदही पुकार रही है.. मतलब तुम्हें बुलाती है.. बचपन का मासूम मन भी इसे मान लिया.. वैसे भी दीदी किसी आम लड़की कि तरह चिड़िया जैसे उड़ना चाहती थी.. हवाओं को अपने मुट्ठी में बंद कर उड़ाना चाहती थी.. जमाने कि फिक्र से बेफिक्र..
ठीक-ठीक याद नहीं है पर शायद 1992-93 में पापाजी का तबादला चक्रधरपुर, जो बिरसा मुंडा कि कर्मभूमी रह चुकी है और अब झारखंड में है, हो गया.. पापाजी 2-3 महीने या शायद 3-4 महीने के लिये हमलोगों को वहीं छोड़कर वहां चले गये.. हो सकता है 1-2 महीने के लिये ही गये हों मगर वही सालभर से कम नहीं था मेरे बालमन के लिये.. सो अभी तक बस इतना ही याद है कि बहुत दिनों तक नहीं आये थे.. फोन का जमाना उस समय तक हमलोगों के लिये नहीं आया था.. सारा काम चिट्ठियों से ही होता था जो महिने में 2-3 ही मिलते थे.. वो चिड़िया भी लगता था उन्हीं के साथ चली गयी थी.. उसने भी आना कम कर दिया था.. जब कभी ओ गदही जैसी आवाज आती हम दौड़ पड़ते बगीचे कि तरफ.. लगता जैसे पापाजी का संदेश लेकर आयी हो..
सितामढी के बाद कभी भी उस चिड़िया कि आवाज नहीं सुनी.. मैं सोचता था कि कहीं वो भी तो विलुप्त नहीं हो गयी होगी? आज सुबह-सुबह लगभग 5.30 में एक फोन के आने से नींद खुल गई.. बाहर बालकनी में आया तो ठंडी हवा चल रही थी.. आसमान में बादल छाये हुये थे.. तभी कहीं से वही आवाज सुनी.. "ओ गदही" या कह सकते हैं "टू नी नी".. लगा कि बस हम इंसानों की भाषा ही बदलती है.. पंछी-जानवरों कि भाषा हर जगह एक जैसी ही होती है.. लगा जैसे कि वही बचपन फिर से लौट आया है.. मन ख्यालों में डूब गया.. लगा जैसे पापाजी अभी कहेंगे कि देखो स्वीटी, तुम्हें ये चिड़िया "ओ गदही" बुला रही है..

भले ही अब हर दिन घर बात हो जाती है.. जब जिससे संपर्क में आना चाहूं आ सकता हूं.. चौबिसों घंटे मोबाईल भी साथ होता है.. ई-पत्रों से सुविधा और भी बढ गयी है.. मगर उस हाथ के लिखे पत्रों कि महत्ता खत्म नहीं हो सकती है.. उसकी छुवन से वो अहसास कभी नहीं जा सकता है.. हस्तलिपी से आप पल भर में किसी को पास पा सकते हैं.. कुछ दिन पहले मैंने पापाजी को एक ई-पत्र लिखा था जिस पर उन्होंने कहा था कि मैं तुम्हें इसके जवाब में सेन्ड नहीं पोस्ट करूंगा.. 10 दिन हो गये हैं.. अभी तक मुझे मिला नहीं है.. या तो पापाजी भूल गये भेजना या फिर कहीं रास्ते में अटका होगा.. पता नहीं.. खैर अगर भूल गये होंगे तो मेरा यह पोस्ट पढकर याद आ जायेगा..
बगीचे में 5-6 अमरूद के पेड़ थे, कुछ पपीते के और केला के पेड़ों का एक समूह भी जिसे बहुत छोटे में मैंने ही लगाया था और जब सूखने लगा था तब गुस्से से काट भी दिया था.. मगर बाद में चाचाजी ने उस कटे हुये पेड़ को फिर अच्छे से लगाया तो वह लग गया.. शायद 5-6 साल का रहा हो ऊंगा उस समय.. एक खास तरह कि चिड़िया अक्सर उन्हीं पेड़ों में से किसी पर आकर बैठती थी और "टू नी नी" जैसी आवाज निकालती थी.. एक दिन दीदी को पापाजी ने बताया कि वह ओ गदही पुकार रही है.. मतलब तुम्हें बुलाती है.. बचपन का मासूम मन भी इसे मान लिया.. वैसे भी दीदी किसी आम लड़की कि तरह चिड़िया जैसे उड़ना चाहती थी.. हवाओं को अपने मुट्ठी में बंद कर उड़ाना चाहती थी.. जमाने कि फिक्र से बेफिक्र..
ठीक-ठीक याद नहीं है पर शायद 1992-93 में पापाजी का तबादला चक्रधरपुर, जो बिरसा मुंडा कि कर्मभूमी रह चुकी है और अब झारखंड में है, हो गया.. पापाजी 2-3 महीने या शायद 3-4 महीने के लिये हमलोगों को वहीं छोड़कर वहां चले गये.. हो सकता है 1-2 महीने के लिये ही गये हों मगर वही सालभर से कम नहीं था मेरे बालमन के लिये.. सो अभी तक बस इतना ही याद है कि बहुत दिनों तक नहीं आये थे.. फोन का जमाना उस समय तक हमलोगों के लिये नहीं आया था.. सारा काम चिट्ठियों से ही होता था जो महिने में 2-3 ही मिलते थे.. वो चिड़िया भी लगता था उन्हीं के साथ चली गयी थी.. उसने भी आना कम कर दिया था.. जब कभी ओ गदही जैसी आवाज आती हम दौड़ पड़ते बगीचे कि तरफ.. लगता जैसे पापाजी का संदेश लेकर आयी हो..
सितामढी के बाद कभी भी उस चिड़िया कि आवाज नहीं सुनी.. मैं सोचता था कि कहीं वो भी तो विलुप्त नहीं हो गयी होगी? आज सुबह-सुबह लगभग 5.30 में एक फोन के आने से नींद खुल गई.. बाहर बालकनी में आया तो ठंडी हवा चल रही थी.. आसमान में बादल छाये हुये थे.. तभी कहीं से वही आवाज सुनी.. "ओ गदही" या कह सकते हैं "टू नी नी".. लगा कि बस हम इंसानों की भाषा ही बदलती है.. पंछी-जानवरों कि भाषा हर जगह एक जैसी ही होती है.. लगा जैसे कि वही बचपन फिर से लौट आया है.. मन ख्यालों में डूब गया.. लगा जैसे पापाजी अभी कहेंगे कि देखो स्वीटी, तुम्हें ये चिड़िया "ओ गदही" बुला रही है..

भले ही अब हर दिन घर बात हो जाती है.. जब जिससे संपर्क में आना चाहूं आ सकता हूं.. चौबिसों घंटे मोबाईल भी साथ होता है.. ई-पत्रों से सुविधा और भी बढ गयी है.. मगर उस हाथ के लिखे पत्रों कि महत्ता खत्म नहीं हो सकती है.. उसकी छुवन से वो अहसास कभी नहीं जा सकता है.. हस्तलिपी से आप पल भर में किसी को पास पा सकते हैं.. कुछ दिन पहले मैंने पापाजी को एक ई-पत्र लिखा था जिस पर उन्होंने कहा था कि मैं तुम्हें इसके जवाब में सेन्ड नहीं पोस्ट करूंगा.. 10 दिन हो गये हैं.. अभी तक मुझे मिला नहीं है.. या तो पापाजी भूल गये भेजना या फिर कहीं रास्ते में अटका होगा.. पता नहीं.. खैर अगर भूल गये होंगे तो मेरा यह पोस्ट पढकर याद आ जायेगा..



