Saturday, October 18, 2008

एक चिड़िया जो ओ गदही पुकारती थी

मुझे उस चिड़िया का नाम पता नहीं है जो ओ गदही पुकारती थी.. हम तीनों भाई-बहन बहुत छोटे थे उस समय.. मैं छठी कक्षा में था, भैया आठवीं में और दीदी नौंवी में.. पापाजी हम तीनों को अलग-अलग नामों से पुकारते थे.. मुझे पुछरू(अब इस नाम से पुकारे गये जमाना बीत गया है), भैया को नकपिच्चू और दीदी को गदही.. इस नाम से पुकारे जाने पर पूरे जन्म भर का प्यार उमर आता था..(शायद अब भी पुकारे जाने पर वही एहसास रहे.).. दो कमरे और एक ड्राईंग रूम के अलावा दो लैट्रिन-बाथरूम, एक बाल्कनी, रसोई घर, डायनिंग हॉल और एक छोटा सा बगीचा हुआ करता था.. हम सभी सितामढी में रहते थे.. कुछ धुंधली सी यादें जानकी मंदिर कि भी है जिसके बारे में मान्यता है कि सीता जी का जन्म वहीं हुआ था..

बगीचे में 5-6 अमरूद के पेड़ थे, कुछ पपीते के और केला के पेड़ों का एक समूह भी जिसे बहुत छोटे में मैंने ही लगाया था और जब सूखने लगा था तब गुस्से से काट भी दिया था.. मगर बाद में चाचाजी ने उस कटे हुये पेड़ को फिर अच्छे से लगाया तो वह लग गया.. शायद 5-6 साल का रहा हो ऊंगा उस समय.. एक खास तरह कि चिड़िया अक्सर उन्हीं पेड़ों में से किसी पर आकर बैठती थी और "टू नी नी" जैसी आवाज निकालती थी.. एक दिन दीदी को पापाजी ने बताया कि वह ओ गदही पुकार रही है.. मतलब तुम्हें बुलाती है.. बचपन का मासूम मन भी इसे मान लिया.. वैसे भी दीदी किसी आम लड़की कि तरह चिड़िया जैसे उड़ना चाहती थी.. हवाओं को अपने मुट्ठी में बंद कर उड़ाना चाहती थी.. जमाने कि फिक्र से बेफिक्र..

ठीक-ठीक याद नहीं है पर शायद 1992-93 में पापाजी का तबादला चक्रधरपुर, जो बिरसा मुंडा कि कर्मभूमी रह चुकी है और अब झारखंड में है, हो गया.. पापाजी 2-3 महीने या शायद 3-4 महीने के लिये हमलोगों को वहीं छोड़कर वहां चले गये.. हो सकता है 1-2 महीने के लिये ही गये हों मगर वही सालभर से कम नहीं था मेरे बालमन के लिये.. सो अभी तक बस इतना ही याद है कि बहुत दिनों तक नहीं आये थे.. फोन का जमाना उस समय तक हमलोगों के लिये नहीं आया था.. सारा काम चिट्ठियों से ही होता था जो महिने में 2-3 ही मिलते थे.. वो चिड़िया भी लगता था उन्हीं के साथ चली गयी थी.. उसने भी आना कम कर दिया था.. जब कभी ओ गदही जैसी आवाज आती हम दौड़ पड़ते बगीचे कि तरफ.. लगता जैसे पापाजी का संदेश लेकर आयी हो..

सितामढी के बाद कभी भी उस चिड़िया कि आवाज नहीं सुनी.. मैं सोचता था कि कहीं वो भी तो विलुप्त नहीं हो गयी होगी? आज सुबह-सुबह लगभग 5.30 में एक फोन के आने से नींद खुल गई.. बाहर बालकनी में आया तो ठंडी हवा चल रही थी.. आसमान में बादल छाये हुये थे.. तभी कहीं से वही आवाज सुनी.. "ओ गदही" या कह सकते हैं "टू नी नी".. लगा कि बस हम इंसानों की भाषा ही बदलती है.. पंछी-जानवरों कि भाषा हर जगह एक जैसी ही होती है.. लगा जैसे कि वही बचपन फिर से लौट आया है.. मन ख्यालों में डूब गया.. लगा जैसे पापाजी अभी कहेंगे कि देखो स्वीटी, तुम्हें ये चिड़िया "ओ गदही" बुला रही है..

भले ही अब हर दिन घर बात हो जाती है.. जब जिससे संपर्क में आना चाहूं आ सकता हूं.. चौबिसों घंटे मोबाईल भी साथ होता है.. ई-पत्रों से सुविधा और भी बढ गयी है.. मगर उस हाथ के लिखे पत्रों कि महत्ता खत्म नहीं हो सकती है.. उसकी छुवन से वो अहसास कभी नहीं जा सकता है.. हस्तलिपी से आप पल भर में किसी को पास पा सकते हैं.. कुछ दिन पहले मैंने पापाजी को एक ई-पत्र लिखा था जिस पर उन्होंने कहा था कि मैं तुम्हें इसके जवाब में सेन्ड नहीं पोस्ट करूंगा.. 10 दिन हो गये हैं.. अभी तक मुझे मिला नहीं है.. या तो पापाजी भूल गये भेजना या फिर कहीं रास्ते में अटका होगा.. पता नहीं.. खैर अगर भूल गये होंगे तो मेरा यह पोस्ट पढकर याद आ जायेगा..

Thursday, October 16, 2008

दूसरी बकवास - अर्चना ऐ ईनो

परसो कि बात है.. मैं अपने आफिस के एक साथी के साथ उसके बाईक से घर लौट रहा था.. यूं ही बातें भी हो रही थी.. बातों ही बातों में हिंदी सिनेमा के ऊपर बातें होने लगी.. उन्हें हिंदी टूटी-फूटी समझ में आ जाती है.. सो हिंदी सिनेमा का खूब लुत्फ़ भी उठाते हैं.. बाते करते करते अचानक से उन्होंने पूछा.. Hey! What was that movie? "अर्चना ऐ ईनो"?
मैं सोच में आ गया.. अर्चना ऐ ईनो? ऐसा नाम तो मैंने किसी हिंदी सिनेमा का नहीं सुना था.. बहुत दिमाग घुमाया, कुछ समझ में नहीं आया.. फिर उसी से पूछा कि एक्टर कौन था.. उन्हें याद नहीं.. फिर पूछा एक्ट्रेस कौन थी? अबकी एक नाम बताया.. बिपासा.. फिर सोचा.. हां याद आ गया.. मैंने पूछा क्या आप बचना ऐ हसीनों कि बात कर रहे हैं? जवाब आया Yes yes.. और मेरा हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया.. बेचारे मेरे साथी मुझे अजीब तरीके घूरे जा रहे थे.. :D

मेरे पहले बकवास को पसंद करने से मेरा हौसला बढता ही जा रहा है.. सोच रहा हूं कि कोई नया चिट्ठा ही बकवास करने के लिये शुरू कर दूं.. (बकवास कर रहा हूं, सो लोड ना लें..) वैसे कम्यूनिटी चिट्ठा शुरू करने पर ज्यादा फायदे नजर आ रहे हैं, यहां सभी इस बकवास की तारीफ करने वालों को भी बकवास करने के लिये एक चिट्ठा मिल जायेगा.. दिनेश जी सबसे पहले हौसला बढाने के लिये आये.. पीछे-पीछे संजीत जी हा हा हा करते हुये आये.. अरे हां इससे याद आया.. हमेशा मन में आता था कि टीवी सिरीयल के राक्षस सभी इतने हट्ठे-कट्ठे क्यों होते थे.. बहुत सोचने पर पाया कि हंसी ही उनका राज था.. बात-बेबात की हंसी.. इससे यह शिक्षा मिलती है कि आप भी दिल खोल कर हंसिये और हट्ठे-कट्ठे बने रहिये.. अनिल जी, अपने ताऊ और रंजन जी इस पोस्ट से खूब मजे लिये और अगले के इंतजार में भी पाये गये.. एक तरह अभिषेक ओझा जी को यह सबसे बकवास लगा तो अजित जी इसमें बकवास ढूंढ भी नहीं पाये.. हद हो गई भाई.. इतना बकवास करने पर भी किसी को बकवास ना लगे तो मन खट्टा हो जाता है.. कुश जी बढिया कह कर निकल गये तो मसिजिवी जी बस मुस्कुरा कर रह गये.. वैसे भी कई बार देखा गया है कि लोग मुसिबतों का मुस्कुराकर सामना करते हैं.. मसिजिवी जी का कहीं यही हाल तो नहीं है? वैसे भी वो तस्वीर में जितने खूंखार टाईप दिखते हैं असल जिंदगी में उतने ही हंसमुख मिजाज हैं.. सो कुछ भी कह लें वे तो हमेशा मुस्कुराते ही रहेंगे..(कम से कम मैं तो यही सोचता हूं).. :)

और अंत में सबसे अच्छी बकवास से भड़े कमेंट का ईनाम जाता है जितेन्द्र भगत जी को.. उन्होंने फरमाया "थाली में मुर्गे की लाश है, पौधों में फुल की तलाश है, सागर में जल की प्‍यास है, सोचा था ऐसी टि‍प्‍पणी दूँ जो लगे कि‍ बकवास है, पर लगता है आपकी तरह मैं भी गड़बड़ा गया।"


आप सभी को धन्यवाद..

Wednesday, October 15, 2008

मत पढिये इसे, सब बकवास लिखा है

आज 2-3 शीर्षकों के ऊपर मैं चर्चा करना चाहूंगा जिसके बाद बुद्धिजिवी वर्ग के प्राणी बहस तक कर सकते हैं कि क्या इस तरह की चिट्ठाकारी को आप साहित्य का दर्जा दे सकते हैं? और उन लोगों का भ्रम भी टूटेगा जो चिट्ठाकारिता को एक साहित्य के रूप में सामने रख कर पढने कि नाकाम कोशिश करते हैं.. तो चलिये चलते हैं पहले बकवास की ओर..

कौवा क्या सोचता होगा?

क्या अजीब शीर्षक है ना? मगर आपने कभी सोचा है कि इतनी जगह से दुत्कारे जाने के बाद भी वो आपके द्वार पर दुबारा क्यों आता है? क्या उसके मन में रोष जैसी भावना नहीं आती होगी? कभी कोई प्रेमिका अपने प्रीतम की याद में(साठ के दशक वाले स्टाईल में सोचे तभी कल्पना कर सकते हैं) किसी कौवे से प्राथना करती दिखेगी तब उस समय एक कौवा क्या सोचता होगा?

बहुत पहले की बात है.. हमने घर में हमने एक तोता पाला था.. बहुत प्यार से.. मेनका गांधी से भी छुपा कर.. एक जाड़े की नर्म धूपा में(कुछ याद आ रहा है क्या? हां जी गाना.. या जाड़े की, नर्म धूपा में.. आंगन में लेट कर.. अर्रर्र.. मैं विषय से भटक रहा हूं, अगर कहीं विषय जैसी कुछ चीज होगी तो..) हम उसका पिंजड़ा रख छोड़े थे.. तभी एक कौवे ने आकर उसे बहुत परेशान किया.. तभी हमें कौवे की एक बात पता चली.. हमारा तोता बेचारा, जब तक वहां कौवा था तब तक कौवे की भाषा में बोलता रहा.. पहले तो हमें लगा कि तोता परेशान होकर कांय-कांय चिल्ला रहा है सो उस कौवे को मार कर भगा दिया.. बाद में खूब सोचा तब जाकर महसूस हुआ कि वो बेचारा तड़प रहा था कौवे से बात करने के लिये.. इतना ज्यादा बेचैन था कि वो सुध-बुध खोकर भूल बैठा कि वो तोता है, कौवा नहीं.. और उसी की भाषा में बोलने लगा.. बाद में पाया कि रात में कभी किसी बिल्ले ने आकर तंग किया तो भी कौवे की भाषा में पुकारता था.. कांय-कांय.. नेवला परेशान करे तो भी वहीं भाषा.. कांय कांय..

मन में आया कि कहीं मैकाले की कोई प्रजाति कौवे में भी तो नहीं थी जिसके कारण मेरा तोता अपनी भाषा का सम्मान करना छोड़कर अंग्रेजों.. आं.. माफ किजियेगा कौवे की भाषा में बोलने लगा है..(कॄपया यह प्रश्न ना उठायें कि कौवे अंग्रेज कब से हो गये या फिर अंग्रेज कौवे कैसे.. एक काला और दूजा गोरा.. दोनो में समानता कैसे.. भई हम ब्लौगरों का यही काम ही होता है.. जो चाहे सिद्ध कर सकते हैं.. वैसे भी भई मेरा चिट्ठा है, मेरा लेख है.. जो मन में आये लिखूंगा).. ;) फिर मैंने सोचा कि जब यही कौवा इतना अच्छा है तो क्यों ना कौवा ही पाल लिया जाये.. वैसे भी एक दिन मेरा तोता पिंजड़े से संन्यास लेकर निकल भागा.. अब संन्यास से फिर कुछ याद आ रहा है.. गांगुली.. अजी क्या बतायें हम.. हमको कितना अच्छा लगता है.. वो भी संन्यास ले लिये हैं..

उस दिन से अब तक प्रतिक्षा में हैं कि कब कोई कौवा उस पिंजड़े में आकर बैठता है.. मगर उसकी प्रजाति में गुलाम होना नहीं लिखा है.. सो अब क्या करें.. देखिये.. आपने तो मुझे विषय से ही भटका दिया था.. विषय था कौवा क्या सोचता होगा? मैंने बहुत सोचा और अंततः समझ भी गया.. वो सोचता होगा "कांव-कांव".. अगर मैं गलत हूं तो साबित करके दिखायें.. :D

चलिये अब दूसरे बकवास की ओर चलते हैं.. क्या अभी भी आपमें इतनी उर्जा बची हुई है कि दूसरा बकवास भी पढेंगे? अगले पोस्ट का इंतजार तो कर लें.. :)

Sunday, October 12, 2008

इंतजार है मुझे(एक कविता मनोज द्वारा)


जाने किसका इंतजार है मुझे..
जब घर में अकेला होता हूं मैं,
सन्नाटों से घिरा होता हूं मैं..
कोई आहट सी होती है तो,
चौंक जाता हूं..
दरवाजे पर निगाहें टिकी होती है,
दस्तक कोई दे रहा हो जैसे..
जाने किसका इंतजार है मुझे..

अखबारों को पलटते समय,
निगाहें बेकरार होती है जैसे..
हर खबर को पढकर,
कुछ ढूंढती हुई निगाहें जैसे..
अखबारों के हर पन्ने से,
खेल रहा होता हूं मै..
जाने किसका इंतजार है मुझे..

कभी चबूतरे पर बैठा हुआ,
सड़कों पर नजरें जमाये,
कुछ सोचते हुये..
दौड़ते-भागते गाड़ियों में जैसे,
कुछ ढूंढ रहा होता हूं मैं..
जाने किसका इंतजार है मुझे..

भीड़ में चलते लोगों में,
किसी को पहचानने कि
कोशिस कर रहा होता हूं मैं..
पता नहीं कोई मिल जाये कभी..
इन ख्यालों में घुम रहता हूं मैं..
जाने किसका इंतजार है मुझे..

मेरे खास मित्र मनोज द्वारा प्रस्तुत यह कविता.. यह उनका प्रथम प्रयास है, आप उनका उत्साहवर्धन अपने टिप्पणियों द्वारा करें..

चित्र के लिये Artbywicks.com को साभार..

Saturday, October 11, 2008

अंततः मैं इंडियन आयडल में चुन लिया गया :)

मेयांग चांग - ये है इंडियन आयडल का चेन्नई चैप्टर.. मंदिरों और खूबसूरत समुद्र तट के लिये प्रसिद्ध इस शहर में हम आये हैं साल 2008 के इंडियन आयडल के लिये संगीत के जूनूनी लोगों का चुनाव करने.. तो आप क्या सोचते हैं? क्या आज हम इस शहर से अपने सपनों के गायक का चुनाव कर पायेंगे?
दिपाली - कहीं उत्साह है तो कहीं घबराहट.. आखिर हो भी क्यों ना.. संगीत प्रेमियों के लिये यही तो सपनों की मंजिल भी है.. जैसे जैसे समय बीतता जा रहा है वैसे वैसे माहौल गरमाता जा रहा है.. और अभी-अभी हमारे जजेस भी यहां आ चुके हैं.. उत्साह के साथ कंटेस्टेंट्स ने उनका स्वागत किया..

(15 मिनट बाद..)

उफ्फ.. कितनी गर्मी है.. फिर भी लोगों का उत्साह अपने एक्सट्रीम पर है.. जितनी गर्मी इधर बाहर है उससे ज्यादा गर्मी अंदर जजेस पर भी छाई हुई है.. अभी वक्त है इम्तेहान का.. सिर्फ एक मौका मिलेगा सुनहरे भविष्य से हाथ मिलाने का.. एक मौका जजेस को इंप्रेस करने का.. सभी कंटेस्टेंट्स तैयार हो जाईये.. ये मौका बार बार नहीं आता.. जितने सतर्क कंटेस्टेंट्स हैं उतने ही जजेस भी.. आखिर आज उनका भी तो इम्तेहान है.. अंदर जाकर दिखा देना है कि चेन्नई में भी है कुछ बात..

(काफी देर बाद..)

मैं मन ही मन सोचते हुये, "चलो अब मेरा समय भी आ ही गया.." धरकते हुये दिल से मैं अंदर गया.. सोचते हुये, "पता नहीं क्या होगा अंदर.. खैर जो होगा देखा जायेगा.." अंदर पाया कि पिछले प्रतियोगी से जजेस बहुत चिढे हुये से लग रहे थे..

अनु मलिक - आईये.. आप भी आइये.. क्या सुनाना चाहते हैं आप?
जावेद अख्तर - आप पिछले प्रतियोगी कि खीज इन पर क्यों उतार रहे हैं?
अनु - लो.. मैंने क्या कह दिया?
जावेद - जो कहना था वह तो आपने पहले ही कह दिया..
कैलाश खेर - हा हा हा..
सोनाली - अरे अभी तो आप लोग बहस करना बंद करें.. हां तो आप कहां से हैं?

मैं - जी मैं पटना बिहार से..

सोनाली - बिहार से और यहां चेन्नई में? क्या कर रहे हैं आप यहां पर?

मैं - जी हां.. मैं यहां एक साफ्टवेयर कंपनी में काम करता हूं..

सोनाली - हां तो गाईये..

मैंने गाना शुरू किया..

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अनु - ये गाना है? आप क्या सोचते हैं, साफ्टवेयर बनाते हुये आप गाना भी गा सकते हैं?
कैलाश - मेरे मुताबिक तो कुछ बात है इसकी आवाज में.. मेरी तरफ से येलो कार्ड के लिये हां है..
अनु - मानता हूं कि लय सही पकड़ा इन्होंने मगर ये आवाज सही है गाना गाने के लिये?
कैलाश - आप जितनी भी सूफी कव्वालियां सुनेंगे, आपको ऐसी ही भाड़ी आवाज सुनने को मिलेगी..

मैं मन ही मन सोचते हुये, "अरे यार हां करना है तो करो नहीं तो निकाल दो ना.. इतना नाटक क्यों कर रहो हो यारों.. मैं कौन सा इंडियन आयडल बनने आया था.. अपन भी तो टाईम पास कर रहा है यार.. :)"

जावेद - तुम एक काम करो, एक और गीत सुना दो..


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जावेद - बस.. मेरी तरफ से यह येलो कार्ड पक्का है..
सोनाली - मेरी तरफ से भी..
उधर अनु मलिक गुस्से से मुझे देखे जा रहे थे और मैं खुशी-खुशी येलो कार्ड लेकर बाहर निकला.. खुशी से चीखते हुये..

तभी आवाज आई.. अबे साले! क्यों नींद में चिल्ला रहा है? खुद तो सोता नहीं है और किसी दूसरे को भी नहीं सोने देता है.. घड़ी देखा तो रात के तीन बज रहे थे.. सोचा चलो देखता हूं कि सच में इंडियन आयडल चेन्नई कब आ रहा है.. कंप्यूटर चालू किया और इंटरनेट पर सर्च किया.. पता चला कि चेन्नई नहीं आ रहा है.. बल्की आजकल जो भी दिखा रहा है उसकी रिकार्डिंग मई महिने में ही हो चुकी थी.. सो अगर बैंगलोर जाकर आडिसन देना भी चाहूं तो नहीं दे सकता.. खैर चलो सोने चलता हूं.. शायद फिर सपने में आगे का एपिसोड दिख जाये.. :)

Friday, October 10, 2008

इंतजार भी कितनी खूबसूरत होती है.. है ना?

इंतजार भी कितनी खूबसूरत होती है..
एक ऐसा इंतजार जो कभी लगता है,
खत्म ना ही हो तो अच्छा है..
दिल को सकून तो मिलता है,
कि तुम भी शायद इसी इंतजार में हो..
मेरे इंतजार में..

भुलावे में जीना भी कभी-कभी
जीने कि वजह बन जाती है..
तुम कभी वापस मत आना..
शायद यह खुशफहमी खत्म ना हो जाये..
जीने की वजह ही खत्म ना हो जाये..
तुम कभी वापस मत आना..
प्लीज मत आना..


मेहदी हसन जी का एक गीत..

Tuesday, October 07, 2008

२४ घंटे, जो ख़त्म होता सा ना दिखे

मेरे मित्र अमित द्वारा

अमूमन मैं इतना लम्बा नहीं लिखता हूँ.. उतना धीरज ही नहीं है की लिखू.. पता नहीं क्यों आज लिखने का मन कर रहा है और आज लिख रहा हूँ.. इससे पहले भी मेरे साथ बहुत साड़ी अजीबोगरीब घटनाएं हो चुकी हैं.. मगर आमतौर से मैं बांटता नहीं हूँ और बांटता भी हूँ तो बहुत कम लोगो से..

शुरु से शुरु करते हैं.. पहले मैं हरेक दूसरे हफ्ते या हर हफ्ते बैंगलोर जाया करता था.. पर इस बीच में हालत कुछ ऐसे हो गए कि मैं लगभग एक-दो महीनों से बैंगलोर नहीं जा सका.. पिछले हफ्ते किसी तरह मौका निकाल कर मैंने बैंगलोर जाने का मन बनाया और शुक्रवार को निकल पड़ा बैंगलोर के लिए.. अक्सर मैं ऑफिस से ही निकला करता था लेकिन उस दिन मैं ऑफिस से घर आया फिर घर से निकला.. घर से निकलते ही मुझे अपने आस पास के चीज़ों पर से कण्ट्रोल ख़तम होता सा लगाने लगा.. ऐसा मुझे काफी बाद मैं पता चला.. खैर!! घर से निकलते ही लिफ्ट के पास पहुंचा.. बटन दबाया.. पर लिफ्ट काम नहीं कर रहा था.. ऐसा अक्सर होता है.. इसलिए मैं सीढियों से नीचे गया..

फिर बारी आई ऑटो लेने कि.. जिस भी ऑटो वाले से पूछो कोई ८०-९० रूपये से कम बोल नहीं रहा था.. मेरे घर से कोयम्बेदु(चेन्नई इंटर सिटी बस स्टैंड) तक का साधारण किराया ४० रूपया है.. मैंने लगभग १० ऑटो छोडे फिर जाकर एक ऑटो वाले ने ४५ रूपये में मुझे कोयुम्बेदु पहुंचाया.. अब यहाँ सबसे पहले मुझे वापसी का टिकट लेना था.. आमतौर से मैं वापसी का टिकट बैंगलोर से चेन्नई ले लेता हूँ जिससे आते समय कोई दिक्कत ना हो.. और जाने का टिकट वहीँ लेता हूँ.. इसके लिए मुझे ATM से पैसा निकालना था.. अभी तक ज्यादा कुछ नहीं हुआ था.. खैर जब ATM के पास गया तो पता चला ATM ख़राब है.. मेरे पास सिर्फ १०० रूपये थे.. मुझे हर हालत में पैसा निकालने थे.. फिर क्या मैंने वापस ऑटो लिया और वापस १०० फीट रोड आकर पैसे निकाला और फिर उसी ऑटो से वापस बस स्टैंड पहुंचा.. अब मुझे टिकट लेना था वापसी का और मैं सोच रहा था की काश टिकट काउंटर पर भीड़ ना हो.. और यही हुआ भी.. टिकट काउंटर पर बिलकुल भीड़ नहीं थी.. देख कर जान में जान आई(पर मुझे पता नहीं था कि क्या होने वाला है मेरे साथ).. बस मेरे आगे 2 लोग ही थे.. ३ मिनट में मेरा नंबर आ गया..

टिकट काउंटर पर जो बैठा था उसने मेरी सारी जानकारी फीड कर दिया और टिकट निकालने के लिए उसने कन्फर्म बटन दबा कर मुझसे पैसे ले लिए.. बस अब इंतजार था प्रिंटआउट आने का.. ५ मिनट बीता.. १० मिनट बीता.. १५ मिनट हो गए.. पर कुछ नहीं आया.. उसने फिर से कन्फर्म बटन दबाया.. कुछ आना था नहीं सो नहीं आया.. इंतजार करते-करते ३० मिनट हो चले.. वो बटन दबाता पर कुछ नहीं होता.. बीच में मैंने उससे कहा भी कि फिर से बंद करके शुरू करे पर वो नहीं माना.. खैर इसी तरह करते-करते एक घंटे हो गए.. टाइम १० बजकर ३० मिनट.. बैंगलोर जाने वाली बसें निकलती जा रही थी और मैं लाचार होकर बस देखता जा रहा था.. अब टिकट काउंटर वाले किसी जानकार को बुला रहे थे.. मैं उन्हें अपनी बात समझा भी नहीं सकता था.. तमिल मैं बोल नहीं सकता और इंगलिश उन्हें समझ में नहीं आ रही थी.. अबा समय था ११.०० PM.. किसी तरह मैंने उन्हें फिर से ऍप्लिकेशन को बंद करने और शुरू करने के लिए मना लिया.. और अंततः ११.२० तक मेरा टिकट हाथ में आ गया..

लेकिन अब तक लगभग सारी बसें जा चुकी थी.. एक बस खुलने वाली थी.. मैं दौड़ के वहां पहुंचा.. कंडक्टर दिख नहीं रहा था.. तभी एक आदमी ने आवाज़ दिया.. मैं गया उसके पास.. ताबेअत्याप जैसा ही दिख रहा था.. एक कंडक्टर के पास जो होना चाहिए सब थे उसके पास.. खैर! मैंने पुछा आप उस बस के कंडक्टर हो.. उसने कहा हाँ और ये भी की बस एक सीट खाली है, जल्दी करो.. मुझे भी जल्दी थी.. मैंने उसे पैसे दिए और उसने मुझे सीट नंबर ३४ का टिकट दे दिया.. मैं भाग कर बस के अन्दर गया.. लेकिन यह क्या? उस सीट पर कोई और बैठा था.. उसने अपना टिकट दिखाया और उसका भी नंबर ३४ था.. बस लगभग खुल चुकी थी और स्टैंड से निकलने लगी थी.. मैं नीचे उतरा कंडक्टर को खोजने.. वो तो कहीं नहीं मिला इस बस का कंडक्टर मिला.. मैंने उससे कहा की ३४ सीट नंबर पर कोई है जबकि वो मेरी जगह है.. उसने इंतजार करने को कहा...मैं फिर बस के अन्दर चला गया.. बस स्टैंड से निकल चुकी थी और मैं बेवकूफ जैसे बस में खडा था.. कंडक्टर आया.. वो सीट नंबर ३४ के पास गया.. फिर वापस आया.. उसने मुझसे पुछा की ये टिकट मैंने दिया है और मैंने यहाँ झूठ बोला क्योंकि अबतक मैं जान चूका था की मुझे किसी ने मामू बना दिया है.. बस मैंने पूरे आत्मविश्वास से कहा, "हाँ भाई आपसे ही तो लिया है.." बेचारा सोच में पड़ गया.. अंततः उसने मुझे ड्राईवर के ठीक पीछे भैटने का ऑफर किया.. वहां बैठ नहीं सकते थे इसलिए मैंने उससे पैसा वापस के लिए कहा..

क्रमशः...

Saturday, October 04, 2008

तुम बहुत दुबले हो, इज दिस राईट फौर यू?

एक दिन जब मैं मोटा हो जाऊंगा तब,
हवायें उड़ा ना पायेंगी मुझे..

लोग मुझे मोटा कहकर पेपरवेट कि तरह,
मेरी बातों को दबाने का प्रयास भी किया करेंगे..

किसी मटके सा मेरा पेट होगा,
गालें फुली होंगी चर्बी से..

किसी मोटे सेठ सा मेरा हुलिया होगा
लोग मुझे उसी स्तर का समझ सलाम ठोकेंगे..

गरीबी रेखा से नीचे वालों के लिये,
मैं ईर्ष्या की वस्तु होऊंगा..

अपने दबे-पिचके पेट, सूखे गालों कि तुलना
वो मुझसे किया करेंगे..

इज्जत का चिथड़ा उड़ाकर
ऐ मोटे कहकर दोस्त लोग बुलायेंगे..

मैं मन ही मन गालियां देकर
और उपर से खींसे निपोर कर रह जाऊंगा..

एक दिन जब मैं मोटा हो जाऊंगा तब,
हवायें उड़ा ना पायेंगी मुझे..

Friday, October 03, 2008

धुम्रपान निषेध और मेरे कुछ अनुभव


कल से पूरे भारत में धुम्रपान संबंधित कई तरह के नये नियम लागू किये गये.. उसका असर मुझे अपने घर के आस-पास भी देखने को मिला.. सुबह-सुबह अपनी बाल्कनी से झांका तो मुझे एक पुलिसवाला पार्किंग स्थल पर घूमता हुआ मिला जो लगभग हा 1 घंटे पर आकर झांक जाता था.. वैसे यह दोपहर 12 बजे तक ही दिखा.. उसके बाद उसी पार्किंग में लोग सिगरेट पीते हुये दिखे.. भारत में नाना प्रकार के कानून बनाये गये हैं, मगर कितनों का पालन अच्छे से होता है? चलिये मैं धुम्रपान से संबंधित अपने अनुभव सुनाता हूं..

अनुभव एक -
पिछले साल कि बात है.. मैं अपने घर के पास वाले एस.बी.आई. के ए.टी.एम. से पैसे निकालने के लिये गया.. वहां लम्बी कतार लगी हुई थी.. मुझसे दो आगे एक विदेशी भी था.. वो लगातार सिगरेट पिये जा रहा था.. चूंकि मैं सिगरेट पीता था सो मुझे कोई परेशानी नहीं थी, मगर मैंने देखा कि आस-पास के लोगों को खास करके महिलाओं को परेशानी हो रही है मगर विदेशी होने के कारण संकोच से कोई भी उसे कुछ नहीं बोल रहा था.. मैंने उसे बोला इसे बंद करने के लिये.. उसने अनसुना कर दिया और पीता रहा.. मैंने देखा कि गार्ड भी कुछ नहीं बोल रहा था और मजे ले रहा था.. फिर वो वैसे ही सिगरेट पीते हुये ए.टी.एम. के अंदर चला गया.. अब मैंने गार्ड से पूछा कि क्यों कुछ नहीं बोले उसे? वो हिंदी या अंग्रेजी नहीं समझने कि बात इशारों में कह कर कुछ नहीं किया..
अब तक सारे लोग बस तमाशा देख रहे थे.. मैं पूरे मूड में आ चुका था.. मैंने भी अपनी सिगरेट निकाली.. और उसे जला कर पीने लगा.. अब गार्ड मुझे घूरने लगा.. जब मैं ए.टी.एम. के अंदर जाने लगा तो उसने मुझे इशारों में टोका अंदर नहीं पीने के लिये.. अब वहां सारे लोग उससे लड़ने लगे.. कि जब ऐसा ही था तो उस विदेशी को कुछ क्यों नहीं बोले? खैर मैंने सिगरेट बुझाई, अपने पैसे निकाले और चला गया वहां से, दिल में खुश होता हुआ कि कुछ गलत को होने से रोकने कि कोशिस तो की मैंने..

अनुभव दो -
बहुत पहले कि बात है.. ठीक-ठीक याद नहीं कि वो संपूर्ण क्रांती एक्सप्रेस थी या दानापुर-हावड़ा.. ट्रेन अपनी पूरी रफ़्तार से भागी जा रही थी.. रात के लगभग बारह बज रहे थे.. मैं ए.सी. टू टीयर में था शायद.. मैं सोने से पहले बाथरूम जा रहा था, तो मैंने देखा कि एक लड़का दरवाजा खोल कर सिगरेट पी रहा है.. मुझे भी सिगरेट पीने कि इच्छा हो आई.. थोड़ी देर बाद उस लड़के की जगह मैं था.. उसी तरह धुवें के छल्ले उड़ाता हुआ.. तभी वहां से टी-टी गुजरा.. उसने मुझे देखा और कहने लगा कि फाईन होगी.. मैंने कुछ कहा नहीं बस अपना सिगरेट का पैकेट निकाल कर उसे भी पीने का ऑफर कर डाला.. वो कभी मुझे देखता और कभी सिगरेट को.. फिर मुझे बुला कर अलग से ले गया.. बैठाया और एक सिगरेट मुझसे लेकर पीने लगा.. कहने लगा कि बहुत दिनों बाद मार्लबोरो सिगरेट देख रहा है.. बहुत देर तक मेरा दिमाग चाटता रहा.. मुझे लग रहा था कि यह मुझसे फाईन ले लेता वही अच्छा होता.. :)

एक और अनुभव मैंने बहुत पहले लिखी थी.. उसे आप यहां पढ सकते हैं..

Wednesday, October 01, 2008

नये न्यूज चैनल VMM का खबरिया, प्रशान्त

नमस्कार!! आप देख रहे हैं VMM न्यूज चैनेल.. आज का समाचार आप प्रशान्त प्रियदर्शी से सुनने जा रहे हैं.. आज के मुख्य समाचार इस प्रकार हैं..

*शिवेन्द्र अपने घर बीबीपुर, छपरा के लिये रवाना, वडापलानी चिड़ियाघर में खुशियों का सा माहौल..
*वडापलानी चिड़ियाघर में इंडियन आईडल का धमाल..
*कोलकाता में त्योहारों का उल्लास मगर नीता को अपने पैसे अभी तक नहीं मिलने से उनका मन उदास..
*मुम्बई में लंगड़ा त्यागी जी प्रशान्त कि नयी कविता के इंतजार में.. संजीव के 3-4 कॉल अमित ने मिस किये..
*बैंगलोर में सन्नाटा..
*USA में आर्थिक संकट..
*प्रशान्त ने क्रिकेट टीम से अपना नाम वापस लिया.. चंदन शतक कि ओर..


अब समाचार विस्तार से सुने..
अभी-अभी हमारे विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि शिवेन्द्र कुमार गुप्ता जी अपने घर बीबीपुर जाने के लिये चेन्नई सेन्ट्रल पहूंच चुके हैं.. यह खबर सुनते ही वडापलानी चिड़ियाघर में स्थित हमारे मित्रों में खुशियों की लहर सी दौर गई.. हमारे संवाददाता ने उनसे फोन लाईन पर संपर्क किया और पुछा आपको कैसा लग रहा है.. उन्होंने बताया की बहुत उल्लास पूर्वक वो घर जा रहे हैं.. संवाददाता ने उन्हें याद दिलाया कि बोतल में चूड़ा का भूंजा पैक करके लाना ना भूलें.. वो इन दिनों बहुत परेशान नजर आ रहे थे, उनकी परेशानी दूनी हो गई जब उन्हें पता चला कि 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये और 25 से 50 तक गृहस्थ का.. उन्हें पता चला की इस तरह उन्होंने अपना 1 वर्ष और 1 महिना व्यर्थ कर दिया है.. हम उम्मीद लगा रहे हैं कि बीबीपुर से वापस आ कर साथ में अप्नी बीबी का भी हाल समाचार सुनायेंगे.. यह समाचार हम सबसे पहले आप तक पहूंचा रहे हैं.. हमारे दूसरे फोन लाईन पर मौजूद हैं वडापलानी चिड़ियाघर में रहने वाले एक प्राणी विकास..
"हां विकास जी, क्या आप हमें सुन पा रहे हैं?"
घर्रर्रर्र.. "हां कहिये.."
"आपको कैसा लग रहा है?"
"अच्छा हुआ साला चला गया.. कुछ दिन मन को शांति मिलेगी.. एक साला से उसकी सूरत देख-देख कर पक गया था.. दूसरी बात यह है कि जब घर से आयेगा तो खाने-पीने का सामान भी लेता आयेगा.."
"तो आप देख रहे हैं कि वडापलानी चिड़ियाघर के प्राणियों के चेहरे पर कितनी खुशी छाई हुई है.."
सबसे तेज VMM न्यूज चैनल..

आज-कल वडापलानी चिड़ियाघर में स्थित हमारे सभी जानवर गण रात में अपने पिंजड़े में पहूंचते ही ठ्V पर टूट परते हैं.. आज-कल वहां इंडियन आईडल और जरा-जरा नच के दिखा जैसे रियालिटी शो ने धमाल मचा रखा है.. आज-कल प्रशान्त को उनके मित्र विकास, अमित और शिव इंडियन आईडल में भाग लेने के लिये चने कि झाड़ पर चढा रहे हैं.. देखिये कब तक चने कि झाड़ पर प्रशान्त चढने में सफल होते हैं, जिससे कि उन्हें वहां से धक्का दिया जा सके..

दशहरा के पावन मौके पर कोलकाता में खुशियों का सा महौल है.. रोज खरीददारी करके बाकी जगहों के लोगो को जलाया जा रहा है.. उधर हमें अभी-अभी पता चला है कि नीता को अपने पैसे नीरज से वापस नहीं मिले हैं.. वो काफी गुस्से में हैं और उदास भी.. और इस त्योहार में नीरज को गालियों का उपहार देने का सोच रहीं हैं..

आज ही पता चला कि हमारे अनुज कुमार सिंह उर्फ़ 'लंगड़ा त्यागी' काफी दिनों से दूसरों कि कवितायें पढकर बोर हो जाने के कारण से एक अदद कविता कि मांग प्रशान्त प्रियदर्शी के सामने रखे हैं.. उन्होंने धमकी दी है कि अगर जल्द से जल्द उन तक कविता ना पहूंचाई गयी तो वो देशव्यापी बंद का आयोजन करेंगे.. इधर प्रशान्त घबरा कर अपने ऑफिस में ही किसी कविता कि तलाश में जुट गये हैं.. एक कविता को वो जानते थे, मगर वो तो दूसरे ब्रांच में काम करती है..

उधर कल रात अमित ने संजीव भाई के 3-4 बार फोन करने पर भी फोन नहीं उठाया.. हमारे विश्वत शूत्रों से पता चला है कि अमित ने वो कॉल देखा ही नहीं.. मगर अमित कि हालत पतली बताई जा रही है.. उन्हें डर है कि कहीं मुम्बई से भाई लोगों का फोन जबरदस्ती टैक्स वसूलने के लिये तो नहीं था? उन्होंने अभी तक पुलिस को खबर नहीं की है और इससे अपने स्तर से निकलने कि तैयारी में हैं..

आज ही अर्चना का मेल भी मिला, जिसमें उन्होंने कहा एडवांस में हैप्पी ईद और हैप्पी दशहरा.. हाल में हुये बम धमाकों को मद्देनजर रखते हुये इसे एक प्रकार कि धमकी के रूप में लिया जा रहा है.. माना जा रहा है कि इसमें उच्च स्तर के तकनीक का प्रयोग किया गया है.. मुम्बई के किसी Wi-Fi नेट्वर्क को हैक करके यह ई-मेल भेजे जाने कि भी संभावना व्यक्त की जा रहीं है.. विरोधी पार्टी इस ई-मेल कि जांच उच्च स्तर पर किये जाने की मांग कर रहे हैं..

उधर बैंगलोर में काफी सन्नाटा छाया हुआ है.. कहीं से किसी प्रकार कि खबर मिलने कि सूचना नहीं है.. आशंका व्यक्त की जा रही है कि कहीं यह तूफान से पहले की शांति तो नहीं है?

अब चलते हैं कुछ अंतरराष्ट्रीय खबरों कि ओर..
वाणी मिश्रा के USA पहूंचने कि खबर सुनते ही वहां आर्थिक मंदी का माहौल तैयार हो गया है.. माना जा रहा है कि ऐसे कंजूस के वहां पहूंचने से वहां की उपभोक्तावाद संस्कृति पर भी काफ़ी बुरा असर परा है और लोग पैसे खर्च करना बंद कर दिये हैं.. फेडेरल बैंक ने इस स्थिति से बाहर निकलने के लिये $700 बिलियन बाजार में लाने का प्रबंध कर रही थी मगर राष्ट्रपति बुश ने यह सोचकर इसे खारीज कर दिया कि वाणी को तो अब बस 1.5 महिने ही यहां रहना है.. उसके बाद सब खुद ही ठीक हो जायेगा..

अभी अभी हमारे तेज खबरिया रिपोर्टर से पता चला है कि USA में छाई मंदी का असर कोलकाता में भी हुआ है.. नीरज अफ़रा-तफ़री में अपना सारा पैसा बैंको से निकाल कर अपने घर में जमा कर रहे हैं.. उन्हें चोर-लूटेरों का भी भय हो रहा है, मगर वह निश्चिंत हैं की बैंक जैसे चोर-लूटेरों से तो मोहल्ले वाले चोर-लूटेरों अच्छे हैं.. कुछ तो छोड़ ही जायेंगे.. बैंक वाले तो कुछ भी नहीं छोड़ते हैं..

अब कुछ खेल समाचार..
अभी पूरा विश्व दिल थामे बैठे हैं कि कब चंदन अपना शतक पूरा करते हैं.. वो अभी नर्वस नाईन्टी में पहूंच चुके हैं.. 90किलो पार करने के बाद वो अभी संभल कर बल्लेबाजी कर रहे हैं.. उम्मीद जतायी जा रही है कि एक बार 100 पूरा कर लेने के बाद फिर से उनकी धुवांधार बल्लेबाजी देखने को मिलेगी.. इधर चेन्नई में CSS कंपनी के तरफ से आयोजित क्रिकेट टूर्नामेंट से प्रशान्त ने अपना नाम वापस ले लिया है.. माना जा रहा है कि उन्हें चयनकर्ताओ ने जबरी टीम में शामिल कर लिया था..

इसी के साथ आज का समाचार समाप्त होता है.. नमस्कार..

आपको यह समाचार कैसा लगा? आप अपना जवाब हमें इस पते पर दे सकते हैं..
पिंजड़ा नंबर 420,
वडापलानी चिड़ियाघर, चेन्नई-26
या फिर आप हमें ई-मेल भी कर सकते हैं.. पता है - prashant7aug@gmail.com
या फिर आप अपना विचार हमें SMS के द्वारा भी बता सकते हैं.. नंबर है - 9940648140

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यह पत्र मैंने अपने दोस्तों के लिये लिखा था.. इसमें वडापलानी में मेरा घर है जिसे सभी मित्रगण वडापलानी चिड़ियाघर के नाम से बुलाते हैं.. और बाकी सभी मेरे कालेज के मित्रों के नाम हैं.. VMM का फुल फार्म है - VIT MCA Mitra Mandali NEWS Channel.. ;)