Tuesday, September 16, 2008

अजी नाम में ही तो सब कुछ है


शेक्सपीयर का लिखा हुआ और धीरे-धीरे लोकोक्ति में बदल चुक यह वाक्य कि, नाम में क्या रखा है.. मगर मजे की बात तो यह है कि जब उसने लिखा था तब उसके नीचे अपना नाम भी लिख ही दिया जिससे सभी ये जाने की इसे किसने लिखा है.. मेरा तो मानना है कि नाम में ही सभी कुछ रखा है.. कोई नामी-गिरामी आदमी जब कोई बकवास भी करता है तो सभी कान लगा कर उसकी बात सुनते हैं.. साथ में वाह-वाही भी करते हैं.. और यदी कोई अनाम व्यक्ति अगर कुछ बहुत गूढ बातें भी करता है तो कोई उसकी बात नहीं सुनता है.. साहित्य की नजर से देखने पर भी आप यही पायेंगे की छपता उसी का है जिसका कोई नाम हो, नहीं तो अच्छी रचनायें भी यूं ही फेंकी हुई मिलेगी..

आजकल मेरे भतीजे का कोई अच्छा सा नाम ढूंढा जा रहा है.. बेचारा बहुत दिनों तक बिना नाम के ही रहा.. सभी कोई अच्छा सा नाम उसके लिये सोच रहे हैं.. यूं तो कुछ नाम अभी विचाराधिन हैं मगर कोई नाम अभी तक तय नहीं हुआ है.. घर का पुकारू नाम केशू रख दिया गया है..

जब इसका जन्म हुआ था तब मुझसे पुछा गया की क्या नाम रखना है, साथ में यह भी कहा गया की भागवान के नाम पर होना चाहिये.. मैंने तुरत-फुरत ही कहा, "मुर्गन" या "मुर्गेशन".. :) सभी मुझपर चिल्लाना शुरू कर दिये कि कैसा नाम चुन रहे हो बेटा का? लग रहा है जैसे चिकेन कबाब का नाम रख रहे हो.. मैंने बताया की दक्षिण में यह नाम बहुत प्रसिद्ध है.. भगवान के ही नाम पर है.. मगर फिर एक अवरोध कि नाम कृष्ण या फिर कम से कम भगवान विष्णु के नाम पर होना चाहिये.. मैंने फिर सुझाया, "श्रीनिवासन" या "श्रीनिवास".. अगर आंध्रप्रदेश के मुताबिक नाम रखना हो तो श्रीनिवास और अगर तमिलनाडु के नाम पर रखना हो तो श्रीनिवासन.. अबकी बार मेरी भाभी की प्रतिक्रिया कुछ ऐसी थी.. "बाप रे!! आप तो पूरे मद्रासी बन गये हैं.. मेरे बच्चे का नाम बिगाड़ कर छोड़ियेगा.. आपसे नाम नहीं रखवाना है.."

अब आप ही बताईये, मैं जहां रहूंगा वहीं की संस्कृति को याद रखूंगा ना? वैसे भी मुर्गन नाम कितना अच्छा है.. जब भी अपने बच्चे की याद आयेगी, साथ में चिकेन भी याद आयेगा.. ;)

वैसे अभी "सुशांत प्रियदर्शी" नाम रखे जाने की प्रबल दावेदारी है(भले ही भगवान के नाम पर ना हो".. बच्चे के दादाजी का सुझाया नाम है.. भैया के नाम से भी बहुत मिलता जुलता नाम है क्योंकि भैया का नाम "सुस्मित प्रियदर्शी" है.. भैया के पहले नाम का पहला और अंतिम अक्षर से भी मिलाप हो रहा है.. सच कहें तो मुझे भी ये नाम पसंद है.. आखिर उसके अपने छोटे पापा के नाम से भी तो बहुत मिलता है.. "प्रशांत प्रियदर्शी"..

आप क्या कहते हैं.. कुछ आप भी सुझायें.. मगर फिर से एक बात कहूंगा.. नाम 'S' अक्षर से ही शुरू होना चाहिये..

Sunday, September 14, 2008

सच में मम्मी, कहां फंसा दी

कुछ दिन पहले मैंने अपने एक पोस्ट में अपने भतीजे के जन्म पर एक पोस्ट लिखा था की क्या मम्मी कहां फंसा दी.. वो पोस्ट बस एक मजाक भर में लिखा हुआ था.. खुशियों से भरा हुआ.. मगर कभी-कभी सच में लगता है की क्या मम्मी कहां फंसा दी जन्म देकर.. हर दिन एक नयी चुनौती का सामना करना पड़ता है.. नये अंतर्द्वंद सामने आते हैं.. हर समस्या को हम उचित तरीके से हल नहीं कर पाते हैं तो कुछ समस्याओं का समाधान हमारे बस के बाहर की चीज लगती है, जो होती भी है.. कभी कुछ ना कर पाने का दर्द होता है तो कभी कुछ करने पर भी खोने का डर लगा रहता है..

अगर मैं अपने जीवन के अबतक के बीते हुये सालों पर गौर करता हूं तो पाता हूं की मैं जितना पाने के लायक हूं उतना मुझे कभी मिला नहीं है.. खासतौर पर मैं जो कुछ भी पाने के लिये जी-तोड़ मेहनत करता हूं वो मुझे कभी नहीं मिला है.. जिस किसी से बहुत ज्यादा लगाव होता है, वो मेरे जीवन में क्षणभर से ज्यादा नहीं रहता है.. चाहे वो कोई भौतिक पदार्थ हो या कोई मित्र हो या कोई अपना..

कुछ चीजें इतनी अधिक तकलीफ पहूंचाती है जो मेरे सहनशक्ति से बाहर लगता है.. तब मन में ये जरूर लगता है की क्या मम्मी कहां फंसा दी.. पापा-मम्मी से बहुत ज्यादा लगाव है मुझे, मगर उनसे इतनी दूर हो गया हूं कि जब कभी मुझे उनके साथ की जरूरत होती है तब कभी उन्हें अपने पास नहीं पाया हूं.. स्वभाव कुछ ऐसा मिला है कि अपनी बात अपने भीतर ही रख लेता हूं, किसी से मन की कुछ बात कहना भी चाहूं तो कह नहीं पाता हूं.. कई बार ये भी महसूस हुआ है की अंदर ही अंदर घुटा जा रहा हूं..

कहने को तो ब्लौगिंग एक ऐसा संसार है जहां आप अपने मन की बात बिना किसी सोच-संकोच के रख देते हैं, लिख देते हैं.. मगर हिंदी ब्लौगिंग का चरित्र अंग्रेजी ब्लौगिंग से अलग है.. यहां हम सभी सार्वजनिक होते हैं.. अब ऐसे हालात में अपने मन की बात को सार्वजनिक करना भी उचित नहीं होता है.. किसी सीमा में रहकर ही अपने मन की बात लिखता हूं.. सच कहूं तो मैं अभी भी अंदर ही अंदर घुट रहा हूं.. क्या करूं, कहां जाऊं कुछ समझ में नहीं आ रहा है..

जाता हूं मम्मी से बात करने.. उन्हें कहने.. उनसे पूछने.. कि क्या मम्मी कहां फंसा दी जन्म देकर..

कुछ दिनों से ब्लौगजगत से बिलकुल बाहर हो चला था.. अपने कुछ निजी कारणों से.. अपने अगले पोस्ट में बताता हूं यहां चेन्नई में किये गये बाढ सहायता कार्यों के बारे में..

Thursday, September 11, 2008

Saturday, September 06, 2008

एक नरसंहार के बाद दूसरे भीषण नरसंहार की तैयारी

जैसा की सुशांत झा जी का एक लेख मैंने मोहल्ला पर पढा था की ये बाढ नहीं नरसंहार है.. बिहार में आये बाढ को मैं भी नरसंहार की संज्ञा देना ज्यादा उचित समझता हूं.. राष्ट्र के कर्ता-धर्ता, राज्य प्रसाशन, जिला प्रसाशन.. सभी जानते थे की बाढ आनी है.. मगर सभी हाथ पर हाथ धरकर बैठ पानी के आने का इंतजार कर रहे थे.. आखिर बाढ का पानी और पैसे का जबर्दस्त संबंध जो है..

अगर राष्ट्र स्तर पर देखा जाये तो अभी सारे राजनितिक दल सियासत की राजनीति खेलने में लगे हुये हैं.. आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है जो अगले चुनाव से पहले खत्म नहीं होने वाला है.. अगर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो वहां भी मनमोहन सिंह की कठपुतली सरकार और नेपाल की माओवादी सरकार एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोपों में ही घिर कर रह गयी है.. भारत सरकार का कहना है की भारत अपने ईंजिनियरों और मजदूरों को तटबंध की मरम्मत करने के लिये वहां भेजी थी जहां तटबंध टूट रहा था और जो नेपाल के हिस्से में आता है जहां माओवादियों ने उन्हें मार-पीट कर भगा दिया, और नेपाल सरकार का कहना है की मजदूरों के साथ मेहनताना को लेकर कुछ दिक्कतें आयी थी जिसके कारण वे लोग वहां से लोग वहां से वापस आ गये थे.. अभी हाल-फिलहाल में मैंने किसी न्यूज पोर्टल पर पढा था की इंजिनियर वहां तब पहूंचे थे जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो चुकी थी..

खैर अब समय ऐसे वाद-विवाद से कहीं आगे करने का आ चुका है.. अभी समय है एक नरसंहार के बाद दूसरे नरसंहार को नहीं होने देने का.. मेरी जानकारी के मुताबिक जब बाढ का पानी उतरता है तो पीछे छोड़ जाता है कई तरह कि बीमारियां.. घुटने भर कीचड़.. विस्थापितों का दर्द.. बिलखते अनाथ बच्चे.. और इन सबसे मरने वालों की संख्या बाढ से मरने वालों से कहीं ज्यादा होती है.. अगर अभी भी हम नहीं चेते तो इस भीषण नरसंहार के हम भी भागीदार होंगे..

जैसा की हमें पहले ही ज्ञात है, 30 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं और उन्हें कम से कम 3-4 महिनों तक राहत शिविरों में रहना पर सकता है.. अगर हम 100 दिनों का भी अनुमान लगाते हैं और 50 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिदिन का सोचते हैं तो भी हर दिन 15 करोड़ का खर्च आता है.. मुझे नहीं पता है कि कित्ने पैसे अभी तक इकट्ठा हुआ है बाढ राहत के लिये, मैं अभी आंकड़े जुटा रहा हूं, मगर मुझे ये पता है कि 1500 करोड़ से कहीं ज्यादा खर्च होने वाला है इन सब पर.. और इतने पैसे अभी तक नहीं आ पाये हैं.. मैं आप सभी से ये आग्रह करता हूं की जितना हो सके आप मदद करें और दूसरों को भी इसके लिये प्रेरित करें.. अगर आप अभी भी कुछ ना करेंगे तो इस अगले भीषण नरसंहार के लिये आप सभी भी जिम्मेदार होंगे..

मेरे अगले पोस्ट में - आप कैसे और क्या कर सकते हैं, और चेन्नई में हम क्या कर रहे हैं इसकी जानकारी..

Friday, September 05, 2008

छुट्टियों में मुझे व्यथित करने वाले कुछ अहम प्रश्न

अभी कुछ दिनों पहले मैं छुट्टियों में घर गया हुआ था.. अगर आप मेरा चिट्ठा पढते होंगे तो आपको पता होगा की कुछ खुशियां मेरे परिवार में आयी है.. घर में हर दिन, हर तरफ उत्सव सा ही माहौल था.. मगर इन सबके बीच कुछ प्रश्न मुझे लगातार व्यथित करता रहा.. "बाढ़".. बिहार का शोक कही जाने वली नदी कोशी अपने पूरे उफान पर थी.. घर पर होने के कारण समाचार चैनलों को भी करीब से देखने का मौका मिला..

अगर अभी हाल-फिलहाल की बात छोड़ दिया जाये तो शुरूवाती दिनों में किसी भी चैनल पर कोई खबर नहीं थी.. ये हालात है बुद्धिजिवियों का गढ माने जाने वाले बिहार का.. सबसे अधिक पत्रकार पैदा करने वाली भूमी पर संकट और उसी धरती का कहीं कोई कवरेज नहीं और अगर कहीं कवरेज था भी तो वो बस खानापूर्ती करने के लिये.. इसी बीच भारत के होनहार खिलाड़ी सुशील कुमार भारत के लिये ओलंपिक में पदक भी जीते मगर उन दिनों जेड गुडी बिग बॉस क्यों छोड़कर जा रही है ये बात समाचार चैनलों को ज्यादा महत्वपूर्ण लग रहा था.. कोशी और बिहार का मानों भारत में कोई अस्तित्व ही नहीं था..

मेरे पड़ोस की एक भाभी जिनका मायका बीरपुर है अपने भाई के हवाले से बता रही थी(जो हाल-फिलहाल में ही अपनी जान बचा कर वहां से आया था) की कैसे कोशी अपना रौद्र रूप मनुष्यों को दिखा रही थी.. किस तरह से लाशों का ढेर उनके घर के सामने से बह कर जा रही थी.. चारों ओर एक प्रकार का हाहाकार मचा हुआ था जो बेआवाज थी.. बस पानी का कलरव.. मेरे मन में कुछ करने का जज्बा हिलोरें मार रहा था, मगर उचित संस्था या व्यक्ति से संपर्क नहीं होने के कारण कुछ नहीं कर सका.. बाढ में जाकर लोगों की सेवा करने का भी ख्याल आया, मगर ये भी जानता था की घर से मुझे कोई भी अपनी जान सांसत में डालने के लिये मुझे वहां कोई नहीं भेजने वाला है.. सो किसी से ये बात कही नहीं.. इसी बीच मेरे एक मित्र के मित्र जो मधेपुरा के रहने वाले थे और वहां अपने रिश्तेदारों को बचाने के लिये जा रहे थे उनसे मैंने संपर्क साधा और 3 लाईफ़ जैकेट खरीद कर उन्हें दिया.. ये कहकर की जितनों की जिंदगी बचा सकते हैं बचा लाईयेगा..

मगर अभी भी एक अहम प्रश्न मेरे सामने था.. क्या 3 लाईफ जैकेट काफी है? उत्तर मुझे पता है.. नहीं.. मगर फिर भी जो कुछ हम कर सकते हैं वो हमें करना चाहिये..

अगले पोस्ट में - एक नरसंहार के बाद अगले भीषण नरसंहार की तैयारी

Thursday, August 28, 2008

क्या मम्मी!! कहां फंसा दी??

क्या मम्मी!! कहां फंसा दी?? कितने अच्छे से आराम से था.. अब तो जिसे देखो आता है.. चारो ओर घेरा डाल कर घूरता है.. इतने मूरख लोग हैं ये सभी, इतने बड़े हो गये हैं और अभी तक ठीक से बोलना भी नहीं आता है.. पता नहीं किस भाषा का प्रयोग करते हैं? कितने जाहिल गंवार लोग हैं.. आते ही अलेलेले.. आ आ आ आ.. और भी पता नहीं कितने तरह के अंट संट आवाजें निकालते हैं.. इससे अच्छा तो मैं हूं, कितना आराम से ऊंऊं करता रहता हूं.. मम्मी, तुम भी उन्हीं की भाषा बोलती हो.. कभी तो ठीक से बोला करो.. मेरी तरह.. ऊं ऊं.. :)


आराम से सोता हुआ मेरा बच्चा.. :)


ब्यूटी एंड बीस्ट.. मेरे हाथ के सामने मेरे बच्चे का हाथ.. :)

Monday, August 25, 2008

गिरीधर गोपाल आयो मोरे अंगना

मैं जिस कारण से यहां पटना आया हुआ हूं वो कल सफल हो गया.. कल मेरे अंगना स्वयं गिरीधर गोपाल पधारे.. मेरी भाभी ने कल एक बहुत ही प्यारे बच्चे को जन्म दिया.. बहुत इंतजार कराया हमारे गोपाल ने.. मेरे भैया चित्रगुप्त पूजा के दिन इस धरती पर आये थे और उनमें जन्मजात विलक्षण प्रतिभा थी.. ठीक वैसे ही मैं भैया को बोल रहा हूं की बाल गोपाल आये हैं तो अब आप ही अपने बाल गोपाल और उसकी गोपियों को संभालियेगा.. :)

फिलहाल आप इसकी तस्वीर से संतुष्टी करें.. इसके बारे में फिर कभी.. वैसे भी अब इसके पोस्ट से मेरा चिट्ठा आपको भड़ा मिलेगा.. :)



Thursday, August 21, 2008

बिहारी, भिखारी और पटियाला दी नारी

- आप उत्तर भारत के किस हिस्से से हैं?

- यूं तो मैं पंजाब, पटियाला से हूं मगर पिछले 25 सालों से पापा दिल्ली में बस गये थे..

- तो फिर चेन्नई में कहां से आ गई आप?

- नौकरी जहां खींच लाया वहां चली आई.. आप कहां से हैं?

- मैं बिहार, पटना से..

- आप यहां कैसे?

- पढाई तमिलनाडु में ही हुई सो नौकरी भी यहीं कर ली..

बातें कुछ और आगे बढी तो दिल्ली की भी बात आई.. मैंने बस यूं ही कह दिया

- मैं भी कुछ दिन दिल्ली में रहा हूं..

एक कुटिल मुस्कान के साथ जवाब आया
- अपके यहां से तो हर कोई दिल्ली ही भागता है..

- अच्छा? आपने तो नई बात बतायी..

- आप भी तो वहीं आये थे..

- वैसे अगर मैं भूला नहीं हूं तो आप पटियाला से हैं? सही कहा?

- हां!!

- आपको पटियाला से चेन्नई आने की क्या जरूरत पर गई?

- अब क्या कहूं, पति यहीं नौकरी करते थे सो मैं भी यहां आ गई.. नौकरी जिसे देखो उसे इधर से उधर भगाती रहती है..

- बिलकुल सही कहा आपने.. बिहारियों को भी यही नौकरी दिल्ली भगाती है.. जैसे आप यहां आये हैं..

अब उनका चेहरा देखने लायक था.. मैंने आगे कहा ये सोचकर की अब उन्हें बुरा लगे या भला ये उन्हें सुनना ही चाहिये..
- आप भी तो पटियाला छोड़कर पहले दिल्ली भागी, फिर वहां से चेन्नई भाग आयी.. मगर फिर भी आपको इससे दिक्कत आती है की बिहारी दिल्ली क्यों जाते हैं? जब इतनी ही दिक्कत आपको है तो आपको वापस पटियाला ही चले जाना चाहिये और वहीं कोई बड़ी सी साफ्टवेयर कंपनी खुलने के लिये इंतजार करनी चाहिये.. वैसे भी हमलोग अधिकतर अपने देश में ही भागते हैं, आपलोग तो देश ही छोड़कर भाग जाती है नौकरी और पैसे के लिये..
और उनका जवाब सुने बिना ही मैं वहां से चला गया..

ये संवाद मेरे साथ मेरी कंपनी में काम करने वाली एक महिला के साथ मेरा हुआ था जो मेरी कंपनी में किसी दूसरे टीम में टीम लीडर है.. कल जब मैंने ये समाचार(बिहारी नहीं हैं भिखारी-नीतिश कुमार) पढा तब अचानक ही मुझे ये घटना याद हो आयी..

Wednesday, August 20, 2008

कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता

यूं तो यह एक हिंदी सिनेमा का एक गीत भर है मगर मानो पूरे जीवन-दर्शन को अपने मे समेटे हुआ है..

कल रात नींद नहीं आ रही थी.. रात काफी हो चुकी थी.. सो कोई बात करने को भी नहीं था.. नेट पर घूम-घूम कर बोर भी हो चुका था.. बस यूं ही अपना मोबाईल उठा कर कांटैक्ट लिस्ट के सभी नंबर को पलटने लगा.. पाया ढेर सारे नंबर अब मेरे किसी काम का नहीं है फिर भी वो मेरे मोबाईल में अपनी जगह बनाये हुआ है.. मुझे एक समय बिताने का साधन मिल गया.. एक एक करके सभी नंबर को चेक करना और अगर किसी काम का ना हो तो बस उसे डिलीट करना.. एक काम मिल चुका था मुझे.. एम. ॠंखला वाले नंबरों को देखते हुये अचानक से मुझे एक ऐसा नंबर मिला जिसे देखकर मैं जैसे फ्लैश बैक में चला गया..

लगभग दो महीने पहले की बात है.. शाम होने वाली थी.. आफिस में बैठा काम कर रहा था तभी जीटॉक पर मेरे एक जूनियर ने पिंग किया.. "sir, maroof expired.."
अचानक से एक झटका सा लगा.. पहले तो मुझे लगा की कहीं वो मजाक ना कर रहा हो.. मैंने उसका नंबर लिया और उसे फोन किया.. वो बेचारों सी हालत में था.. ना बोला जा रहा था और ना ही रोया जा रहा था.. आफिस में बैठ कर वो और कर भी क्या सकता था? खबर सही थी.. मारूफ़ यूं तो कालेज में मेरा जूनियर था मगर चूंकि मेरे पापाजी के घनिष्ठा मित्र का पुत्र था और उम्र में मुझसे बड़ा भी, सो मैं हमेशा उससे मित्रवत व्यवहार ही रहा था.. मैं चुपचाप अपनी कुर्सी पर बैठ गया.. हार्ड ए.सी. में भी पसीने से भींग गया..

अभी कुछ ही दिनों में आई.बी.एम. ज्वाईन करने वाला था.. घर में सबसे बड़ा होने के कारण सबसे अधिक जिम्मेवारी भी उसी के उपर था.. बाद में जब अगले दिन पापाजी जब उसके जनाजे से वापस लौटे तब पता चला की अचानक से सुबह के समय सांस रूक गई और मां के गोद में ही शायद दम निकल गया.. पिछली बार जब पता चला था तो आंटी की हालत ठीक नहीं थी.. बस दो दिन पहले ही वो बैंगलोर से पटना वापस लौटा था.. शायद मौत उसे पटना लेकर खींच लाया था..

सोचा की मारूफ़ के जाने के बाद पहली बार पटना आया हूं.. मुझे लगा की मुझे जाना चाहिये उसके घर.. मगर मैं नहीं जा रहा हूं.. ना तो जाने का मन ही है और ना ही हिम्मत..

Tuesday, August 19, 2008

क्या शामें भी उदास होती हैं?

यार ये भाषा तुम अपने ब्लौग के लिये ही बचा कर रखा करो.. कभी शाम को भी भावनाओं से भर कर उदास कर डालते हो, तो कभी गुल्लक से तस्वीरें निकाल लेते हो.. कभी तो तुम्हारे यादों के भी पर निकल आते हैं, तो कभी मुस्कुराहट चारपाई के नीचे झांकती सी दिखती है तुम्हें.. ये सब हमारे समझ के बाहर की चीजें हैं.. अक्सर मुझे ये उलाहना अपने कुछ मित्रों से सुनने को मिल जाया करती है.. आज ये लिखने बैठा तो बरबस ही ये याद हो आया.. :)

जब कभी उदास शाम का जिक्र आता है तो कुछ जगहें दिलो-दिमाग से नहीं निकल पाता है.. जहां दीन-दुनियां से बेफिक्र ना जाने कितने ही उदास शामें बिताया हूं.. "मैं और मेरी तन्हाई" जैसी हिंदी सिनेमा मार्का डायलॉग भी याद आ जाती है.. पहली बार घर से बाहर आने का गम और उस पर हर दूसरे दिन नौस्टैल्जिक हो जाना.. कभी घर की याद आना तो कभी दोस्तों की.. कुछ दोस्त साथ में भी थे.. जिसमें एक खासमखास मित्र भी था.. मनोज.. उसकी सबसे बड़ी खूबी यह की वो मुझे हद से ज्यादा मानता था.. यहां तक की मैं ये दावा कर सकता हूं की मेरे घरवालों को अगर चोड़ दिया जाये तो उससे ज्यादा मुझे कोई भी नहीं मान सकता था.. मगर अपनी आदत से मजबूर.. जब भी कुछ बुरा लगे तो बस अपने भीतर ही दबा कर बैठ जाओ.. किसी की याद आये तो और भी ज्यादा अकेलेपन की तलाश में निकल जाना..

अक्सर जे.एन.यू. के पुस्तकालय से अपना बस्ता संभालकर बाहर निकलते हुये रात के 8-9 बज जाया करते थे.. पुस्तकालय के कैंटीन में ही आठ रूपये का मशाला दोसा खाकर निकल पड़ता था.. मन में एक संकल्प की कुछ बनना है और घर की याद भी बहुत आती थी.. घर जाना भी नहीं चाहता था और घर की याद भी बहुत आती थी.. कमोबेश सांप-छछूंदर जैसी स्तिथी बन गयी थी.. सबसे ज्यादा मम्मी की याद आती थी.. कभी उनसे अलग जो नहीं हुआ था इससे पहले..

पुस्तकालय से निकल कर घर जाने की इच्छा नहीं होती थी.. लगता था की वापस जाकर फिरसे सिगरेट का धुवां जो किसी और के मुंह से निकल कर मेरे भीतर घुसे, इससे तो अच्छा थोड़ी देर और यहीं कहीं बिता लिया जाये.. एक बार फिर से अकेलेपन की तलाश.. मुझे खुद कभी समझ नहीं आया अभी तक, मैं अकेलेपन में क्या तलाशता हूं.. कदम बिना किसी से कुछ पूछे अपनेआप PSR हिल की ओर निकल जाते थे.. वहीं एक पत्थर पर बैठ कर ना जाने क्या-क्या सोचता हुआ.. कभी अतीत में झांकता तो कभी भविष्य की ओर मुंह ताकता.. एक लड़की की याद भी बहुत सताती थी.. ऐसा लगता था जैसे वो जगह(PSR हिल ) हर समय गुलजार ही रहता हो.. अधिकतर जोड़े किसी रोमांटिक स्थान के तलाश में वहां पाये जाते थे, कुछ लड़के उन जोड़ों को घूरने के लिये आते थे तो कुछ मुझ जैसे अकेलेपन की तलाश में वहां भटक जाते थे..

उदास शामों की सिलवटें अक्सर,
अपना निशान छोड़ जाती हैं..
जाने क्यों? कुछ शाम उदास होती हैं और,
कुछ शाम उदास कर जाती हैं..