Thursday, July 17, 2008

अई-यई-यो.. हिंदी.. हिंदी..

"हेलो सर! नान फलाना नदु कॉल पनरे..(तमिल में इसका मतलब होता है मैं फलाना से बोल रहा/रही हूं)" सपाट सी आवाज आई ऊधर से..

"कहो भाई क्या कहना है?" अनमने ढंग से मैंने कहा..

वो लगभग चीख उठी, "अई-यई-यो.. हिंदी.. हिंदी.."

"हां यार ये हिंदी ही है.." मुझे हंसी आई, मगर मैंने सपाट सा उत्तर दिया..

"वेट सर, 1 मिनट वेट.." घबराते हुये वो बोली..

अब मुझे भी थोड़ी जिज्ञासा हुई की अब कौन आता है फोन पर..

फिर से उधर से एक लड़की की आवाज गूंजी, "हेलो सर मैं एच.डी.एफ.सी. बैंक से बोल रही हूं.. अभी हमारे यहां ये स्कीम आया हुआ है.. ब्लाह... ब्लाह.." वो बस बोलती गई और मैं सुनता गया.. चेन्नई में किसी कॉल सेंटर से हिंदी में बात करने वाला(या वाली) पहली बार जो मिला था.. बीच-बीच में हां हूं भी करता गया..

उसे लगा की समझ में नहीं आया मुझे.. सो उसने फिर से दोहराया, "ब्लाह.. ब्लाह.."

मैं यंत्रवत हां हूं करता रहा..

उसे फिर लगा की समझ में नहीं आया मुझे.. सो उसने तीसरी बार दोहराया, "ब्लाह.. ब्लाह.."

मुझे तो बस अच्छा लग रहा था हिंदी में और वो भी एक लड़की की आवाज जो बिना गालियां दिये अच्छे से कुछ बताये जा रही थी.. :)

अबकी बार उसने थोड़ा झल्लाते हुये अपनी बात खत्म की और पूछा,"अब तो समझ गये होंगे स्कीम?"

नींद से उबासी लेते हुये मैंने उसे वो सारी बात शब्दशः बता दी जो वो अभी तक उसने मुझे तीन बार कही थी.. सुनकर थोड़ा आश्चर्य से बोली, "मतलब आप समझ गये थे पहली ही बार में? तो आपने पहले क्यों नहीं बताया?"

"अजी आप कहने का मौका देती तब न?", मैंने हंसते हुये कहा..

मैं इतनी देर से उसके बोलने के ढंग को अच्छे से सुन रहा था ये अंदाजा लगाने के लिये कि वो भारत के किस हिस्से से होगी?
वो आगे कुछ बोलती इससे पहले ही मैंने उसे कहा, "स्कीम की बात बाद में करते हैं, मगर मैं ये बता सकता हूं कि आपका घर कहां होगा.."

"कहां?" उसने उत्सुकता से पूछा..

"दिल्ली या फिर चंडिगढ़ या उसी के आस पास की कोई जगह??"

"हां मैं दिल्ली से हूं.. आपको कैसे पता?"

"आपके बोलने के ढंग से समझ गया.. अब आपकी बारी, पहचानिये मैं कहां से हूं?" ये कहते कहते मैंने अंग्रेजी में भी कुछ कह गया..

"आप अंग्रेजी जानते हैं?" आश्चर्य मिश्रित लहजे में उसने कहा.. "वैसे मैं नहीं समझ सकी की आप कहां से हैं.."

"हां जी.. अंग्रेजी जानता हूं.." हंसते हुये मैंने कहा.. "चलिये मैं ही बता देता हूं कि मैं कहां से हूं.. बिहार, पटना.. अब तमिल बोल बोल कर कॉल सेंटर वाले इतना परेशान कर देते हैं कि अब मैं हिंदी में ही उन्हें जवाब दे देता हूं.."

"हां क्या कहें, मेरा भी यही हाल है.. जब मैं किसी को फोन करती हूं और उधर से तमिल में कोई कुछ बोलता है तो मैं भी ऐसे चिल्लाती हूं.. तमिल.. तमिल.." खिलखिलाकर हंसते हुये उसने कहा..

"वैसे आपका नाम क्या है?"

"मनप्रीत कौर.."

फिर ऐसे ही लगभग 45 मिनट बातें होती रही.. अरे हां एक बात तो बताना ही भूल गया.. मैंने अपने जीवन का पहला फिक्स डिपोसिट भी उस कॉल के कारण करवा लिया.. :D एक अफसोस रह गया.. मैंने उसका मोबाईल नंबर क्यों नहीं लिया.. :(

Wednesday, July 16, 2008

मेरे मरने के बाद किसे कितना मिलेगा?

जब काम करते हुये मूड ऑफ होता है तब तमिल सुन कर हिंदी में ही बोल देता हूं "अरे यार तमिल नहीं आती है.." और उधर से जो कोई भी होता है वो घबरा जाता है हिंदी सुन कर क्योंकि उसे हिंदी नहीं आती होती है.. फिर मैं फोन ऑफ कर देता हूं.. कभी-कभी जब पूरे मूड में होता हूं या फिर बोर होता रहता हूं तो बस इस तरह के कॉल का भरपूर आनंद उठाता हूं.. सामने वाले से इतने सवाल पूछता हूं की वो अपना पीछा छूड़ाने की सोचने लगे..

मैं बात कर रहा हूं अवांछित फोन कॉल की जो ज्यादातर किसी बैंक के क्रेडिट कार्ड के लिये होता है, या फिर इंस्योरेंस कंपनी वालों का होता है.. आज मैं आपको वे बातें सुनाता हूं जो अक्सर इंस्योरेंस कंपनी वालों के साथ मेरी होती है..

वैसे तो ये बातें हिंदी, अंग्रेजी और कुछ तमिल शब्दों का मिश्रण होता है मगर मैं इसे आपके सामने हिंदी में पेश करता हूं..

"हेल्लो! सर मैं फलाना इंस्स्योरेंस कंपनी से बोल रहा हूं.."
"हां!! कहिये"
"सर आपने कितने इंस्योरेंस लिये हैं?"
"एक भी नहीं.."
"सर इस इंस्योरेंस को लेने से आपको फलाना-चिलाना फायदा मिलेगा.."
"मुझे इससे क्या फायदा होगा?"
"सर इतने साल के बाद आपको इतने पैसे मिलेंगे.."
"अच्छा? कितने प्रतिशत पर?"
"सर फलाना प्रतिशत पर.."
"लेकिन अगर मैं फिक्स डिपोजिट अगड़म बैंक से करता हूं तो मुझे ज्यादा प्रतिशत का ब्याज मिलेगा.."
"सर आप समझे नहीं, ये फिक्स डिपोजिट से कहीं ज्यादा फायदे वाला है.."
"आप बतायेंगे तभी तो पता चलेगा.."
"सर भगवान ना करे ऐसा हो, मगर अगर आपको कुछ हो जाये तो आपके परिवार वालों को इतना मिलेगा.."

अब तक मेरा अच्छा टाईम पास हो चुका था सो अब बात खत्म करना चाह रहा था.. सो बोला, "मुझे तो कुछ नहीं मिलेगा ना? और मेरे मरने पर जो पैसा मेरे घरवालों को मिलेगा उस पैसे की उन्हें जरूरत नहीं होगी.. उससे ज्यादा मेरी जरूरत है उन्हें.. और मेरे उपर अभी तक कोई निर्भर नहीं है जिसे उस पैसे से कोई फायदा हो.. कोई और फायदा आपको बताना है क्या?"
अब तक वो समझ चुका होता है कि ये नहीं लेने वाले हैं सो मन में गालियां देते हुये बोलता है, "ठीक है सर.. धन्यवाद.."
"धन्यवाद.."


अगर मैं बात करने के मूड में नहीं होता हूं तो भले ही बैठ कर मक्खी मारता रहूं मगर एक सपाट सा उत्तर देता हूं.. "मैं अभी मिटींग में हूं, क्या आप बाद में कॉल करेंगे?"

Monday, July 14, 2008

बदलते चेहरे

कल रात ऑफिस से निकलकर चल परा मैं माम्बलम रेलवे स्टेशन की तरफ.. ऑफिस से लगभग 1 किलोमीटर या उससे कुछ ज्यादा दूरी रही होगी.. एक ओवरब्रिज, उसके बगल में कुछ टूटा हुआ या कुछ तोड़ा गया.. पता नहीं जो भी हो, मगर अंदर प्लेटफार्म पर जाने के लिये एक रास्ता भर.. मुझे तो बस इसी से मतलब था.. चेन्नई के सबसे व्यस्त इलाके से गुजरते हुये पीछे कि तरफ से माम्बलम स्टेशन में प्रवेश किया.. जब नया-नया चेन्नई आया था तब माम्बलम का मतलब पता चला था "आम".. बाद में पता चला कि इसी नाम से एक स्टेशन भी है.. अच्छा लगा कि चलो एक स्टेशन के नाम का मतलब तो पता है..

कानों में मोबाईल का फोन लगा हुआ था और उस पर एफ.एम. रेडियो से कोई हिंदी गाना चल रहा था.. रात 8 से 9 तक किसी चैनेल पर हिंदी गाना आता है.. दो अलग-अलग गीत मुझे दो अलग-अलग लड़कियों कि याद में धकेल गया जो मेरी जिंदगी के पड़ाव में महत्वपूर्ण स्थान पा चुकी है.. माम्बलम स्टेशन पर टिकट लेकर ट्रेन का इंतजार करने लगा.. भीड़ बहुत ज्यादा थी.. सोचा कि क्या इससे भी ज्यादा भीड़ मुंबई में होती होगी? पता नहीं.. इससे ज्यादा भीड़ अगर कहीं रहे तो आदमी 1 इंच भी ना खिसक पाये.. माम्बलम चेन्नई का सबसे व्यस्त स्टेशनों में से एक है.. कारण टी.नगर, पोथी, नल्ली और सर्वणा स्टोर(इसके बारे में फिर कभी)..

माम्बलम से चेन्नई सेंट्रल की ओर बढते हुये अगला स्टेशन कोडमबक्कम.. जब भी यहां से गुजरता हूं तो गार्गी की याद एक बार जरूर आ जाती है.. ना जाने कितनी ही बार कभी उसे छोड़ने तो कभी उसे लेने तो कभी उसके साथ यहां से कहीं और जाने के आता था.. तब ये स्टेशन अपना सा लगता था, अब लगता है जैसे स्टेशन भी पराया हो गया है.. लोग पराये हो जाते हैं, समझ में आता है.. निर्जीव वस्तुयें भी कैसे परायी होती है, समझ के बाहर है.. जब गार्गी चेन्नई में थी तब अक्सरहां उससे सिरीयस वाली लड़ाई हो जाया करती थी.. 3-4 बात नहीं करते थे फिर पुनर्मुशको भवः हो जाता था..

उसके जाने के बाद अब गार्गी की याद आती है.. सोचता हूं कि फिर कभी किसी एक शहर में बसे तो कभी लड़ाई नहीं करूंगा.. मगर मैं जानता भी हूं की ऐसा नहीं होगा.. हमारी दिनचर्या फिर से वहीं हो जायेगी.. उसका कोलकाता वाला घर याद आता है.. उसकी मम्मी और नानी मां का प्यार से खाना खिलाना याद आता है.. उसके पापा का वो गिटार बजाना याद आता है जिसपर मैं जगजीत का कोई गजल गा रहा हूं.. फिर सभी एक झटके से गायब हो जाते हैं..

एक लड़की को यहां चढते हुये देखा.. शायद उत्तर भारत के किसी हिस्से में उसे देखता तो ध्यान भी नहीं देता.. मगर यहां उत्तरी भारतीय को देखकर सोच में पर जाता हूं.. क्या ये भी किसी कॉल सेंटर या साफ्टवेयर कंपनी में काम करती है? क्या इसे भी घर गये महीनों बीत गये होंगे? बेतरतीबी और उदासीन सा चेहरा.. एक सिंपल सी जींस और टी-शर्ट में.. लोग उसे ऐसे देख रहे थे मानों किसी चिड़ियाघर से भाग कर आ गई हो.. सोचा, जो कपड़े दिल्ली में बिलकुल सामान्य सा है वही यहां के लोगों को हजम नहीं होता है.. मन में 2-4 गालियां दी.. उसे इस सबसे कोई मतलब नहीं था.. वो तो शायद ट्रेन में थी भी नहीं.. चेहरा बता रहा था कि कहीं जल्दी से उड़कर पहूंच जाना चाहती थी वो.. एक पल में.. खैर मुझे इससे क्या? मैं मुंह फेरकर खड़ा हो गया..

ऐसे ही सोचते-सोचते नुगमबक्कम, चेटपेट कब गुजरा पता भी नहीं.. भीड़ का हुजुम एग्मोर में उतर गया.. बैठने के लिये जगह खाली हो गया.. सोचा क्या बैठ जाऊं? 2 मिनट में तो पार्क स्टेशन आ जायेगा.. वहीं तो उतरना है.. फिर वहां से सेंट्रल पैदल.. दोस्त को छोड़ने जाना था वहां.. वो दिल्ली जा रही थी.. अब आ ही गया हूं तो 3 मिस्टेक्स ऑफ माई लाईफ भी ले ही लूं.. पता चला की उसकी टेर्न 2 घंटे लेट हो गई है.. अब रात के बारह बजे जायेगी.. उसे बताया तो उसे भरोसा नहीं हुआ.. ये ट्रेन कभी लेट हो ही नहीं सकती है.. कभी नहीं होती है.. आज कैसे.. टिकट भी कंफर्म नहीं है.. "तुम कैसे पता करते हो कि कंफर्म हुआ की नहीं?" उसने पूछा.. हर जवाब इंटरनेट पर मिल जाता है.. "अच्छा!" हंसी उड़ाता हुआ सा चेहरा.. फिर अपने एक मित्र से पूछना.. हुर्रे!! मेरा टिकट कंफर्म हो गया.. सेकेंण्ड ए.सी. में है.. सोचता हूं, लोग कैसे इतना उर्जावान रहते हैं? शायद मैं भी होता.. अगर घर जाने की बात होती तो.. घर-घर-घर.. क्या मैं भी घर के पीछे पर गया हूं..

11.30 में मैं उसे ट्रेन में बिठा कर विदा ले लेता हूं.. इतनी रात में तो ट्रेन मिल ही जायेगी.. मोबाईल की घंटी बजती है.. विकास है.. कहां हो? कब तक आओगे.. परेशान सी आवाज.. ऑफिस के अलावा कहीं और से इतनी देर से घर नहीं गया हूं.. शायद इसलिये.. आ रहा हूं.. पार्क स्टेशन में फिर जाता हूं.. 11.45 हो गये.. अगर ट्रेन नहीं मिला तो ऑटो से जाना होगा.. कुछ लोग दिखे जो ट्रेन के इंतजार में थे.. अरे लोग हैं तो ट्रेन भी आ जायेगी.. बगल में बैठा दो लड़का हिंदी में बात कर रहा है.. कान लगा कर सुनने लगा.. चेन्नई में हिंदी.. नार्थ इंडियन है.. किसी की मां-बहन एक की जा रही थी.. गाली सुनने के लिये तो मैं हिंदी नहीं सुनने वाला हूं.. लो ट्रेन भी आ गई.. अभी की ट्रेन और थोड़ी देर पहले की ट्रेन में अंतर था.. वातावरण का मिजाज भी बदला हुआ था.. ओह!! तो ट्रेन भी शक्लें बदलती है हर घंटे.. अभी भी एक लड़की जा रही थी.. साउथ इंडियन बहुत ही सलीके के कपड़ों में थी.. मगर उस लड़की की तरह बेपरवाह नहीं थी.. कुछ खुबसूरत भी नहीं थी.. मगर चेहरे पर एक डर था.. निगाहें चौकन्नी थी.. घबराई हुई थी.. मैंने घड़ी देखी 12.30 से ज्यादा हो चुके थे..

Saturday, July 12, 2008

एक शाम कुछ यूं भी


उस दिन जब तुम्हें देखा तो मानो दिल कि धड़कन थम सी गई थी.. तुम्हारी नजरों को भी मैंने देखा था.. पल भर को मेरे चेहरे पर टिकी थी.. मानो इस बात का सबूत दे रही हो कि मैं कोई अंजान नहीं हूं.. दिल को तसल्ली हुई, तुम अभी भी मुझे देख कर पहचान रही हो.. अभिनय करने में तुम अभी कच्ची हो.. नहीं तो तुम मुझे ये एहसास नहीं होने देती.. जिंदगी भी किसी नदी कि तरह होती है, हर परिस्तिथि में अपना रास्ता तलाश कर लेती है.. बहना कभी बंद नहीं करती है.. मगर रास्ता बदलने पर जैसे सूखे हुये पानी के श्रोत अपना निशान छोड़ जाती है वैसे ही जिंदगी भी कहीं ना कहीं अपना निशान छोड़ जाती है.. मानो ये याद दिलाने के लिये कि कहीं कुछ सूना सा है.. कुछ खालीपन.. कुछ यादें.. तुमने भले ही अपनी नजरें मुझसे फेर ली थी, मगर मैं तुम्हें एक-टक देखता रहा.. फिर बेतरतीबी में सिगरेट जलाया.. मेरी मित्र ने मुझे कहा कि मत जलाओ.. शायद धुवें से उसे दिक्कत थी.. मैं सॉरी कहकर वहां से जाने लगा, उसने जाने से मना कर दिया.. सिगरेट बुझाने को कहा.. मैंने एक लंबा कश लिया, उसने फिर मना किया.. इतने अधिकार से जिसे मैं नजर अंदाज नहीं कर पाया.. सिगरेट फेंक कर अपना सारा आवेश अपने जूते से उस पर निकाल दिया.. "यहीं थोड़ी दूर पर एक मंदिर है, चलोगे वहां?" मन नहीं था, सो एक सपाट सा उत्तर.. "अरे प्रसाद भी बहुत अच्छा मिलता है वहां.." एक खिलखिलाती हुई सी हंसी, जो शत-प्रतिशत मुझे बहलाने का प्रयास था.. मैं फिर मना नहीं कर पाया.. सोचा मेरा मन बहलाने के लिये ही तो कर रही है ये सब.. मंदिर से बाहर निकलकर सभी प्रसाद खाने लगे.. शायद सच में अच्छा था.. उनके चेहरे से झलक रहा था.. दो चने के दाने मैंने भी उठाया और मुह में डाल लिया.. अनमने ढंग से उसे निगल भी लिया.. फिर वापस कर दिया.. ना जाने क्यों कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था.. कुछ यादें फिर से दिल पर दस्तक दे रही थी.. ऐसी यादें जिनका मैं सामना नहीं कर सकता.. बस भागना चाहता हूं.. मगर भाग भी नहीं पाता.. क्या करूं? कहां जाऊं इन यादों से?

Thursday, July 10, 2008

आम जिंदगी और मेंटोस जिंदगी. दिमाग की बत्ती जला दे..

ये है आम जिंदगी एक साफ्टवेयर प्रोफेशनल की..



और ये है मेंटोस जिंदगी एक साफ्टवेयर प्रोफेशनल की..



मेंटोस!! दिमाग की बत्ती जला दे.. :)

Wednesday, July 09, 2008

जीवन दर्शन कि कुछ असाधारण सूक्तियां

आज मैं लेकर आया हूं कुछ ऐसी असाधारण सूक्तियां जो मजेदार भी है और तार्किक भी.. अगर इसे कुछ लोग कुतर्क समझ लें तो इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है.. :) इसे पढिये, मेरा दावा है कि आप इसे पसंद जरूर करेंगे..

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If your father is a poor man,
it is your fate but,
if your father-in-law is a poor man,
it's your stupidity.

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I was born intelligent -
education ruined me.

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Practice makes perfect.....
But nobody's perfect......
so why practice?

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If it's true that we are here to help others,
then what exactly are the others here for?

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Since light travels faster than sound,
people appear bright until you hear them speak.

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How come "abbreviated" is such a long word?

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Money is not everything.
There's Mastercard & Visa.

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Behind every successful man, there is a woman
And behind every unsuccessful man, there are two.

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Every man should marry.
After all, happiness is not the only thing in
life.

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The wise never marry.
and when they marry they become otherwise.

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Never put off the work till tomorrow
what you can put off today.

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"Your future depends on your dreams"
So go to sleep

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"Hard work never killed anybody"
But why take the risk

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"Work fascinates me"
I can look at it for hours

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god made relatives;
Thank god we can choose our friends.

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The more you learn, the more you know,
The more you know, the more you forget
The more you forget, the less you know
So.. why learn.

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A bus station is where a bus stops.
A train station is where a train stops.
On my desk, I have a work station....
what more can I say........

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Tuesday, July 08, 2008

Forever (मेरे मित्र द्वारा)

ये कविता मेरे एक मित्र के द्वारा लिखा गया है.. मुझे बहुत ज्यादा पसंद है यह, मगर मैं अपने मित्र का नाम नहीं देने जा रहा हूं.. :)

Forever takes me by a minute,
While I’m here with you.
I’m falling even more in love,
With everything you do.

Hold me in your arms,
Look deep into my eyes,
Don’t turn away and let me go,
Don’t ever tell me lies.

I swear I’ll never loose you,
In my arms I’ll always hold.
I’ll never let you slip away,
And leave nothing left untold.

There aren’t enough hours,
In each passing day,
To find all the words,
I wish I could say.

Your kiss will last forever,
Your touch forever warm.
You’ll guide me to the sunlight,
And shield me from the storm.

This is what I’m saying,
With everything that’s true,
I swear on my life,
That I really do love you.

Monday, July 07, 2008

बाहर बसने की तकलीफ़ और नोस्टैजिया

चारों ओर सामान बिखड़ा हुआ था और मैं उसे एक-एक करके समेट रहा था.. वापस जाने का समय आ गया था.. पहली बार घर से वापस कालेज जाने पर मन इतना दुखी हो रहा था.. पापा-मम्मी का साथ और चाहता था.. मगर घड़ी की सुई अपनी रफ़्तार से भागती जा रही थी.. जब पहली बार घर से बाहर निकला था तब भी ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ था और ना ही उसके बाद अभी तक कभी हुआ..

सितम्बर सन् 2006 का दिन था.. मैं अपने मिड सेम में ही क्लास छोड़कर घर भाग आया था.. कैंपस सेलेक्शन बीते हुये बस कुछ महीने हुये थे और इस बीच मैं अपने जीवन की एक बहुत बरी घटना से निकल कर आ रहा था.. मन कह रहा था कुछ देर और रुक जाऊं.. मगर समय इसकी इजाजत नहीं दे रहा था..

एक-एक कर के मैंने सारे सामानों को उसके स्थान पर रख कर अपना बैग बंद कर दिया.. मम्मी ढेर सारा खाने का सामान दे रही थी और मैं बिना कोई नखरा किये बस उसे रखता जा रहा था, जैसा की मैं हमेशा नखरा करता हूं.. सामान ठीक करके मैं सोफे पर बैठ गया.. 5 मिनट और रुका जा सकता था.. चुपचाप बैठ कर पापा-मम्मी को देख रहा था.. फिर उठा और बैग को कंधे पर डाल कर मम्मी का पैर छूकर आशीर्वाद लिया.. तभी पापा बोले कि भगवान को भी जाकर प्रणाम कर लो.. मैं थोड़ी देर के लिये ठिठका, मगर भगवान वाले कमरे में नहीं गया.. पहले जब कभी ऐसे हालात आते थे तब मैं चुपचाप कभी मन से तो कभी अनमने ढंग से जाकर हाथ जोड़कर वापस चला आता था.. इससे पापा-मम्मी को कम से कम संतुष्टी तो हो जाती थी.. फिर से पापाजी ने अपनी बात बहुत प्यार से कही.. मैं भगवान वाले कमरे में जाने के बजाये मैं पापाजी कि ओर बढ चला और उनके चरण छूकर कहा कि मैंने तो अपने भगवान को प्रणाम कर लिया.. आप अपने भगवान को प्रणाम कर लीजिये..

वो जान रहे थे कि अब ये किसी तरह से भगवान के सामने नहीं जायेगा.. उन्होंने मुझे बहुत ही भावपूर्ण और प्यार से गले लगा लिया..

सच कहूं तो मुझे इससे ज्यादा आनंद कभी नहीं आता है जब पापाजी मुझे गले लगाते हैं.. ढेर सारे रस एक साथ मेरे ऊपर बरस परता है मानो.. ढेर सारा प्यार.. ढेर सारा आशीर्वाद.. एक संतुष्टी, कि मैं हूं ना, तुम किसी बात की चिंता क्यों करते हो..

आजकल ना जाने क्यों पापाजी कि बहुत याद आ रही है.. ढेर सारी पुरानी बात याद आ रही है जो समय के गर्द में कहीं छुप सी गई थी.. अभी बहुत भाव-विह्वल हो रहा हूं.. बाकी बात कल करता हूं..

Sunday, July 06, 2008

बदलाव! मेरे भीतर का..

"तुम्हारे मोबाईल पर फोन किया था मैंने.."

"हां, वो स्विच्ड आफ था.."

"क्यों?"

"चार्ज ख़त्म हो गया था.."

"तुम गधे हो एक नम्बर के.. जब मोबाईल ठीक से चार्ज नहीं रख सकते तो उसे रखते ही क्यों हो?"

"चलो छोडों ना.. आगे से ध्यान रखूंगा.."

"अब मुझे ऐसे क्यों देख रहे हो?"

"सोच रहा हूं.. तुम इतनी ख़ूबसूरत क्यों हो?"

"तुम्हें तो बस ऐसी बातें बनाना ही आता है.."

"नहीं.. सच में पूछ रहा हूं.."

"बातें खूब बना लेते हो.. मुझे घूरना छोडो..

"...."

"मतलब तुम नजरें नहीं हटाओगे?"

"तुम जब शरमाती हो तो और भी ख़ूबसूरत दिखती हो.."

"मेरा नहीं तो आस-पास के लोगों का तो ख्याल करो.. क्या सोचेंगे?"

"बस दूसरों का ही सोचती हो.. कभी मेरा भी सोच लिया करो.."

कुछ यादों में डूबते-उतरते कुछ बातें याद आ रही थी तुम्हारी.. मगर बस यादें ही आ रही थी.. तुम नहीं.. क्यों सताती हो तुम मझे इतना? दुनिया हर दिन, हर घंटे बदलती है.. तुम भी बदल गई.. शायद मैं भी बदल गया हूं.. शायद नहीं, मैं सच में बदल गया हूं.. पहले सोचता था की तुम सबसे अलग हो.. सबस हट कर.. मगर अब ना जाने क्यों मुझे हर चेहरे में तुम्हारा चेहरा क्यों नजर आने लगा है.. हर जगह तुम क्यों दिखने लगी हो? है ना ये बदलाव की निशानी? क्यों, मैं भी बदल गया हूं ना?

एक डायनामिक पर्सनैलिटी, Mr.G.Vishvanath(Part - 3)

जब मैं विश्वनाथ सर के साथ उनके आफिस में बिता हुआ था तब मुझे उन्होंने अपने बेटे के बारे में बताया.. अपने कामयाब बेटे के बारे में बताते समय एक पिता के चहरे पर जितनी ख़ुशी और गर्व होना चाहिए वो सभी भाव एक साथ उनके चहरे पर मैंने देखा.. मुझे फिर से अपने पापा की यदा आ गई.. मेरे भैया की बता तो छोडिये, जब वो मेरे जैसे नालायक बेटे के बारे में भी किसी को बताते हैं तो उनके चहरे पर कोई भी वो भाव देखा जा सकता है.. इनके बेटे के बारे में ज्यादा जानने के लिए आप यहां क्लिक करें..

उन्होंने मुझे ढेर सारे किस्से सुनाये.. किस तरह उन्होंने पहले अपने घर के आधे हिस्से को आफिस में बदला और फिर पत्नी के ये कहने पर की आप घर को आफिस में बदल कर प्राइवेसी ख़तम कर दिये हैं, फिर उन्होंने पूरे घर को ही आफिस में बदल कर एक फ्लैट में शिफ्ट कर गए.. विश्वनाथ सर ने मुझे अपने आफिस का एक-एक हिस्सा दिखाये.. कौन कंप्यूटर किस नेतवर्क से जुडा हुआ है.. कहां पहले क्या था और उसे उन्होंने कैसे आफिस के प्रयोग में बढ़ला दिया.. वगैरह-वगैरह..

फिर हम वहां से उनके फ्लैट पर गए.. जहां इस समय विश्वनाथ सर अपने सास-ससुर के साथ रह रहे थे.. मुझसे सभी बहुत प्यार से मिले और बहुत ही स्वादिष्ट भोजन भी बहुत प्यार के साथ कराये.. खाने की मेज पर हम हिंदी ब्लौग के बारे में चर्चा भी किये.. जैसे मैं अमथुरा पर कौन-कौन सा ब्लौग पढ़ता हूं.. उसमें से मुझे कौन सा ब्लौग पसंद है.. मैंने उन्हें कुछ ब्लौग पढ़ने का सुझाव भी दिया.. जैसे अनामदास जी का ब्लौग, डा. अनुराग जी का ब्लौग और भी कुछ ब्लौग के बारे में मैंने उन्हें बताया जिसे मैं लेखनी के कारण पसंद करता हूं.. यहां हमने प्रसिद्द ब्लौगरों के बारे में ज्यादा बातें नहीं की क्योंकि उनके बारे में तो लगभग सभी जनाठे हैं..

खाना खा कर थोडी देर बाद हम निकल परे.. वो मुझे वापस फोरम के पास छोड़ने जा रहे थे.. रास्ते में मुझे उनके जीवन के कुछ अनुभवों को जानने का मौका भी मिला.. उन्होंने बताया की कैसे केरल में शिक्षित, बेरोजगार और कंम्यूनिस्त का कैसे खतरनाक संगम बनता जा रहा है.. समय भागता जा रहा था, मगर मुझे अपने नियत समय पर फोरम भी पहूंचना था.. अंततः विश्वनाथ सर ने मुझे फोरम के पास जाकर छोड दिये और साथ में मैं लेकर आया एक बहुता ही ख़ूबसूरत सा अनुभव..