Thursday, January 31, 2008

"अविनाश कैसे बना लौटकर अविनाश" और उनसे जुड़े कुछ तथ्य

कल मैंने घन्नू झारखंडी जी का पोस्ट यूं ही पढकर छोड़ दिया था क्योंकि मुझे ये जानने की कोई उत्सुकता नहीं थी की ये लौटकर अविनाश कब और कैसे बने। पर आज इतनी टिप्पणीयां देखकर रहा नहीं गया और बैठ गया लिखने के लिये। पहले तो टिप्पणी लिखी थी फिर सोचा की क्यों ना कोई पोस्ट ही गिरा दिया जाये।

कल जैसा की मनोज जी ने कहा था की उन्हें मुन्ना भैया(मैं तो यही कहकर बुलाउंगा उन्हें) कुछ घमंडी स्वभाव के लगे थे। तो उस पर मेरा कहना ये है की मुन्ना भैया को जो बात सही लगती है उसे सही साबित करने के लिये ये किसी से भी किसी भी स्तर के बहस के लिये तैयार रहते हैं और तब तक उसे सही मानते हैं जब तक कोई ठोस तर्क उसके विरोध में उन्हें ना मिल जाये। ये एक बहुत बड़ी बजह है जिसके कारण लोग उन्हें कई बार घमंडी स्वभाव का समझ बैठते हैं। शायद मनोज जी के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ होगा।

एक बात जो इन्हें भीड़ से अलग खड़ा करती है वो ये है की इन्होंने दुनिया कि कभी परवाह नहीं की और जो भी इनके मन में आया वही इन्होंने किया है अभी तक। और सबसे बड़ी बात तो ये है की आज तक ये कोई भी काम कुछ भी छुप-छुपा कर नहीं किये हैं। जो भी किये हैं सबके सामने। खुल्लम खुल्ला। चाहे इसके लिये इन्हें कितना भी विरोध का सामना क्यों ना करना पड़ा हो।

मेरी जानकारी में बस एक बात ऐसी है जो इन्होंने कुछ दिनों तक हम परिवार वालों से छिपा कर रखी थी, और उससे जुड़ी एक मजेदार घटना भी है। वो बात है उनकी शादी से जुड़ी हुई, जिसे कुछ पारिवारिक समस्या के कारण इन्होंने छुपाया था।

मजेदार घटना :
हुआ ये की इन्होंने उस समय तक शादी कर ली थी और घरवालों से छुपा रखा था। अब मेरे पापाजी एक प्रसाशनिक अधिकारी हैं सो उन्हें पत्रकारों से अक्सर पाला पड़ता ही रहता है। एक बार कोई पत्रकार पापाजी से मिलने के लिये आया हुआ था, उससे पापाजी ने बस यूं ही कहा की मेरा भतीजा भी पत्रकार है(उस समय मुन्ना भैया प्रभात खबर में थे)। उसने नाम पूछा, पापाजी ने बताया अविनाश। उसने कहा की मैं दो अविनाश को जानता हूं, तो पापाजी ने कहा की लौटकर अविनाश। तो उसने कहा की वही ना जिसने अभी शादी की है। अब मेरे पापाजी चौंक गये। बोले की नहीं उसकी तो अभी शादी नहीं हुई है। पर उसने पूरे आत्मविश्वास से कहा की नहीं सर उसकी तो शादी हो चुकी है। उसने तो पार्टी भी दे दी है।

खैर पापाजी घर आये और हम सबको बताया साथ ही ये भी कहा की किसी को भी ये बात मत बतान चाहे कुछ भी हो। वो जब तक खुद नहीं बताये तब तक किसी को ये बात पता नहीं चलनी चाहिये। बाद में मुझे पता चला की एक बार मुन्ना भैया हमें भाभी से अपनी महिला मित्र कह कर मिलवा चुके थे। :D

अब उसके कुछ दिन के बाद की बात है। दिसम्बर का महीना था और पटना में पुस्तक मेला लगा हुआ था। मैं वहां घुम रहा था उसी समय मुन्ना भैया भी को भी वहीं देखा। वो भाभीजी के साथ थे। जैसे ही वे मुझे देखे थोड़ा हरबरा से गये और फिर से भाभी का परिचय मुझसे कराने लगे कि इनसे मिलो ये मेरी महिला मित्र हैं। मैंने कुछ कहा नहीं बस मुस्कुरा कर रह गया।

उस समय जब घर में सभी को पता चला तो हमारे समाज में कानाफूसी का लम्बा दौर चला था। सभी सोचते थे की हमारे समाज के बाहर कि है पता नहीं क्या करेगी घर आकर एडजस्ट नहीं कर पायेगी और भी ना जाने क्या-क्या। पर अगर आज की बात करें तो, मेरी मम्मी के शब्दों में, "मुक्ता(भाभी) बहुत अच्छी हैं, इनसे अच्छी मुन्ना को मिल ही नहीं सकती थी।" और मेरे मत भी मम्मी से कुछ अलग नहीं हैं। :)

अभी-अभी भैया ने मेरा पोस्ट पढा और मुझे एक तस्वीर भेजी जो कि इस पोस्ट पर बिलकुल सही फिट होती है.. सो इसे एडिट करके मैं वो तस्वीर भी लगा रहा हूं..
Thanks to bhaiya.. :)

अफ़लातून जी के साथ मुन्ना भैया

Wednesday, January 30, 2008

आज कोई मस्ती नहीं.. बस बचपन में की गई गंभीर बातें..

आज मैंने सोचा की हर दिन मैं फालतू कि बकवास करता रहता हूं, सो क्यों ना आज उन गंभीर बातों के बारे में आपको बताऊं जो मैंने और भैया ने मिलकर बचपन में किया था।

घटना 1 (एक कुत्ते की कथा)-
पापाजी उस समय बिहार के बिक्रमगंज नामक जगह के SDM हुआ करते थे जो पटना से ठीक 120 KM पर स्थित है। महीने में एक-दो बार पटना से बिक्रमगंज या बिक्रमगंज से पटना आना जाना हो ही जाता था। बीच रास्ते में पीरो नामक जगह पर एक कुत्ता हर बार सारे वाहन का पीछा करते हुये ना जाने कितनी ही दूर दौड़ता रहता था। सो एक बार मैं और भैया बैठ गये उस पर सोचने कि वो क्यों हर वाहन का पीछा करता है?
बहुत सोचा। कई तर्क दिये। और अंत में इस निर्णय पर पहूंचे की जरूर उस कुत्ते की मां की मौत किसी ट्रक के नीचे आने से हुई होगी और वो अपनी मां की कसम खाते हुये फिल्मी स्टाइल में सबसे चुन-चुन कर बदला लेने का सोचा होगा। :)

घटना 2 (बेचारा कौवा)-
हम(मैं और भैया) अक्सर सोचते थे कि लोग हर तरह के पंछी पालते हैं। तोता, मैना, कबूतर, गौरैया, फुदकी चिड़ैया, घूघूती(अपनी घूघूती बासूती नहीं, असली वाली :)) यहां तक की बाज और गिद्ध तक पालने की घटना सुनते हैं। पर कोई कौवा को क्यों नहीं पालता??
फिर हमने सोचा की कहीं से तो इसकी शुरूवात होनी चाहिये तो क्यों ना हम से ही ये शुरूवात हो। अब कोई कौवा तो बेचता नहीं है सो हमें ही उसे पकड़ना था पालने के लिये।
हमने बहुत कोशिश की मगर हम अंत तक सफल नहीं हो पाये। और अंततः एक तोता ही पाल कर संतोष कर लिये।

ये सभी घटनाऐं बिलकुल सही है। इनका कल्पानाओं से कोई लेना देना नहीं है। कल मैं लेकर आउंगा घटना नम्बर 3 जो एक तथ्य भी था हमारे लिये जिसे हमने सिद्ध किया था बचपन में और हम सोचते थे की इसके लिये हमें कोई पुरस्कार तो मिलना ही चाहिये। :)

एक परिचय मेरे भैया का। मेरे भैया IES की परिक्षा उत्तीर्ण करके अभी MES दानापुर कैंट में कार्यरत हैं।

Tuesday, January 29, 2008

क्या आपने ये गीत सुना है युनुस भाई??

युनुस जी आज के हिंदी चिट्ठाजगत के सबसे बड़े संगीत प्रेमी के रूप में जाने जाते हैं। मगर मुझे पूरी उम्मीद है कि वो ये गीत शायद ही सुने होंगे.. मैं काफी दिनों से ये गीत पोस्ट करने के बारे में सोच रहा था पर पता नहीं क्यों नहीं पोस्ट कर पाया।

लगभग छः महीने पहले आपने रजनीकांत की धमाकेदार सुपर हिट फिल्म शिवाजी द बास के बारे में सुना होगा। ये गीत उसी फिल्म का है। मैं जो गीत पेश कर रहा हूं उसका पहला गाना (सहाना चरन...) सुनने में कर्ण्प्रिय लगता है और दूसरा गीत (वाजी वाजी वाजी...) थोड़ा मस्ती भड़ा लगता है। बस ये मत पूछियेगा की इन गीतों का मतलब क्या है? मुझे नहीं पता है।

Shivaji Sahana Cha...



पोस्टर से लिया हुआ चित्र

Shivaji Vaaji Vaaj...


मुझे आज भी याद है जिस दिन मैंने अपनी नौकड़ी ज्वाईन किया था ये फिल्म उसी दिन रिलीज हुई था। मेरे साथ ज्वाईन करने वाले मेरे एक मित्र ने मुझे बताया था की वो पहली शो में ही ये फिल्म देख कर आया था और वो भी रात के 1 से 4 बजे वाला शो। जबकी सुबह 8:30 में आफिस भी पहूंचना था। क्योंकि उसके बाद अगले तीन महीने तक किसी भी थियेटर में कोई भी टिकट नहीं मिल रहा था। सभी बुक हो चुके थे।

अब क्या था इस फिल्म में ये तो मुझे पता नहीं क्योंकि मैंने देखी नहीं है लेकिन जैसे ही मौका मिलेगा मैं इसे जरूर देखना चाहूंगा। पर जैसा कि मेरे तमिळ मित्रों ने मुझे बताया की इसमें हर तरह का मसाला, कर्णप्रिय गीत और सबसे बड़ी बात रजनीकांत था जिसके कारण ये इतनी बड़ी हिट हुई।

अब तो रजनीकांत कि अगली फिल्म भी आने वाली है। उसका नाम सुल्तान द वैरियर है। देखते हैं वो क्या गुल खिलाती है।

Monday, January 28, 2008

26 जनवरी और 15 अगस्त भूल जायें और अमेरीकन इंडिपेंडेन्स डे मनायें भारत में

मैं आज बात कर रहा हूं भारत में मौजूद कुछ ऐसी कम्पनियों के बारे में जो भारत में अपना कारोबार कर रही हैं पर वो 26 जनवरी या 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस नहीं मना कर 4 जुलाई को स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिये छुट्टी देती है।

साफ्टवेयर बनाने वाली कम्पनियों में अपनी गुणवत्ता और अपने कर्मचारीयों कि सुविधा का अच्छा खयाल रखने के लिये जाने जानी वाली कम्पनी CSC(कंप्यूटर साईंस कारपोरेसन) के बारे में मेरी एक मित्र ने ये जानकारी दी है जो उसी कम्पनी में कार्यरत है।

अभी मैं इस इंडस्ट्री में नया नया आया हूं सो बहुत ज्यादा कम्पनियों के बारे में जानकारी नहीं है मुझे, पर ये जरूर जानता हूं की इस तरह का काम करने वाली ये अकेली कम्पनी नहीं होगी।

आपका क्या विचार है इस तरह की कम्पनियों के बारे में?? अगर इस पर एक बहस की शुरूवात की जाये तो क्या अच्छा ना होगा??

Saturday, January 26, 2008

कुछ चित्र

आज बस कुछ चित्रों के साथ आया हूं.. आप भी देखें...


चेन्नई समुद्र तट पर करतब दिखाते कुछ नट...


जीवन कि सुनसान राह जैसी कुछ राहें..


मेरा नया स्टाइल... :)


मेरी मित्र.. ना जाने लहरों मी क्या ढूँढती सी..

Friday, January 25, 2008

All The Best For Girls और पैसा वसूल

लड़कियों के मामले में अपनी तो किस्मत ही हर वक्त दगा दे जाती है। और अगर किसी ने All The Best जैसा जैसा कुछ बोल दिया फिर तो बंटाधार होना निश्चित है।

अभी कुछ दिनों पहले की बात है। मैं और मेरा दोस्त विकास एक सिनेमा देखने के लिये चेन्नई के प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित सिनेमा हालों में से एक सत्यम के लिये जा रहे थे। रास्तें में उपरोक्त डायलाग(All the best for girls) मेरे एक मित्र ने यूं ही मजाक में कहा कि जाओ शायद बगल वाली सीट पर कोई अच्छी और खूबसूरत लड़की बैठी हो।

वहां मैं पहूंचा और अपने ई-टिकट को दिखा कर सही टिकट लिया(मैंने नेट से बुकिंग की थी)। अब जैसा कि मैंने पाया है, महानगरों में आप किसी मल्टिप्लेक्स में रात वाले शो में जाते हैं और चूकिं टिकट बहुत महंगा होता है और उपर से अगर वो कोई अंग्रेजी सिनेमा हो तो अच्छी-अच्छी और खाते पीते घर कि लड़कियां बहुतायत में पहूंचती है जिसे हम जैसे युवा वर्ग के लोग हॉट क्राउड कहते हैं।

उस दिन इस तरह कि सारी परस्थितियाँ हमारे अनुकूल थी। रात 10 बजे का शो था, "I Am Legend" नामक सिनेमा की टिकट हमारे पास थी और महंगा मल्टिप्लेक्स था सो चेन्नई होते हुये भी क्राउड अच्छा था।

हम दोनों टिकट लेकर अंदर गये और अपनी-अपनी सीट पकड़ कर बैठ गये। फिर लगे इंतजार करने की कोई अच्छी और खूबसूरत लड़की बगल वाली सीट पर आकर बैठे। मगर किस्मत को कभी मेरे उपर दया नहीं आती है और अगर साथ में विकास भी हो फिर तो क्या कहने।

पूरा हॉल अच्छी-अच्छी लड़कियों से भरा परा था। पर मेरे बगल की तो बात छोड़िये, मेरे पूरे रो(ROW) में एक भी लड़की नहीं थी। खैर किसी तरह दिल को समझाया कि सिनेमा अच्छी हो तो पैसे वसूल हो जाये।

10 बज चुके थे, सिनेमा शुरू होने से पहले का प्रचार परदे पर आना चालू हो चुका था और हम उसे देखकर अपने चव्वनी-अठन्नी वसूल कर रहे थे। फिर शुरू हुआ सिनेमा मगर अभी तक किस्मत को हमपर दया नहीं आई था। और 5-6 सेकेंड सिनेमा चलने के बाद ही प्रोजेक्टर खराब हो गया। उसे ठीक करते-करते 11:15 हो गये। अब तक उन सारे दर्शकों का सब्र टूट चुका था जो संभ्रांत दिखने का मुखौटा ओड़ कर चुपचाप बैठे हुए थे। हम तो बस बैठ कर तमाशा देखते रहे। क्योंकि हमारे बोलने का ज्यादा फायदा नहीं होने वाला था। क्योंकि हम तमिल जानते नहीं थे और अंग्रेजी में आज-तक कभी चिल्ला कर बोले नहीं थे। और हमारे भदेस भाषा को वहां समझने वाले लोग कम ही थे।

खैर अंत में हमारे सारे पैसे वसूल हो गये। सिनेमा हाल वालों ने हमसे टिकट लेकर हमारे पैसे लौटा दिये। यहां तक कि पार्किंग के भी। और हम वापस घर आ गये। मन को समझाते हुये की चलो पैसे तो वसूल हो गये!!!

(अपने जीवन की इस घटना पर एक व्यंग जैसा कुछ लिखने का मैंने प्रयत्न किया है सो आप इसे अन्यथा ना लें। अब कितनी सफलता मिली है ये तो आप ही बतायें।)

Thursday, January 24, 2008

ब्लौग से बदनामी तक

मैं एक चिट्ठाकार हूं!! इसकी बदनामी इन दिनों मेरे आफिस में भी पहूंच गई है। कल मेरे आफिस में जो हुआ वो इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

कल जब मैं दोपहर का खाना खाने के लिये अपने क्यूबिकल से बाहर निकल कर अपने एक मित्र के क्यूबिकल की ओर जा रहा था उसी समय बीच में मेरे प्रोजेक्ट मैनेजर मिल गये। उनके और मेरे बीच जो कुछ बातें हुई वो कुछ ऐसी थी :

PM : I didn't saw your work from many days, can you show me your work apart from BLOGGING? (उन्होंने मुझपर कमेंट करते हुये पूछा।)
Me : (With a smile) Sure Karthi.

फिर मैंने उन्हें अपना काम दिखाया तब उन्होंने फिर मुझसे पूछा :

PM : This is good. Now can you show me your coding, not the XML coding of your blog. (उन्होंने फिर से मेरे उपर कमेंट किया।)

मैंने उन्हें दिखाया और वो मेरे प्रोग्राम का कोड देखकर खुश हुये और कहा कि मैं जल्द ही तुम्हें कोई नया काम देता हूं।

खैर जो भी हुआ हो मगर इससे ये तो तय हो गया की मैं बस अपने दोस्तों में ही ब्लौगिंग के लिये कुख्यात नहीं हूं, मेरी कुख्याती तो अब जग प्रसिद्ध होती जा रही है। :D
वैसे मेरे प्रोजेक्ट मैनेजर को इससे कोई परेशानी नहीं है की कौन आफिस में क्या करता है, कितने बजे आता है, कितने बजे जाता है। उन्हें तो बस इससे मतलब रहता है कि सभी काम सही समय पर होते रहना चाहिये।

Wednesday, January 23, 2008

मेरा मित्र विकास और नेताजी

इसे छोड़कर इन दोनों में और कोई समानता नहीं है कि इन दोनों का जन्म आज ही के दिन 23 जनवरी को हुआ था। मैं विकास से पहली बार अपने कालेज के पुस्तकालय में मिला था, मैं MCA के दूसरे बैच में प्रवेश लेने के लिये गया हुआ था और विकास ने पहले बैच में प्रवेश लिया था। विकास पुस्तकालय में पार्थो के साथ था जो मेरा पुराना मित्र था और उस समय का विकास का रूममेट। मुझे लगा की ये जरूर अव्वल दर्जे का पढाकू होगा तभी तो कोर्स के शुरूवाती दिनों से ही पुस्तकालय में घूम रहा है। (कालेज के दिनों में पढाकू हमारे लिये एक गाली की तरह होता था। :)) और फिर उसके साथ जो मेरी दोस्ती शुरू हुई सो अभी तक है। उस समय से लेकर अभी तक हम साथ ही हैं। भाग्य ने भी दोनों को ऐसे जगह ला पटका की यहां भी हम साथ ही रह रहे हैं।

जैसे-जैसे मैंने इसे जानना शुरू किया, मैंने पाया की ये अव्वल दर्जे तो क्या छोटे दर्जे का पढाकू भी नहीं है पर अपनी पढाई को लेकर बहुत ज्यादा उद्यमी लड़का है। तीक्ष्ण बुद्धि और विनोदिता से सुसज्जित मस्तिष्क जैसे इसे ईश्वर की ही देन है। मैंने ये भी पाया की हमारे गुण-विचार भी एक दूसरे से बहुत मिलते हैं। यहां तक की अगर कोई हमारे हस्तलिपि पर अचानक यूं ही नजर डाले तो उसके लिये ये जानना बहुत कठिन होगा की ये किसी एक के द्वारा ही लिखा हुआ है या अलग-अलग व्यक्तियों के द्वारा।

बैंगलोर-मैसूर हाईवे पर मैं(बायें) और विकास(दाहिने)
छात्रावास प्रवास के दौरान हमने ना जाने कितनी ही रातें गप्पे मारते हुये बिताये। मैं जब भी किसी परेशानी में होता था तो विकास से हमेशा ही एक परिपक्व सलाह मिल जाती थी। जब मैं अपने जीवन का सबसे बड़े मानसिक तनाव से गुजर रहा था उस समय मुझे कुछ लोगों का(घर के सदस्यों को छोड़कर) बहुत सहयोग मिला था जिसमें विकास का हिस्सा सबसे बड़ा था।

पढाई में हमेशा अव्वल मगर हमेशा खुद को सबसे छोटा और कम जानने वाला बताने वाला(घमंड से कोशों दूर), कराटे का ज्ञाता और बलिष्ठ शरीर का स्वामी होते हुये भी हमेशा लड़ाई-झगड़े से दूर रहने वाला(इसके शब्दों में, "मैं जब भी लड़ा हूं तो बस कराटे में पाईन्टस लेने के लिये"), हमेशा शांत सा दिखने वाला मगर अगर कुछ पसंद नहीं है तो उसका कड़ा विरोध भी जताने वाला।

चलिये जब मैं इसकी इतनी सारी खूबियों के बारे में बताया ही हूं तो इसकी सबसे बड़ी खामी के बारे में भी बताता चलूं। "आलस्य और संतोष" एक जगह अगर कुछ मिल जाये तो बस वहीं इसका मन रम जाता है और फिर कुछ भी नया पाने के लिये कोई उद्यम नहीं करना इसके स्वभाव में है।

अगर कोई मुझसे पूछे की विकास मेरे लिये कितना महत्व रखता है तो मेरे पास उसका कोई जवाब नहीं होगा, मैं निरूत्तर हो जाऊंगा। क्योंकि उसे बताना मेरे बस के बाहर की बात होगी। हां मगर ये जरूर कहूंगा की ये मेरे लिये दोस्त के रूप में एक बड़े भाई की तरह है, और हमेशा मुझे इससे सही सलाह मिलती रही है। अगर ये मुझे कुछ करने के लिये कह दे तो वो सही हो या गलत, मुझे अच्छा लगता हो या बुरा, इसकी परवाह किये बगैर बस उसे कर देता हूं। मुझे नहीं पता की ये मेरे बारे में ऐसा ही सोचता है या नहीं, खैर अगर ये ऐसा नहीं सोचता है फिर भी मेरे इस कथन में कोई अंतर नहीं आता।

जब हम दोनों चेन्नई शिफ्ट हुये थे तब मेरे घर वाले निश्चिंत थे की मैं विकास मेरे साथ रह रहा है और इसके घर पर भी सभी निश्चिंत थे की ये प्रशान्त के साथ रह रहा है। बस ऐसी ही हमारी दोस्ती है। :)

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आज नेताजी का जन्मदिन है और उन्हें याद किये बगैर अगर मैं आज का ये पोस्ट बंद कर दूं तो ये उनके प्रति न्याय नहीं होगा। अगर आप उनके बारे में ज्यादा पढना चाहते हैं तो इस पते पर जाईये।

Tuesday, January 22, 2008

अनंत कुशवाहा और "कवि आहत"

एक डाल से तू है लटका,
दूजे पे मैं बैठ गया।
तू चमगादड़ मैं हूं उल्लू,
गायें कोई गीत नया।

घाट-घाट का पानी पीकर,
ऐसा हुआ खराब गला।
जियो हजारों साल कहा पर,
जियो शाम तक ही निकला।

खड़-खड़-खड़ खड़ग सिंह,
खड्डे में रपट गये।
बत्तीस में चार दांत,
आगे के घट गये।

ये कुछ कवितायें मैंने बचपन में बालहंस नामक बाल पत्रिका में पढी थी जो मुझे अभी भी याद है। उन दिनों बालहंस में मैं जो सबसे पहले ढूंढता था वो था कवि आहत नाम का चित्रकथा, ये कवितायें वहीं से ली गई है।

बचपन से लेकर ग्रैजुएसन के दिनों तक हर पंद्रहवें दिन सुबह उठते ही पापाजी या मम्मी(जो भी पहले सामने आ जायें) से पूछता था की इस बार का बालहंस कहां है? अनंत कुशवाहा जी के संपादकीय के जादूगरी से लैस हर अंक अपने में कुछ नया लेकर आता था। और दाम भी हम बच्चों सा ही। बस दो रूपये।

उसके चित्र कथाओं के पात्र हम सभी भाई-बहनों में रच बस गये थे। "हवलदार ठोलाराम, कवि आहत, शैलबाला, कूं-कूं और मुनिम जी" तो लगभग हर अंक में दिखते थे। धीरे-धीरे एक एक करके कुछ पूराने पात्र कम ही दिखने लगे। जैसे हवलदार ठोलाराम, शैलबाला इत्यादी। मगर कवि आहत हर अंक में दिख जाते थे।

हमारे घर में कवि आहत को कुछ ज्यादा ही पसंद किया जाता था। यहां तक की पापा-मम्मी भी उसकी कविताओं को बड़े चाव से पढते थे। कई बार उन कविताओं में सामाजिक व्यवस्था पर ऐसे व्यंग हुआ करते थे जो होते तो थे बड़ों के लिये, मगर बच्चों को भी समझ में आ जायें।

धीरे-धीरे उसका दाम बढने लगा और दो से चार फिर पांच फिर छः। मगर उसे पढने का चाव कभी खत्म नहीं हुआ। फिर धीरे-धीरे उसकी गुणवत्ता में गिरावट आने लगी। और कुछ महीनों बाद हमने उसे लेना बंद कर दिया। फिर मैं भी घर से बाहर अपने आगे की पढाई के लिये निकल गया। मगर आज भी मेरे पास बालहंस के वे सारे अंक आज भी मौजूद हैं। सभी को पता है कि मुझे उससे कितना लगाव है सो घर में कोई भी उसे फेंकने की बात भी नहीं करता है।

अब भी कभी घर जाता हूं और कहीं बालहंस दिख जाता है तो जरूर खरीद लेता हूं। पर ना जाने क्यों वो वाली बात कहीं नजर नहीं आती है। मैंने सालों से बालहंस की कोई प्रति नहीं पढी है। मेरे एक परिचित ने मुझे कुछ साल पहले बताया था की अनंत कुशवाहा जी का निधन हो गया है। मुझे नहीं पता कि ये खबर कितनी सच्ची है, क्योंकि जब आप किसी को बहुत पसंद करने लगते हैं तो ऐसी खबरें अक्सर झूठी ही लगती है। अब आप लोगों में से ही कोई उनके बारे में मुझे सही-सही जानकारी दें। क्या वो आज भी अपने काम को बखूबी निभा रहें हैं या फिर सच में उनका निधन हो चुका है?

Monday, January 21, 2008

ये एक कूड़ा पोस्ट है, कृपया तथाकथित बुद्धिजीवी इसे ना पढें

वैधानिक चेतावनी : ये जो मैं आज लिख रहा हूं कृपया इसे तथाकथित बुद्धिजीवी लोग ना ही पढें तो अच्छा होगा। वैसे भी एक साफ्टवेयर बनाने वाला छोटी बुद्धि का इंसान इतनी धृष्टा कैसे कर सकता है की उसकी रचना तथाकथित बुद्धिजीवीयों भी पढ लें। अब बाद में ना कहियेगा कि मैंने आगाह नहीं किया था।

मैं और मेरी यायावरी

कभी-कभी इंसान हर किसी से पीछा छुड़ाना चाहता है, इस इंसानों की मंडी में खुद को बिकता हुआ नहीं देखना चाहता है। लोग नये टेक्नालौजी की आड़ में हर वक्त किसी ना किसी रूप में आपका पीछा करते होते हैं, कभी टेलिफोन से तो कभी मोबाईल से।

पिछले शनिवार को मैं इस तरह के बोझिल वातावरण से तंग आकर अचानक से बिना किसी को कुछ कहे निकल गया घर से। बस पीछे छोड़ गया विकास को भेजा गया एक SMS जिससे मेरे पीछे किसी को कुछ परेशानी तो ना हो। मुझे घर में ज्यादा तलाश तो ना किया जाये। जिसमें मैंने लिखा था कि, "मैं कहीं घुमने जा रहा हूं, मुझे पता नहीं कहां। मैं अपना मोबाईल घर में ही छोड़े जा रहा हूं, अगर मेरे किसी परिचित का फोन आये तो बोल देना की मैं मोबाईल घर पर भूल गया हूं।"

घर से नीचे जैसे ही पहूंचा, देखा कि 25G नम्बर कि बस आ रही है जो मेरिना समुद्र तट तक जाती है। मैंने सोचा कि बहुत घुम चुके बड़े लोगों का समुद्र तट(बेसंत नगर बीच), आज दिखावापन छोड़ कर अपने जैसे छोटे लोगों का समुद्र तट घुम कर आया जाये। शायद भाग्य भी मेरे साथ था तभी तो जो बस अमूमन खचाखच भड़ी होती है वो उस समय बिलकुल खाली आ रही थी। 4.50 का एक टिcकेट लेकर मैं अपने मनपसंद जगह पर बैठ कर सो गया। क्योंकि मुझे पता था कि वहां तक पहूंचने में कम से कम एक घंटा तो बड़े आराम से लग जायेगा। पास में कुछ कीमती सामान तो था नहीं जिसे चोरी से मुझे बचाना था और सावधानी पूर्वक बैठना था।

जब नींद खुली तो पाया की मैं ट्रिप्लीकेन नामक जगह से गुजर रहा हूं। ये वही जगह है जहां मैंने अपने नौकड़ी के शुरूवाती दिन काटे थे। ये कुछ कुछ वैसा ही जगह है जैसा की दिल्ली का कठबड़िया या जीया सराय है। अकेले रहने वाले नवयुवकों से भड़ा हुआ और मेरिना समुद्र तट के बिलकुल पास। मैंने सुना था की सुनामी के समय यहां पूरा पानी भर गया था मगर किसी भी बड़े शहर की ही तरह बस एक-दो महीने बाद ही उस त्रासदी से उबर कर लोग अपने में रम गये। बस पीछे रह गई थी कुछ बुरी यादें जैसे कोई दुःस्वप्न।

थोड़ी देर मैं मेरिना बीच पर घुमता रहा। पर फिर मन में ये जानने कि इच्छा जागी की अपना वो आसियाना कैसा होगा? जहां मैंने ना जाने कितनी शामें रोटियां तोड़ते हुये गुजारी है, वो आन्टी जी का होटल कैसा होगा? जहां मैंने अपने उदासी भरे दिनों को सिगरेट के धुवें में उड़ाने की नाकाम कोशिश की थी वो गलियां कैसी होगी? और मेरे कदम बरबस ही उस ओर मुड़ चले।

हर एक चीज को गौर से देखते हुये, अपने पुराने दिनों को फिर से जीते हुये मैं चलता गया। वो SBI बैंक का ATM जहां मैंने ना जाने कितनी ही बार सड़क तक लाइन में लग कर पैसे निकाले थे। वो फल वाला जिससे कितनी ही बार अंगूर खरीद कर खाये थे। ऐसा लग रहा था जैसे मैं किसी दूसरे शहर में आ गया हूं। एक ही शहर में रहते हुये आप उसी शहर के किसी हिस्से से बिलकुल अंजान बनते हुये अपनी अपनी जिंदगी में कैसे खो जाते हैं, इसका सबसे बड़ा उदाहरण मैं ही था।

फिर से वैसे ही घर की खुश्बू का अहसास करते हुये आन्टी जी के हाथों का बना हुआ फुलका खाया और वापस लौट पड़ा उसी भागम-भाग भड़े जिंदगी में। घर पहूंच कर अपने मोबाईल को चेक किया तो पाया की एक भी मिस्सड काल नहीं आया हुआ था। मैंने सोचा, चलो अच्छा ही हुआ। किसी को सफाई तो नहीं देनी पड़ेगी की मैं इतना लापरवाह कैसे हो गया हूं जो अपना मोबाईल घर में भूल जाता है।