Monday, June 29, 2009

15 रूपये कि एक मुस्कुराहट और ट्रैफिक सिग्नल

अपने ऑफिस के बाहर वाले पार्किंग में खड़ा मैं फोन पर किसी से बातें कर रहा था.. तभी नीचे से कुछ आवाज आई.. मैंने देखा तो पाया की एक 3-4 साल की बच्ची थी और उसके गोद में भी एक 5-6 महिने का बच्चा था.. मैंने उसे भीख मांगने वाली समझ उसे इसारे से मना किया, कि मैं कुछ भी नहीं दूंगा.. उसने कहा, "अन्ना, नो मनी.."...

Wednesday, June 24, 2009

फादर्स डे के बहाने कुछ मेरी बातें

- मैं इन सब बातों को नहीं मानता हूं.. अब भला यह भी कोई बात हुई कि कोई दिन फिक्स कर दिया जाये कि इसी दिन आप मां-बाप को याद करें?- फिर तो तुम्हें नया साल भी नहीं मानना चाहिये?- हां नहीं मानता हूं..- तो फिर हमलोग पिकनिक पर क्यों जाते थे? और सबसे ज्यादा खुश भी तुम ही होते थे..- मैं उस समय छोटा था, अपनी...

Friday, June 19, 2009

कोई नॄप होए, हमें का हानी

वर्ल्ड कप 20-20 से भारत बाहर हो चुका है, और अभी आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है.. वैसे इसमें कुछ भी अजूबा नहीं है, ऐसा तो हमेशा ही होता है.. जब भी बारत हारता है तो लोग एक-दूसरे पर आरोप मढ़ने लगते हैं.. मिडिया का दोमुहा चेहरा...

Monday, June 15, 2009

रात ऊनांदे में लिखी मम्मी को एक एस.एम.एस.

मम्मी, नींद नहीं आ रही है.. एक अजीब सी बेचैनी सी महसूस हो रही है.. जैसे कहीं कुछ छूट सा गया हो.. कुछ खालीपन सा.. एक सन्नाटा सा.. कुछ विरानी सी.. एक छटपटाहट सी..ऐसा लग रहा है जैसे कोई आत्मा को खरोंच रहा हो.. कुछ बूंदे टपक रही हो जैसे.. कुछ वैसा ही जैसे किसी बोतल में खरोंच लगने पर पानी कि बूंदे बेतरह...

Sunday, June 14, 2009

एक सस्ती शायरी

एक इन्कलाब आयी, पूरी दुनिया सुधर गई..हजार और आये, हम न सुधरे हैं औ ना सुधरेंगे.. मेरे पिछले पोस्ट पर कुछ लोगों ने कमेन्ट में मुझे सुधारने कि सलाह दे डाली थी.. उसी पर यह माइक्रो पोस्ट है.. ;)वैसे मैं यह बता देना चाहता हूँ कि मैं इस शायरी को लिखने का दावा नहीं कर रहा हूँ.. किसने लिखा है यह मुझे पता नहीं...

Friday, June 12, 2009

मेरे घर के आगे एक रंगोली

नये घर में शिफ्ट हुये एक महिना बीत चुका है.. तो महिने का किराया देने का भी समय आ गया था.. 50 रूपये बरामदा साफ करने वाले को भी देना था.. हमारा कहना था कि महिना में एक दिन भी उसने आकर साफ सफाई नहीं की है तो हम 50 रूपये क्यों...

Thursday, June 11, 2009

कहानी मां की

मुझे याद नहीं है कि मैंने यह कब लिखा था.. बस इतना ही याद है कि रात में किसी बेख्याली में मम्मी को एस.एम.एस.मे यह लिखकर भेजा था.. आज यही सही..मां याद है तुम्हें?कैसे तुम्हारी कहानियों में,नायक हमेशा जीतता रहा है..खुद को जाने कितनी ही बारउस नायक के स्थान परदेख चुका हूं मैं..लड़ाई में मगर अकेला पर जाता...

Tuesday, June 09, 2009

दीवानगी ऐसी कि परदे पर भगवान देख रहे हों

कुछ दिन पहले मेरे इस लेख को अजय जी ने इसे अपने चवन्नी छाप नामक ब्लौग में स्थान दिया था.. मगर मेरे कुछ मित्र जो चवन्नी छाप ब्लौग नहीं पढ़ते हैं, उनके लिये मैं इसे अपने ब्लौग पर भी पोस्ट कर रहा हूं..अजय जी को धन्यवाद सहित..यूं तो तमिलनाडु जुलाई सन 2004 में आया था.. मन में कई बातें लेकर जैसे वहां तमिल वालों...

Saturday, June 06, 2009

ना फुरसतिया जी को फुरसत, और ना मुझे

फुरसतिया जी चेन्नई आये और चले गये.. लगभग 7 दिन पहले अनूप जी का फोन आया और वो अपने चिर-परिचित अंदाज में बोले, "पीडी, मैं ये देखने चेन्नई आ रहा हूं कि सच में तुम्हारा पैर टूटा है या बस नाटक कर रहे हो?" मैंने तुरत फुरत में...