Saturday, February 14, 2009

तुम मुझसे इतने दिन गुस्सा कैसे रह सकती हो?

- इस खेल में बस नौ खाने ही क्यों होते हैं?

- मुझे क्या पता?

- फिर किसे पता होगा?

- सब समझती हूं, मुझे बातों में उलझा कर इस बाजी को जीतना चाहते हो..

- जहां खाने सिर्फ नौ हों वहां एक बार बाजी निकल जाने पर जीतने की संभावना वैसे भी कम ही हो जाती है.. तुम तो इसे ऐसे भी जीत रही हो..

- लिखना ही है तो कॉपी पर लिखो ना, मेरे हाथों पर क्यों लिख रहे हो?

- कुछ नहीं, बस तुम पर लाईन मार रहा हूं..

- कोई बाते बनाना तो तुमसे सीखे..

- और मुझे बनाना तुमसे..

- ठीक है, ठीक है.. ये मैंने अपना कुट्टा लगा दिया है.. अब मेरे चेहरे को छोड़ कॉपी भी एक बार देख लो..

- कॉपी क्यों देखूं? जब अपने जीवन की किताब पढ़ रहा हूं..

- नजर हटाओ, मुझे शर्म आती है.. अब तुम्हारा चांस है.. एक बार कॉपी भी देख लिया करो, कहीं कोई बेईमानी तो नहीं कर रहा है?

- ये क्या, तुमने सच में बेईमानी की है.. यह तुम जान कर हार रही हो..

- हां!!

- मैं बेईमानी वाला खेल नहीं खेलता हूं, चाहे वो बेईमानी मुझे जीताने के लिये ही हो..

- देखो, तुम जीत गये ना?

- तुम्हें जानबूझकर मुझसे हारकर क्या मिलता है जो हारती हो?

- बस ऐसे ही.. तुम नहीं समझोगे..(और वो हंसने लगी)

हर हार में तुम जीत खोजती थी, चाहे वो कट्टम-कुट्टा का खेल हो या बिंदुओं को मिलाकर चौखट बनाने का.. जीतते समय भी जानबूझकर हार जाती थी और तुम्हारी खुशी देख कर मैं भी खुश हो लेता था.. कई बार जानबूझकर हारने की कोशिश करने पर भी हार नहीं पाता था, कोई ना कोई कुतर्क हमेशा तुम्हारे पास होता था हारने का.. फिर आज अचानक इस जीत से तुम्हें खुशी कैसे मिलने लगी? या फिर से मैं ही जीता हूं जिसे मैं समझ नहीं पाया और तुम खुश हो? कुछ समझ नहीं आ रहा है.. जिंदगी के कुछ प्रश्न कभी समझ नहीं आते हैं..


नोट - यह शीर्षक पूजा के चिट्ठे से लिया गया है

Related Posts:

  • Coorg - वह चाँद, जो सारी रात साथ चलता रहा Part 3सुबह जागने पर पाया कि वही रेल जो रात चाँद के साथ कदमताल मिला कर चल रहा था, सुबह दूर खड़े पेड़ के साथ रिले रेस लगा रहा था.. जो कुछ दूर साथ-साथ दौड़ते हैं … Read More
  • Coorg - एक अनोखी यात्रादफ्तर से समय से बहुत पहले ही निकल गया.. टी.नगर बस स्टैंड के पास के लिए, जहाँ मेरा एक मित्र किसी लौज में रहता है, किसी छोटे से दूकान से पकौड़े और जलेबी … Read More
  • मेरे घर के बच्चों को डराने के नायाब नुस्खेबात अधिक पुरानी नहीं है.. इसकी शुरुवात सन 2004 के कुछ साल बाद हुई, जब दीदी कि बड़ी बिटिया को यह समझ आने लगा कि डरना क्या होता है.. फिर शुरू हुई यह दास्… Read More
  • Coorg - खुद से बातें Part 2सूरज कि रौशनी मे बारिश होने पर इन्द्रधनुष निकलता है.. चाँद कि रौशनी मे बारिश होने पर भी वो निकलता होगा ना? हाँ!! जरूर निकलता होगा.. मगर रात कि कालिमा … Read More
  • दो बजिया बैराग्य - भाग छःऐसा लग रहा है जैसे मैं कुछ अधिक ही आत्मकेंद्रित हुआ जा रहा हूँ.. सुबह घर में अकेले.. दिन भर दफ्तर में अकेले.. और शाम में भी अकेले ही.. ऐसा नहीं की किस… Read More

8 comments:

  1. कुछ ऐसी हार होती हैं जिन्दगी मे जिन्हे हारने मे ही जीत होती है.

    रामराम.

    ReplyDelete
  2. ताऊ जी से सहमत हैं हम भी।

    ReplyDelete
  3. gambhir prashn hai...soch ke batayeinge...ho sakta hai na bhi batayein...par aisi haar kai baar jeet se bhi jyada sukhad hoti hai.

    ReplyDelete
  4. tum mera title aise kaise uda sakte ho? :D :D :D

    ReplyDelete
  5. मज़ा जीत मे ही नही हार मे भी होता है पी डी

    ReplyDelete
  6. पासे पड़े जो हार के वों जीत बन गए...

    ReplyDelete
  7. "मेरे हाथों पर क्यों लिख रहे हो?" मैं होता तो जवाब देता.. 'ब्लफमास्टर नहीं देखा' :P :D

    ReplyDelete