Monday, November 26, 2007

मेरे मित्र का प्रणय निवेदन

"यार! ये प्राणाय क्या होता है?", शिवेन्द्र ने चीख कर पूछा।

"क्या? मैं कुछ समझा नहीं", मैंने रसोई में रोटीयां सेकते हुये चिल्ला कर पूछा साथ में रोटीयां बेलते हुये विकास ने भी पूछा।

"प्राणाय? प्राणाय?"

"पूरी बात बताओ तब समझ में आयेगा।"

"यहां लिखा हुआ है यह एक प्रणय कथा है--नहीं, नहीं!"

"अबे प्रणय कथा का मतलब लव स्टोरी होता है, हिंदी में कहो तो प्रेम कथा", मैंने कहा।

"और ये प्राणाय नहीं, प्रणय होता है", पीछे से विकास ने भी आवाज लगायी।

"मुझे कुछ-कुछ याद आ रहा है कि बचपन में हम अप्लिकेशन(आवेदन) लिखते थे की प्रणय निवेदन है कि.....", शिवेन्द्र ने कहा।

और उसके बाद हमलोगों का ठहाका रोके नहीं रूक रहा था। शिवेन्द्र बेचारा हक्का-बक्का होकर हमें देख रहा था कि उसने ऐसा क्या कह दिया। थोड़ी देर बाद मैंने उसे कहा, "अरे यार प्रणय निवेदन नहीं, सविनय निवेदन।" और फिर उसके चेहरे पर शर्मीली सी हंसी थी। फिर हमने उसे चिढाना चालू किया कि, "तुम अपने प्रिंसिपल को प्रणय निवेदन भेजते थे क्या?"

और फिर हमारे बीच ढेर सारी ब्लाह...ब्लाह...ब्लाह...ब्लाह...

हुआ ये था कि शिवेन्द्र ने मेरे और विकास के मुंह से ययाति की बड़ाई सुन कर उसे पढने के लिये उठाया था और उसके पहले पन्ने पर ही प्रणय शब्द पढकर उलझन में पर गया था। ये बात और है कि वो अभी भी उस पुस्तक को लेकर मैदान में डटा हुआ है। आप कृपया उसका उत्साह कमेंटस के द्वारा बढाये ताकि हिंदी पाठकों कि संख्या एक और बढे। धन्यवाद। :)

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6 comments:

  1. आप कृपया उसका उत्साह कमेंटस के द्वारा बढाये ताकि एक और हिंदी पाठकों कि संख्या एक और बढे।
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    चलो कर देते हैं - कहीं वह पाठक जगत से प्रयाण न कर जाये!

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  2. उनका उत्साह बढ़ाना ज़रुरी है , प्रणय निवेदन के लिए भी और हिंदी पढ़ने के लिए भी!!;)

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  3. प्रशांत जी
    आप रोटियां बहुत अच्छी बनाते हो.. क्या गोल गोल रोटियां हैं ... :)

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  4. विष्णु सखाराम खांडेकर की 'ययाति'... पढ़े हुए बहुत दिन हो गए, शायद 8-9 साल... और अब तो ऐसा लगता है की मैं भी एक 'ययाति' हूँ... कितने भी जतन कर लो, दिल स्साला खुश होने का नाम ही नहीं लेता...!!!

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