Tuesday, April 29, 2008

चलो सुहाना भरम तो टूटा, जाना की हुश्न क्या है

कुछ दिन पहले रेडियोवाणी में गाईड से संबंधित कुछ कड़ियां पढाई जा रही थी और उसी के गीत अंतर्मन के किसी हिस्से में कहीं गूंज रहे थे जो कभी शब्दों का भी रूप लेकर होंठों से भी निकल रहे थे.. यूं ही ना जाने कैसे वे शब्द मेरे मित्र विकास के मोबाईल में भी जगह पा गई.. मैंने सोचा क्यों ना वो बेतकल्लुफी से निकले अल्फ़ाज को अपने चिट्ठे पर भी पोस्ट कर डालूं..

अब सबसे बड़ी मुसिबत ये थी की .AMR फाइल को कैसे .MP3 मे बदलूं.. इसका सबसे आसान मगर थका देने वाला रास्ता ये था की अपना माईक्रोफोन ऑन करके मोबाईल से उस गाने को बजा कर .MP3 में रिकार्ड कर लो.. और दूसरा रास्ता ये सूझा की क्यों ना कुच गूगल पर सर्च करके देखूं शायद ऐसा कोई साफ्टवेयर मिल जाये जिससे इसका कोई आसान हल मिले और आसानी से .MP3 में कन्वर्ट भी हो जाये..

रविवार को ना जाने क्यों सुबह-सुबह 6:30 नींद खुल गई जबकी पिछली रात भी देर से सोया था.. नींद तो खुल गई मगर बिस्तर से उठने का मन नहीं हुआ और लेटे-लेटे ही अपना लैपटॉप और गूगल से खेलने लगा.. अंततः लगभग 30 मिनट सर्च करने एक साफ्टवेयर मिला जिसने अपना काम बखूबी किया उस गाने को .MP3 में बदलने का.. अब अगला पड़ाव था उस गाने को पॉडकास्ट करने का.. चूंकि मैंने पहले कभी कोई आवाज को अपलोड करके पॉडकास्ट नहीं किया था सो मुझे लाईफलागर के अलावा किसी दूसरे साईट की जानकारी भी नहीं थी और लाईफलागर सही काम नहीं कर रहा था.. मैंने फिर सर्च करना शुरू किया की कहीं से कुछ असान तरीका मिले जिससे मैं इस गाने को पॉडकास्ट कर सकूं.. घंटे भर में लगभग 100 से ऊपर साईटों को डेखा और परखा मगर मेरे काम का कोई नहीं मिल रहा था..

अब सोचा इतनी मेहनत करने से तो अच्छा है किसी की मदद ले ली जाये और सबसे पहले ज़ेहन में युनूस जी का नाम कौंधा.. मैंने उन्हें फोन लगाया और अपनी समस्या बताई, उन्होंने कहा कि इंटरनेट आर्काईव डाट ओआरजी पर जाकर अपलोड कर दो और वहीं से तुम्हें प्लेयर भी मिल जायेगा.. मैंने उनके बताये राह पर चलते हुये फिर से अपना कार्य प्रारंभ किया.. मगर पहली बार अपलोडिंग का कार्य सफल नहीं हुआ.. मैंने दूसरी बार कोशिश की और एक और असफलता हाथ लगी.. तीसरा-चौथा प्रयास भी असफल होने के बाद मैंने फिर से युनूस जी का नंबर घुमाया.. और इस तरह मैं उन्हें लगभग दो घंटे परेशान करता रहा और वो भी पूरे धैर्य के साथ मुझे बताते रहे.. अंततः मैंने वो .MP3 फाईल उन्हें मेल कर दिया की आप ही चेक करके बताइये की दिक्कत कहां पर है..

फिर थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे गूगल टॉक पर पिंग किया और मुझे सारे लिंक के साथ पॉडकास्ट का HTML कोड भी दे दिया.. मतलब उन्होंने मेरा सारा काम ही कर डाला.. बाद में मुझे पता चला की मेरे कनेक्सन में कोई दिक्कत थी जिसके कारण वो फाईल ठीक से अपलोड नहीं हो पा रही थी.. आज मैं ये जो पॉडकास्ट कर रहा हूं उसका सारा श्रेय मैं युनूस जी को देता हूं.. क्योंकि ना वो रेडियोवाणी में गाईड को सुनवाते ना मैं ये गीत गाता और अगर गलती से गा भी लेता तो बिना युनूस जी की मदद के अपलोड करके पॉडकास्ट कहां करता?:)

अब आप ये गीत सुने और बतायें कैसी है? वैसे मेरा अपना फीडबैक ये है कि मैंने इस गीत को बहुत धीमा गाया है और कहीं-कहीं उच्चारण में भी गड़बड़ है.. जैसे हुश्न को मैं हुस्न उच्चारित कर रहा हूं..


codebase="http://fpdownload.macromedia.com/pub/shockwave/cabs/flash/swflash.cab#version=7,0,0,0"
id="xspf_player" align="middle" height="170" width="400">




type="application/x-shockwave-flash"
bgcolor="#e6e6e6" name="xspf_player" allowscriptaccess="sameDomain"
pluginspage="http://www.macromedia.com/go/getflashplayer"
align="middle" height="170" width="400"/>


Keyword : Song, Sung by Prashant Priyadarshi, Guide's song chalo suhana bharama to toota..

Sunday, April 27, 2008

अकेलापन और यायावरी मनुष्य का सच्चा साथी

आज फिर मैं अपनी यायावरी पर निकल गया.. मेरा सोचना है की यायावरी का असली मजा अकेले ही यायावरी करने में आता है.. अगर आपको भरोसा ना हो तो कभी आप भी करके देखिये, मेरा दावा है की आप भी मुझसे सहमत होंगे.. हर बात पर आप बारीक नजर डालेंगे जितना आप उस समय कभी नहीं डाल सकते हैं जब कोई आपके साथ हो.. हर चीज को एक अलग ही नजरिये से देखेंगे..

मेरा सोचना है की अगर आप अकेले जीवन के मजे लेना सिख लिए हैं तो आपको इस दुनिया से कोई शिकायत नहीं रह जायेगी.. अकेलापन ही आपका सच्चा साथी है जो कभी आपका साथ नहीं छोड़ता है..

आज जो मैंने देखा उसे आप मेरी नजर से देखिये..

1. ढेर सारे लोग नए-नए फैसनेबल कपडे पहने हुए और दूसरों को ऐसे देखना जैसे उसकी साडी मेरी साडी से सफेद क्यों? (आज मैं चेन्नई के सबसे बड़े शौपिंग मॉल स्पेंसर प्लाजा गया था)

2. एक देहाती जोड़े को एस्केलेटर पर चढ़ते हुए देखना.. शायद महिला के लिए ये पहला अनुभव था एस्केलेटर पर चढ़ना.. पति उसका हाथ पकर कर चढ़ने लगे तो वो महिला घबरा कर वापस आ गयी और पति देव ऊपर चढ़ गए.. वो महिला सीढ़ी से ऊपर चढ़ना चाह रही थी मगर पति जी वापस आकर फिर से उसका हाथ पकर कर ऊपर ले जाना चाहे और वो महिला घबरा कर अपने पति से लिपट गयी मगर तभी उसे ध्यान आया की वो एक भीड़ भरे जगह पर है और ये जान कर उसका शर्म से दोहरा होते जाना..
उसके बगल से एक व्यक्ति जो टी-शर्ट और थ्री-फोर्थ पहने हुए था उन्हें देखकर ऐसे तन कर उतर रहा था जैसे वो बिना डरे एस्केलेटर पर चढ़ कर कोई बहुत ही महान काम कर रहा है.. :)

3. एक डार्ट से निशाने लगाने का कम्पीटिशन होना जिसे एक बच्चे ने पूरा कर दिखाया और बांकी सारे बरे लोग उसका मुंह देखते रह गए.. क्योंकि कोई भी बड़ा आदमी उसे पूरा नहीं कर पाया..

4. एक बहुत बड़े किताब की दूकान में जाने पर वहां एक भी हिंदी की किताब का ना दिखना.. अधिकतर अंग्रेजी की किताब का होना और कुछ तमिल की किताबें.. बस.. ऊपर से सभी किताब कम से कम २५० रूपये का होना..

5. उसी दूकान में हिंदी सिनेमा की ज्यादा सीडी होना.. जो ये साफ दिखाता है की हिंदी सिनेमा का चलन तमिलनाडू में भी बहुत है.. और दूसरी बात ये की लोग हिंदी नहीं पढना चाहते हैं पर हिंदी सिनेमा देखना चाहते हैं..

नोट : मेरी अगली पोस्ट में यूनुस जी ने मुझसे ज्यादा मेहनत की है जो अभी मेरे ड्राफ्ट में परा है.. उसके बाद मैं कब लिखूंगा मुझे पता नहीं.. जब अपनी बात नहीं कह पाने की कुंठा से ग्रस्त हो जाऊँगा तब लिखूंगा.. या फिर उस कुंठा की वजह से अवसाद ग्रस्त हो जाऊं और फिर से ना लिखूं.. देखिये.. मैं चिट्ठाकारों की दुनिया को अलविदा भी नहीं कह रहा हूँ.. बस अवकाश पर जा रहा हूँ.. पर मैं यहाँ सारे चिट्ठों को पढता भी रहूँगा और उन पर टिपियाता भी रहूँगा.. ज्ञान जी की भाषा में कहूं तो "मेरे होने का दस्तावेजी प्रमाण बन रहा है यह ब्लॉग" क्योंकि जो मैं किसी से नहीं कह पाता हूँ उसे अपने ब्लौग पर डाल देता हूँ..

Keyword : Yayavari, Human Mind, Chennai spencer plaza

Saturday, April 26, 2008

पहले लड़की बनाया फिर उसे प्रेग्नेंट कर दिया

इस दुनिया में क्या-क्या नहीं होता है.. पहले तो अच्छे खासे 26 साल के खांटी जवान को लड़की बन कर काम करना परा और फिर जब उसका काम Client को पसंद आया और उसने उस लड़की से बात करनी चाही तो उसे Maternity Leave पर छः महीने के लिए भेज दिया.. ये कहानी किसी और की नहीं मेरी ही है.. :(

मैं आज-कल जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रहा हूँ वो मेरी कम्पनी के लिए बिलकुल नया प्रोजेक्ट है, Client नया है.. इस प्रोजेक्ट के लिए Client ने पहले ही कह दिया था की कम से कम 2-3 साल के अनुभवी लोगों को ही इस प्रोजेक्ट में डालें.. सो इन्होने वैसा ही किया.. एक लड़की को भी इन्होने लिया जो उस समय दूसरी कम्पनी में काम कर रही थी और Job Shift करके मेरी कम्पनी में आ रही थी.. Client के यहाँ सभी का Login ID और Password भी बन चुका था.. मगर अंत समय में पता चला की उस लड़की को उसकी कम्पनी वालों ने नहीं छोडा और वो यहाँ नहीं आ रही है..

अब यह बात इनलोगों के लिए परेशानी का सबब बन चुका था क्योंकि अब अगर यहाँ से ये कहा जाता की वो यहाँ ज्वाइन नहीं कर रही है तो मेरी कम्पनी का So Called Image खराब हो जाता.. फिर उनलोगों ने मुझसे पूछा की क्या मैं ज्वाइन करूंगा वो प्रोजेक्ट और मैंने हामी भर दी.. चूंकि ये नया प्रोजेक्ट था और कोई इसे ज्वाइन नहीं करना चाह रहा था और इसीलिए मुझ जैसे नौसिखुवे को इन्होने अपने प्रोजेक्ट में रख लिया जिसके पास 2 साल का अनुभव नहीं था..

किस्सा शुरू होता है बस यहीं से.. अब मुझे उस लड़की का ID दे दिया गया और कहा गया की तुम्हे इसी पर काम करना है.. तब से मैं उसकी ID पर ही काम कर रहा था.. ट्रेनिंग तक तो सब ठीक-ठाक रहा.. पर बाद में कहीं ये मुसिबत ना बन जाये इसलिये एक लम्बी-चौडी टीम मीटिंग के बाद ये फैसला लिया गया की उस लड़की को Maternity Leave पर भेज दिया जाए और उन्हें कहा जाए की एक नया लड़का Join कर रहा है..

ये पूरी घटना मुझे इतनी दिलचस्प लगी की मैंने उसे यहाँ चिपका दिया.. :)
बाद में पता चला की ऐसी ही परेशानी लगभग ३-४ टीम में है और अब सभी को एक साथ Maternity Leave पर भेज दिया जाए..

Friday, April 25, 2008

काश हम इश्क ही ना करते किसी से

काश हम इश्क ही ना करते किसी से..


ना किसी दराज में रखते सूखे गुलाब छुपा कर..

ना बटुवे में कोई तस्वीर ही होती..

होती एक ऐसी दुनिया जहां,

जीने की तस्वीर ही अलग होती..


काश हम इश्क ही ना करते किसी से..


कहीं अचानक टकरा जाना सड़क पर

और हफ़्तों तक न दिखना का,

मलाल भी ना होता..

कभी यूं ही निगाहें मिल जाने पर,

उनका चेहरा लाल भी ना होता..


काश हम इश्क ही ना करते किसी से..


अपने हिस्से का चुंबन लेकर

उनके वापस दौड़ जाने पर

कोई गम भी ना होता..

इस जहान में उनका साथ छूटने पर,

आंखें नम भी ना होता..


काश हम इश्क ही ना करते किसी से..




कल मैं हिन्द-युग्म के ब्लौग पर गया और वहां एक कविता पढी.. उसी पर कमेंट लिखते समय ये कविता मेरी झोली से गिर गई जिसे मैं यहां डाल रहा हूं..

Keywords : Poem By Prashant, Love

Thursday, April 24, 2008

संजीव की भाषा में मैं सनकी हूँ

ये अक्सर मुझे और हमारे सभी दोस्तों को कहता था, "प्रशान्त सनकी है.. जब तक इसे सनक सवार नहीं है तब तक ये सभी के लिए बहुत अच्छा है नहीं तो एक बार सनक सवार हो जाए तो किसी को कुछ भी नहीं समझता.. सबसे जरूरी बात ये की कोई भी ये नहीं समझ सकता है की इसे सनक कब सवार होगी.. आज जिस बात पर सनक सवार हुआ था कल उसी बात पर हंसता हुआ मिलेगा.." वैसे मैं भी इसकी बात से लगभग पूरी तरह सहमत हूँ.. लगभग इसलिए क्योंकि मेरे पास पूरी वजह होती है किसी एक बात पर सनकने की और उसी बात पर हंसने की.. :)

संजीव नारायण लाल पूरा नाम है उसका.. कुछ लोग उसे संजीव बुलाते हैं तो कुछ लोग नारायण लाल.. मगर हमारे अधिकतर मित्र उसे लाल साहब ही कहते हैं.. बहुत ही अजीव किस्म का इंसान है(कभी-कभी तो मुझे अपनी इस बात पर भी शंका होती है कि इंसान है भी या नहीं :P).. उसे आप कभी जीवट पायेंगे तो कभी अति उत्साही.. कभी महा आलसी तो कभी उजड्ड किस्म का.. मगर आप उसके जितेने करीब आते जायेंगे वैसे-वैसे आप भी उसके मुरीद होते जायेंगे.. खुद को एक कट्टर हिंदू दिखाना उसके स्वभाव में है, मगर मुझे ये भी पता है कि अगर वो किसी को मुसिबत में देखेगा तो ये कभी नहीं पूछेगा कि उसका धर्म क्या है और बिना कुछ कहे उसकी सहायता में लग जायेगा और जब तक सामने वाला उसे अपनी सहायता के लिये धन्यवाद देना चाहे उससे पहले ही उसका वो वहां से अंतर्ध्यान हो जाना उसके साधारण से स्वभाव मे मिश्रित है.. संजीव मुझे बहुत पसंद है क्योंकि मेरी नजर में यह बहुत ही अच्छा इंसान है.. पहले दूसरों के बारे में सोचना फिर अपनी खबर लेना इसके प्राकृतिक स्वभाव में है..


होस्टल के समय की तस्वीर.. हमलोग परीक्षा के समय आल्मिरा के अन्दर बैठ कर पढ़ रहें हैं.. बाएँ तरफ संजीव है और दाहिने तरफ मैं हूँ.. :D

अभी महाशय मुम्बई में हैं.. हर दिन दौड़ते हुए कम्पनी वाली बस पकड़ना इनकी फितरत बन चुकी है और आफिस पहुंचते ही हम सभी को एक मेल जरूर करेंगे की आज बस कैसे पकडी या आज कैसे बस छूटी और सुबह कैसे १० मिनट में तैयार हुआ.. मुझे अभी भी कालेज के दिन याद आते हैं जब संजीव पूरे लगन के साथ हर दिन संकल्प करता था की आज से तो पढाई शुरू कर ही देनी है मगर वो आज कभी नहीं आता था, हाँ मगर एक बात तो जरूर है की पढाई चाहे ना करे, कक्षा में अच्छे नंबर भी ना आये मगर यह दिमाग का बहुत तेज था(क्या करूं संजीव आजकल हमारे साथ नहीं रह रहे हो ना, नहीं तो मैं लिखता की है :D).. वैसे मुझे अभी भी इसकी कुछ मजेदार बात याद आती है जैसे, C Language का फ्लो-चार्ट बनाने के लिए बेचारा बिलकुल हक्का-बक्का होकर बैठा हुआ चेहरा, हर समय इसके गले में लटकने वाला मोबाइल फोन, कैसा भी टी-शर्ट पहन कर कहीं भी चले जाना, जो भी पूरे लगन के साथ करने का सोचना वो कभी ना होना.. सबसे बड़ी बात ये की अगर इसे सुबह जल्दी उठना हो तो पूरी रात नहीं सोना की कहीं सुबह उठ ना पाऊँ और एन वक्त पर ठीक उसी समय सोना जब इसे काम हो.. और महाशय एक बार सो गए तो पूरे होस्टल की घडियाँ चिल्ला-चिल्ला कर खराब हो जाए तो हो जाने दो मगर इनकी नींद नहीं टूटने वाली है.. आज भी मुझे याद है जब होस्टल का पूरा फ्लोर इसके लगाए हुए अलार्म से जग जाया करता था मगर इसकी नींद नहीं खुलती थी.. और तो और इसे रूम-मेट भी चुन कर मिला था.. दोनों उसी घंटी की कर्ण फोडू शोर में सोये रहते थे जब तक कोई गालियाँ देते हुए इसका रूम पीट कर इन्हें जगा ना दे..

अरे यार क्या क्या गिनाऊं.. दिल से कहूं तो तुम बहुत याद आते हो.. आज के समय में अगर कोई भी मित्र बिना मतलब का मुझे फोन करता है तो उसमे तुम्हारा नंबर पहला है.. नहीं तो आज हालत ये है की भले हम कितने ही अच्छे मित्र हों मगर किसी को कुछ जरूरत होती है तभी उसका फोन आता है..

बोलने में तो महाशय पक्के उस्ताद हैं.. एक बार कुछ कहने को मिल जाए तो बस तर्क क्या और कुतर्क क्या.. होस्टल के समय में हमें जब कभी अंग्रेजी के शब्दों की जरूरत होती थी तो संजीव की ही सबसे पहले खोज होती थी.. सिनेमा के शौकीन और वो भी ऐसे वैसे नहीं, हर सिनेमा को कम से कम एक बार सभी को देखना चाहिए ऐसी विचारधारा रखने वाले.. अगर संजीव की चर्चा मैं करूं और इसके बैडमिन्टन प्रेम की बात ना करूं तो चर्चा अधूरी रह जायेगी.. इसके अति उत्साही स्वभाव(जिससे मैं हमेशा परेशान रहता था) और उसी अति उत्साह में अपने छाती की हड्डी में हल्का फ्रैक्चर कराना और छः माह तक इस खेल से दूर रहना और बस हमलोगों को खेलते हुए देखना इसके लिए किसी जुल्म से कम नहीं था..

मेरे और संजीव की विचारधारा में कभी मेल नहीं हुआ.. अगर मैं कहूंगा की पूरव चलो तो ये पश्चिम जाने को तैयार मिलेगा और अगर ये कहे की उत्तर चलो तो मैं दक्षिण जाना चाहूंगा.. मगर शायद इसे भी पता नहीं है की मैं इसे कितना मानता हूँ.. कोई बात नहीं, मेरे इस पोस्ट से इसे पता चल ही जायेगा.. :)

तुम्हारे भविष्य के लिए तुम्हें ढेरों शुभाकानाओं के साथ मैं आज का ये चिटठा समाप्त करता हूँ..

Keyword : Sanjeev Narayan Lal, VIT Friends, Good Human Being..

Wednesday, April 23, 2008

Oh!! Its Lalu's Bihar??

"Where is your native place?" उसने मुझसे पूछा..

मैंने कहा, "Patna, Bihar.."

"Oh!! Its Lalloo's Bihar??" उसने कहा..

"Nope.. Who told you that its Lalu's Bihar??" मैंने उससे कहा, "Its My Bihar.."

वो अपनी आंखें गोल-गोल करके आश्चर्य से मेरी ओर देखने लगा, जैसे मेरा कहा इस दुनिया का नौवां अजूबा हो..

मैं भी इतनी देर तक लगातार काम करते रहने के कारण थोड़ा चिड़-चिड़ा सा हो गया था और थोड़ा आक्रामक भी.. मैंने उसी आक्रामक अंदाज में अपनी बात जारी रखी, "Bihar is not only about Lalu.. Bihar is not because of Lalu.. Yah, you probably say Lalu is because of Bihar.."

"But Lalu is from Bihar na(Typical Indian style english:))??" उसने थोड़ा प्रतिकार करना चाहा..

"Yes.. He is from Bihar but 70-80 Million people is also from Bihar.. Why you are not talking about those people??" मैंने कहा..

"It means you don't like Lalu?" उसका अगला प्रश्न, मानों वो अपनी हार नहीं मानना चाह रहा था..

"In some manner Lalu is good and some manner he is bad.. By the way I don't like any politician.. They all are corrupt.. Any more question??" मैंने बात खत्म करने की कोशिश की..

"No....." उसने उदास चेहरा बनाते हुये कहा पर उसके चेहरे पर मैं अब भी वही नौवां आश्चर्य वाला भाव पढ रहा था.. :)

Tuesday, April 22, 2008

Marriage Anniversary

आज मेरे पापा-मम्मी का वैवाहिक वर्षगांठ है..

इससे ज्यादा मुझे कुछ नहीं कहना है आज..

मुझे उनकी बहुते याद आ रही है..

I am missing You Papa-Mummy... :(

Sunday, April 20, 2008

यूनुस जी की सादगी - अंतिम भाग

मंगलवार को जब सुबह १० बजे यूनुस जी का फोन आया था तब उन्होने मेरी आवाज सुन कर सबसे पहले कहा की आपकी आवाज तो बहुत ही अच्छी है, आप गलत जगह पहुंच गए हैं.. एक आवाज के धनी व्यक्ति के मुंह से ये सुनना एक अलग ही बात है.. उनसे ये सुन कर मेरी हालत लगभग वैसी ही हो गई थी जैसे की किसी स्कूली बच्चे की हो जाए अगर उसे सचिन तेंदुलकर आकर कहे की तुम बहुत बढ़िया क्रिकेट खेलते हो.. :) मैं बचपन से ही उनकी आवाज सुनता आ रहा हूँ, और उनकी आवाज बहुत पसंद भी करता था.. कई बार दोस्तों के बीच किसी रेडियो उद्घोषक की नक़ल करते हुए कुछ कहता था तो या तो अमीन सयानी या फिर यूनुस खान की ही नक़ल करता था.. हाँ ये बात मैं जरूर स्वीकार करूंगा की पहले मैं रेडियो के उद्घोषकों के नामो को उतने ध्यान से नहीं सुनता था जितना आज सुनता हूँ, मगर यूनुस खान का नाम तो जरूर याद रहता था..

जब पहली बार मैंने रविवार की रात उनसे बात की तो वो बात मिनट भर से भी कम समय के लिए हुई, मगर उनसे बात करने के बाद मेरी पहली प्रतिक्रिया मेरे दोस्तों ने सुनी जो कुछ यूं थी.. "अरे यार पता है मैंने अभी यूनुस जी से बातें की.. फोन पर भी उनकी आवाज बिलकुल वैसी ही थी जैसी की रेडियो से आती है.. बिलकुल मख्खन जैसी.. :D"

जब एक बार उनसे बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो बात कहीं से कहीं पहुंच गया.. पहले मैं सोच रहा था की रेडियो और ब्लौग के अलावा और क्या बाते करूंगा, मगर यहाँ तो चेन्नई, मुम्बई, रेडियो, ट्रैफिक और ना जाने क्या क्या बाते निकलती चली गई.. हमारे बीच की बातें औपचारिकता से निकल कर कब अनौपचारिकता पर पहुंच गई इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं की मैंने उन्हें बीच में किसी बात पर ये भी कहा की "जब आपको मुझे डांटने का मौका मिले तो डांट दीजियेगा.. मैं बुरा नहीं मानूँगा.. वैसे भी किसी बड़े से डांट खाए बहुत दिन हो गए हैं.. :)"

ऐसा लग ही नहीं रहा था की मैं उनसे पहली बार बात कर रहा हूँ, सच्ची बात कहूं तो अपने करीबी मित्रों से भी आजकल इतनी लम्बी बात नहीं हो पाती है फोन पर जितनी की उनके साथ हुई.. और उनसे बात करके इतनी ख़ुशी हुई की मैं उस दिन अतिव्यस्त होते हुए भी पूरे उत्साह के साथ सारा काम किया और उसी उत्साह के साथ घर भी लौटा..

उन्होने मुझे मुम्बई आने का न्योता भी दिया, अब विविध भारती को अन्दर से देखने का मौका भला मैं क्यों चुकाने वाला हूँ :D सो झटपट न्योता स्वीकार करना चाहा मगर अपनी विवशता भी उन्हें बताई की अगर कुछ दिनों की छुट्टी मिलती है तो घर से इतनी दूर रहता हूँ की सीधा घर भागने का ही ख्याल आता है.. वैसे भी मुम्बई में कई अजीज दोस्त हैं जो की अगर मैं कभी मुम्बई जाऊं तो अपने पलकों को बिछा कर मेरा स्वागत करने को तैयार मिलेंगे.. और अब तो यूनुस जी भी हैं.. :)

Keyword : Yunus khaan, Radio, First talk..

यूनुस जी की सादगी - पार्ट 1

यूनुस जी से पहले मैं अपने जीवन मे अभी तक किसी भी ऐसे व्यक्ति से नही मिला था जिसने पहली ही मुलाक़ात मे मुझे प्रभावित किया हो, मगर कहीं ना कहीं से तो शुरूवात होनी ही थी और ये काम यूनुस जी ने किया और वो भी ऐसे मे जबकि मेरा स्वभाव कुछ ऐसा है कि में किसी के भी व्यक्तित्व से आमतौर पर प्रभावित ही नही होता भले ही वो कितने बडे आदमी क्यों ना हों.. मुझे प्रभावित करने के लिए बड़ा होना कोई मायने नही रखता है, हाँ एक अच्छा मनुष्य होना जरूर मायने रखता है..

मैंने कुछ दिन पहले उन्हें एक इ-मेल किया था जिसमे उनसे बात करने की इच्छा जाहिर की थी और जवाब मे उन्होने बहुत ही प्यार भरा जवाब दिया था की जब चाहो तब मुझे फोन कर सकते हो और साथ मे अपना और अपने घर का नम्बर भी दिया था.. मगर मुझमे कुछ संकोच और थोडी सी झिझक थी जिसके कारण उन्हें फोन करने मे लगभग २ सप्ताह का समय ले लिया.. बात करने से ज्यादा संकोच इसका था की पता नही वो कब फ्री रहते होंगे, मैं कहीं असमय फोन करके उनके कार्य मे विघ्न तो नही डाल दूंगा..

मैंने पिछली रविवार को उन्हें रात के समय फोन किया.. बस हल्की सी जान-पहचान के बाद उन्होने कहा की मेरे पिताजी का फोन आ रहा है सो मैं तुम्हे बाद में फोन करता हूँ.. फिर उस दिन उनका फोन नहीं आया.. अगले दिन मुझे दिन के समय उनका कॉल मिला, उस समय मैं एक मीटिंग में था.. सामन्यतः मैं किसी भी मीटिंग में कोई भी फोन नहीं उठाता हूँ(जबकि ऐसी कोई वर्जना नहीं होती है की आप किसी का फोन ना उठाओ), मगर फिर भी मैंने उनका फोन उठाया और हेल्लो...हेल्लो... बोलता रह गया.. उधर से कोई भी आवाज नहीं आ रही थी.. मैंने मीटिंग खत्म होने के बाद उन्हें फोन करना चाहा मगर उनका फोन नहीं जा रहा था.. और फिर कुछ ऐसी व्यस्तता की रात लगभग ११ बजे घर पहुंचा और उस समय कुछ भी होश नहीं था की किसी को भी फोन करूं और वैसे भी सभी मेरी तरह निशाचर नहीं होते हैं.. :)

यूनुस जी के ब्लौग से ही उठाया हुआ उनका चित्र
बाकी अगले भाग में.. :D

Keywork : Radio, Yunus Khan, First Talk

Saturday, April 19, 2008

Do you believe in Ghost??

कल... नहीं-नहीं आज सुबह जब आफिस से लौटा तो सुबह के ३:३० हो रहे थे.. मैंने इससे पहले कभी इतना समय कार्यालय में नहीं बिताया.. पिछला पूरा सप्ताह कुछ ऐसे बिता जैसे अपनी कोई निजी जिन्दगी ही ना हो.. उधार पर दे रखा हो अपनी कम्पनी वालों को.. पूरे १९ घंटे लगातार कंप्यूटर के मानीटर पर नजर गड़ा कर देखते जाना.. पहले Code को Code Coverage और Ultra Edit नामक Tool से Check करना की कितना प्रतिशत इस प्रोग्राम का Code Execute हो रहा है और अगर नहीं हो रहा है तो क्यों नहीं हो रहा है.. फिर उसका Documentation करना..

अनायास मुझे एक चुटकुला याद आ रहा था.. जिसमे सांभा आज के IT युग में गब्बर से कहता है की सरदार मैंने आपका Code लिखा है और गब्बर जवाब में कहता है की ले अब Documentation कर..

खैर वो भी एक दुस्वप्न की तरह गुजर गया लगता है, या फिर मैं गलत हूँ? मुझे तो पक्का यकीन है कि मैं गलत हूँ.. मैंने अपने अभी तक के कंप्यूटर कैरियर में तो यही पाया है कि अगर किसी के पास काम है तो बहुत है या फिर नहीं है तो वो किसी निकम्मे कि तरह बैठा रहता है..

कल रात एक मजेदार घटना भी घटी.. जब मैं और मेरा बास (Project Leader) बैठ कर काम कर रहे थे तभी मेरे Cubical के पास वाले ट्यूब लाईट का कवर निकल कर गिर गया.. उस समय रात के २ बज रहे थे और मेरे पूरे फ्लोर पर मैं और मेरे बास के अलावा कोई नहीं था.. मैं और मेरा बास एक दूसरे को देख कर बस मुस्कुरा दिए और फिर काम में लग गए.. थोडी देर बाद मैंने काम करते-करते अपने Project Leader से कहा, "Srini(his name), do you believe in GHOST?" वो अजीब तरह से मुस्कुराते हुए (या यूं कहें घूरते हुए मुस्कुरा कर) बोले, "At this time do you want to make fun? Still do you have that much energy?" मैंने कुछ नहीं कहा बस मुस्कुराया और फिर से काम में लग गया.. लगभग १५ मिनट के बाद उन्होने कहा, "Yeh!! I believe..." शायद तभी से उनके मन में बस यही चल रहा होगा..:D या शायद मैंने उन्हें डरा दिया.. जो भी हो मुझे तो मजा आ गया.. ;)

Keywords : Project Leader, Documentation, Office, Code Coverage, Cybernet-Slash Support Chennai, Ultra Edit.