Thursday, June 11, 2009

कहानी मां की

मुझे याद नहीं है कि मैंने यह कब लिखा था.. बस इतना ही याद है कि रात में किसी बेख्याली में मम्मी को एस.एम.एस.मे यह लिखकर भेजा था.. आज यही सही..

मां याद है तुम्हें?
कैसे तुम्हारी कहानियों में,
नायक हमेशा जीतता रहा है..
खुद को जाने कितनी ही बार
उस नायक के स्थान पर
देख चुका हूं मैं..
लड़ाई में मगर अकेला पर जाता हूं..
इस नायक का हौशला भी
टूटता सा लगता है..
तुम आ जाओ मां..
आज फिर उन कहानियों कि जरूरत सी है..

Tuesday, June 09, 2009

दीवानगी ऐसी कि परदे पर भगवान देख रहे हों

कुछ दिन पहले मेरे इस लेख को अजय जी ने इसे अपने चवन्नी छाप नामक ब्लौग में स्थान दिया था.. मगर मेरे कुछ मित्र जो चवन्नी छाप ब्लौग नहीं पढ़ते हैं, उनके लिये मैं इसे अपने ब्लौग पर भी पोस्ट कर रहा हूं..
अजय जी को धन्यवाद सहित..



यूं तो तमिलनाडु जुलाई सन 2004 में आया था.. मन में कई बातें लेकर जैसे वहां तमिल वालों के बीच रहने में दिक्कत होगी, भाषाओं के बीच के अंतर्द्वंद को झेलना होगा.. मगर यहां आकर ऐसा कुछ नहीं लगा क्योंकि सभी मित्र उत्तर भारत के ही थे.. इसका एक तरफ फायदा हुआ तो वहीं दूसरी ओर घाटा भी हुआ.. यहां की संस्कॄति को भी ठीक से समझ नहीं पाया..

सिनेमा के मामले में भी कुछ हद तक यही हाल रहा.. दक्षिण में होते हुए भी यहां के सिनेमा कल्चर से कोसों दूर रहा.. बस गीत संगीत सुनता था, वो भी इसलिये क्योंकि होस्टल में रहते हुए कभी-कभार यहां के गीत किसी कमरे से पूरी आवाज में सुनाई दे जाता था.. शुरूआत में कुछ तमिल गाने भी खूब सुने,जिनमें अधिकतर तमिल से हिंदी में डब किये हुए गीतों के ओरिजिनल साउंड ट्रैक होते थे या फिर धूम-धड़ाके वाले गीत.. अब चूंकि तमिल समझ में आती तो थी नहीं सो संगीत पर ही सब कुछ टिका हुआ था.. ये कुछ ऐसा ही है जैसे अधिकतर छोटे शहरों में रहने वाले भारतीय वेंगाब्वाज को सुनना पसंद करते हैं, मैं भी अपवाद नहीं हूं इनमें.. यहां आकर ये भी जाना कि हिमेश रेशमिया यहां के लोगों का सबसे प्रिय संगीतकार है, कुछ-कुछ उसकी वजह भी वही धूम धड़ाका है..

फिर जनवरी 2007 में चेन्नई आ गया अपने अंतिम सेमेस्टर के प्रोजेक्ट के लिये.. मेरे साथ मेरा मित्र शिवेन्द्र भी था.. यहां आकर भी यहां हम नहीं होते थे.. क्योंकि लगभग हर साप्ताहांत पर हम वापस वेल्लोर, अपने कॉलेज को निकल लेते थे और पूरे सप्ताह भर घर से ऑफिस और ऑफिस से घर मे ही निकल जाता था.. छः महीने फिर से ऐसे ही निकल गये, मगर इस बार के छः महीने में कुछ तमिल मित्र बनाने का मौका मिला.. वे लोग भी अपना अंतिम सेमेस्टर का प्रोजेक्ट पूरा करने के लिये यहां आये थे.. उनसे कुछ तमिल सिनेमा की जानकारी भी मिली.. मगर कुछ ऐसा नहीं जिसका उल्लेख किया जा सके..

दोबारा चेन्नई आना हुआ 2007 जून में, जब नौकरी ज्वाइन करने के लिये बुलाया गया.. संयोग कुछ ऐसा कि जिस दिन मुझे ज्वाइन करना था उसी दिन रजनीकांत का "शिवाजी द बॉस" रिलीज हो रही थी.. सुबह-सुबह जल्दी जाना था सो कुछ पता नहीं चला, मगर जहां हमारा स्वागत समारोह रखा गया था वहीं एक मित्र ने बताया कि वो इस सिनेमा को किसी भी हालत में जल्दी देखना चाहता था मगर अगले एक महीने तक की सभी टिकटें बुक हो चुकी है.. सो वो रात के 1 से 4 का शो देखकर सुबह सात बजे यहां पहुंच रहा है.. वो तारीख कभी नहीं भूल सकता हूं, आखिर पहली नौकरी का पहला दिन जो था.. :) वो 15 जून था.. उस दिन शाम में घर लौटते समय देखा कि घर के पास बहुत भीड़ थी, लोग लम्बी-लम्बी कतारों में खड़े थे.. थोड़ी देर बाद समझ में आया कि मेरे घर के ही पास में एक सिनेमा हॉल है और वहां शिवाजी द बॉस देखने के लिये इतनी भीड़ है.. मैंने सोचा कि ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ते रहेगी ये भीड़, मगर नहीं बिलकुल उतनी ही भीड़ अगले दो महीने से भी ज्यादा दिनों तक रही.. तब जाकर समझ में आया कि रजनीकांत क्या चीज है तमिलनाडु के लिये..

चेन्नई में रहते हुए कुछ दिन होने के बाद मुझे पता चला कि मेरे घर के पास ही एक फिल्म स्टूडियो भी है, जिसका नाम ए.वी.एम. स्टूडियो है.. अब जबकि चेन्नई में ही हूं तो एक बार मुझे शिवाजी द बॉस भी देखने का मौका मिला और तब जाकर पता चला कि ये सिनेमा भी ए.वी.एम. स्टूडियो में ही बना है.. कुछ तमिल मित्रों से छानबीन की तो ये भी पता चला कि दूर-दराज के देहाती इलाकों से आने वाले लोगो चेन्नई आते हैं वो एक बार जरूर ए.वी.एम. स्टूडियो देखने की चाहत रखते हैं..

यहां दक्षिण भारत आकर मैंने जो सबसे पहला सिनेमा देखा उसका नाम था "अनियन", जिसे बहुत बाद में हिंदी में भी डब करके लाया गया था "अपरिचित" के नाम से.. उस समय के मुताबिक मुझे वह एक अच्छी एक्शन फिल्‍म लगी थी.. मगर वही बाद में जब हिंदी में आया तब वही सिनेमा मैं हिंदी में एक बार भी पूरा नहीं देख पाया था.. दूसरी तमिल फिल्‍म जो मैंने देखी थी उसकी छाप मेरे मन पर अभी तक है.. उसका नाम था "गिली".. किसी भी फार्मूला सिनेमा में जो कुछ भी हो सकता है, वह सभी कुछ उसमें था.. एक अच्छी और मशालेदार कहानी.. शानदार एक्शन, जिसके अंत में तमिल स्टाइल का एक्शन भी देखने को मिला(अरे वही, एक घूसा लगने पर हवा में चार-पांच बार गोते खाना.. :)) शानदार गाने(उत्तर भारतियों को गिली के गाने अच्छे लगने के पीछे इसका तेज म्यूजिक है और साथ ही एक और कारण होता है वह है उदित नारायण की आवाज..) यहां तक कि अभी भी कोई मुझे कोई तमिल गाना गाने को कहता है तो इसी सिनेमा का एक गीत "अप्पड़ी पोड़े, पोड़े" ही मुंह से निकलता है.. मुझसे मेरे कई तमिल मित्र यह भी शिकायत कर चुके हैं कि तुम सभी उत्तर भारतीयों से कोई भी तमिल गीत गाने को कहो तो यही गीत गाते हो.. :) "गिली" की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि इसमें तेजी बहुत अधिक थी और डायरेक्शन पर बहुत अच्छे से काम किया गया था..

यहां लोगों कि दीवानगी सिनेमा के प्रति कुछ ऐसी है जैसे वे भगवान का ही एक रूप हों.. जैसा वो परदे पर अपने भगवान को ही देख रहें हों.. ऐसी दीवानगी हमें उत्तर भारत में शायद ही देखने को मिले..

Saturday, June 06, 2009

ना फुरसतिया जी को फुरसत, और ना मुझे

फुरसतिया जी चेन्नई आये और चले गये.. लगभग 7 दिन पहले अनूप जी का फोन आया और वो अपने चिर-परिचित अंदाज में बोले, "पीडी, मैं ये देखने चेन्नई आ रहा हूं कि सच में तुम्हारा पैर टूटा है या बस नाटक कर रहे हो?" मैंने तुरत फुरत में कारण जानना चाहा, फुरसतिया जी को चाहे कितनी भी फुरसत हो मगर इतनी दूर चेन्नई बस फुरसत के पल बिताने के लिये आने से तो रहे..

खैर, उन्होंने भी उत्तर देने कि औपचारिकता निभाते हुये तुरत कहा कि बेटे का काऊंसेलिंग है, उसी के लिये आ रहा हूं.. अगला प्रश्न भी तैयार था, "किस कॉलेज में?"
"कोई वी.आई.टी. करके कॉलेज है."

अब मुझे तो पता नहीं कि बांछें कहां होती है, मगर जहां भी होती है वो वहीं पर खिल गई.. आखिर खिलती भी क्यों ना? आखिर मेरे ही कॉलेज में वो अपने बेटे को प्रवेश दिलाने ले जा रहे थे.. अब जल्दी से मैंने उनका प्लान पूछा और उनका सारा प्लान जानने के बाद वो बांछे जैसे खिली थी वैसे ही मुरझा भी गई.. क्योंकि उनका सारा प्लान सप्ताह के कार्य दिवस के बीच ही था.. मतलब मुझे दिन भर फुरसत नहीं और अगर रात में भी जल्दी निकलना हो तो अपने बॉस को कई तरह के तर्क देना..

खैर अनूप जी(अरे वही फुरसतिया) अपने बेटे के साथ 2 जून को चेन्नई आये और अगले ही दिन वेल्लोर के लिये निकल लिये.. दिन भर वहां व्यस्त रहने के बाद शाम में वापस आये, उनके बेटे को वहां प्रवेश भी मिल गया और मेरे मुताबिक वी.आई.टी. के कुछ अच्छे ब्रांचों में से एक ब्रांच भी मिल गया..

अब 4 जून भी आ गया, जिस दिन उन्हें जाना था, और 4 कि शाम जल्दी ऑफिस से निकलने के चक्कर में 3 को देर रात तक काम भी करना पड़ा.. "देखिये फुरसतिया जी, केतना कष्ट उठवायें हैं आप हमको.. :)" अब 4 को दिन भर वह क्या किये यह आप उनसे ही जाकर पूछिये.. हम तो उसके आगे का हाल सुनाते हैं..

संयोग से मेरे गुरू जी(अरे वही, बॉस) को हैदराबाद जाना था सो वो जल्दी निकल लिये.. अब मेरे लिये शाम 7.30 मे ऑफिस से निकलना थोड़ा आसान हो गया.. हम निकलने से पहले पूछे, "कहां हैं आप और कहां मिलना है?"
"हां पीडी, तुम एक काम करो.. बॉम्बे हलवा सेंटर पर आ जाओ.." जैसे वो फोन पर बोलते हैं, बिलकुल उसी स्टाईल में लिखे हैं.. ;)
उन्होंने कहने को तो कह दिया कि बॉम्बे हलवा सेंटर पर आ जाओ, मगर हमें यह भी तो पता होना चाहिये कि यह है कहां? वैसे फुरसतिया जी इतना कांफिडेंट होकर बोके थे कि हमें लगा बहुत फेमस जगह होगी, जिसके बारे में फुरसतिया जी को पता है मगर मुझे चेन्नई में रहते हुये भी नहीं पता.. उनके बताने के तरीके से तो ऐसा लग रहा था कि वह हलवा सेंटर मेरे घर के नुक्कड़ पर ही है, और मैं ऐसे ही आ जाऊंगा.. :D अब हमने अपने कुछ उन दोस्तों से उसका पता पूछा जो चेन्नई में ही पैदा हुये हैं और यहीं मरने कि तमन्ना भी रखते हैं.. मगर नतिजा सिफ़र.. किसी को कुछ भी नहीं पता..

सो फिर से मैंने फोन लगाया, और पूछा कि यह है कहां? उन्होंने अपने मित्र से पूछ कर बताया कि ईगा थियेटर के पास है.. चलो कम से कम ईगा थियेटर को चेन्नई में रहने वाला लगभग हर उत्तर भारतीय जानता है, कारण यह चेन्नई के उन चंद सिनेमा हॉल में से है जहां हिंदी सिनेमा लगता है..

मैं सोचने लगा, अब वहां कैसे जाऊं? अगर सार्टकट से जाता हूं तो ट्रैफिक बहुत मिलेगा.. सो थोड़ा लौंग कट ही मारा जाये.. ट्रैफिक थोड़ा कम मिलेगा.. अब मैंने पूरा माऊंट रोड(चेन्नई का लाईफ लाईन कह सकते हैं जैसे दिल्ली में रिंग रोड) घूम कर पूनामल्ली हाई रोड पकड़ा और ईगा थियेटर पहूंचकर फिर से फोन लगाया.. अब पता चला कि हम जिस ओर से आ रहे हैं उसी तरफ ईगा थियेटर से 2-3 किलोमीटर आगे है.. हमने यू टर्न मारा और सीधा बॉम्बे हलवा हाऊस(असली नाम बॉम्बे हलवा सेंटर नहीं, बॉम्बे हलवा हाऊस है) जाकर ही माने..

वहां फुरसतिया जी भी मिल गये.. उनको प्रणाम करने लगे तो उन्होंने गले लगा लिया.. :) अब तक उन्हें बहुत देर हो चुकी थी, सो बॉम्बे हलवा हाऊस के अंदर ना जाकर सीधा चेन्नई सेंट्रल(अजी वही रेलवे स्टेशन) जाने का प्रोग्राम बन गया.. मैं बाईक से आगे-आगे, फुरसतिया जी अपने बेटे के साथ ऑटो पर पीछे-पीछे.. इतने में अचानक मूसलाधार वर्षा.. मुझे संभलने का बस इतना ही समय मिला कि मैं अपनी सारी जरूरी कागजात अपने बैग में रखे प्लास्टिक कि थैली में डाल सकूं.. बस मैंने सारा सामान उसके अंदर डाला और भींगते हुये पहूंचा स्टेशन..

चेन्नई सेंट्रल पर मुझे सबसे ज्यादा जो बात परेशान करती है वह ये कि बाईक कैसे पार्क करूं? थोड़ी सी जगह, उसी में सभी अपनी अपनी मोटरसाईकल लेकर जुटे रहते हैं.. मेरे साथ और बड़ी परेशानी यह होती है कि 150 किलो कि बड़ी गाड़ी उस छोटे से जगह में कैसे घुसाऊ? खैर जब तक मैं पार्क करता तब तक अनूप जी भी वहां पहूंच गये और मेरे लिये प्लेटफार्म टिकट भी ले लिये..

अब जाकर थोड़ा चैन से उनसे बाते हुई, और वहीं पर उनके बेटे से भी मिला.. बच्चा जिन कपड़ों में था, उन कपड़ों में जिस मात्रा में अधिकतम स्टाईल मारा जा सकता था, उतना स्टाईल में था.. :D वैसे मुझे इसमें कोई ऐतराज नहीं है.. बच्चा था बहुत ही शालीन(कम से कम अपने पापा के सामने..) :D सौमित्र नाम है अनूप जी के बेटे का..

हमलोग वहीं ईडली खाये.. फुरसतिया जी ने मुझे कानपुरिया मिठाई भी खिलाई.. उन्होंने पूरा डब्बा मेरे सामने खोल कर रख दिया और मैंने जैसे ही एक मिठाई ली वैसे ही उसे अंदर रखने लगे.. मगर हम भी ठहरे मैथिल आदमी(अब इतना भी नहीं समझे? अरे, मिथिलांचल के रहने वाले), तुरत उनसे डब्बा ले लिये.. अब किसी को साल भर के बाद मोतीचूर के लड्डू मिले तो भला वह क्यों और किसके लिये छोड़ेगा? :D

हमने अपने ब्लौग दुनिया में बहुत डायरियां पढ़ी है.. दुर्योधन की डायरी जो शिव भैया लिखते हैं, वो तो इतिहास बना ही रहा है.. खुद हमने भी एक लड़की कि डायरी लिख डाली थी.. जब इतनी डायरी लिखी-पढ़ी जा चुकी है तो फुरसतिया जी ने सोचा होगा कि पीडी को "एक नौकरानी कि डायरी" भी पढ़ा ही देते हैं.. उन्होंने मुझे दो किताबें भी भेंट की -
"एक नौकरानी कि डायरी"
"नेकी कर अखबार में डाल"


इसमें से "नेकी कर अखबार में डाल" के लेखक तो हमारे ब्लौग दुनिया में भी धमाल दिखाते ही रहते हैं.. अजी वही आलोक पुराणिक जी.. पिछले साल इनसे भी मिलने का सौभाग्य पंगेबाज जी और मैथिली जी के सौजन्य से मुझे प्राप्त हो चुका है..

4 कि शाम में जब मैं अनूप जी से मिलने को निकलने ही वाला था उसी समय शिव जी का फोन भी आया, वह यह जानने को उत्सुक थे कि फुरसतिया जी से मिले या नहीं? हम उन्हें बताये कि बस उन्हीं से मिलने के लिये निकल ही रहे हैं..


यह फोटो अंधेरे का शिकार हो गई है.. :(

बस थोड़ी देर में कुछ मिनटों कि देरी से ट्रेन भी वहां से रवाना हो गई.. कुल मिला कर अनूप जी से पहली बार मिलना बहुत ही सुखद रहा.. कुल मिलाकर मैं बस इतना ही कह सकता हूं कि जैसा उनका लेखन है और जिस प्रकार से वह फोन पर बतियाते हैं, उससे कुछ भी अलग नहीं है.. वैसे ही खुशमिजाज, वैसा ही उनका सेंस ऑफ ह्यूमर.. कुल मिला कर बहुत ही बढ़िया अनुभव रहा उनसे मिलने का.. :)

दो दिन देर से छापा इसे.. कारण - हमने सोचा कि फुरसतिया जी के बारे में कुछ भी लिखने से पहले पूरा फुरसत निकालो, और वह फुरसत आज ही मिली है.. :)

Wednesday, May 27, 2009

बाऊ भैया अंततः बाऊ पप्पा बन ही गये

हमारे एक भैया हैं(बड़े चाचा के लड़के).. यूं तो उनका पूरा नाम प्रभाष रंजन है मगर हम उन्हें बाऊ भैया के नाम से ही जानते हैं.. हम सभी भाई-बहनों में सबसे बड़े, और मुझसे छः साल बड़े हैं.. अभी भारतीय जल सेना, मुंबई में कर्यरत हैं..

मैंने जब से होश संभाला है तब से उन्हें घर में देखा था, वो हमलोगों के साथ ही रहते थे.. फिर एक दिन अचानक से दरभंगा(जहां मेरा गांव है) के लिये निकल गये.. स्वभाव के सीधे-साधे, महाआलसी(इतना कि अगर एक जगह पसर जायें तो बस! उन्हें उठाना असंभव).. आम तौर पर गुस्साते नहीं हैं मगर जब गुस्सा आया तो आगे-पीछे कुछ भी नहीं समझते हैं.. फौजी होते हुये भी स्वभाव में बहुत कोमलता है इनके..

अक्सर जब कभी भी हम गांव में होते थे तो इन्हें मैं अक्सर देखता था कि अपने भतिजों(गांव वाले रिश्तों से) को अक्सर धमकाते रहते थे कि मुझे बाऊ चच्चा नहीं, बाऊ पप्पा बोलो.. और जब वे बाऊ पप्पा बोलते तो बस भाभी को चिढ़ाना शुरू..

कल रात मुझे भैया फोन किये और बोले, "एक खुशखबरी है, बाऊ भैया की तरफ से.."
मेरे मुंह से सीधा निकला, "बेटा या बेटी?"
भैया बोले, "बेटी.." और आगे बोले "बेटा तो है ही, बेटी कि चाहत भी पूरी हो गयी.."
मैंने कहा, "आपसे बाद में बात करता हूं, पहले बाऊ भैया को फोन कर लूं.."

फिर बाऊ भैया को फोन लगाकर उनसे कहा, "तो फाईनली आप बाऊ पप्पा बन ही गये ना?" उनके मुंह से खुशी से कुछ निकल नहीं रहा था.. वह लगभग आह्लादित सी मुद्रा में थे..

मेरे घर में मेरी पीढ़ी के अगर सिर्फ भाईयों कि बात की जाये तो बाऊ भैया सबसे बड़े हैं, उसके बाद मुन्ना भैया आते हैं, उसके बाद मेरे भैया और फिर मेरा नंबर है..

Friday, May 22, 2009

अथ श्री रजिस्टर कथा

सुबह-सुबह पूजा कि बक-बक में आप सभी ने पढ़ा होगा "दास्ताने लेट रजिस्टर(पढ़ना ना भूलें, नहीं तो इस कथा का पुण्य पुरा नहीं मिलेगा)".. तो एक रजिस्टर कथा मेरी तरफ से भी सुन ही लें.. इसे सुनने वाले को 10 दिनों तक किसी भी प्रकार के रजिस्टर से छुटकारा मिल जाता है.. ना तो उसे किसी रजिस्टर पर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं और ना ही किसी अन्य प्रकार के रजिस्टर को लेकर इधर-उधर भटकना पड़ता है.. इसे जोर-जोर से उच्चारण समेत पढ़कर दूसरों को सुनाने पर 100 दिनों तक रजिस्टर नामक कष्ट से मुक्ति मिल जाती है..

बहुत समय पहले कि बात है.. चेन्नई नामक शहर में प्रशान्त नाम का एक मनुष्य निवाश करता था.. उसे रजिस्टर देव पर कोई आस्था नहीं थी.. वह अपना हर कार्य कंप्यूटर नामक दानव कि सहायता से करता था.. वह हर दिन घर से ऑफिस के लिये निकलने से पहले ध्यानपूर्वक अपने ऑफिस जाने वाले फौर्मल कपड़े पहनता था और ध्यान से अपना आई.डी.कार्ड साथ में रखता था.. जिससे कि उसे रजिस्टर पर सही ड्रेस कोड में ना आने का कारण या फिर अल्पकालिक आई.डी.कार्ड जारी करवाने के लिये रजिस्टर में कुछ ना लिखना पड़े..

इसी तरह दो साल गुजर गये और उसे कभी भी रजिस्टर पर कुछ भी नहीं लिखना पड़ा.. इससे उसमें अहं कि भावना जागने लगी.. धीरे-धीरे वह समझने लगा कि वह रजिस्टर डेवता से भी ऊपर उठ गया है.. वो जिस किसी के गले में अल्पकालिक आई.डी.कार्ड देखता उसका मन ही मन मजाक उड़ाता.. किसी को जूते में नहीं देखता तब भी उसकी वही मनोदशा होती..

उसके इस व्यवहार से एक दिन रजिस्टर देवता रूष्ट हो उठे और उन्होंने श्राप दे डाला.. उनके श्राप के कारण एक रात दुर्घटना में उसके पैर टूट गया और अगले दिन से वो भी बिना जूते के चप्पल में जाने लगा.. 10-15 दिन तो यूं ही गुजर गये, उससे किसी गार्ड ने चप्पल में आने का कारण रजिस्टर में लिखने को नहीं कहा और इससे उसे लगने लगा कि ड्रेस कोड वाला रजिस्टर यूं ही फालतू का रखा हुआ है..

रजिस्टर देव फिर कुपित हो उठे.. और अगले ही दिन एक गार्ड ने उसे रोक कर बोला कि "चप्पल में आये हैं आप, रजिस्टर पर इसका कारण लिखो".. प्रशान्त ने कहा,"मैं अगले 2 महिनों तक ऐसे ही आने वाला हूं, क्या हर दिन कारण लिखूंगा?" गार्ड ने बोला, "हां, लिखना होगा.." प्रशान्त ने उत्तर दिया, "हर दिन एक ही चीज लिखना ठीक नहीं है, मैं तुम्हारे हेड से बात करना चाहता हूं.." गार्ड ने बहाना बनाया और बोला, "मेरे बॉस अभी यहां नहीं हैं.. सो आपको तो लिखना ही होगा.. यही तो हमारी ड्यूटी है.." प्रशान्त ने कहा, "जब यही तुम्हारी ड्यूटी है तो यह ड्यूटी आज 20 दिनों के बाद याद आ रहा है?" बेचारे प्रशान्त को पता नहीं था कि यहां गार्ड कि कोई गलती नहीं थी.. यह सब तो रजिस्टर देवता का कोप था जो उसे भुगतना पर रहा था.. आगे प्रशान्त ने अपने बैठने कि जगह का पता और फोन नंबर देते हुये कहा, "मैं अभी नहीं लिख रहा हूं, जब तुम्हारे बॉस आ जायें तब मुझे फोन कर लेना.."

5 मिनट के बाद ही फोन आया, उसके बॉस ने कहा कि गार्ड कि गलती थी कि उसने पिछले 20 दिनों में एक बार भी नहीं रजिस्टर में लिखने को नहीं पूछा.. मगर आपको उसमें तो लिखना ही होगा..

अब तक वत्स प्रशान्त को रजिस्टर देवता कि महिमा का ज्ञान हो चुका था.. उस दिन से लगातार वह 5 दिनों तक रजिस्टर देवता का गुण गाया और हर दिन गार्ड के बिना पूछे ही खुद से मांग कर रजिस्टर में अपने चप्पल और कारण वाले भाग में "लेग फ्रैक्चर" के बारे में लिखता रहा..

अंततः एक दिन रजिस्टर देव खुश हुये और उन्होंने एडमिन वालों कि आंखें खोल दी.. उस दिन से एक नया नियम बन गया कि अगर किसी के साथ ऐसी दिक्कत हो तो वह एक ही बार में अपनी दिक्कत के बारे में ऑनलाईन इंट्रानेट वाले साईट पर इंटर कर दे..

इसी के साथ कथा समाप्त होती है.. तो सभी लोग एक साथ बोलें.. "रजिस्टर देवता कि?.......जय!!!!!"

Thursday, May 21, 2009

वोट कटुवा के रोल में Knight Riders

यूं तो राजनीति तो हर जगह होती है, चाहे वो कोई खेल हो या नौकरी करने वाली जगह हो या फिर आम जिंदगी में आस-पड़ोस के लोगों के साथ मिलकर रहना हो या फिर रिश्तों को निभाना हो.. मगर यहां आई.पी.एल. में तो वोट कटुवा वाली स्थिती भी पैदा हो गई है..

अपने शुरूवाती सभी मैच(एक को छोड़कर, वह जीत तो ऊपर वाले कि दया थी जो पानी बरसा दिया था) हारकर शाहरूक(फेक आईपीएल प्लेयर के शब्दों में डिल्डो) कि टीम कोलकाता नाईट राईडर इस टूर्नामेंट से बाहर हो चुकी है.. मगर अंत में लगातार दो मैच जीतकर वह अन्य टिमों में हड़कंप भी मचा चुकी है..

एक के बाद एक मैच हारने के बाद सबसे पहले उसने चेन्नई को धोया और बाद में राजस्थान को.. चेन्नई वह मैच हारने के बाद भी टूर्नामेंट में तो बना रहा, मगर राजस्थान को कल कि हार बहुत महंगी पड़ी और वह टूर्नामेंट से ही बाहर हो गया..

"पिछले आई.पी.एल. का विजेता इस बार सेमीफाईनल में भी जगह नहीं बना सका, शायद यही क्रिकेट कि अनिश्चितता है.."

आई.पी.एल. कि शुरूवाती दिनों से लेकर अभी तक मैं कोलकाता की जीत के खिलाफ ही रहा.. कारण सिर्फ और सिर्फ शाहरूक के घमंडी स्वभाव के कारण.. उन दिनों में गवास्कर को मिडिया के सामने बेईजत्त करते समय उसे पता नहीं था कि यह कोई मुंबईया सिनेमा नहीं है जहां अंत में अचानक से हारता हुआ हिरो अचानक से चैंपियन बन जाता है.. यह रील लाईफ नहीं रियल लाईफ है.. यहां सभी कुछ खिलाड़ियों के मनोबल और मेहनत से होता है.. जिसे शाहरूक और बेकनन (फेक आईपीएल प्लेयर के शब्दों में भोखा नान) शुरू से ही तोड़ते नजर आये.. अब यहां किसी देश कि इज्जत तो दांव पर लगी नहीं थी जो खिलाड़ी अपना जी-जान लगाते.. सो वैसे हालात में जो होना था वही हुआ भी..


पिछले 3-4 मुकाबलों में अचानक से कोलकाता कि यह टीम हर मैच को आखिरी ओवरों तक पहूंचाने में कामयाब रही.. एक कहावत है, "नंगा भगवान से भी नहीं डरता है".. लगभग यही हालात शायद कोलकाता के साथ रही हो.. उसके पास खोने को कुछ भी नहीं था और सभी खिलाड़ी अपना स्वभाविक खेल दिखाने लगे..

"जब भी किसी क्रिकेट मैच को आखिरी ओवर तक खिंचता देखता हूं तो मुझे लौंस क्लूजनर की याद आने लगती है.. आखिरी ओवरों के खेल में वह मेरा हीरो हुआ करता था.."


लौंस क्लूजनर

अभी तक सभी फिल्मी सितारों कि टीम इस प्रतियोगिता से बाहर हो चुकी है.. सबसे ज्यादा चर्चे में भी उन्हीं कि टीम रही थी, खेल या सितारों के कारण नहीं.. बल्की अपने तरिकों से इस खेल को ढ़ालने कि कोशिश करने के कारण.. शायद वे यह भूल गये थे कि वह किसी फिल्म के सेट पर नहीं हैं जहां डायरेक्टर उनके हर नखरे को सहता है.. यहां डायरेक्टर कि भूमिका में वे खुद थे फिर भी उन्हीं के नखरे ज्यादा थे..

अगर खिलाड़ियों कि बात की जाये तो मुझे कोलकाता नाईट रायडर से अगरकर का खेल अच्छा लगा.. राजस्थान और पंजाब एलेवन से पठान भाईयों का प्रदर्शन भी अच्छा रहा है अब तक.. जब सफल खिलाड़ियों कि बात करें तो हेडेन को कैसे भुलाया जा सकता है? वैसे सबसे ज्यादा निराश किया है हमारे वीरू ने अभी तक.. और भी कई नाम हैं सफल-असफल खिलाड़ियों कि जमात में, किन-किन का नाम गिनाऊं?

Monday, May 18, 2009

प्रभाकरण कि मौत तमिल लोगों कि नजर से

थोड़ी देर पहले ही यह खबर मिली कि प्रभाकरण मारा गया.. मुझे यह खबर एक तमिल मित्र द्वारा मिली.. उसके चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी, सो मैं संकोच में आ गया कि इन लोगों के सामने मुझे किस तरह कि प्रतिक्रिया व्यक्त करनी चाहिये? अगर सिर्फ मेरी बात की जाये तो मुझे खुशी ही हुई यह खबर सुन कर मगर यह खुशी उन लोगों के सामने व्यक्त करना मुझे ठीक नहीं लगा जो मेरे शुभचिंतक भी हैं और साथ ही इस खबर पर उदास भी..

मैंने उन्हीं से जानना चाहा कि आप ही बतायें कि इस खबर पर तमिल लोगों कि क्या प्रतिक्रिया आयेगी?

उनका कहना था कि प्रभाकरण का भारत के प्रति बस एके ही गलती थी जिसके कारण उसे भारत का समर्थन नहीं मिल सका.. और वो थी राजीव गांधी कि हत्या.. अगर इस बात को हटा दिया जाये तो तमिल टाईगर किसी भी नजर से किसी अन्य आतंकवादी संघटन जैसी नहीं थी.. जब वह अपने चरम पर थी तब उसकी श्रीलंका में एक अलग सरकार जैसी चलती थी जिसने वहां के तमिल लोगों के भले के लिये बहुत सारे काम किये.. इसी तरह की कई बाते उसने मुझसे कही जो भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ कोई इंसान ही बोल सकता है.. साथ ही साथ उसने एक बात और कही, "जो भी तमिल नहीं है वह इस भावनात्मक पहलू को कभी नहीं समझ सकता है.." जो एक हद तक सही भी है..

मेरे मित्र को एक उम्मीद यह भी है कि शायद अभी प्रभाकरण जिंदा हो.. उसका कहना है कि प्रभाकरण हमेशा अपने दो हमशक्लों को रखता है(जिसकी पुष्टी कई समाचार साईट पर भी कि गई है), और शायद उन्हीं हमशक्लों में से कोई मारा गया हो शायद.. ये कुछ-कुछ ऐसी ही उम्मीद है जैसे कि किसी परी कथा का नायक दुश्मनों के लिये मर चुका होता है मगर असल में वह अचानक हमला करके सभी दुश्मनों को धराशायी कर देता है..

मैं तमिल बनाम सिंघल के बहस में नहीं पड़ना चाहता हूं, मगर यहां के तमिल लोग भावनात्मक रूप से तमिल टाईगर से बहुत जुड़े हुये हैं.. प्रभाकरण भले ही मारा गया हो मगर वह एक मिथक के रूप में तमिल लोगों के जेहन में हमेशा जिंदा रहने वाला है..

नोट - इस लेख को प्रभाकरण के पक्ष में लिखा गया लेख ना माना जाये.. जो भी बातें लिखी गई हैं वे सभी तमिलनाडु के निवाशियों से ली गई राय के बाद लिखी गई है..

Saturday, May 16, 2009

एक कहानी जिंदगी कि अटपटी सी, चटपटी सी

"तुम्हारा ड्राईविंग नहीं सीखने को लेकर विकास, वाणी और मैं एक ही बात से सहमत हैं, वो ये कि तुम गाड़ी चलाना सीखना ही नहीं चाहते हो.." मैंने शिव से बोला.. यूं तो उसका पूरा नाम शिवेन्द्र है मगर सभी उसे शिव के नाम से बुलाते हैं.. छोटा नाम करके बुलाने का फायदा यह होता है कि समय तो बचता ही है साथ में जुबान को भी कम शब्द बोलने के कारण कम मेहनत करनी पड़ती है.. शायद इसलिये कभी संजीव "संजू" बन जाता है तो कभी चंदन "चंदू" तो कभी अर्चना "अर्चू"..

शिव ने भी इसी में अपनी सहमती जतायी, "हां भाई, जब तुम्हारे, विकास और वाणी जैसे इतने अच्छे ड्राईवर मिले ही हैं तो मैं भला ड्राईविंग क्यों सीखूं?"

"अच्छा! हम लोग कब तक तुम्हारे साथ रहेंगे?"

"जब तुम लोग नहीं रहोगे तो कोई और रहेगा.. क्या फर्क पड़ता है?"

"अच्छा? और जब तुम्हारी शादी हो जायेगी तब?"

इस प्रश्न पर उसके पास कोई कुतर्क नहीं था सो बस गूं गूं करके इतना ही बोला कि "तुम्ही लोग तब भी काम आओगे.."

मैं अब मजाक के मूड में आ गया था.. सो बोला, "मतलब कि भाभी जी को भी मेरे ही पीछे बैठाओगे?"

"हां.." एक सपाट सा उत्तर उसने दिया..

"ठीक है.. फिर रूपेश वाला किस्सा तुम्हारे साथ हो जाये तो मुझे मत कहना.." मेरा इतना कहना था कि हम दोनों ठहाके लगा कर हंसने लग गये.. कुछ पुरानी बातें याद हो आयी.. कालेज की..





तब हम नये नये वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में प्रवेश लिये थे और हमारी दोस्तों का दायरा ज्यादा बड़ा नहीं था.. लेकिन जानपहचान सभी से हो चुकी थी.. एक दिन विकास, शिव, रूपेश और मैं सुबह के नाश्ते के लिये होस्टल के मेस में बैठे हुये थे.. रूपेश बहुत कम बोलने वाला प्राणी तब भी हुआ करता था और अब भी वैसा ही है.. अचानक से मेरे मन में पता नहीं क्या आया और मैं रूपेश की खिंचाई करना शुरू कर दिया..

बिलकुल सीरीयस होकर मैंने रूपेश से बोला, "तुम भाई पढ़ने में बहुत तेज हो.. मैं तो कहीं भी तुम्हारे सामने नहीं टिकता हूं.. तुम्हारा तो कैंपस सेलेक्शन भी जल्दी हो जायेगा.. मेरा होगा या नहीं इस पर भी प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है.."

रूपेश कुछ बोला नहीं बस एक हल्की सी मुस्कुराहट के साथ मेरी ओर देखता रहा..

"अब जरा आज से दस साल बाद के बारे में सोचो.. मैं शायद तब भी खाली ही बैठा रहूंगा.. मगर तुम्हारे पास अच्छी सी नौकरी होगी.. एक बहुत संदर सी बीबी होगी.. एक बच्चा भी होगा जो इतना प्यारा कि उसे देखते ही कोई भी उसे प्यार करने को मचल जाये.."

अब तक रूपेश की आंखें फैल कर गोल हो चुकी थी.. वह सोच में था कि मैं क्या बोलने जा रहा हूं या फिर क्या बताना चाह रहा हूं!

मैंने आगे बात जारी रखी, "एक दिन मैं तुम्हारे घर आऊंगा और कॉल बेल बजाऊंगा.. तुम्हारा बच्चा दौड़ा-दौड़ा आयेगा और दरवाजा खोलेगा.. मुझे देख कर वापस तुम्हारे पास भागा-भागा जायेगा और बोलेगा "पापा, पापा.. अंकल आये हैं.." तुम पूछोगे, "बेटा कौन अंकल आये हैं?" बच्चा बोलेगा, "पापा वही अंकल आये हैं जिनकी शक्ल मुझसे मिलती है.."

अभी तक रूपेश बहुत उत्सुकता से मेरी पूरी बात सुन रहा था.. लेकिन जैसे ही मेरी पूरी कहानी खत्म हुई तो वह बुरी तरह से मुझे घूर रहा था.. लेकिन ना तो पहले वह कुछ बोल रहा था और ना ही अब वह कुछ बोल रहा था.. बस चुपचाप ब्रेड-बटर खाये जा रहा था..

बाद में जब हम अच्छे मित्र हो गये तब मैंने उससे पूछा कि क्या सोच रहे थे उस समय तुम? उसका कहना था कि वह सोच रहा था कि क्या उत्तर दे इसका.. मगर उसे कुछ सूझ नहीं रहा था..

थोड़ी देर मैं और शिव इसे याद करके हंसते रहे और फिर से मैं शिव के लिये ड्राईवर के काम पर निकल पड़ा.. एक बार फिर से मैं गाड़ी चला रहा था और शिव पीछे बैठा हुआ था.. :)

इस किस्से के सभी पात्र जिवंत हैं और इनका इस दुनिया में जिवित किसी ना किसी व्यक्ति से संबंध है.. ;)

Friday, May 15, 2009

टूटो तो यूं टूटो कि खबर बन जाये

जी हां! मेरे पैर के टूटने का अनुभव कुछ-कुछ ऐसा ही रहा.. और तो और ये एक छुवाछूत की तरह फैलता ही चला जा रहा है.. मैं जहां काम करता हूं वहां मेरे फ्लोर पर सबसे पहले मेरा पैर टूटा.. उसके बाद तो जैसे सभी मेरा ही अनुसरण करने निकल पड़े.. एक के बाद एक अभी तक पूरे छः लोग अपनी टांगों को कुर्बान कर चुके हैं.. हर तीसरे दिन कोई ना कोई मेरे पास आकर मुझे गरिया कर जाता है कि ये सब तुम्हारा ही किया धरा है.. शुरूवात तुमने ही कि थी.. और मैं मन ही मन खुश होता हूं कि चलो इस एलाईट ग्रुप में एक और शामिल हुआ है..


चलते-चलते एक चव्वनी छाप शायरी -
पैर टूटे तो यूं टूटे कि खबर बन जाये,
ऐसे टूटे सभी का पैर जैसे जिंदगी जहर बन जाये..
तोड़ने को तो लोग दिल भी तोड़ा करते हैं,
मगर तोड़ो सभी का पैर ऐसा कि कहर बन जाये... ;)


वैसे मेरे पैर की हालत दिन ब दिन ठीक होती जा रही है.. उम्मीद करता हूं कि 1-2 महिने में पूरी तरह चंगा हो जायेगा.. :)

जब शहर हमारा सोता है

एक बकत कि बात बतायें,
एक बकत कि..
जब शहर हमारो सो गयो थो,
वो रात गजब की..
चहुंओर, सब ओर दिशा से,
लाली छाई रे..
जुगनी नाचे, चुनरी ओढ़े,
खून नहाई रे..
सब ओरों गुल्लाल पुत गयो,
सब ओरों में..
सब ओरों गुल्लाल पुत गयो,
विपदा छाई रे..
जिस रात गगन से,
खून की बारिश आयी रे..
जिस रात शहर में,
खून कि बारिश आयी रे..

सराबोर हो गयो शहर,
और सराबोर हो गई धरा..
सराबोर हो गई रे जत्था,
इंसानों का पड़ा-पड़ा..
सभी जगत ये पुछे था,
जब इतना सब कुछ हो रह्यो थो..
तब शहर हमारो कांय-बांय सा,
आंख मूंद के सो रह्यो थो..
शहर ये बोल्यो,
नींद गजब कि ऐसी आयी रे..
जिस रात गगन से,
खून की बारिश आयी रे..
जिस रात शहर में,
खून कि बारिश आयी रे..

सन्नाटा वीराना..
खामोशी अनजानी..
जिंदगी लेती है..
करवटें तूफानी..
घिरते हैं साये घनेरे से..
रूखे बालों को बिखेरे से..
बढ़ते हैं अंधेरे पिशाचों से..
कांपे है जी उनके नाचों से..
कहीं पे वो जूतों कि खट खट है..
कहीं पे अलावों कि चट पट है..
कहीं पर है झिंगुर कि आवाजें..
कहीं पे वो नल के कि टप टप है..
कहीं पे वो खाली सी खिड़की है..
कहीं वो अंधेरी सी चिमनी है..
कहीं हिलते पेड़ों का जत्था है..
कहीं कुछ मुंडेरों पे रक्खा है..

सुनसान गली के नुक्कड़ पर जब
कोई कुत्ता चीख-चीख कर रोता है..
जब लैंप पोस्ट कि गंदली पिली घ्प्प रोशनी
में कुछ-कुछ सा होता है..
जब कोई साया, थोड़ा बचा-बचा कर
उन सायों में खोता है..
जब पुल के खंभों को गाड़ी का गरम उजाला,
धीमे-धीमे धोता है..
तब शहर हमारा, सोता है..
तब शहर हमारा, सोता है..
तब शहर हमारा सोता है,
तब मालूम तुमको वहां पे क्या-क्या होता है?
इधर जागती हैं लाशें,
जिंदा हो मुर्दा उधर जिंदगी खोता है..
इधर चीखती है एक हौव्वा,
खैराती सी उस अस्पताल में बिफरी सी..
हाथ में उसके अगले ही पल,
गरम मांस का नरम लोथड़ा होता है..

इधर उगी है तकरारें,
जिस्मों के झटपट लेन देन में,
ऊंची सी.....
उधर गांव से रिश्ते फूंको,
दूर गुजरती आंखे डेखो,
रूखी सी.....
लेकिन उसको लेके रंग-बिरंगे,
महलों में गुंजाईश,
होती है.....
नशे में डूबे सेहन से,
खूंखार चुटकुलों कि पैदाईश,
होती है.....
अधनंगे जिस्मों कि देखो,
लिपी-पुती सी लगी नुमाईश,
होती है.....
लार टपकते चेहरों को,
कुछ शैतानी करने कि ख्वाहिश,
होती है.....
वो पुछे है हैरान होकर,
ऐसा सब कुछ होता है कब?
तो बतलाओ उनको तब-तब-तब
ऐसा होता है.....

जब शहर हमारा सोता है..
जब शहर हमारा सोता है..
जब शहर हमारा सोता है..


एक गीत गुलाल सिनेमा से..