वो शहर था ही ऐसा.. ख्वाबों में जीने वाला शहर.. जहां हर सख्श के भीतर कुछ ख्वाब पलते थे.. जो भी उस शहर में आता था तो कुछ नये ख्वाब लेकर आता था.. मगर ख्वाबों कि भी एक लिमिट होती होगी, तभी तो नये ख्वाबों को पालने के लिये कुछ पुराने ख्वाबों को मारना भी पड़ता था.. मगर वह ख्वाबों में जीने वाला सख्श, अपने ख्वाबों के मरने कि कल्पना करने से भी घबराता था.. घबराहट पर काबू पाने के लिये वह अक्सर सिगरेट जलाया करता था.. फिर उसी सिगरेट के धुंवें में वह अपने ख्वाबों कि तस्वीर बनाया करता.. सारे तस्वीर धुंवें के फैलने के साथ ही टेढ़े-मेढ़े आकार के हो जाया करते थे.. वह अक्सर सोचता था, ख्वाब के बड़े होने के क्रम में होने वाला फैलाव भी क्या उस ख्वाब को बदसूरत कर सकते हैं? वह चीख कर यह सवाल पूछता, कहीं से कोई जवाब ना पाकर वह ये सवाल अपने आप से पूछता.. खुद से भी कोई जवाब नहीं मिलता उसे तो पागलों कि तरह रात के सन्नाटे में पागलों कि तरह निकल जाता..
वह जागती आंखों से भी ख्वाब देखता.. वह ऐसे ख्वाब जागती आंखों से देखता जो उसे सोने नहीं देती.. ख्वाबों में अक्सर एक लड़की को देखता.. ख्वाबों में ही उसे पहचानने कि कोशिश भी करता.. नहीं पहचानने कि हालत में वह फिर पागल हो उठता और पहचान लेने पर उठकर पागलों कि ही तरह उसकी तलाश भी करता.. लेकिन वह नहीं मिलनी थी सो नहीं मिली.. वह अक्सर सोचता, जब उसे नहीं मिलना था तो ख्वाबों में क्यों आती थी? शायद उसका बस यही काम था, ख्वाब देखना.. फिर सोचना.. खूब सोचना.. फिर पागल होना.. फिर ख्वाब देखना.. किसी चक्र की तरह.. इन सबके बीच वह कैसे दूसरे काम करता, उसे पता नहीं चलता..
वह खूब ख्वाब देखता.. खूब सारे पैसों के ख्वाब.. एक बड़ सा महलनुमा घर के ख्वाब.. जिसके चारों तरफ इतनी ऊंची चारदिवारी हो जिसके इस ओर कोई और झांक भी ना सके.. जिसके चारों तरफ चौकिदार पहरा देते रहे.. हां दो बड़े अलसेसियन डौग भी हों.. पता नहीं कैसे दिखते होंगे वे डौग.. वह सोचता कि अमीर लोग कुत्तों को डौग ही क्यों कहते हैं? वह सोचता कि क्या अलसेसियन ही सबसे डरावना कुत्ता होता है? फिर वह सोचता कि ऐसा ही कुछ तो जेल में भी होता है.. चारों तरफ ऊंची-ऊंची चारदिवारी.. दिवारों के ऊपर खड़े कुछ पुलिस वाले.. वह खुद से कहा, नहीं वह चारदिवारी छोटी रखेगा.. उसमें लोहे के नुकीले तार लगवाऊंगा..
अंधेरों में वह ख्वाबों कि परछाईयां ढ़ूंढ़ता.. वह सोचता, जैसे धुंवें में एक परछाई बनती थी, वैसे ही अंधेरे में भी बनती होगी.. उसके कदम अपने आप परछाईयों कि ओर मुड़ जाते.. ख्वाब बुनना छोड़ कर वह परछाईयों कि ओर भागने लगता.. अब कुछ भी उसके हाथ नहीं आता.. ना ख्वाब, और ना परछाई.. उसे रोने का जी करता? क्यों रोये? किसके लिये रोये? मां क्यों हमेशा कहती कि लड़के नहीं रोया करते? यही सोचते-सोचते उसकी रूलाई भी रूक जाती.. वह फिर सोचने लगता, वह सोचता कि यह शहर ही ख्वाबों का है? या फिर वह इतना सोचता क्यों है? वह डरने लगता.. उसे लगने लगा कि कहीं वह भी उस सड़क पर कचरे में सोने वाले भिखाड़ी कि तरह पागल तो नहीं होता जा रहा है? कहीं उसने सुना था कि वह भी सोचते-सोचते पागल हो गया था? क्या लोग सोचने से भी पागल हो जाते हैं? फिर तो ख्वाब भी किसी को पागल बनाता होगा? वह डरने लगता.. फिर अपने ख्वाबों को मारने की सोचने लगता....
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ख्वाब ही ख्वाब देखते रहें सोते जागते तो दीवाने तो हो ही लेंगे।
ReplyDeleteकुछ ख्वाब ऐसे भी होते हैं जो शायद इंसान को पागल भी कर देते हों
ReplyDeleteएक शब्द...
ReplyDeleteओह्ह!!
बस, और न बोल पायेंगे.
कितने ही ख्वाब गर्भ में ही मर जाते है..
ReplyDeleteशहर का असर है
ReplyDeleteयह किसकी छाया पड गई?
ReplyDeleteरामराम.
ख़्वाबों की कहानी..........लाजवाब लिखा है....... कुछ ख्वाब सचमुच पागल कर देते हैं.....
ReplyDeleteBahut Badiya :)
ReplyDelete"फिर तो ख्वाब भी किसी को पागल बनाता होगा? "
ReplyDeleteजब से दुनिया ने ख्वाब देखना छोड़, ख्वाब उधार लेने शुरू कर दिए हैं... तब से हर वो व्यक्ति जो ख्वाब देखता है...सोचता है, पागल ही कहलाता है....