Sunday, June 10, 2007

कालिज की यादें

बडे उतावले थे यहा से जाने को,ज़िन्दगी का अगला पडाव पाने को...पर ना जाने क्यो..दिल मे आज कुछ और आता है,वक्त को रोकने को जी चाहता है.जिन बातो को लेकर रोते थे,आज उन पर हसी आती है...ना जाने क्यो आज उन पलो कि याद बहुत आती है...कहा करता था...बडी मुश्किल से तीन साल सह गया,पर आज क्यो लगता है कि कुछ पीछे रह गया...कही-अनकही...