Wednesday, March 13, 2013

शहर

बैंगलोर कि सड़कों पर पहले भी अनगिनत बार भटक चुका हूँ. यह शहर अपनी चकाचौंध के कारण आकर्षित तो करता रहा मगर अपना कभी नहीं लगा. लगता भी कैसे? रहने का मौका भी तो कभी नहीं मिला था. २००५ में पहली दफे इस शहर में आया था, शायद जुलाई का महिना था वह. और लगभग साढ़े सात साल बाद बसने कि नियत से इस साल जनवरी में आया.

अभी भी लगता है जैसे कल कि ही बात थी. कालेज के दिनों में पहली बार अपने दो दोस्तों के साथ यहाँ आया था, इरादा कुछ तफरी करने का था. वेल्लोर से बैंगलोर. जब २००५ जुलाई कल कि बात लग सकती है तो २००७ जनवरी तो उससे भी अधिक नजदीक का मामला है. २००६ दिसंबर में जयपुर दीदी के घर गया था, ठीक ३१ दिसंबर को रेल से चेन्नई उतरा. कहने को तो उससे पहले भी चेन्नई से होकर गुजरने का मौका मिला था, मगर रेल से होकर ही निकल लेता था. हाँ, जब पहली दफे वेल्लोर जा रहा था कालेज में एडमिशन के लिए तब चेन्नई एयरपोर्ट से चेन्नई सेन्ट्रल तक का रास्ता टैक्सी में तय किया था. मगर तब घबराहट रास्तों को और उस शहर को देखने अधिक थी.

जब भी चेन्नई होते हुए वेल्लोर जाता था तब सिर्फ इतना ही समझ में आया था, कि जिस स्टेशन पर गाड़ी के रुकते ही पसीने से तर-ब-तर हो जाओ, वही चेन्नई है.

३१ दिसंबर को चेन्नई उतरने के बाद शिवेंद्र का इन्तजार थोड़ी देर किया. वह वेल्लोर से चेन्नई आया था. २ जनवरी को हमें अपनी पहली नौकरी ज्वाइन करनी थी चेन्नई में, मगर उससे पहले रहने का ठिकाना भी तलाश करना था. फिर तो हमारे लिए बेहद अजीबोगरीब नामों का सिलसिला ही निकल पड़ा, जिसमें सबसे पहला नाम "चुलाईमेदू" था. एक सीनियर ने हमें बताया था कि वहीं रहते हैं, और उनके ही मैन्सन में हमारा भी इंतजाम हो जाएगा, जो कि ना हो सका. और फिर उसके बाद तो एक झड़ी सी लग गई ऐसे नामों की. जैसे कोयम्बेदू, त्यागराया(जिसे अंग्रेजी में Thyagaraya लिखते हैं और हम उत्तर भारत के लोग उसे "थ्यागराया" पढ़ते हैं, टी नगर में टी का मतलब यही है), ट्रिप्लिकेन, वरासलावक्कम, नुगमबक्कम, केलाबक्कम, पैरिस, थोरईपक्कम.. खैर हमें इतना ही समझ आया कि चेन्नई में जगहों का नाम कुछ "अक्कम-बक्कम" टाईप होता है और बैंगलोर में "हल्ली-पल्ली" टाईप.

एक और नई बात पता चली कि यहाँ PG को लोग मैन्सन कहते हैं. सच कहूँ तो मुझे उस वक़्त तक पता नहीं था कि मैन्सन का मतलब क्या होता है? मुझे बाद में शब्दकोष का सहारा लेना पड़ा था. खैर!! जब चुलाईमेदू में ना मिला तो फिर कुछ ने सलाह दी कि टी नगर में ढूंढो, वहां मिल जाएगा. खैर वहां भी ना मिला, मगर वहां ढूँढने के चक्कर में चेन्नई के एक ऐसे इलाके का पता चला जिसे देख कर हम दंग रह गए थे. हम कोडम्बक्कम से लोकल लेकर माम्बलम में उतरे, जो कि टी नगर का लोकल स्टेशन है, और जैसे ही स्टेशन से बाहर निकलने वाली गली में घुसे, लगा जैसे ग़दर मचा हुआ हो. एक लम्बी से गली, उसमें जितने दूकान, उन सब का नाम सर्वणा स्टोर, और लोग ऐसे धक्कम धक्का मचाये हुए जैसे आज ना लिए तो कल कुछ नहीं मिलेगा. जैसे कर्फ्यू लगने के बाद थोड़े समय कि ढील दी गई हो लोगों को खरीददारी करने के लिए. हम पहली बार चेन्नई कि गर्मी को देख रहे थे, उसमें भी ऐसी जगह आ गए थे. वह तो बाद में पता चला कि सालों भर उस जगह का यही हाल रहता था.

फिर वहीं किसी ने कहा कि ट्रिप्लिकेन चले जाओ, वहां जरूर मिल जाएगा. वहां मिल भी गया. और वो भी मुश्किल से दस-पंद्रह मिनट के मशक्कत में ही. वहां जाने पर ऐसा लगा जैसे दिल्ली के मुनिरका या कठबरियासराय-जियासराय वाले इलाके में आ गए हों. माहौल वैसा ही, सिर्फ एक ही भाषाई अंतर मिला, अलबत्ता सब एक बराबर. हाँ, यहाँ कि सड़के कठबरियासराय-जियासराय से अधिक चौड़ी थी. मेरा यह यकीन और पुख्ता हो चला कि सारे शहर का मिज़ाज एक सा ही होता है, बाहर से चमचमाती दिखती महानगर अंदर से ऐसे ही इलाकों में गरीबी में गिजगिजाती है, जहाँ अधिकांश नौकरी करने वाले अथवा पढने के लिए बड़े शहर में आने वाले युवा रहते हैं. शहर के अभिजात्य वर्ग ऐसे इलाकों को नफ़रत से देखती है, मगर शहरें संभली होती हैं ऐसे ही बिगड़े हुए इलाकों से.

Tuesday, February 05, 2013

बोंसाई


दमनकारी चक्र के तहत
जड़ो एवं तनों-पत्तियों को काट-छांट कर
बहाकर उन मासूम पौधों का खून
तमाशा देखते लोग
हर पौधे पे वाह-वाह का शोर

दमनकारी चक्र के तहत
हमारी जड़ों एवं प्रतिभाओं को काट-छांट कर
बहाकर प्रतिभाओं का खून
तमाशा देखते लोग
हर व्यक्ति पे वाह-वाह का शोर!!!

Wednesday, November 07, 2012

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जिंदगी.
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कुछ दिन पहले ऐसे ही आये ख्याल

Friday, October 05, 2012

प्रतीक्षानुभूति

वे दोनों मिले, एक फीके मुस्कान के साथ. फीकापन क्या होता है वह उस समय उसे देखते हुए समझने की कोशिश कर रहा था, ना समझ पाने कि झुंझलाहट भी उसके चेहरे पर थी. वह सोच रहा था वो क्या सोच रही होगी अभी?
"पास में ही एक कैंटीन है, चलो उधर ही चल कर बैठते हैं." जाने किन ख्यालों में गुम थी वो.
"चलो"
कॉफी पीते हुए वह बरबस ही पूछ बैठी, "इतने दिनों बाद आये हो, कैसा लग रहा है यहाँ?" और बेहद लापरवाही के साथ वह बोल गया "तुम्हारे पास होने से यह शहर भी हसीन लगने लगा है" बोल चुकने के बाद वह सोचने लगा "शहर तो सारे एक से ही होते हैं, बेतरतीब से. यह हसीन शहर कैसा होता होगा?" और खुद अपनी कही बातों पर भी एक फीकी मुस्कान दे बैठा.

वहाँ भीड़ बढती जा रही थी. उन्होंने वहाँ से उठना पसंद किया. बाहर निकल कर अब कहाँ जाया जाए? पास के एक चबूतरे पर बैठ गए, जहाँ लड़के को बैठने में कोई परेशानी नहीं थी वहीं लड़की नाक-भौं सिकोर रही थी.

"क्या समय हुआ है?" अब से पहले तक जो औपचारिकता और फीकापन दोनों के चेहरे पर था वह छंट चुका था. "मुझे साढ़े पांच बजे तक घर के लिए चले जाना होगा."
"दो बज कर पच्चीस मिनट" उसने कलाई घडी पर समय देखते हुए बताया.

"तुम अपनी झुल्फों को हमेशा को तो हमेशा अपनी तर्जनी में फंसा कर लपेटती रहती हो? मगर आज तो यह हवा में लहरा रहे हैं?"
ठिठक कर अपनी जुल्फों को तर्जनी से पकड़ कर इठलाती हुई अपने कानो में खोंसती हुई वह जैसे सफाई दे रही हो, अपने उस झूठ की जो उसने पिछले दफे कही थी, "जब बिना मांग के बाल संवारती हूँ तब बालों को अँगुलियों में लपेटती हूँ, वर्ना यूँ ही कानो में खोंस लेती हूँ."

"अच्छा अब समय क्या हुआ?" एक लम्बी खमोशी के बाद उसने पूछा.
"दो बज कर पैतीस मिनट"

वह उसकी तरफ देख रहा था, एकटक.. अचानक वह चीख उठी, उसके साथ वह भी चिहुंक उठा. "क्या हुआ?" लड़की ने सामने इशारा किया, एक गाय कहीं से घास चरते हुए उधर ही आ रही थी. वह हडबडा कर उठा, गाय को डरा कर भगाने की कोशिश किया. फिर वापस आकर बैठ गया. मन ही मन खुद पर हँसते हुए. वह गाय खुद ही जब तक चरते हुए वहां से नहीं चली गई तब तक लड़की उसके हाथों को पकड़ कर बैठी रही और वह उसके डरे हुए चेहरे को देख कर मुस्कुराता रहा..

अब कितने बजे? लड़का चिढ कर बोला, "जाने कि इतनी ही जल्दी है तो अभी चली जाओ."
"अरे, टाईम तो बताओ?"
"नहीं बताता! तुम जाओ. अभी." इतना सुनते उसने लड़के का हाथ पकड़ कर घड़ी में समय देख लिया.

लड़की ने एक कहानी को याद किया, जिसमें नायक-नायिका इसी प्रकार मिलते हैं. घंटो साथ बैठने के बाद भी एक-दूसरे से एक फीट की दूरी बनाए हुए थे. फिर उन दोनों ने उस कहानी को याद किया.
"क्या किसी दूसरे की कहानी को जीने के लिए हम अभिसप्त हैं?" कहकर वह मुस्कुराया और खिसक कर जरा पास बैठ गया और वह भी झिझक कर दूसरी दिशा में खिसक गई. यह देख वह वापस अपनी जगह पुनः आ बैठा. किसी अपराधबोध से वह मुस्कान अब तक विलुप्त हो चुकी थी. यह देख वो मुस्कुराई और उसके पास उसके बाहों को पकड़ कर बैठ गई और फिर शरारत से पूछ बैठी, "समय क्या हुआ"? इस दफ़े वह चिढा नहीं, उसके हाथ को इस तरह पकड़ कर बैठा रहा जैसे जिंदगी को मुट्ठी में बंद करना चाह रहा हो!

शाम ढलने को थी, दोनों थके हुए से कदमों से टेम्पो स्टैण्ड की ओर बढ़ रहे थे. भविष्य की कोई चिंता किये बिना.

मरा हुआ प्रेम अक्सर पेड़ पर बैठे प्रेत की तरह होता है, आप चाहे कितना भी दुनिया से कह लें की बात बीत चुकी है, अब आप याद नहीं करते उन बातों को, मगर आप अपनी अंतरात्मा के वेताल से वही शब्द नहीं कह पाते हैं, अगर कहेंगे तो आपके सर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे, और यदि सच कहेंगे तो वह वेताल पुनः उसी पेड़ पर जा बैठेगा! - गीत चतुर्वेदी जी से उत्प्रेरित यह पंक्ति.

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हमारा प्यार बहुत-कुछ हमारी ज़िन्दगी की तरह है. आदमी जानता है कि वह बुरी तरह ख़त्म होगी, काफी जल्दी ख़त्म होगी, वह हमेशा रह सकेगी, इसकी उसे रत्तीभर उम्मीद नहीं है, फिर भी, सब जानते हुए भी- वह जिये चला जाता है. प्यार भी वह इसी तरह करता है, इस आकांक्षा में कि वह स्थायी रहेगा, हालांकि उसके 'स्थायित्व' में उसे ज़रा भी विश्वास नहीं है. वह आँखें मूंदकर प्यार करता है...एक अनिश्चित आशंका को मन में दबाकर- ऐसी आशंका, जिसमें सुख धीरे-धीरे छनता रहता है और वह इसके बारे में सोचता भी नहीं.
- आखिरी पंक्ति "ईवान क्लिमा" की लिखी हुई


Wednesday, August 15, 2012

लोनलिनेस इज द बेस्ट फ्रेंड ऑफ़ ओनली ह्युमनस

हम हों चाहे किसी जलसे में
अकेलापन का साथी
कभी साथ नहीं छोड़ता हमारा

हम हों चाहे प्रेमिका के बाहों में
अकेलापन का साथी
कभी साथ नहीं छोड़ता हमारा

हम पा लिए हों चाहे मनुष्यता का शिरोबिंदु
अकेलापन का साथी
कभी साथ नहीं छोड़ता हमारा

हम बैठे हों किसी प्रयाग में
अकेलापन का साथी
कभी साथ नहीं छोड़ता हमारा

बुद्ध ने भी ज्ञान प्राप्त किया था
अकेलेपन में ही
हिटलर ने की थी आत्महत्या
अकेलेपन में ही
बड़ी वैज्ञानिक खोजे भी होती हैं
अकेलेपन में ही

जाने क्यों लेमिंग करता है
सामूहिक आत्महत्या?

मेरी समझ में तो
लोनलिनेस इज द बेस्ट फ्रेंड ऑफ़ ओनली ह्युमनस

Wednesday, August 01, 2012

अतीत का समय यात्री

हम मिले. पुराने दिनों को याद किया. मैंने उसके बेटे कि तस्वीरें देखी, उसने मेरे वर्तमान कि पूछ-ताछ की. सात-आठ मिनटों में हमने पिछले छः-सात सालों को समेटने की नाकाम कोशिश की.

- तुम मोटी हो गई हो!
- मम्मी जैसी हो गई हूँ ना? मम्मी बन भी तो गई हूँ.
और एक बेतक्कलुफ़ सी हंसी...

- तुम शादी कब कर रहे हो? बूढ़े हो जाओगे तब कोई शादी भी नहीं करेगी तुमसे..
मैं बस मुस्कुरा भर दिया... चार साल पहले कि हमारी बात याद आ गई, जब उसने यही सवाल पूछा था और मेरे यह कहने पर की "थोड़े पैसे तो जमा कर लूं" के जवाब में वह पलट कर बोली थी "बोल तो ऐसे रहे हो जैसे दुल्हन खरीदनी है तुम्हें"

हमें जनकपुरी मेट्रो स्टेशन में बैठने के लिए कोई जगह नहीं मिली थी, सो हम सीढियों पर ही बैठ गए थे...और वहाँ से गुजरने वाले मुसाफिरों की आँखों में चुभ भी रहे थे. कुछ हमारे बगल से बुदबुदाते हुए भी, हमें कोसते हुए, वहाँ से गुजरे....और हम बेपरवाह अपनी ही बातों में मगन.

- कैसा मेट्रो बनाई हो तुमलोग? देखो सीढी हिल रहा है!
लोगों के वहाँ से गुजरने से सीढियों में होने वाले कंपन को महसूस करते हुए मैंने उसे उलाहना दिया, सनद रहे की मेरी मित्र दिल्ली मेट्रो में ही उच्च पद पर आसीन है.
- अब क्या करें, ऐसा ही है..
आँखें नचाते हुए उसने ऐसे जवाब दिया कि मैं हंसने लगा..

- समय कैसे गुजर जाता है, लगता है कल की ही बात है और हम सीतामढ़ी में अपनी कॉलोनी में हंगामा मचाते फिरते थे..
- हाँ, और मैं तुमको एक रूपया दिया था...चुकिया वाली गुल्लक लाने के लिए.. जो तुम्हारे स्कूल वाले रास्ते में बिकता था.
- और मैं ले ली थी?
विस्मयकारी भाव चेहरे पर लाते हुए उसने पूछा
- हाँ...
- मैं भी ना..पता नहीं कैसे ले ली थी?
- लेकिन अगले दिन वापस कर दी थी..शायद आंटी डांटी होगी..
इस दफे दोनों ही साथ-साथ हँसे...

- पता है? मैं भी कार चलाना सीख ली..लेकिन अभी स्टेशन से घर तक पहुँचते-पहुँचते मैं पसीने से भींग जाती हूँ..
- कार में एसी नहीं है क्या?
- है ना...लेकिन सीसा चढा रहेगा तो हाथ निकाल कर "हटो-हटो" कैसे चिल्लायेंगे?
"हटो-हटो" कहते समय उसका हाथ भी ऐसे ही हिल रहा था जैसे सामने वाले कार को हटने के लिए बोल रही हो...
- साफ़-साफ़ बोल दो ना कि मेरे घर के आस-पास मत दिखना नहीं तो तुम्हारे एक्सीडेंट के जिम्मेदार हम नहीं होंगे.. इशारों में क्यों धमका रही हो?
फिर से एक हंसी..दोनों कि ही साथ-साथ..

फिर वो अपने घर के लिए निकल ली.. कुछ देर बार उसका एस.एम.एस. आया, "इतने दिनों बाद मिलकर लगा कि कुछ रिश्ते कभी नहीं बदलते. लगा कि तुम पूछोगे की इंस्टीट्यूट जाना है क्या? ऐसे ही रहना." मुझे सहसा याद हो आया, जब पटना में किन्हीं वजहों से लगभग सात-आठ महीने उसे रोजाना एल.एन.मिश्रा इंस्टीट्यूट उसे छोड़ने जाता था.. भले ही मुझे कितना भी जरूरी काम क्यों ना रहा हो, उसकी प्राथमिकता को बाद में रखकर.. मैंने जवाब में लिखा "कुछ चीजों को नहीं ही बदलना चाहिए"

कुछ लोगों से मिलते वक्त हम अपना चोंगा उतार कर मिलते हैं.. मगर ऐसे लोग जिंदगी में कम ही होते हैं... जिंदगी कि भी अपनी ही रफ़्तार होती है.. सामने देखो तो वक्त कटता नहीं रहता है, पीछे देखो तो वक्त मानो लाईट-स्पीड को भी मात देती दिखती है.. जनकपुरी पश्चिम मेट्रो स्टेशन से हम दोनों की ही मेट्रो अलग दिशाओं में भागती चली जा रही थी...
"27-July-2012"

Tuesday, July 03, 2012

यह तोता आज भी पिंजड़े में बंद छटपटा रहा है


बचपन में एक तोता हुआ करता था. यूँ तो कई तोते हमने एक-एक करके पाले, और एक-एक करके सभी भाग गए. वह तोता भी जिसके बारे में लिख रहा हूँ. मगर यह तोता हमारे यहाँ सबसे अधिक समय तक रहा, तक़रीबन 8-9 साल. पापा के कई मातहत और हम बच्चे भी उसे कुछ बोलना सिखा-सिखा कर थक गए, मगर उसे ना कुछ सीखना था, और ना ही सीखा! 

शुरुवाती दिनों में वह पिंजड़ा तोड़ने का अथक प्रयास करता था. अपनी चोंच से जितनी कोशिश कर सकता था, वह करता था. लहुलुहान होने तक! खाने को छूता तक नहीं था. "कहीं भली है कटुक निबोरी कनक-कटोरी की मैदा से" वाली कविता शायद ऐसे ही दृश्य देख कर लिखी गई हो! फिर धीरे-धीरे उसने प्रयास करना छोड़ दिया.

शायद उसे समझ आ गया हो कि वह उसे तोड़ नहीं सकता है, मगर उससे अधिक संभव यह है की वह धीरे-धीरे उसे ही नियति समझ लिया हो! इतने विश्वास के साथ मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि बाद के दिनों में, तीन-चार साल बाद, जब कभी गलती से पिंजड़ा खुला भी रह जाता था तो वह बजाय दरवाजे से बाहर निकलने के बजाये डर कर और अंदर घुस जाता था. 

पहले भैया से, और बाद में मुझसे उसे बहुत लगाव हो गया था. चाहे कितने भी गुस्से में हो, मगर कभी हमें काटता नहीं था. हम ही उसे खाना देते थे, उसके लिए हम भले इंसान थे. बहुत नासमझ था वो बेचारा. इतनी समझने की शक्ति नहीं थी उसमें की हम उसका भला चाहने वाले होते तो यूँ कैद में नहीं रखते! हम तो उसके लिए ऐसे थे जैसे, कैद में रखो और खूब भला चाहो!

फिर एक दिन वह उड़ गया! तब तक हम दोनों ही रोजी की तलाश में घर छोड़ चुके थे... मगर, मैं अभी तक इस पिंजड़े में बंद छटपटा रहा हूँ....

Tuesday, June 26, 2012

होने अथवा ना होने के बीच का एक सिनेमा


कुछ चीजें अच्छी-बुरी, सच-झूठ के परे होती है. वे या तो होनी चाहिए होती हैं अथवा नहीं होनी चाहिए होती हैं. गैंग्स ऑफ वासेपुर भी इसी कैटेगरी में आता है.. हमारे उन भारतीय दर्शकों को, जो विदेशी सिनेमा देख कर आहें भरते हैं कि ऐसा कुछ यहाँ क्यों नहीं बनता, संतुष्टि जरूर मिलेगी इसे देखकर. और वे आगे उम्मीदें भी पाल सकते हैं की आगे भी ऐसे सिनेमा बनते रहेंगे..

कहानी तेजी से बढती है, ठिठककर रूकती है, फिर बढती है, फिर रूकती है..जैसे कि जिंदगी!! जिंदगी की ही तो महागाथा है यह. 

मैं कोई बहुत बड़ा सिनेमा का ज्ञानी नहीं हूँ, मगर फिर भी इतना समझ में तो जरूर आया कि सिनेमा के हर छात्र को यह जरूर देखना चाहिए. इसके अभिनेता-अभिनेत्रियों से अभिनय सिखने के लिए, कैमरामैन से कैमरे कि कला सिखने के लिए, निर्देशक से निर्देशन की बारीकियां सिखने के लिए..

हाथ के बुने हुए हाफ स्वेटर पहन कर पहलवान दोनों हाथो में मुर्गा टांग कर गली से जाते हुए दिखाना, या फिर मीट की नली वाली हड्डी सूंss कि आवाज के साथ चूसना, या फिर गोल गले के लोटे से स्नान करते हुए दिखाना, या फिर आइसक्रीम के लिए बच्चों कि शैतानी, या फिर सरदार खान का गिरिडीह के बदले गिरडी..गिरडी..गिरडी..गिरडी की आवाज लगा कर सवारी बटोरना. रात का खाना चीनी मिट्टी के प्लेट में परोसना क्योंकि मुसलमान घर आया है.. जाने कितनी ही हत्या सरदार खान कर चुका हो मगर जवान बेटे को लगी छर्रे से लगभग पागल सा हो उठना. फ्रिज के आने के बाद सब बच्चों का उचक-उचक कर उसे देखना और गृहणी का यह देखना की उसमें कोई खाली बर्तन तो नहीं रखा हुआ है! 

इसे देखने से पहले मैं कोई भी रिव्यू नहीं पढ़ रहा था. किसी तरह का पूर्वाग्रह लेकर नहीं देखना चाहता था. और मुझे सबसे अधिक अचंभित "जियs हे बिहार के लाला" गीत ने किया. जिस गीत को मैं फ़िल्म के शुरुवात में देखने कि उम्मीद कर रहा था उसे जिंदगी कि खुशी में नहीं, मृत्यु के जश्न के तौर पर लाया गया!

हो सकता है कि अनुराग जी ने कई लोगों को निराश किया होगा इस सिनेमा में गाली-गोली दिखा कर, मगर हर चीज को इतनी बारीकी से उन्होंने फिल्माया है जिसको कोई भी सिने छात्र देखना-सीखना चाहेगा. थैंक्स अनुराग जी को, हमें ऐसी सिनेमा देने के लिए!!

मैं अपनी पसंद के पिछले तीन देखे हुए सिनेमा कि बात करूँ तो मुझे वाकई आश्चर्य हो रहा है कि हम कैसे समाज में जी रहे हैं? मैं यह आकलन करने में विफल हो रहा हूँ की हमारा समाज बेशर्म है या असंवेदनशील? उन तीन सिनेमा का नाम है: १. पान सिंह तोमर, २. शंघाई एवं ३. गैंग्स ऑफ वासेपुर. मेरे मन में ऐसे प्रश्न इसलिए आये क्योंकि जिन चीजों पर खुद से घिन आनी चाहिए उन चीजों पर सिनेमा हाल में हंसी के फुहारें छूट रही थी!

अंत में अगर तिग्मांशु धुलिया की तारीफ़ नहीं करूँ तो ये नाइंसाफी होगी. जहाँ मनोज वाजपेयी अपने किरदार को मेहनत से निभाते दिखे हैं वहीं तिग्मांशु धुलिया बिना किसी एक्स्ट्रा एफर्ट के अपने किरदार को जिए चले गए हैं!!

चलते-चलते इस सिनेमा का एक डायलॉग पढते जाइए: 
पुलिस एक अपराधी के बच्चे से पूछती है, जो अपने बाप के लिए खाने का टिफिन लेकर आया है - डिब्बे में क्या है?
लड़का - अब डिब्बा खोल के औंगली से छौंका लगाईयेगा का?

नोट - यह संभव है कि बिहारी परिवेश को फिल्माने कि वजह से मुझे यह सिनेमा नॉस्टैल्जिक कर रही हो..

Wednesday, June 06, 2012

जन्म और मृत्यु

मेरे जन्म को लेकर 
अफवाहें अपनी चरम पर हैं
मगर मेरा जन्म 
ठीक उसी दिन हुआ था
जब मिला था 
तुमसे पहली दफे
अब मौत का दिन भी मुक़र्रर हुआ है
ये वही दिन होगा
जब यकीन होगा
अब ना होगी मुलाक़ात तुमसे
फिर कभी!!!

Thursday, May 31, 2012

लव यू मम्मी - दो बजिया वैराग्य

जब छोटा था तब...कहीं भी जाऊं, मम्मी का आँचल पकड़ के चलता था.. गाँव हो या कोई और जगह, अधिकतर गाँव ही हुआ करती थी, भैया-दीदी पूरा गाँव नापते रहते थे, मगर मैं, मम्मी कहीं भी जाए, उनकी साडी का एक छोड़ पकड़ कर चुपचाप खड़ा रहता था.. मम्मी कितना भी डांटे, या मना करे, मगर चाहे कुछ भी हो, मैं अपना कर्म नहीं भूलता था.. उनकी साडी पकडे खड़ा रहता या रोता रहता था.. अगर उनके साथ नहीं हूँ तो पापा की धोती, जिसे वह आराम के क्षणों में लुंगी की तरह पहनते थे, उसे पकड़ कर उनके साथ रहता.. पापा यदि बैठे हुए हों तो उनकी गोद में मैं भी बैठा रहता था..

मम्मी हमेशा पापा को कहती थी कि अगर ये बिगड गया तो सारा कसूर आपका ही होगा, और पापा उसी समय पलट कर कहते थे, और अगर सुधरा तो सारा श्री भी मेरा ही होगा.. मम्मी कभी इस बात का विरोध नहीं करती थी, बस इतना ही बोलती थी, अगर सुधरा तो ना?

बचपन में मम्मी अगर मारती भी थी(मुझे याद नहीं की मम्मी कभी मारी हो मुझे, मगर ऐसा ही सुना है), या डांटती भी थी तो भी बचाने के लिए मम्मी को ही पुकारता था.."मम्मीsssss"!!!! पापा हमेशा मेरे साथ खड़े रहे हैं कदम-कदम पर.. मगर कभी बचाने के लिए उनका नाम नहीं पुकारा हूँ...

उनसे दूर होने के बाद जब कभी किसी बड़े कष्ट में रहा हूँ, जैसे की वायरल बुखार, जैसे की पैर का टूटना, तो भी कराहते हुए "मम्मी" ही पुकारता रहा हूँ.. ये जानते हुए भी की बचपन से ही पापा की "जान" रहा हूँ मैं.. पन्द्रह-सोलह साल तक की उम्र तक उनकी गोद में बैठ कर खेला हूँ, जो कई लोगों को अतिशयोक्ति लग सकती है..

मुझे वह दिन भी याद है जब कई अन्य वजहों से मैं जितनी दफे दिल्ली से पटना जाता था और पड़ोस से चाभी लेकर घर खोलता था, फिर अगले दिन वह चाभी उसी पड़ोस में देकर गोपालगंज के लिए निकल जाता था..M.C.A. पहले सेमेस्टर की परीक्षा के बाद जब घर लौट रहा था तब मन में इस विकार के साथ यात्रा की थी कि अगर इस दफे भी घर में कोई ना हुआ तो पूरे तीन साल बाद ही घर जाऊँगा.. जी हाँ, वह विकार ही था, और इसे आज महसूस करता हूँ.. मम्मी आज तक सिर्फ एक ही इंसान को लेने के लिए रेलवे स्टेशन गई है, और वह मैं ही था, जब पहले सेमेस्टर की परीक्षा के बाद घर लौटा था..

अब ये तो पता नहीं की कितना सुधरा, इसका हिसाब-किताब उन्हें ही करने दिया जाए.......