Sunday, August 28, 2011

महुवा घटवारन से ठीक पहले

बचपन से 'बाढ़' शब्द सुनते ही विगलित होने और बाढ़-पीड़ित क्षेत्रों में जाकर काम करने की अदम्य प्रवृति के पीछे - 'सावन-भादों' नामक एक करुण ग्राम्य गीत है, जिसे मेरी बड़ी बहिन अपनी सहेलियों के साथ सावन-भादों के महीने में गाया करती थी । आषाढ़ चढ़ते ही - ससुराल में नयी बसनेवाली बेटी को नैहर बुला लिया जाता है । मेरा अनुमान है कि सारे उत्तर बिहार में नव-विवाहिता बेटियों को 'सावन-भादों' के समय नैहर से बुलावा आ जाता है...और जिसको कोई लिवाने नहीं जाता वह बिचारी दिन-भर वर्षा के पानी-कीचड़ में भीगती हुई गृहकार्य संपन्न करने के बाद नैहर की याद में आँसुओं की वर्षा में भीगती रहती है । 'सावन-भादों' गीत ऐसी ही, ससुराल में नयी बसने वाली कन्या की करुण कहानी है :
"कासी फूटल कसामल रे दैबा
बाबा मोरा सुधियो न लेल,
बाबा भेल निरमोहिया रे दैबा
भैया के भेजियो न देल,
भैया भेल कचहरिया रे दैबा
भउजी बिसरी कइसे गेल...?"
(अब तो चारों और कास भी फूल गए यानि वर्षा का मौसम बीतने को है । पिछली बार तो बाबा खुद आये थे । इस बार बाबा ने सुधि नहीं ली । बाबा अब निर्मोही हो गए हैं । भैया को 'जमीन-जगह' के मामले में हमेशा कचहरी में रहना पड़ता है । लेकिन, मेरी प्यारी भाभी मुझे कैसे भूल गई?)

भाभी भूली नहीं थी, उसने अपने पति को ताने देकर बुलाने के लिए भेजा । भाई अपनी बहिन को लिवाने गया...इसके बाद गीत की धुन बदल जाती है । कल तक रोनेवाली बहुरिया प्रसन्न होकर ननदों और सहेलियों से कहती है :
"हाँ रे सुन सखिया ! सावन-भादव केर उमड़ल नदिया
भैया अईले बहिनी बोलावे ले - सुन सखिया..."
ओ ननद-सखी ! सावन भादों की नदी उमड़ी हुई है । फिर भी मेरे भैया मुझे बुलाने आये हैं । तुम जरा सासजी से पैरवी कर दो कि मुझे जल्दी विदा कर दें...सास कहती है, मैं नहीं जानती अपने ससुर से कहो । ससुर ताने देकर कहता है कि नदिवाले इलाके में बेटी की शादी के बाद दहेज में नाव क्यों नहीं दिया । अंत में, पतिदेव कुछ शर्तों के साथ विदा करने को राजी होते हैं । ससुराल की दुखिया-दुलहिन हंसी-खुशी से भाई के साथ मायके की और विदा होती है । लेकिन, नदी के घाट पर आकर देखा - कहीं कोई नाव नहीं । अब क्या करें ! भाई ने हिम्मत से काम लिया । कास-कुश काटकर, मूँज की डोरी बनाकर और केले के पौधों के ताने का एक 'बेड़ा' बनाया और उस पर सवार होकर भाई-बहिन उमड़ी हुई कोशी की धरा को पार करने लगे । बेड़ा डगमग करने लगा । और, आखिर :
"कटि गेल कासी-कुशी छितरी गेल थम्हवा
खुलि गेल मूँज केर डोरिया - रे सुन सखिया !
...बीचहि नादिया में अइले हिलोरवा
छुटि गेलै भैया केर बहियाँ - रे सुन सखिया !
...डूबी गेलै भैया केर बेडवा - रे सुन सखिया !!"
(नदी के उत्ताल तरंगों और घूर्णिचक्र में फंसकर बेड़ा टूट गया । भाई का हाथ छूट गया । और, भाई का बेड़ा डूब गया । भाई ने तैरकर बहिन को बचाने की चेष्टा की, किन्तु, तेज धरा में असफल रहा । डूबती हुई बहिन ने अपना अंतिम संदेशा दिया - माँ के नाम, बाप के नाम...फिर किसी बेटी को सावन-भादों के समय नैहर बुलाने में कभी कोई देरी नहीं करे । और देरी हो जाए तो जामुन का पेड़ कटवाकर नाव बनवाए, और तभी लड़की को लिवाने भेजे !)

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फणीश्वर नाथ 'रेणु' जी की किताब "ऋणजल धनजल" से लिया हुआ ।



Wednesday, August 24, 2011

दरवाजा

कुछ दिनों पहले एक अजीब सा वाकया हुआ.रक्षा बंधन के दिन कि बात है.. मेरे घर पे मेरे भाइयों का जमावड़ा लगा था.. उनमे मुन्ना भैया और मुक्ता भाभी भी थे.. सबने खाना खाया.. लगभग रात के साढ़े दस या एग्यारह बजे भैया और भाभी अपने घर जाने को निकले.. नीचे तक छोड़ने के लिए मैं भी साथ निकली और मेरे साथ मेरी दोनों बेटियां भी.. मैंने देखा हमारे पडोसी का ड्राईवर अपने पूरे परिवार के साथ सीढ़ी चढ रहा था.. गौर से देखा, उसकी पत्नी ने एक हैण्ड बैग भी टांग रखा था और दो लड़कियां और एक छोटा सा लड़का भी था..

उस ड्राईवर को मैं प्रतिदिन गाड़ी कि सफाई करते तो घर का सामान लाते और यहाँ तक कि उनके कुत्ते को घुमाते भी देखा था.. वो इतने लगन से गाडी कि सफाई करता है कि मैंने अपनी गाडी को साफ़ करने के लिए भी उससे पूछ लिया था, जिससे उसने नम्रतापूर्वक इनकार भी कर दिया था.. कुल मिला कर ये तो मैं जानती हूँ कि वो बरसों से उनके घर पे काम करता है..
हाँ तो अब अपनी बात पे आती हूँ.. नीचे भैया भाभी को विदा करते हुए लगभग दस पन्द्रह मिनट लग गए.. बच्चे भी खेलने के मूड में थे.. भैया कि बेटी सुर को जाने नहीं देना चाहते थे.. कुल मिला कर काफी वक्त बाद हम ऊपर अपने घर कि ओर वापस आये..

मैं हैरान रह गयी जब देखा कि इतनी देर बाद भी उन पडोसी का दरवाजा नहीं खुला था.. वो अब बेल बजाना छोड़ कर हलकी आवाज़ लगाने लगा..'मैडम...मैडम'...उसकी पत्नी और बच्चे थोड़े परेशान हो रहे थे.. अंदर से उनके कुत्ते के भौंकने कि आवाज़ भी आ रही थी.. यानी उस जानवर को भी समझ में आ गया था कि बाहर कोई है..

मैं कुछ समझ नहीं पा रही थी.. मेरे पति शेखर भी दफ्तर के काम से मुंबई गए थे.. एक बार उनसे पूछने को हुई कि क्या बात है.. फिर डर गयी कि मैं तो अभी अकेली हूँ बच्चों के साथ.. फिर सोचा कि शायद अंकल-आंटी दरवाज़ा खोल ही दे.. इसी दुविधा में अपने घर के अंदर आ गई..

अब तक रात काफी हो चुकी थी, साढ़े ग्यारह से ऊपर हो चुका था.. बच्चों को सोने के लिए कहा.. काफी देर बाद पानी पीने रसोई गयी.. अभी भी वो आवाज़ लगा रहा था.. बच्चों के पास वापस आई ! काफी देर तक सो नहीं पायी ! एक ही सवाल मन में उठ रहा था कि क्या कोई अपने घरेलू नौकरों के प्रति इतना निर्दयी हो सकता है ? कम से कम दरवाज़ा खोल के उसका हाल तो ले ही सकते थे..

अपने ऊपर भी गुस्सा आया.. क्यों नहीं मैंने भी उससे इतनी रात गए सपरिवार यहाँ आने कि वज़ह पूछा.. पर मैं तो उसे ठीक से जानती भी नही..
शायद उस रात उन लोगो ने दरवाज़ा नहीं खोला था और उसे वापस जाना पड़ा था.. अब भी वो हर दिन उसी लगन से सारे काम करता दीखता है.. लेकिन मैं नहीं पूछ पाती कि उस रात क्या हुआ था..

दीदी(रश्मि प्रिया) की कलम से

दीदी से बिना पूछे ही उनके बज्ज से उठा कर छाप रहा हूँ.. सोच रहा हूँ की वो जो कुछ भी लिखे, जो मुझे अच्छा लगे, वो इधर तब-तक छापूंगा जब-तक की वो खुद ही इसे सोशल नेट्वर्किंग साईट्स से हटाकर किसी ब्लॉग पर लिखना शुरू ना कर दे..


आज शाम एक खबर सुनी, सहसा विश्वास ना हो सका.. डा.अमर कुमार जी अब हमारे बीच नहीं रहे.. क्या संयोग है, दीदी के बज्ज पर किये गए इस पोस्ट को पढ़ने के बाद मैं आज ही कुछ साल पहले दीदी के ऊपर लिखी गई एक पोस्ट को देख रहा था, जिस पर डा.अमर जी ने बेहद भावुक होकर एक कविता कमेन्ट में लिखी थी.. मैंने उससे पहले कभी भी उन्हें भावुक होते नहीं देखा था.. उसी पोस्ट के बाद पहली दफ़े उनसे बातें करने का मौका भी मिला था.. फिलहाल मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं.. मुझे शब्दों में किसी का दुःख बांटना नहीं आता है, सो मूक श्रद्धांजलि ही सही.. उन पर लिखे गए यह शब्द उनके ही अंदाज में तिरछे...



Thursday, August 18, 2011

एक सौ सोलह, चाँद की रातें

ये आर्चीज़ वाले जान बूझ कर सेंटीमेंटल और यादगार गीत बजाते हैं. ये चाहते हैं की फ़साने चलते रहें. रिया ने यही सोचते हुए अपनी गिफ्ट में मिली स्टील घडी को कलाई पर कसा और आर्चीज़ वाले को बोला - भैया, ये विंड चाइम्स, वो चोकलेट, और सोनू निगम की 'जान' सी. डी. एक साथ वो वाले रंगीन कवर में पैक कर दो. पैकिंग के दौरान प्लेयर पर टेप गिर गया... नेक्स्ट गाना : मेरा वो सामन लौटा दो....

रिया ब-मुश्किल ही गाली रोक पायी. %#$@%

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जैसे जिंदगी वैसा ही बातों में विरोधाभास... कहना, काटना फिर वही कहना.. नाटक के दो जुदा पात्र अपने ही अन्दर. झगडा तो ता-उम्र चलता रहा... चलते फिरते उस रंगमच से आप काफी कुछ सीख सकते हैं. अव्वल तो ये की वैसा दूसरा ना होगा ये मानते हुए उससे नफरत करना और दूरी बना कर रखना. आवाज़ कभी यूँ की जैसे सरौते से सुपारी काट रहे हों और कशिश यूँ कि कोहरे के पीछे हल्का दीखता चेहरा.... औंधे पड़े हुए कहीं डीप कट ब्लाउज वाली स्त्री ... अधिकार हुआ तो क्या हुआ ... जिसे चूमने जा रहे हों रहे हों उसे पहले कम से कम बता तो दो...
आधी रात को जब भी खवाब महके हाथ पर कुछ पेशानी से यूँ ही कुछ ठंढी बूंदे गिरती जाती थी.

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उसने पेड़ की डाल पकड़ के आमिर खान की तरह 'पहला नशा, पहला खुमार' गाना था लेकिन उसने सेनोरिटा को चुना... स्पेनिश बोलने में जुबान लड़खड़ा जाती थी लेकिन भरपूर कोशिश की. चाहत के दो पल भी मिल पाए पर विशेष जोर देता (ये व्यक्तिगत रूप से अभिव्यक्त की गयी सामूहिक गान था) डाल पर झूमने के बजाय मेट्रो के नीचे लेट कर गाने लगा... कलाई से खून जब फव्वारे की तरह फूटा तो ग्लास में लाल पानी का चढ़ता नज़र आया. मेट्रो जब गुज़र चुकी वह फिर उठ खड़ा हुआ उसे गुमान था नायिका अपने सहेली को कविता सुना रही होगा - सखी वो मुझसे कह कर जाते... उधर लड़की ने भी गीत बदल लिया था "उसने जब मेरी तरफ प्यार से देखा होगा, मेरे बारे में बड़े गौर से सोचा होगा:
गति सम्बन्धी कुछ नियम भौतिकी के सत्य हुए थे. बस ज़रा दोनों ने अपने अपने युग बदल लिए थे.

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ऑरकुट पर नहीं वो नहीं मिला तो लड़की ने फेसबुक पर उसे खोजना शुरू किया. थोड़ी मुश्किल हुई लेकिन मिल गया. प्रोफाइल में चेहरा उभरा तो दिल धक् से रह गया. ह्म्म्म... ! तो आँखें अभी भी फरेबी हैं और दिल सुख़नसाज... तस्वीर में खुश ही लग रहा है.
उधर तस्वीर भी अपनी पलक बिना गिराए पूछ रहा था - हमसे ना पूछो हिज्र के किस्से, अपनी कहो अब तुम कैसे हो ?

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लड़की ने बादलों से घिरे दिन को देख को झूले पर झूलते हुए लड़के को देखा. उसका दिल रीझ आया. गाना शुरू किया - तेरे नाम से शुरू तेरे नाम पे ख़तम... लड़का खुश हुआ, बोला - ओ सात घाट की रानी, कह्नानी- जवानी - कहानी.. बेसाख्ता निकले ये शब्द! तब कहाँ पता था की गीत के बीच में थोड़ी देर के लिए बिजली गयी थी और इसी में घोटाला हो गया बोले तो हंगामा हो गया...
बरसों बाद दोनों फिर मिले और अबकी कह्नानी- बुढ़ापा - कहानी थी. स्मृति भी साथ छोड़ देती थी.

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लेखक: सागर शेख
संकलनकर्ता: पूजा
प्रस्तुतकर्ता: प्रशान्त


Sunday, August 07, 2011

दो बजिया बैराग्य - एक और भाग

अगर गौर से सोचें तो सुबह उठना हर व्यक्ति के लिए अपने आप में एक इतिहास की तरह ही होता है, और इतिहास अच्छा, बुरा अथवा तटस्थ, कुछ भी हो सकता है और एक साथ सब कुछ भी.. जब तक घर में रहा तब तक मैं भले ही कितनी ही सुबह उठ जाऊं, पापा या मम्मी या फिर दोनों को ही जगा हुआ पाया हूँ.. पता नहीं माता-पिता इतनी जल्दी कैसे उठ जाया करते हैं?

बहुत बचपन की एक याद बाकि है अभी भी, हर सुबह पापा गोद में उठा कर सारे घर में घूमते थे.. कुछ वैसे ही जैसे अपने पिछले पटना प्रवास के दौरान केसू को घुमते देखा था उन्हें(इस बाबत सीन तीन पढ़ें इस पोस्ट का).. और मैं उनके कंधे पर सोया हुआ रहता था, बीच-बीच में आँखें मीचते हुए..

कुछ साल बाद की भी बात याद है.. हम तीनों भाई-बहन का एक ही कमरा हुआ करता था, जिसमें दो बिस्तर लगे रहते थे.. एक दीदी का और दूसरा बड़ा वाला हम दोनों भाइयों का.. यहाँ मैं अपनी बात करने आया हूँ तो सिर्फ अपनी ही बात करूँगा, भैया दीदी की नहीं, स्वार्थी हूँ इस मायने में.. अगर जाड़े की सुबह हुई हो तो पापा अपने ठंढे हाथों को मेरे गालों से छुवा देते थे, साथ में कोई गीत भी हुआ करती थी, कोई सा भी गीत, ऐसा गीत जिसमें एक चिढाने का तत्व जरूर होता था.. फिर भी अगर नहीं उठा तो रजाई भी धीरे से नीचे सरक जाती थी.. धीरे से उठ कर या फिर नखरे के साथ उठ कर मैं उनसे चिपक कर उनके ओढ़े हुए चादर में सिमटने की कोशिश करने लगता जहाँ वह या तो चाय पीते रहते थे या फिर चाय पीने के बाद अखबारों में खबरें ढूंढते फिरते थे.. वहीं अगर गर्मियों का मौसम हुआ तो कई दफे उनके हाथों से टपकते हुए पानी के माथे पर बूँद-बूँद गिरने से.. कई दफे ऐसे भी सुबह जगा हूँ जग तेज आंधी-तूफ़ान में पापा या मम्मी खिड़कियों को बंद करने की मसक्कत कर रहे हों..

आज भी हर रोज सुबह होती है.. आज भी रोज सुबह उठता हूँ.. अगर पटना में हुआ तो भी अब कोई उठाता नहीं है, ये कह कर की इस लड़के को नींद बहुत कम आती है, सो जितने दिन घर पर है उतने दिन इसे जी भर कर सोने दिया जाए.. नौ-साढ़े नौ बजे पापा उठाते हैं और मुंह हाथ धोए बिना ही जबरदस्ती अपने साथ नाश्ते पर बिठा देते हैं.. फिलहाल तो चेन्नई में हूँ और जिंदगी का अधिक समय इसी शहर में गुजर रहा है.. सुबह साढ़े आठ बजे मोबाईल का अलार्म बजता है.. हाथ यंत्रवत आँख मून्दे में ही टच स्क्रीन को सही जगह छूकर अलार्म को बंद कर देता है.. फिर साढ़े नौ अथवा दस बजे तक खुद ही उठता हूँ.. फिर दफ्तर जाने की मारा-मारी, और अगर साप्ताहांत हुआ तो मोबाईल पर ही मेल चेक करने के बाद फिर सो जाना..

जिंदगी के तीस बसंत गुजर चुके हैं.. अगर आज भी घर पर होता तो सुबह उठ कर आशीर्वाद लेने से पहले ही पापा सीने से लगा लेते और मम्मी माथे को चूम लेती.. जो किसी आशीर्वाद से कहीं बेहतर रहता आया है मेरे लिए.. एक आत्मिक संतोष जैसा कुछ.. जन्मदिन की सुबह तो यक़ीनन ऐसी ही होती.. आज फिर पापा के सीने से लगने की इच्छा हो रही है.. सोचता हूँ की मम्मी के अपने माथे को चूमने के एवज में शायद मैं उनके गाल को चूम लेता.. मैं उन्हें अक्सर छेड़ने के लिए उनका गाल चूम लेता हूँ और वो मुस्कुरा कर एक थप्पड़ सर पर लगा देती है, शायद तब भी ऐसा ही करती.. पापा को सीने से लगाने के बाद मैं उन्हें नहीं छोड़ता हूँ तब वह अक्सर पेट में गुदगुदी लगाने लगते हैं, तब भी शायद ऐसा ही करते..

फिलहाल तो मोबाईल को बंद करके बैठा हूँ.. किसी से कोई बात करने की इच्छा नहीं है.. एक अवसाद में घिरा हुआ हूँ.. अवसाद क्यों? कुछ पता नहीं.. जीवन के लक्ष्य का कुछ पता नहीं.. जीने की वजहों को इतने साल बीतने के बाद भी नहीं जान पाया हूँ.. हर महीने तनख्वाह की रकम मिलना, उसमें से कुछ बचाना एक अनिश्चित भविष्य के लिए, कुछ खर्च करना निश्चित वर्तमान के लिए, और बीते भूत के लिए कभी खुश होना और कभी खुद को कोसना, यूँ ही पूरा महीना निकलते जाना, साल-दर-साल.. क्या ऐसे ही मानव जीवन को लोग अमूल्य मानते हैं? मुझे तो नहीं लगता.. कहने को तो मैं भी अच्छा ख़ासा दर्शन कह सकता हूँ, मगर उससे क्या? क्या मेरी यह दिनचर्या बदल जायेगी? नहीं!! जिंदगी वहीं की वहीं रहेगी, रेत के एक-एक दाने की तरह फिसलती हुई.. साल-दर-साल यूँ ही गुजरते हुए कई सालों के बाद एक दिन मैं भी गुजर जाऊँगा.. बदलेगा कुछ नहीं.. जिंदगी भर यूँ ही माया के पीछे भागता ही रहूँगा..

बहुत बेचैन हुआ जा रहा हूँ, मन बहुत विचलित है.. फिलहाल जहाँ हूँ वहाँ होने की इच्छा नहीं है.. कल दिन भर शायद भागता फिरूँगा, ये भागना किसी और से नहीं, खुद से ही है.. क्यों? कुछ पता नहीं.. अभी जो पता है वह यह की I am missing my Mummy-Papa.......मगर साथ ही एक और बात सच है की मैं फिलहाल अकेले रहना चाहता हूँ.. किसी का भी साथ नहीं चाहता हूँ, मम्मी-पापा का भी नहीं.....किसी ऐसे जगह पर घंटों चुपचाप बैठना चाहता हूँ जहाँ घोर सन्नाटा हो.. इतना सन्नाटा की खामोशी कि वह आवाज कानों के परदे को फाड डाले......

Tuesday, August 02, 2011

पहली कसम

किसी बच्चे
को कभी देखा है कंचे के साथ? जब किसी बच्चे से पहली बार उसका एकलौता कंचा गुमा हो तब उसे बहुत तकलीफ़ हुई होगी.. फूट-फूट कर रोया होगा सारी रात, कभी छिड़ीयाया होगा सारी रात, कभी भोकार पाड़ लार रोया होगा.. कभी माँ ने तो कभी पिता ने उसे तरह-तरह से उसे बहलाया होगा.. चन्द्र खिलौना ला दूँगा.. मगर बच्चे का गम उस चन्द्र खिलौने के नाम से भी कम नहीं होगा..

उसी बच्चे को जब वही कंचा पहली बार मिला होगा तब उस बच्चे के मुताबिक उससे अधिक खुश कोई ना रहा होगा.. सारा दिन अपनी छोटी सी मुट्ठी में कंचे को दबाये फिरता रहा होगा.. मुट्ठी कस कर बंद, के कहीं कोई देख ना ले.. दुनिया से छिप-छिपाकर अपनी मुट्ठी को जरा सा ढीला छोड़कर उसमें झांकता होगा, और फिर से मुट्ठी वैसे ही कस कर बंद.. रात के अँधेरे और लालटेन की हल्की रौशनी में सबसे छुपाकर, आँखों में उस कंचे को लगाकर, लालटेन कि रौशनी में देख-देख कर खुश होता रहा होगा.. वह उसे दिन में सूरज की रौशनी में उसकी चमक देखना चाहता होगा, मगर कहीं सारी दुनिया ही ना देख ले इसे, इस डर से कभी उसने कोशिश भी ना की होगी..

कुछ दिन बाद उसे एक और कंचा मिला जिसे कुछ दिन बाद उसने फिर गुमा दिया लेकिन वह फिर से उसी दुःख से नहीं गुजरा, एक ही टूटे पुल से कोई बार-बार गुजरता है भला? हिचक-हिचक कर रोने से बेहतर वह अकेले गुमसुम बैठा रहा.. रात को लालटेन बुझा कर.. यक़ीनन दुःख तो हुआ ही होगा, क्योंकि अगली बार जब उसे एक और कंचा मिला तब वह जानकर उसे नहीं उठाया, एक भय से, कि वह फिर गुम होना ही है, तो एक और तीसरे कंचे का दुःख क्यों पाले भला?

Monday, August 01, 2011

प्रलाप

एक अरसा हुआ कुछ लिखे हुए.. कई लोग मेल करके पूछ चुके हैं कि कई दिन हुए ! क्यों नहीं लिखता हूँ इसका जवाब जानता हूँ.. जो भी लिखूंगा वह कुछ भला सा नहीं होगा.. वह कुछ ऐसा ही प्रलाप होगा जैसे कोई पागल बीच चौराहे अपने कपड़े फाड़-फाड़ कर अर्धनग्नावस्था में घूमता है, और उसे देखकर या तो लोग बगल हट जाते हैं या तो 'च्च च्च' की आवाज देते हैं या तो कोई डबल रोटी का एक टुकड़ा फ़ेंक जाता है या तो कोई सहानुभूति जताता है, मगर अपनाने को कोई आगे नहीं आता.. और अंततः हर सहानुभूति, हर डबल रोटी का टुकड़ा और हर 'च्च च्च' की आवाज किसी आधुनिक समाज के प्रपंच से अधिक नजर नहीं आता है.. अरे मैं उन सब भावों में घृणा का भाव तो भूल ही गया था.. वह पागल पता नहीं क्या समझता होगा और क्या नहीं, मगर मैं उन दीन भावों को नहीं सह सकता..