यह बातें मैंने ३० जून २०१० को लिखी थी.. लिखते वक्त जाने किन बातों को सोचते हुए इतनी तल्खियत में लिख गया था.. आज ना वे बातें याद हैं और ना ही उन बातों के पीछे कि तल्खियत.. फिर भी इसे जस का तस आप तक भेज रहा हूँ..
अब अच्छी कहे या बुरी, मगर जनाब आदत तो आदत होती है.. और जो छूट जाये वह आदत ही क्या? जैसे मेरी एक आदत है.. कहीं कुछ भी अच्छा लिखा दिखा, तो उसे अपने कालेज के उन सहपाठियों को मेल कर देता हूँ जिन्हें अपना मित्र समझता हूँ.. कई बार तो यह भी नहीं बताता हूँ कि यह मैंने लिखी या किसी और ने.. मुझे कभी-कभी अपना लिखा भी पसंद आ ही जाता है.. अपना लिखा पसंद करने में कोई गुनाह भी नहीं दीखता है मुझे.. जब मैं "मेरी छोटी सी दुनिया" में नहीं लिख रहा होता हूँ तो अपने निजी ब्लॉग पर लिखता होता हूँ, इसे स्वांत सुखाय कर्म कहना ही ठीक रहेगा.. किसी निजी डायरी कि तरह, जिसके दरवाजे बंद हैं सभी के लिए.. उन्हें जब कुछ भी मेल करता हूँ, तब मुझे एक-दो को छोड़ किसी से यह उम्मीद बिलकुल नहीं होती है कि वे इसे पढेंगे ही.. वे भी शायद यही समझते होंगे कि क्या पागलों कि तरह इतने लंबी-लंबी कहानियाँ मेल करता रहता है.. खैर इसकी परवाह होती तो अभी तक यह सिलसिला ना चलता होता.. जिस दिन कोई कह देगा कि मत भेजो, उस दिन से उसे भेजना बन्द.. फिलहाल तो यह जारी ही रहेगा.. आदत जो ठहरी.. और आदत इतनी आसानी से थोड़े ही ना जाती है!!!
अभी कुछ दिन पहले कि ही बात है.. मैंने "मानव के मौन" से उठाकर यह कहानी "तोमाय गान शोनाबो" सभी को मेल की.. फिर एक दिन अपने एक मित्र से यूँ ही पूछ बैठा, "आजकल फुरसत में हो(उन दिनों वाकई वह फुर्सत में थे), तो कहानी पढ़ने का पूरा समय मिल जाता होगा? वह कहानी कैसी लगी?" यह मित्र उन मित्रों में से आता है जिनसे यह उम्मीद रहती है कि उसे पसंद आये ना आये मगर वह पढता जरूर होगा.. उसने कहा, "थोडा और खुलकर लिखता तो मस्तराम हो जाता.." मैं भी उसकी बात पर हँस दिया.. खुद के हँसते वक्त मुझे यह भी याद आया कि कैसे उस दिन मैंने उससे जिरह की थी जब मेरे ही कहने पर वह मंटो को पढ़ा था और लगे हाथ उसने भी मंटो को अश्लील कह कर ख़ारिज करने कि कोशिश भी की थी.. साहब, कोशिश क्या की थी, वो तो लगभग ख़ारिज हो भी चुका था.. बड़ी मुश्किल से मंटो को अश्लील होने से बचाया था, शायद!! मगर अब इन जिरहों में नहीं पड़ना चाहता था.. यह सोच कर सिर्फ हँस कर निकल लिया कि हर कोई अपनी सोच के साथ जीता है, मैं भी.. और उस सोच में कोई किसी तरह का खलल नहीं चाहता है..
ठीक ऐसी ही एक मित्र हैं, उसे कई वैसी कहानियों या सिनेमाओं से चिढ है जो सच्चाई दिखाती हो, या फिर उन कहानियों किस्सों को नापसंद करती हो जिसे मैं पसंद करता हूँ.. अभी तक तय नहीं कर पाया हूँ.. उससे भी यह उम्मीद हो चली है कि अधिकांश फीसदी मेरी भेजी कहानियाँ पढ़ती होगी.. क्योंकि अधिकतर मेरी भेजी वैसी कहानियों पर अपनी नापसंदगी जाहिर कर चुकी है जिसका अंत असल दुनिया कि तरह ही निराशाजनक होता है.. शायद उसके ख्वाबों कि दुनिया में असल दुनिया अथवा असल दुनिया कि कहानियों की कोई जगह तय नहीं होगी.. शायद!! पता नही!!! उफ़ ये परीज़ाद के किस्से भी!!!!
मुझे वह दिन भी याद आ गया जब घर पर अपनी एक मित्र के साथ बैठ कर गप्पे हांक रहा था और उधर टीवी भी चल रही थी.. कोई म्यूजिक चैनल था, जिस पर बदल-बदल कर गाने आ रहे थे.. मैं गुलजार के किसी गाने पर अटक गया.. वह मुझसे बेतक्कलुफ़ होकर कह दी, "मुझे गुलजार के गाने कभी समझ में नहीं आते हैं, मगर जब सभी तारीफ़ करते हैं तो अच्छा ही लिखते होंगे.." मैंने कहा, "समझना चाहो ता जरूर समझ में आएगी.." उसका कहना था, "ठीक है, तुम ही समझा दो कभी.." मैंने कहा, "ठीक है, समय आने दो.." मगर मन में चल रहा था कि उसे उन चीजों को कैसे समझाऊं जो भावनाओं पर बहते हैं, परिस्थितियों से गुजरते हैं.. गुलजार साहब, शब्दों से यूँ खेलना ठीक नहीं.. कहीं पढ़ा था, सागर के ब्लॉग पर, "एक सौ सोलह चाँद कि रातें, एक तुम्हारे काँधे का तिल" जैसी बातों को समझाने से उसने मना कर दिया था....अब कोई भला इसे कैसे समझायेगा? ये बचपन के, स्कूल के समय के कमबख्त हिंदी टीचर ने भी कबीर और रहीम के दोहे जैसी चीजों के अलावा कुछ भी नहीं समझाया.. बिहारी तक आते आते उनकी पढाने की कला में चूक हो जाया करती थी, या सिलेबस खत्म, या परीक्षा के चलते टाल जाया करते थे.. इन अथाह प्यार में डूबे गीतों को भी उन्होंने कभी नहीं समझाया जिनमे भावनाएं सच्चाई के साथ सवार रहती है...
एक दफ़ा जब याद है तुमको, जब बिन बत्ती सायकिल का चालान हुआ था.. हमने कैसे, भूखे-प्यासे, बेचारों सी एक्टिंग की थी.. हवलदार ने उल्टा एक अठन्नी देकर भेज दिया था.. एक चव्वनी मेरी थी, वो भिजवा दो..
सावन के कुछ भींगे-भींगे दिल रक्खे हैं, और मेरी एक ख़त में लिपटी रात पड़ी है.. वो रात बुझा दो, और भी कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है, वो भिजवा दो..
पतझड़ है कुछ, पतझड़ में कुछ पत्तों के गिरने की आहट, कानों में एक बार पहन कर लौट आई थी.. पतझड़ कि वो साख अभी तक कांप रही है.. वो भिजवा दो,
एक सौ सोलह चांद की रातें, एक तुम्हारे कांधे का तिल.. गिली मेंहदी की खुश्बु, झूठ-मूठ के शिकवे कुछ.. सब भिजवा दो..
हर बार घर से वापस आने का समय अजीब उहापोह लिए होता रहा है, इस बार भी कुछ अलग नहीं.. अंतर सिर्फ इतना की हर बार एक-दो दिन पहले ही सारे सामान तैयार रखता था आखिर में होने वाली हड़बड़ी से बचने के लिए, मगर अबकी सारा काम आखिरी दिन के लिए ही छोड़ दिया.. साढ़े बारह बजे के आस-पास घर से निकलना भी था और आठ साढ़े आठ से पहले मैं जग नहीं सकता ये भी पता.. कुल मिला कर मैं मानसिक तौर पर इस बात के लिए तैयार था कि कुछ ना कुछ मैं छोड़ कर ही आऊंगा..
"अब ये क्या है?" माँ कुछ दे रही थी, तीन-चार पन्नियों में अच्छे से जकड़ा हुआ एक पैकेट.. "काजू-किशमिश का पैकेट है.. तुम्हे अच्छा लगता है, और मुझे पता है कि तुम खरीदता नहीं है वहाँ.." यही कुछ जवाब आया.. पिछली दफे मैं हर ऐसे किसी पैकेट पर ऐतराज जताता रहता था जिसे मैं चेन्ना में आसानी से खरीद सकता हूँ, मगर अबकी मैं अन्य दिनों कि अपेक्षा चुपचाप सब रखे जा रहा हूँ.. अपना लगभग खाली सा बैग टटोलता हूँ, याद आता है कि आते समय पापा कि कई किताबें याद करके लेता आया था.. कुछ सामान भी था जैसे दीदी की साडी, बच्चों कि कुछ चीजें, एक अन्य मित्र के लिए कांचीपुरम की साडी.. अब बैग लगभग आधा से अधिक खाली है.. हाँ, जितनी किताबें लेकर आया था, लगभग उतनी ही पुनः लेते जाना है.. उसे कंधे पर टांगने वाले बैग में रख लूँगा.. इस बैग को कार्गो में भेजना है, जिसका वजन अधिक नहीं होना चाहिए.. वैसे भी किताबों का वजन कुछ अधिक ही होता है, चाहे दिमाग पर हो या कन्धों पर.. "बगल में एक डब्बा भी रखा हुआ है, उसे भी रख लो.." एक और संवाद, "अब क्या है इसमें?" "मखाना भूंज कर, पीस कर रखा हुआ है.. वहाँ ये नहीं मिलता होगा, खीर बना कर खाना.." मैं थोड़ी सी जगह बनाता हूँ और उसे भी रख लेता हूँ.. आलमीरा से एक शर्ट निकालता हूँ.. पास मौजूद हर चीज से कोई ना कोई किस्सा जुड़ा होता है, कई लोग अपना पात्र निभा चुके होते हैं उन किस्सों में.. उस शर्ट से भी जुड़े कुछ किस्से याद आते हैं.. कुछ-कुछ पुराने जमाने के सिनेमा कि तरह बैक्फ्लैश के कुछ सीन आँखों के सामने से गुजर कर थम जाता है.. कुछ साल पुराने किस्से.. वे किस्से जो आज भी मेरे भीतर कहीं पैठ जमाये हुए हैं, फिर से उस किस्से में अपना पात्र याद नहीं करना चाहता हूँ सो वापस रख देता हूँ..
नाश्ते के लिए पूछा जाता है, मैं मना कर देता हूँ.. कहता हूँ कि एक ही बार खाना खाकर एयरपोर्ट के लिए निकलूंगा.. वापस जाने का उद्देश्य सोचते हुए घर में टहलता हूँ.. पापा मम्मी के कमरे में जाता हूँ.. पापा नाश्ता करके नींद में हैं.. उनके बगल में लेट कर उनके गोद में समाने की असफल कोशिश करता हूँ.. याद आता है कि अब उनसे भी एक-दो इंच लंबा हो चुका हूँ, मगर उनके सामने जाता हूँ तो हमेशा मुझे वही पापा याद आते हैं जो बचपन में दिन भर मुझे गोद में उठाये घुमते थे.. कई किस्से आँखों के सामने घूम जाते हैं.. मुझे वह पापा याद आते हैं जिनके मातहत कर्मचारी उन्हें हम बच्चों के साथ हंसी-ठिठोली करते देख सदमे कि स्थिति में आ जाया करते थे, उन्होंने सपने में भी ये कभी नहीं सोचा था कि इतने कड़क साहब का यह रूप भी हो सकता है.. कुछ उससे पुराने किस्से भी नज़रों के सामने घूमने लगते हैं जब गाँव जाने पर भैया-दीदी कहीं और निकल जाते थे मगर मैं पापा या मम्मी को छोड़ कर कहीं नहीं जाता था और अब हालात कुछ ऐसे हैं कि पापा-मम्मी से सबसे अधिक समय तक अलग रहने का रिकार्ड सा बनाते हुए इतनी दूर फिर से निकल जाना है.. जीवन का लक्ष्य क्या है? क्या पैसे कमाना ही 'कुछ' या 'सब कुछ' है? कहीं मैं किसी मृगमरीचिका के पीछे तो नहीं भागा जा रहा हूँ? कहीं हम सभी किसी मृगमरीचिका के पीछे तो नहीं भाग रहे हैं? कुछ प्रश्न मन में आते हैं, जिनका कोई उत्तर ना पाकर मैं खीज उठता हूँ, और उन्हें नजरअंदाज ना करते हुए भी नजरअंदाज कर देता हूँ.. पापा को नींद में कसमसाते हुए देखकर उनकी गोद में समाने कि अपनी असफल कोशिशों को मुल्तवित कर देता हूँ.. धीरे से उनका हाथ लेकर अपने गाल पर रखता हूँ.. एक किस्सा फिर कहीं नज़रों के सामने घूमने लगता है.. बचपन में भैया के एक मित्र 'रॉबिन्सन हैम्ब्रम' जब पहली दफे हमारे चक्रधरपुर वाले घर में पापा से मिले थे तब बाद में आश्चर्य से बोले थे, "अंकल का हाथ कितना बड़ा है!!" मैं पापा का बायां हाथ अपने दाहिने हाथ में लेकर अपने हाथ से नापता हूँ.. कुछ मिलीमीटर का फर्क अब भी है, अंतर सिर्फ इतना है कि अब मेरा हाथ बड़ा है.. मैं धीरे से उनके हाथ को चूमता हूँ.. और रख देता हूँ..
बचपन में माँ कहती थी, "तुम खा लिए तो मेरा पेट भर गया.." मुझे आश्चर्य होता था.. अहा!! ये कैसा जादू है? जो मेरे खाने से माँ का पेट भर जाता है? मुझे महाभारत का वह किस्सा याद आता है जिसमें भगवान कृष्ण ने मात्र एक चावल के दाने से सभी ऋषि-मुनियों को तृप्त कर दिया था.. हकीकत का ध्यान बड़े होने पर ही आया.. "मिथकें भी भला कभी सच होती है क्या?" जिस दिन घर में पलाव बनता था उस दिन हम सभी भाई-बहन आपस में लड़ते थे माँ के साथ खाने के लिए, वो काजू-किशमिश चुन कर हम लोगों के लिए अलग रख देती थी.. कहती थी कि उन्हें अच्छा नहीं लगता है ये.. सच कहूँ तो मुझे आज भी नहीं पता कि माँ को खाने में क्या अच्छा लगता है? शायद पापा को पता हो.. मगर हमारी हर एक पसंद-नापसंद का ख्याल तब भी रखती थी, और आज भी रखती है.. अब जब हम भी ख्याल रखने के हालत में आ चुके हैं तब भी मुझे सिर्फ इतना ही पता है कि उन्हें 'वेनिला फ्लेवर' का आइसक्रीम बेहद पसंद है.. शायद भैया को इससे अधिक पता हो, उन्हें उनके साथ समय बिताने का अधिक मौके मिले हैं..
मैं वापस उस बड़े वाले हॉल में आता हूँ जिसमे मुझे हर चीज बड़ी-बड़ी दिखती है.. टीवी बड़ा.. सामने टंगे हुए फोटो बड़े-बड़े.. हम सभी की तस्वीर वह टंगी हुई है.. माँ भी बड़े वाले सोफे पर आराम से बैठी हुई है.. उनके पास जाता हूँ.. पास जाकर जमीन पर बैठ कर अपना सर उनके गोद में रख लेता हूँ.. माँ के हाथ को अपने गालों पर महसूस करता हूँ.. बचपन के किये एक जिद्द कि याद हो आती है.. कितना छोटा था, यह अब याद नहीं.. मगर यकीनन मैं बहुत ही अधिक छोटा रहा होऊंगा, क्योंकि बेहद धुंधली सी याद बाकी है.. माँ अपने घर के काम को लेकर हैरान-परेशान सी थी और मैं जिद्द पकड़े बैठा था कि खाना खाऊंगा तो माँ के गोद में ही बैठ कर.. मेरी वह जिद्द पूरी भी हुई, उनके सारे जरूरी कामों को छोड़कर.. उनके गर्भ में समाने कि इच्छा होती है, जिससे उनसे दूर ना जा सकूं.. चूंकि पता है कि यह एक असफल कोशिश ही होगी, सो कोशिश ही नहीं करता हूँ.. रोने कि असीम इच्छा होती है, मगर नहीं रोता हूँ.. यह एक कष्टप्रद स्थिति होती है जब आपको कुछ करने कि असीम इच्छा हो और आप ना कर पायें.. एक बेचैनी, छटपटाहट की धार भीतर ही कहीं घाव करती एवं कुरेदती रहती है.. समय देखता हूँ, समय होने ही जा रहा है.. धीरे से वहाँ से उठ जाता हूँ.. खाना लेता हूँ, खाता हूँ और निकल जाता हूँ मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ.. मैं अपनी पहचान खोता जा रहा हूँ, जिंदगी एक नया पाठ सीखा रही है.. एक ओढ़ी हुई मुस्कराहट जो अब कभी-कभी लगता है मेरी नई पहचान ही बनती जा रही है..
इन सब बातों को बीते हुए लगभग डेढ़ महीना होने को आ रहा है.. देखिये मम्मी, घर से लाया काजू खत्म होने के बाद मैंने फिर खरीद लिया है.. रात के, नहीं-नहीं.. सुबह के साढ़े चार बजने जा रहे हैं.. मेरी माँ मुझसे नाराज है, पापा तटस्थ मुद्रा लिए हैं, और मैं बहुत उदास हूँ.. कारण बता कर दुनिया के सामने नंगा नहीं होना चाहता.. पापा-मम्मी, I Love You Too Much..
इस लेख से कमेन्ट का ऑप्शन स्वेच्छा से हटाया गया है..
किसी शहर से प्यार करना भी अपने आप में अजीब होता है.. मुझे तो कई शहरों से प्यार हुआ.. सीतामढ़ी, चक्रधरपुर, वेल्लोर, चेन्नई, पटना!!! पटना इन सबमें भी कुछ अव्वल दर्जे का.. सोलह हजार पटरानियों में रुक्मणि जैसा रुतबा!! जवानी के दिनों में हौसलाअफजाई से लेकर आवारागर्दी तक.. सब जाना पटना से.. अब लगभग सात-आठ साल से पटना से बाहर रहने के कारण कई जगहों के नाम बिसरता जा रहा हूँ, मगर उन गलियों के नक्शों को कौन मिटाएगा जो अंदर तक कहीं खुदी हुई है?
उस शहर से पहली मुलाक़ात बचपन में कभी हुई थी, कब, यह अब याद भी नहीं.. सीतामढ़ी से पटना तक गया था, पापा के साथ टंगके, सरकारी गाडी से जो किसी सरकारी काम से जा रहे थे.. गांधी सेतु पुल के ऊपर से गुजरने में अजीब सा सुखद अहसास अब भी याद है.. बिहार में एक कहावत बहुत प्रसिद्द है "उप्पर से फीट-फाट, अंदर से मोकामा घाट".. इस कहावत कि आत्मा को मेरी पीढ़ी से एक पीढ़ी ऊपर वाले लोग ही समझ सकते हैं.. वे लोग जो गाँधी सेतु पुल से बहुत पहले के थे.. या दीगर बात है कि अगली बार पटना आते समय बिहारसरीफ़ और नवादा से गुजरा था..
बोरिंग रोड, राजीव नगर, रुकुनपुरा, खाजपुरा, मछुवाटोली, पत्थर की मस्जिद, दरभंगा हाउस, पटन देवी, नाला रोड, कदमकुवां, राजेन्द्र नगर, शास्त्रीनगर, गाय घाट, राजापुल.. इन सबसे पहचान के बहुत पहले कि बात थी वो.. सर्पेंटाइन रोड को तो बहुत बाद तक मैं उस पंचमंदिर वाले सड़क के नाम से ही पहचानता था.. उसका नाम तक मालूम ना था मुझे..
नाला रोड वाला वह मित्र अभी भी मुझे चिढाते हुए चिढता है, जिसे अब भी यही लगता है कि उसके घर के सामने से रिक्शे से गुजरने वाली हर लड़की उसे ना देख कर मुझ पर नजर रखती थी.. यह शहर वह शहर है जहाँ मेरी आवारागर्दी के किस्से भी मेरे साथ ही जवान हुए थे.. मेरा कोई भी पुराना मित्र मेरी गवाही दे सकता है कि उन आवारागर्दी के दिनों में भी कभी किसी लड़की से छेड़खानी मैंने ना की थी, मगर चंद मित्र ही उस गवाही में यह जोड़ सकते हैं की राजेन्द्र नगर रोड नंबर दो में पहली बार किसी लड़की के घर का पता जानने के लिए उसके रिक्शे को अपनी स्कूटर के रफ़्तार से कैसे सिंक्रोनाइज़ किया था, जिसके घर के आगे एक तख्ती लगी हुई थे "सावधान! यहाँ कुत्ते रहते हैं!!" आखिरी दफे अगस्त के पटना यात्रा में जब अपने उस नाला रोड वाले मित्र के घर गया था, तब बैंगलोर से फोन पर मेरे मित्र ने नौस्टैल्जिक होते हुए पूछा था, "अबे साले, अभी भी लड़कियां तुझे देख रही थी या मेरे छोटे भाई को?"
कुछ हंसी-हंसी में : मेरी एक कालेज की मित्र पटना के अपराधीकरण के कारण अक्सर कहती थी, "मैं पटना सिर्फ तभी जाउंगी जब तुमलोग शादी करोगे, सुना है बहुत अपराध होता है वहाँ!!" और मेरा पटनिया मित्र उसे और भी डराते हुए कहता था, "अरे पटना के बारे में तो पूछो ही मत.. वहाँ जैसे ही सड़क पर आओगी वैसे ही चारों तरफ गोलियाँ ही चलती मिलेगी.. हमलोग तो झुककर-बचकर निकल जाते हैं.." :)
मेरे साथ एक अजीब विडम्बना रही है अब तक.. जो चाहा वो ना मिला, जो मिला वह चाहने से कहीं बढ़कर.. संतुष्टि कभी ना हो पाती है.. यह कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे माँ को बदलकर दूसरी माँ सामने रख कर कोई बोले कि यह पहले वाली से भी अच्छी है.. इश्क किया पटना से, भटक रहा हूँ भारत भर के बड़े शहरों में..
गाय घाट के किनारों पर बैठ कर गंगा की परती जमीन को देखते हुए हाजीपुर में फैले हुए कई किलोमीटर तक केले के खेत.. चिनिया केला.. पटना से दरभंगा जाते हुए बस में, चिनिया केला.. उस परती जमीन में कई प्रकार के पक्षियों से लेकर क्रिकेट खेलते बच्चे और मछुवारे अपनी नावों के साथ..
पटना का जिक्र हो और गाँधी मैदान के साथ-साथ पुस्तक मेले और दसहरा और छठ पूजा में साफ़-सुथरी सड़क का जिक्र ना हो तो पटना के साथ नाइंसाफी जैसा महसूस होता है.. मगर जिक्र किसका करूं? बरसात के मौसम में झील जैसा सीन क्रियेट करता हुआ गांधी मैदान का? या फिर एक ही मैदान में कम से कम बीस क्रिकेट टीम को एक साथ पूरे स्पेस के साथ क्रिकेट खेलते हुए बच्चों और जवानों का? या फिर उसी मैदान के किसी कोने में नशे में धुत्त ताश के पत्तों से दांव पर सबकुछ हारते लोगों का? या फिर एक ही मैदान में एक साथ चलते दो-तीन मेले के बावजूद आधे मैदान में राजनीति के दांव लगाते कुछ नेताओं का? शुरू के दिनों में विश्व पुस्तक मेला पटना में दो साल में एक बार लगता था जो बाद में बदलकर हर साल लगने लगा.. उसके चक्कर लगाते हुए कई दफे पूरी पुस्तक ही पढ़ जाना.. कामिक्स वाले स्टाल में बच्चों के साथ अपनी उस क्रमशः के बाद वाली कामिक्स ढूँढना.. दसहरा के समय डाक बंगला चौराहे को घेर कर दो-तीन किलोमीटर तक गाड़ियों का प्रवेश निषेध करने के बावजूद लाखों की भीड़ देखना.. मौर्यालोक के पहले मंजिल से देखने पर ऐसा महसूस होना जैसे विशाल नरमुंडो का झुण्ड चला आ रहा हो.. यूँ तो वह शहर गंदगियों में डूबा रहता है और लोग नगरपालिका को गालियाँ देते नजर आते हैं, मगर छठ पूजा के समय वही शहर के लोग पूरे शहर को उसकी सडकों समेत नहलाकर, झाडू लगाकर साफ़ किये रखते हैं.. पोस्टल पार्क कि खुरपेंच गलियों से निकलना किसी भी नए के लिए आसान ना हो..
मुझे बुरी यादें कभी परेशान नहीं करती है, बुरी यादें मुझे ढाढस बंधाती है.. हौसला देती है.. कुछ और अच्छा, कुछ और नया करने को.. वहीं अच्छी यादें मुझे अक्सर अवसाद में धकेलती है.. अंदर ही अंदर कुछ शूल सा चुभता महसूस होता है.. अच्छी यादाश्त से बुरी शै और कुछ नहीं होती है शायद..
अधिक कुछ नहीं कहूँगा, बस ज़िया मोहयुद्दीन की आवाज़ में यह नज़्म सुनिए :
तेरे होंठो के फूलों की चाहत में हम, तार के खुश्क टहनी पे वारे गए.. तेरे हाथों के शम्मों की हसरत में हम, नीम तारीख राहों में मारे गए..
सूलियों पर हमारे लबों से परे, तेरे होंठों की लाली लपकती रही.. तेरी जुल्फ़ों कि मस्ती बरसती रही, तेरे हाथों की चांदी चमकती रही..
जब खुली तेरी राहों में शाम-ए-शितम, हम चले आये लाये जहां तक कदम, लब पे हर्फ़-ए-गज़ल, दिल में कंदील-ए-गम, अपना गम था गवाही तेरे हुश्न की.. देख कायम रहे इस गवाही पे हम..
हम ! जो तारीख राहों में मारे गए.. हम ! जो तारीख राहों में मारे गए..
ना रसाई अगर अपनी तदबीर थी, तेरी उल्फत तो अपनी ही तकदीर थी.. किसको शिकवा है गर शौक के सिलसिले, हिज्र की क़त्ल्गाहों से सब जा मिले.. क़त्ल्गाहों से चुन कर हमारे अलम..
और निकलेंगे उस साख के काफिले.. जिनके राह-ए-तलब से हमारे कदम.. मुख़्तसर कर चले दर्द के फासले.. कर चले जिनकी खातिर जहाँगीर हम.. जाँ गवां कर तेरी दिलबरी का भरम..
हम ! जो तारीख राहों में मारे गए.. हम ! जो तारीख राहों में मारे गए.. हम ! जो तारीख राहों में मारे गए..
------------------------- बाद में जोड़ा गया :
इसे एक माफीनामा ही समझ लें.. इस नज़्म का फैज़ से कोई ताल्लुकात नहीं है.. यह पूरी तरह से Zia Mohyeddin का ही है..
कल अहले सुबह बात बेबात कैसे शुरू हुई कुछ याद नहीं है.. मगर बात विकास के साथ हो रही थी और विषय श्रवण कुमार से सम्बंधित.. श्रवण कुमार कैसे थे अथवा उसके माता-पिता कैसे थे, उनकी मृत्यु कैसे हुई, इत्यादी.. मुझे कुछ ही दिन पहले मम्मी से की हुई बात याद आ गई, जो मैं विकास को सुनाने लगा..
किसी बात पर उनसे(मम्मी से) बहस हो रही थी.. वो मुझसे किसी काम के लिए बोल रही थी, और मैं लगातार मना किये जा रहा था.. उन्होंने ताना मारा, यही श्रवण कुमार बनोगे? मैंने पलटवार किया, मैं उतना बेवकूफ नहीं हूँ जितना श्रवण कुमार थे.. मम्मी चौंकी, ये क्या बात हुई भला? मैं बोला, सही बात कही.. उन्होंने पूछा, भला कैसे? मैंने प्रतिउत्तर दिया, और नहीं तो क्या? माँ-बाप बोले तीर्थ यात्रा करनी है, और बेटा तुरत्ते बड़का बला तराजू लेकर आया, माँ-बाप को दोनों पलडों पर बिठाया, फिर ले चला तीर्थ कराने कंधा पर टांग कर.. कितना कष्ट हुआ होगा उनके माँ-बाप को, सो भला? घुमाना ही था तो बैलगाडी करता, पास में पैसा नहीं था तो पहले कमाता फिर घुमाता.. माँ-बाप अंधे ही थे ना, कोई मरणासन्न स्थिति में तो नहीं थे? फिर बात बदली मैंने.. बोला, वैसे भी मुझे पता है कि कल को मैं अगर श्रवण कुमार जैसा हो भी जाऊं तो भी आपलोग उनके माता-पिता जितना स्वार्थी तो ना ही होंगे भला, होंगे क्या? तीर्थयात्रा करने का शौक किस धार्मिक आदमी को नहीं होता है? सो उन्हें भी था.. अच्छा किये जो मन की बात मन में ना रख कर बेटे को भी बता दी.. बेटा तो बेवकूफ था ही, सो चट से ऑफर कर दिया होगा कि आपको कन्धों पर बिठा कर घुमाने ले जाऊँगा, मानो श्रवण कुमार ना हुए हनुमान जी हो गए.. और माता-पिता भी इत्ता स्वार्थी? राम-राम.. बेटा को कितना कष्ट होगा यह सोचने की भी फुरसत नहीं.. बस घूमने जाना है तो जाना है.. माँ-बाप अंधे ही थे ना, कोई लूले-लंगड़े तो नहीं थे.. बेटा कि बेवकूफी को सुधारेंगे सो नहीं.. बेटा को बोलते कि चलो बेटा, कंधवा पे नै चढेंगे, हथवे पकड़ कर घूम आयेंगे.. लेकिन नहीं.. उनको तो पैदल चलने का नाम सुन कर ही आलस आने लगा होगा!! उन दोनों को बेटे के कष्ट के आगे अपना मोक्ष और आलस दिख रहा होगा.. "हमको तो बस इतना पता है कि मेरे माँ-बाप उतना स्वार्थी नहीं हैं!! है क्या?"
खैर, इतनी बात सुन कर मम्मी भी जो बोल रही थी वो भूल गई, और हँसते हुए फोन रख दी.. :)
हर किसी कि उम्र में उसके हिस्से का संघर्ष छिपा होता है.. वह दिन याद आता है, जब दुनिया के साथ संघर्ष के सिलसिले की शुरुवात नहीं हुई थी तब सोचता था.. चौंधिया कर किसी दूसरे के किस्सों को सुनता था.. गुनता था.. व आह्लादित हुआ करता था.. जैसे कितने बड़े और महान आदमी के बीच बैठने का सौभाग्य मिला हो.. कुछ समय बीता.. अपना भी दिन आया, अपने हिस्से के संघर्ष को जीने का.. फिर अपना किस्सा भी कुछ अपनों की बीच भूंकना शुरू किया गया.. आज भी वह संघर्ष का सिलसिला चल रहा है.. फर्क सिर्फ इतना आया है कि अब भूंकना बंद हो चुका है.. अब ये संघर्ष वैसी ही बात लगती है जैसे दिनचर्या.. जैसे खाते हैं, जैसे सोते हैं, जैसे हगते हैं, जैसे मूतते हैं.. वैसे ही संघर्ष भी कर लेते हैं यार..
अब शांतचित होकर सोचता हूँ, देखता हूँ, तो पाता हूँ कि हर किसी ने अपने हिस्से के संघर्ष को जिया है.. जरूरी नहीं की सभी का संघर्ष आर्थिक ही हो.. किसी का मानसिक, तो किसी का शारीरिक भी होता है.. ये दुनिया किसी को भी बख्सती नहीं है.. अपने ठोकर पर लेकर चलती है.. ऐसी दुनिया जहाँ हर किसी को, हर खुशी की कीमत चुकानी होती है.. जितनी छोटी खुशी, आपके औकात के हिसाब से उतनी ही कम कीमत.. जितनी बड़ी खुशी, आपके औकात के हिसाब से उतनी ही अधिक कीमत.. बिसात बिछी हुई है, बस हर कोई आपके दांव के इन्तजार में खड़ा सा दिखता है.. वो भी तो कहीं खड़ा है, किसी और के चाल के इन्तजार में.. बस शह औ मात!!
रात के इस पहर में अपने दो बजिया बैराग्य को डांट-डपट कर, गरिया कर, मैं अपनी बकवास कर चुका, आपका क्या अनुभव रहा है इस बाबत?
इस नींद को भी मुझी से दुश्मनी क्यों है भला? सोने जाओ तो आती नहीं.. ना सोने के समय, बेसमय आ धमकती है.. रात-बिरात आँख मूंदे ही हिसाब-किताब बिठाने लगता है.. ये तेरा कहाँ, ये तो मेरे हिस्से का गपक गया.. अपने जो दूसरे के हिस्से का गपक गया था उसका हिसाब कोई नहीं.. तेरा.. मेरा.. इसका.. उसका.. किसका? खैर!!!
अभी कुछ दिन पहले एक कामिक्स पढ़ रहा था "वेताल/फैंटम" का.. उसमे उसने एक ट्रक के पहिये को जैक लगा कर उठा दिया, वहाँ खड़े बहुत सारे जंगली लोगों ने एक नयी कहावत कि शुरुवात कर दी "वेताल में सौ आदमियों जितना बल है, उसने अकेले कई हाथियों जितना भारी मशीनी दानव को उठा लिया".. यह किस्सा बताने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि किवदंतियां अथवा दंतकथाओं में अतिशयोक्तियाँ शायद ऐसे ही अज्ञान कि वजह से आती है..
जब तक खुद तर्क कर कुछ समझने कि अवस्था में नहीं था तब तक मैंने भी राम को भगवान कि तरह ही पूजा है.. आज जब तर्क से सब समझने कि कोशिश करता हूँ तो उन्हें कुछ कमियों के साथ एक कथा का महानायक, महापुरुष मानता हूँ.. भगवान/अल्लाह जैसी किसी भी चीज पर आस्था ना होते हुए भी कहीं रामायण का जिक्र आता है तो रुक कर उसे सुनना चाहता हूँ.. किसी आदर्श कथा कि तरह.. रामायण से सम्बंधित जितने भी एनीमेशन बने हैं वह सभी देख रखी है मैंने, रामानंद सागर द्वारा बनाये गए रामायण को भी दो-तीन दफे सम्पूर्ण रूप से देखा हूँ.. रामायण महाकाव्य का हिंदी रूपांतरण भी पढ़ा हूँ.. और इतना कुछ देखने पढ़ने के बाद भी अगर कहीं किसी चैनल पर रामायण(अक्सर स्टार के किसी चैनल या कार्टून नेटवर्क पर) आता देखता हूँ तो वहीं ठहर जाता हूँ.. तुलसी कृत रामचरितमानस का हिंदी अनुवाद भी पढ़ा हूँ.. कुल मिला कर मेरे यह सब कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना ही है कि मुझे यह कहानी अपनी और बेहद आकर्षित करता है.. मेरे मुताबिक यह भारत का या शायद विश्व का सबसे पुरातन साहित्य है, जो संभव है किसी राजा के गुणगान में लिखा गया हो अथवा कोरी कल्पना भी हो सकती है..
आप क्या कहते हैं?
यह तस्वीर मुझे गूगल पर सर्च करने पर मिला.. Indiatimes के साईट का पता दिख रहा है, मगर उसका लिंक गायब है.. खैर इस बढ़िया चित्र के लिए Indiatimes को धन्यवाद तो दे ही दूँ.. वैसे यह एक लेख का हिस्सा था जो अयोध्या मुद्दे पर लिखा था मगर समय पर पोस्ट ना कर सकने के कारण वह लेख अपना अर्थ खो बैठा.. सो उसके इस हिस्से को ही छाप रहा हूँ.. एक अलग तरीके से..