Wednesday, November 04, 2009

बदलाव के चिन्ह एक बार फिर

आजकल खूब हंसता हूं.. जहां गुस्सा आना चहिये होता है, वहां भी हंसने लगा हूं.. कभी खुद पर हंसता हूं तो कभी अपने भाग्य पर.. पहले कभी भी भाग्यवादी नहीं था, मगर अब लगता है जैसे धीरे धीरे भाग्यवादी होता जा रहा हूं.. कारण बस इतना ही है कि कहीं देखता हूं कि लोग मर मर कर काम कर रहे हैं मगर कुछ फायदा उन्हें नहीं मिल रहा है, और कहीं देखता हूं की बिना कुछ किये धराये बैठे बिठाये सब कुछ किसी की झोली में गिर रहा है.. (बस अभी अभी अपने ऑफिस के मित्र, गुरू और इमिडिएट बॉस, माने टीम लीड, से बात हुई और वह भी बोल रहे थे कि कल कुछ बातें हुई लीड के साथ और उन्हें उस पर गुस्सा आने के बदले हंसी आ रही थी..) :)

बदलाव जीवन का अटूट सत्य है.. आज से तीन-साढ़े तीन साल पहले मुझमे बदलाव बहुत-बहुत समय बाद आता था.. मगर आजकल उसी बदलाव को आने में सालभर भी नहीं लगता है, और देखते ही देखते पूरी सोच को ही एक नया घुमाव मिल जाता है.. आजकल ऐसा लग रहा है कि मैं फिर किसी भीषण बदलाव की ओर बढ़ रहा हूं.. पता नहीं यह अच्छा होगा या बुरा..

अगर कार्यालय की ही बात करूं तो, पहले जिन बातों पर अपनी असहमती का सुर हमेशा ऊंचा किये फिरता था, अब उन्हीं बातों को चुपचाप मुस्कुरा कर सुनता हूं.. कुछ कहता नहीं.. अब शायद समझ गया हूं कि मेरे कुछ-कहने सुनने से उन्हें कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला है.. कभी-कभी लगता है कि इस तरह के विचार किसी लाचारी या विवशता के तहत आने शुरू हुये हैं या फिर मन ही मन एक तरह का विद्रोह इन सबके खिलाफ पनप रहा है? आने वाले समय में ही शायद इन सब प्रश्नों के उत्तर मिल सके..

खैर चाहे कुछ भी हो, मगर एक बात अब अक्सर मन में आती है.. जितनी अधिक मायूसी और परेशानी जिंदगी में आती है, उतनी ही बार एक बार फिर उठकर उन सबसे लड़ने का मन करता है.. अंदर से एक जिद्द सा पनपता है, कुछ अच्छा करने को.. जिंदगी पहले से कुछ और बेहतर बनाने को.. आजकल कुछ ऐसी ही धुन लिये जी रहा हूं.. बचपन में पापाजी अक्सर एक कविता सुनाया करते थे, "मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है.." इसे सार्थक कर दिखाने की जिद्द सी मन में है..

चलते-चलते : "आजकल ब्लौग लिखना बहुत कम हो गया है.. कई बार कुछ लिखने बैठता हूं तो इतने सारे विचार एक साथ मुझ पर हमला करते हैं कि उनके बीच मैं कोई तारतम्य ही नहीं बिठा पाता हूं.. तो वहीं कई बार हिंदी ब्लौग जगत के तिल का ताड़ बनाने वालों को पढ़ सुनकर भी मन आहत हो जाता है.."

17 टिप्पणी:

आभा said...

जीवन के अनुभव बदलाव की ओर ही ले जाते हैं ,बदलाव जरूरी भी है..

पी.सी.गोदियाल said...

इसी का नाम जिन्दगी है PD साहब, मन के अन्दर का गुबार निकालना बहुत जरूरी है, मैं भी यहाँ ब्लॉग पर ही सुबह से शाम तक झक मारता रहता हूँ, क्या मिलता है? मौद्रिक रूप में देखे तो कुछ नहीं लेकिन अगर दुसरे ढंग से देखू तो मानसिक शांति, अतः आप से भी अनुरोध करूंगा कि लिखते रहिये jab jab vakt mile कोई पढ़े अथवा नहीं !

Mired Mirage said...

बदलाव आना बहुत आवश्यक है विशेषकर तब जब वह सकारात्मक हो। भाग्य को न मानें तो भी यह तो तय है कि बराबर मेहनत का बराबर फल नहीं मिलता।
तिल को ताड़ बना देना भी एक कला ही है।
घुघूती बासूती

डॉ .अनुराग said...

अच्छा है धीरे धीरे मेच्योर हो रहे हो ..या खालिस भाषा में कहे तो बूढा रहे हो .... आज अपनी बिल्डिंग की छत पे जाकर कॉलेज के कुछ पुराने दोस्तों को फोन लगायो ....बियर शियर पीते हो या नहीं ...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप का यह बदलाव गंभीर है और सही है। जो दोष आप देख रहे हैं वे सब व्यवस्था के हैं। व्यवस्था अकेला व्यक्ति नहीं पूरी जनता या उस का एक बड़ा हिस्सा बदलता है।

AlbelaKhatri.com said...

achha laga........

bahut achha laga !

lagaataar aya karo bhai, bahut khub likhte ho.

-abhinandan !

बी एस पाबला said...

डॉ अनुराग की बात पर ध्यान दिया जाए, मित्र!

बी एस पाबला

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

जमाये रहिये जी!

सुशील कुमार छौक्कर said...

प्रशांत जी ये हाल तो हमारा भी काफी दिनों से है। पर अपना गुस्सा अपने पर ही निकाल रहे है। वैसे "मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है.." ये लाईन वाकई बहुत पसंद आई। वैसे अनुराग जी की सलाह पर भी गौर किया जा सकता है:)

काजल कुमार Kajal Kumar said...

इसे ही ,शायद, अनुभव से पके बाल कहते हैं.

कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra) said...

इसमें कोई बुराई नहीं, कि व्यवस्था के प्रति विद्रोह में धार कम हो रही है।

विद्रोह अगर पेशाब के झाग सा हो, तो कोई सकारात्मक परिणाम नहीं देगा। परिपक्वता के लक्षण अच्छे हैं.. लेकिन यौवन बरकरार रखें।

अनुराग जी की सलाह भी काबिले-गौर है...

रंजन said...

अच्छा बदलाव है.. लगे रहो..

अभिषेक ओझा said...

मुझे तो लगा कि कहना चाह रहे हैं: दर्द जब हद से अधिक बढ़ जाए तो दवा बन जाता है :)

राज भाटिय़ा said...

भाई जिन्दगी मै बदलाव जरुरी है, मायूस कभी मत होना, युही हंसते रहो.... ओर कोई दिल का गुबार हो तो उसे उडेल दो.... दिल मै कभी मत रखो, फ़िर हमेशा खुश रहोगे.

अजित वडनेरकर said...

सोच सही दिशा में बढ़ रही है।
गलत कुछ नहीं है।शुभकामनाएं।

Anil Pusadkar said...

पीडी,परिवर्तन प्रगति का परिचायक है।

PD said...

यहां मेरे अच्छे भविष्य की शुभकामनाओ के साथ आने वाले मित्रगणों को धन्यवाद देना चाहूंगा.. और साथ ही अनुराग जी के कमेंट से लोगों में जो जिज्ञासा पैदा हो गई है उसे भी शांत किये देता हूं.. :)

मैं बीयर शीयर पीता तो नहीं हूं मगर मुझे उससे कोई ज्यादा परहेज भी नहीं है.. अभी तक वीकडेज चल रहा था सो कोई भी मित्र अधिक बात करने की स्थिति में नहीं था.. आज एक एक करके सभी को फोन लगाता हूं.. मगर छत पर बैठ कर नहीं.. क्योंकि आजकल चेन्नई में दो-तीन दिनों से मूसलाधार बारीश हो रही है.. :)